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तीर्थयात्रा एक चिंतन

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तीर्थयात्रा एक चिंतन

संसार समुद्र से पार होने की कला जहाँ पर सीखने को मिलती है वे स्थल तीर्थ कहलाते हैं। मनुष्य सामाजिक प्राणी होते हुए भी स्व—पर कल्याण की भावना से निहित होता है और इस पुनीतं भावना से वह अचेतन तीर्थों का निर्माण करता है। अर्थात् जिनायतनों की स्थापना करता है। श्रमण स्वयं को तीर्थ बनाते हुए स्व—पर कल्याण की भावना से निहित होते हुए तीर्थों के निर्माण का उपदेश मात्र देते हैं, आदेश नहीं देते, न ही स्वयं स्वयं भू बनकर पूर्ण जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हैं। तीर्थस्थल पवित्रता, शांति एवं कल्याण के धाम होते हैं। किन्तु आज उद्देश्य सोच में परिवर्तन होता जा रहा है और तीर्थों को पर्यटन स्थलों में परिर्वितत किया जा रहा है। तीर्थयात्री भी तीर्थों पर जाकर उन संसाधनों की अपेक्षा रखते हैं जो असंयम को पुष्ट करने वाले हों। मैं यहाँ पर कुछ बिन्दुओं पर चर्चा इस विनम्र भावना से कर रहा हूँ कि तीर्थों की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए तीर्थयात्रा को स्व—पर कल्याण में निमित्त बनायें।

तीर्थ यात्रा का उद्देश्य

१. पंच पाप एवं कषायवृत्ति का त्याग करना।

२. व्रत, संयम, तपश्चरण में प्रवृत्ति करना।

३. आत्म जागृति हेतु प्रयत्न करना।

४. तत्त्वज्ञान की जानकारी प्राप्त करना।

५. तीर्थ क्षेत्र विषयक ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक जानकारी प्राप्त करना।

६. महापुरुषों, वीतरागी संतो की अभूतपूर्व साधना का स्मरण कर संमार्ग पर चलने का प्रयास करना।

तीर्थ यात्री कौन—

तीर्थयात्रा पर निकला हुआ भव्य जीव ही तीर्थ यात्री है। शर्त यह है कि—

तीर्थ यात्रा का उद्देश्य

१. जिन धर्म एवं जिनेन्द्रप्रभु के प्रति अत्यन्त भक्ति भाव रखता हो।

२. संसार के दु:खों से भयभीत हो।

३. मंदकषायी एवं त्याग की भावना रखता हो।

४. मन, वाणी और काय के शृंगार से युक्त हो।

(अ) मन का शृंगार—दूसरों के प्रति दूषित विचार, ईष्र्या की भावना न रखकर मैत्रीभाव धारण करना।

(ब) वाणी का शृंगार—अपशब्द, क्रोधयुक्त वचन, अशिष्ट वचन न बोलकर हित—मित वचन बोलना।

(स) तन का शृंगार—हिंसात्मक सौन्दर्य प्रसाधन की सामग्री का प्रयोग न करने अपने सहर्धािमयों के प्रति एवं दु:खी जीवों के प्रति सहयोग तथा करुणा की भावना रखना।

तीर्थ यात्रा के दौरान क्या करें

१. समुचित जानकारी के साथ योग्य ऋतु में यात्रा प्रारम्भ करें।

२. यात्रा के दौरान सूर्यास्त के पूर्व सात्त्विक भोजन की ग्रहण करें।

३. यात्रा के दौरान ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें।

४. सादगीपूर्ण श्वेत अथवा केशरिया, पीत परिधान ग्रहण करें।

५. यात्रा के दौरान धर्मध्यान की वृद्धि के लिए पूजन, स्वाध्याय, जापमाला के साथ स्तुति—स्तोत्र, भजन का पाठ करें।

६. अभक्ष्य पदार्थ जमीकंद, होटल भोजन, अशुद्ध पेय पदार्थ आदि का त्याग रखें।

७. हिल—मिलकर वात्सल्य भावपूर्वक यात्रा करें।

चिंतन सूत्र—यात्रा के दौरान निम्न बिन्दुओं का चिंतन कर सकते हैं—

१. यात्रा क्यों, किसके लिए कर रहे हैं ?

२. वित्तरागी नहीं अपितु वीतरागी बनने के लिए यात्रा करें।

३. धर्म हमारा मित्र है, पाप हमारा शत्रु है।

४. इन भावों का फल क्या होगा।

५. बाहर के पट बंदकर, अंदर के पट खोल।

६. जननी माँ से प्यारी, माँ जिनवाणी हमारी।

७. मरना भला विदेश में, जहाँ न अपना कोय।

८. आतम के अहित विषय कषाय इनमें मेरी परिणति न जायें।

तीर्थ यात्रा का फल—परिणामों में निर्मलता आने से पुण्यवृद्धि होती है। पुण्योदय से सांसारिक सुख की प्राप्ति होती है और परम्परा से सद्गति की प्राप्ति के साथ निर्वाण की प्राप्ति भी होती है। दिगम्बर संत भी चेतन तीर्थों के रूप में जाने जाते हैं। अत: चातुर्मास के दौरान चेतन साधु की गरिमा को बनाते हुए उनकी प्रशस्त वैयावृत्ति करें एवं सदुपदेश ग्रहण कर अपना जीवन परिर्वितत कर संमार्ग का अनुसरण करें तो हमारा जीवन सफल एवं सार्थक हो सकता है।


ब्र. श्री संदीप ‘सरल’ बीना (म. प्र.)
जैन प्रचारक अगस्त २०१४ पेज नं. ५