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तृष्णाष्टक

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तृष्णाष्टक

ये दाँत हाथी के दाँत सम, मजबूत हिलने लग गये ।

जैसे गिरे छत की कड़ी, एक एक गिरने लग गये ।।
खूँटे गिरे ड़ाढ़े गिरी, बत्तीसी सारी गिर गई ।
मुख हो गया है पोपला, तृष्णा नहीं बूढ़ी हुई ।।१।।

आँखे हुई है धुंधली , पढ़ना पढ़ाना बंद है ।
नहि पास तक का दीखता, अब दृष्टि इतनी मंद है ।।
अब कुछ नहि है दीखता, रात दिन में हो गई ।
आँखे दिखाई आँख ने, तृष्णा नहीं बूढ़ी हुई ।।२।।

अब कान आना कान की, ऊँचा सुनाई देत है ।
जब कान पर चिल्लाय कोई , बात कुछ सुन लेत है।।
सुनना सुनाना छुट गया , अब आस सुनने की गई ।
बहरे हुए हैं कान पर, तृष्णा नहीं बूढ़ी हुई।।३।।

काया गली झुर्री पड़ी, लोहु हुआ है लापता ।
पग डगमगाते चालते, कर काँपते सिर हालता।।
ली हाथ लाठी बाँस की, धुन सम कमरियाँ झुक गई।
काया हुई बूढ़ी मगर, तृष्णा नहीं बूढ़ी हुई।।४।।

बेटे बहू विपरीत है, माने नहीं कोई कहा।
रोटी मिले नहि वक्त पर, है स्वाद भी जाता रहा।।
बाबा मरा भाई मरी कूँच पत्नी कर गई ।
इज्जत गई लज्जत गई , तृष्णा नहीं बूढ़ी हुई।।५।।

पुत्र पौत्र सब कहत है, बूढ़ा बहुत दुख पाय है ।
देता हमें भी कष्ट है, मर क्यों नहीं अब जाये है।।
मर जाय अच्छा होय अब तो, कष्ट की हद हो गई ।
मरना न फिर भी चाहता, तृष्णा नहीं बूढ़ी हुई ।।६।।

सब इन्द्रियाँ बलहीन हैं, नहि देह में सामथ्र्य है ।
नहि खा सके नहि पी सके, सब भांति ही असमर्थ है।।
नहि हिल सके नहि डुल सके, अब खाट तह भी कट गई।
मन ठोस है तन खोखला, तृष्णा नहीं बूढ़ी हुई।।७।।

बूढ़ा मरा सब चाहते, बूढ़ा मरा नहि चाहता।
कुल ग्राम के धन धान के, सो सो मनोरथ ठानता।।
वाणी हुई है बंद, नहि देह आसक्ति गई।
तरुणी हुई है वासना, तृष्णा नहीं बूढ़ी हुई।।८।।