दर्शन समीक्षा

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दर्शन समीक्षा

जिसके द्वारा वस्तुतत्त्व का निर्णय किया जाता है, वह [[दर्शनशास्त्र]] है। कहा भी है-‘दृश्यते निर्णीयते वस्तुतत्त्वमनेनेति दर्शनम्’। इस लक्षण से [[दर्शनशास्त्र]] तर्व-वितर्व मन्थन ये परीक्षास्वरूप हैं, जो कि तत्त्वों के निर्णय में प्रयोजक हैं, जैसे-यह संसार नित्य है या अनित्य? इसकी सृष्टि करने वाला कोई है या नहीं? आत्मा का स्वरूप क्या है? इसका पुनर्जन्म होता है या नहीं? ईश्वर की सत्ता है या नहीं? इत्यादि प्रश्नों का समुचित उत्तर देना दर्शनशास्त्र का काम है। दर्शन को दो भागों में विभक्त किया है-भारतीय दर्शन और पाश्चात्यदर्शन। भारतीय दर्शन में भी वैदिक दर्शन और अवैदिक दर्शन ये दो भेद होते हैं। वैदिक दर्शन में मुख्यत: सांख्य, वेदान्त, मीमांसा, योग, न्याय तथा वैशेषिक दर्शन लिये जाते हैं अर्थात् ये सभी दर्शन वेद को मानने वाले हैं। अवैदिक दर्शन में जैन, बौद्ध और चार्वाक माने गये हैं क्योंकि ये वेद परम्परा के पोषक नहीं हैं। न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त ये दर्शन आस्तिक एवं जैन, बौद्ध और चार्वाक नास्तिक दर्शन हैं, ऐसा भी लोग कहते हैं किन्तु यह बात ठीक नहीं है। वास्तव में आत्मा, ईश्वर और परलोक के अस्तित्व को मानने वाले जैन नास्तिक नहीं हैं, आस्तिक ही हैं। यदि कोई कहे कि ये जैन ईश्वर को सृष्टि का कर्ता नहीं मानते हैं अत: नास्तिक हैं, सो भी ठीक नहीं है क्योंकि जैन ईश्वर को सृष्टि का कर्ता न मानकर भी अनन्त ईश्वरों की सत्ता स्वीकार करते हैं अत: जैन आस्तिकवादी ही हैं। यहाँ भारतीय दर्शन की संक्षिप्त मान्यता दिखाकर उस पर विचार करना है।

चार्वाक दर्शन'

चार्वाक पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु इन चारों तत्त्वों को भूतचतुष्टय कहते हैं। उनका कहना है कि इन चार तत्त्वों के मिलने से चैतन्य की उत्पत्ति हो जाती है, जैसे-कि गोबर आदि से बिच्छू उत्पन्न हुए देखे जाते हैं। यह शरीर को ही आत्मा मानता है। जन्म के पहले और मरण के अनन्तर आत्मा नाम की कोई चीज नहीं है। परलोक, ईश्वर, स्वर्ग, नरक आदि कुछ भी नहीं है, जो प्रत्यक्ष में दिखता है उसके सिवाय कुछ भी नहीं है अत: प्रत्यक्ष ही एक प्रमाण है। यह सर्वज्ञ आदि के अस्तित्व को भी नहीं मानता है अत: नास्तिकवादी कहलाता है। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये सर्वथा अचेतन हैं। गोबर आदि में तिर्यंचगति, त्रीन्द्रिय जाति आदि नामकर्म के उदय से अनादि चैतन्य सत्ता वाला जीव आकर जन्म लेता है। जाति स्मरण आदि निमित्तों से जीव के परलोक का अस्तित्व और जीव का अस्तित्व सिद्ध हो जाता है। इसी तरह आत्मा का अस्तित्व सिद्ध हो जाने से सर्वज्ञ आदि की भी सिद्धि हो जाती है।

बौद्ध दर्शन

बौद्ध दर्शन का मौलिक सिद्धान्त है ‘सर्वं क्षणिकं सत्त्वात्’ सभी पदार्थ क्षणिक हैं क्योंकि सत्रूप हैं। बौद्ध के भगवान बुद्ध हैं। इनके यहाँ आत्मा का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है किन्तु रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान इन पाँच स्कन्धों के समुदाय को ही आत्मा माना है।

बौद्धों के चार भेद हैं

माध्यमिक-बाह्य अभ्यन्तर समस्त वस्तु को शून्य रूप मानने वाले, योगाचार-बाह्य वस्तु का अभाव मानने वाले, सौत्रांतिक-बाह्य वस्तु को अनुमान ज्ञान का विषय मानने वाले, वैभाषिक-बाह्य वस्तु को प्रत्यक्ष मानने वाले। ये चारों ही बौद्ध वस्तु को सर्वथा क्षणिक मानते हैं। एक समय मात्र अवस्थित मानते हैं। जैनाचार्यों ने सूक्ष्म ऋजुसूत्र नय से वस्तु की अर्थपर्याय को एक क्षण अवस्थित माना है। उसी का एकान्त लेकर के बौद्धों ने द्रव्य को ही क्षणिक मान लिया है, जो कि गलत है।

सांख्य दर्शन

कुछ सांख्य ईश्वर को नहीं मानकर केवल अध्यात्मवादी हैं। कुछ सांख्य ईश्वर को ही देवता मानते हैं। ये दोनों ही सांख्य साधारणतया पच्चीस तत्त्वों को स्वीकार करते हैं। सत्त्व, रज, तम इन तीनों गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है। इनके यहाँ आत्मा अमूर्त, चेतन, भोक्ता, नित्य, सर्वगत, निष्क्रिय, अकर्ता, निर्गुण और सूक्ष्म है। प्रकृति और आत्मा के संयोग से ही ये सृष्टि की उत्पत्ति मानते हैं। कुछ ईश्वर को भी सृष्टि का कर्ता मान लेते हैं।

पच्चीस तत्त्व

प्रकृति से महान् (बुद्धि), बुद्धि से अहंकार, अहंकार से सोलह गुण (स्पर्शन आदि पाँच इन्द्रियाँ, पायु, उपस्थ, वाणी, हस्त, पाद तथा मन और रूप, रस, गंध, स्पर्श तथा शब्द) उत्पन्न होते हैं। इनमें से पाँच तन्मात्राओं से पाँच भूतों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार सांख्य मत में प्रकृति आदि चौबीस तत्त्वरूप परिणत हुआ प्रधान तत्त्व एक है। इनके यहाँ प्रकृति के वियोग का नाम मोक्ष है। वह प्रकृति तथा पुरुष के विज्ञानरूप तत्त्व ज्ञान से होता है। इस पर जैनाचार्यों का कहना है कि यदि पुरुष सर्वथा अकर्ता, निर्गुण, निष्क्रिय है, तो उसका प्रकृति के साथ संयोग भी नहीं हो सकता है क्योंकि कूटस्थ नित्य सिद्धान्त में परिणमन का अभाव होने से पुरुष को संसार और मोक्ष की व्यवस्था नहीं बन सकती है, इत्यादि अनेकों दोष आते हैं। ये सांख्य प्रत्येक वस्तु को सर्वथा नित्य ही मानते हैं, जो कि द्रव्यार्थिकनय का विषय है। एकान्त, दुराग्रही होने से इनका सिद्धान्त भी दूषित ही है।

नैयायिक दर्शन

इनके मत में सोलह तत्त्व हैं। प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्व, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान। नैयायिक लोग कहते हैं कि जगत् की सृष्टि तथा संहार करने वाला, व्यापक, नित्य, एक, सर्वज्ञ, ज्ञानशाली, महेश्वर सदाशिव है अर्थात् ईश्वर को सृष्टि का कर्ता मानते हैं। जैनाचार्यों का कहना है कि यदि कोई ईश्वर सृष्टि का कर्ता है, तो उसने दु:खी जीव क्यों बनाये? यदि कहो कि उन्होंने पाप किया था, तो ईश्वर ने पाप की सृष्टि भी क्यों की थी क्योंकि ईश्वर परम कारुणिक होता है। उसे पाप और पापियों की सृष्टि भी नहीं बनाना चाहिए था अत: सभी जीव अनादिकाल से कर्मों से बंधे हुए हैंं, वे ही पुरुषार्थ द्वारा कर्मों का नाश कर ईश्वर या मुक्त होते हैं पुन: कृतकृत्य होने के बाद वे सृष्टि निर्माण आदि झंझटों में नहीं पड़ते हैं। वैशेषिक दर्शन-ये लोग द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव ये सात पदार्थ मानते हैं। जिस द्रव्य में समवाय से ज्ञान रहता है, वही आत्मा है क्योंकि आत्मा में ज्ञान समवाय से रहता है। आत्मा के दो भेद हैं-जीवात्मा और परमात्मा। परमात्मा ईश्वर एक है। जीवात्मा प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न है, व्यापक है, नित्य है। वैशेषिक के यहाँ द्रव्य, गुण आदि परस्पर में भिन्न-भिन्न हैं। समवाय संबंध से रहते हैं। नैयायिक के सदृश ये भी ईश्वर को सृष्टि का कर्ता मानते हैं। कुछ ही विषयों में नैयायिक वैशेषिकों में भेद हैं, प्राय: सभी सिद्धान्त सदृश ही हैं। नैयायिक और वैशेषिक इन दोनों दर्शन का नाम ‘योग’ है। इस वैशेषिक ने बुद्धि, सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार इन नव गुणों के अत्यन्त विनाश को मोक्ष माना है। जैनाचार्यों ने इनकी सभी मान्यताओं का निराकरण किया है। वास्तव में ज्ञान और सुख का भी मोक्ष में विनाश मान लेना, तो सर्वथा मूर्खता का ही द्योतक है। ज्ञान और सुख के लिए ही तो लोग मुक्ति हेतुक अनुष्ठान करते हैं अत: इनका भी मत दूषित है। मीमांसा दर्शदर्शनमांसा-यथार्थ विवेचन। इसके दो भेद हैं-कर्ममीमांसा और ज्ञानमीमांसा। यज्ञ विधि, कर्मकाण्ड, अनुष्ठान आदि कर्म- मीमांसा का विषय है एवं जीव, जगत्, ईश्वर का स्वरूप आदि का निरूपण ज्ञानमीमांसा का विषय है। आजकल ज्ञानमीमांसा को ‘वेदान्त’ शब्द से कहा जाता है। मीमांसा ददर्शनके सूत्रकार जैमिनी हैं। इनमें भी कुमारिल भट्ट के शिष्य भाट्ट और प्रभाकर के शिष्य प्राभाकर कहलाते हैं। मीमांसक कहते हैं कि-कोई भी सर्वज्ञ, सर्वदर्शी नहीं है। अतीन्द्रिय पदार्थों का ददर्शनवेद वाक्यों से ही होता है। ये लोग वेद को अपौरुषेय मानकर प्रमाण मानते हैं किन्तु जैनाचार्यों ने सर्वज्ञ का अस्तित्व सिद्ध करके इनके अपौरुषेय वेद का निराकरण कर दिया है क्योकि पुरुषकृत न होने से वेद प्रमाण हो जावें, तब तो चोरी, व्यभिचार आदि का उपदेश किसी भी पुरुष के द्वारा वर्णित नहीं है, वो भी प्रमाण हो जायेगा। दूसरी बात यह है कि वेद में हिंसादि के पोषक वाक्य होने से वेद अप्रमाण ही हैं। वेदान्त ददर्शन


‘‘सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति कचन।
आरामं तस्य पश्यंति न तं पश्यति कश्चन।।’’

यह सारा जगत् एक ब्रह्म स्वरूप ही है, यहाँ अन्य कुछ भी नहीं है, सब उसी के प्रभाव को देखते हैं और उसको कोई नहीं देख सकता है। ये ग्राम, नगर आदि चेतन, अचेतन पदार्थ सब उसी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं, उसी की ही पर्यायें हैं। इनके यहाँ कहा है कि ‘अरे भक्त! तुम आत्मा को देखो, सुनो, मानो और ध्यान करो। एक ही ब्रह्म सभी प्राणियों में भासमान होता है, वह एक रूप है फिर भी अभी में अवस्थित है। ये ब्रह्माद्वैतवादी लोग एक ब्रह्म के अतिरिक्त सारे जगत् को अविद्या-माया का विलास बतलाते हैं। किन्तु वास्तव में उनका यह सिद्धान्त स्वयं ही अविद्या का विलास है। देखो! चेतन स्वरूप ब्रह्म से समस्त चेतन, अचेतन रूप जगत् की उत्पत्ति मानना तो नितान्त गलत है। फिर एक का सुख-दुख दूसरे को नहीं होता है। यह स्पष्ट है पुन: सभी में एक आत्मा का अस्तित्व मानना ठीक नहीं है। हाँ! प्रत्येक आत्मा में ब्रह्म स्वरूप परमात्मा बनने की शक्ति विद्यमान होने से प्रत्येक आत्मा को कथंचित् शुद्धनय से शुद्ध ब्रह्मस्वरूप कह देना ठीक है। कहा भी है१ ‘सव्वे सुद्धा हु सुद्धणया’ सभी जीव शुद्धनय से शुद्ध ही हैं। यदि इसी का एकान्त लिया जाता है, तो महा मिथ्यात्व आ जाता है। जैनददर्शनयह जैनधर्म अनादि निधन है। इसकी स्थापना किसी ने भी नहीं की है। इस सिद्धान्त में सात तत्त्व, नव पदार्थ, छह द्रव्य और पाँच अस्तिकाय माने गये हैं। स्याद्वाद, अहिंसा, अपरिग्रह आदि इसके मौलिक सिद्धान्त हैं। ‘‘सम्यग्ददर्शननचारित्राणि मोक्षमार्ग:’’ इस सूत्र से सम्यग्दर्शदर्शनग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की एकता ही मोक्ष की प्राप्ति का उपाय है। सम्पूर्ण कर्मों से आत्मा का छूट जाना ही मोक्ष है। प्रत्येक आत्मा अनादिकाल से कर्मों से बंधी हुई है। पुरुषार्थ के बल से वही आत्मा, परमात्मा बन जाती है, ऐसे अनन्तों परमात्मा हैं और संसारी जीवराशि भी अनन्तानन्त है। जैनाचार्यों ने अन्य मत-मतान्तरों का निराकरण करके सर्वज्ञ की सिद्धि की है। सर्वज्ञसिद्धि-जो सर्वज्ञ हैं, कर्म पर्वतों के भेत्ता हैं, मोक्षमार्ग के प्रणेता हैं, वे ही अर्हन्त हैं और इसीलिए वे मुनीश्वरों के वंदनीय प्रसिद्ध हैं क्योंकि सर्वज्ञ का अस्तित्व सिद्ध करने के लिए अबाधित और सुनिश्चित प्रमाण पाये जाते हैं। ईश्वर आदि सर्वज्ञ नहीं हैं इसलिए ‘‘सूक्ष्म, अन्तरित और दूरवर्ती पदार्थ अर्हन्त के ही परमार्थत: प्रत्यक्ष हैं क्योंकि वे प्रमेय हैं, जैसे-हम लोगों के द्वारा जाने गये प्रत्यक्ष पदार्थ।’’ प्रश्न-अर्हन्त भगवान सूक्ष्मादि पदार्थों को इन्द्रिय ज्ञान से जानते हैं या अतीन्द्रिय ज्ञान से?

'उत्तर'-इन्द्रिय ज्ञान से भूत, भविष्यत् और वर्तमान इन तीनों कालवर्ती सम्पूर्ण लोकालोक का जानना असंभव है अत: सर्वज्ञ भगवान अतीन्द्रिय ज्ञान से ही सम्पूर्ण चराचर जगत् को एक साथ एक समय में जान लेते हैं।

प्रश्न-ऐसा ज्ञान वैसे प्रगट होता है?

'उत्तर'-आत्मा ज्ञान स्वभाव है, उसके ऊपर ज्ञानावरण कर्म का आवरण है, उसका नाश हो जाने पर पूर्ण ज्ञान प्रकट हो जाता है।

प्रश्न-ज्ञानावरण आदि कर्मों का नाश वैसे होता है?

उत्तर-मोहनीय, ज्ञानावरण, दर्शनादर्शनर अन्तराय इन कर्मों के प्रतिपक्षी कारणों के मिल जाने से इनका नाश हो जाता है।

प्रश्न-इन कर्मों के बंध के कारण और इनके प्रतिपक्षी कारण क्या-क्या हैं?

उत्तर-मिथ्यादर्शन,दर्शनज्ञान और मिथ्याचारित्र ये तीनों मोहादि चार कर्मों के बंध के कारण हैं तथा सम्यग्दर्शन, ज्ञादर्शनऔर चारित्र ये इनके प्रतिपक्षी कारण हैं। ये कारण मिथ्यात्व, अविरति आदि बंध कारणों का विनाश कर देते हैं, तब आत्मा का पूर्ण स्वभाव प्रगट हो जाता है अर्थात् आगामी कर्मों का विपक्ष संवर है और संचित कर्मों का विपक्ष तप से होने वाली निर्जरा है।

आस्रव के निरोध को संवर कहते हैं। यह गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषहजय आदि से होता है और तपश्चरण आदि से निर्जरा होती है। जब घातिया कर्मों का आत्मा से पृथव्करण हो जाता है, तभी वह आत्मा सर्वज्ञ, हितोपदेशी और वीतरागी हो जाती है। जब संपूर्ण कर्मों का पृथक्करण हो जाता है तब वह आत्मा पूर्ण शुद्ध-सिद्ध हो जाती है।