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पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ ऋषभदेवपुरम्-मांगीतुंगी में विराजमान है ।

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दशधर्म,

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दशधर्म

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दशधर्म पुस्तक भी परमपूज्य चारित्रश्रमणी आर्यिका श्री अभयमती माताजी की एक मौलिक कृति है। दशलक्षण महापर्व में दस दिन तक जिनधर्मों की उपासना की जाती है उनका वर्णन इस कृति में किया गया है। उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य एवं ब्रह्मचर्य ये दशधर्म हैं। पूज्य माताजी ने इस पुस्तक में इन दश धर्मों पर अत्यन्त सरल एवं रोचक भाषा में विवेचन किया है। प्रत्येक धर्म पर दृष्टांत, भजन और कथाएँ लिखी हैं। विद्वज्जन एवं श्रावकों के लिए यह पुस्तक बहुत उपयोगी है। दशलक्षण धर्म की स्तुति करते हुए पूज्य माताजी ने लिखा है-


उत्तम दशलक्षण धर्म सर्व संकट हरण पावन प्यारा।

शत शत बार नमन है हमारा।।

क्षमाधर्म से शुभारंभ एवं क्षमा से ही इस पर्व का समापन होता है। अत: पूज्य माताजी ने अंत में बहुत सुन्दर लिखा है-


लाख शास्त्र का सार, राग द्वेष अरु मोह तज।

क्षमा भाव को धार, सम्यग्दर्शन निज गहो।।