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दशलक्षण धर्म का कथन

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दशलक्षणधर्म का कथन उत्तमक्षमाधर्म का स्वरूप मालिनी जडजनकृतबाधाक्रोधहासप्रियादावपि सति न विकारं यन्मनो याति साधो: । अमलविपुलचित्तौरुत्तमा सा क्षमादौ शिवपथपथिकानां सत्सहायत्वमेति।।८२।। अर्थ— मूर्ख जनों कर किये हुवे बंधन हास्य आदि के होने पर तथा कठोर वचनों के बोलने पर जो साधु अपने निर्मल धीर वीर चित्त से विकृत नहीं होता उसी का नाम उत्तम क्षमा है तथा वह उत्तमक्षमा मोक्षमार्ग को जाने वाले मुनियों को सबसे प्रथम सहायता करने वाली है।।८२।। वसंततिलका श्रामण्यपुण्यतरुरत्र गुणौघशाखापत्रप्रसूननिचितोऽपि फलान्यदत्वा। याति क्षयं क्षणत एव घनोग्रकोपदावानलात् त्यजत तं यतयोऽत्र दूरम् ।।८३।। अर्थ—आचार्य कहते हैं कि गुणरूपी जो शाखा पत्र पूâल उन करके सहित ऐसा यह यतिरूपी वृक्ष है यदि इसमें भंयकर क्रोधरूपी दावानल प्रवेश कर जावे तो यह किसी प्रकार फल न देकर ही बात की बात में नष्ट हो जाता है इसलिये यतीश्वरों को चाहिये कि क्रोध आदि को वे दूर से ही छोड़ देवें। भावार्थ—ाqजसवृक्ष पर नाना प्रकार की मनोहर शाखा मौजूद है तथा पत्र पूâलों से भी जो शोभित हो रहा है और अल्पकाल में जिस पर फल आने वाले हैं ऐसे वृक्ष में यदि अग्नि प्रवेश कर जावे तो वह शीघ्र ही जल जाता है तथा उस पर किसी प्रकार का फल नहीं आता उसी प्रकार जो मुनि सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र आदि गुणों कर सहित है किन्तु अभी तक उसके क्रोध मानादिक शान्त नहीं हुवे हैं ऐसे मुनि को कदापि स्वर्ग मोक्षादि की प्राप्ति नहीं हो सकती इसलिये मुनियों को चाहिये कि वे क्रोधादि को अपने पास भी न फटकने देवें।।८३।। ।।उत्तमक्षमाधारी इस प्रकार विचार करते हैं।। तिष्ठामो वयमुज्वलेन मनसा रागादिदोषोज्झिता लोक: किञ्चिदपि: स्वकीयह्दये स्वच्छाचरो मन्यताम् । साध्या शुद्धिरिहात्मन: शमवतामत्रापरेण द्विषा मित्रेणापि किमु स्वचेष्टितफलं स्वार्थ: स्वयं लप्स्यते।। अर्थ—रागद्वेषादि से रहित होकर हम तो अपने उज्जवल चित्त से रहेंगे स्वेच्छाचारी यह लोक अपने हृदय में चाहे हमको भला बुरा वैâसा भी मानो क्योंकि सभी पुरूषों को अपने आत्मा की शुद्धि करनी चाहिये और इस लोक में बैरी अथवा मित्रों से हमको क्या है ? अर्थात् वे हमारा कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि जो हमारे साथ द्वेषरूप तथा प्रीतिरूप परिणाम करेगा उसका फल उसको अपने आप मिल जावेगा।।८४।। और भी उत्तम क्षमा वाला क्या चिन्तवन करता है इस बात को आचार्य दिखाते हैं स्रग्धरा दोषानाधुष्य लोके मम भवतु सुखी दुर्जनश्चेद्धनार्थी मत्सर्वस्वं गृहीत्वा रिपुरथ सहसा जीवितं स्थानमन्य:। मध्यस्थस्त्वेवमेवाखिलमिह हि जगज्जायतां सौख्याराशिर्मत्तो मा भूदसौख्यं कथमपि भविन: कस्यचित्पूत्करोमि।। अर्थ—मेरे दोषों को सबके सामने प्रकट कर संसार में दुर्जन सुखी होवे तथा धन का अर्थी मेरे समस्त धन आदि को ग्रहण कर सुखी होवे तथा बैरी मेरे जीवन को लेकर सुखी होवे और जिनको मेरे स्थान के लेने की अभिलाषा है वे स्थान लेकर आनन्द से रहें तथा जो रागद्वेष रहित मध्यस्थ होकर रहना चाहें वे मध्यस्थ रहकर ही सुख से रहें। इस प्रकार समस्त जगत सुख से रहो किन्तु किसी भी संसारी को मुझसे दु:ख न पहुंचे ऐसा मैं सबके सामने पुकार—२ कर कहता हूं।।८५।। शार्दूलविक्रीडित विंâ जानासि न वीतरागमखिलं त्रैलोक्यचूडामणिं विंâतद्धर्ममुपाश्रितं न भवता िंकवा न लोकोजड:। मिथ्यादृग्भिरसज्जनै रपटुभि: किञ्चित्कृतोपद्रवाद्यत्कमार्जनहेतुमस्थिरतया बाधां मनोमन्यसे।।८६।। अर्थ—मिथ्यादृष्टि दुर्जन मूर्ख जनों से किये हुवे उपद्रव से चंचल होकर कर्मों के पैदा करने में कारणभूत ऐसी वेदना का तू अनुभव करता है सो क्या ? हे मन तीन लोक के पूजनीक वीतरागपने को तू नहीं जानता है अथवा जिस धर्म को तूने आश्रयण किया है उस धर्म को तू नहीं जानता है अथवा यह समस्त लोक अज्ञानी जड़ है इस बात का तुझे ज्ञान नहीं है। भावार्थ—तीन लोक के पूजनीक वीतराग भाव को जानता हुआ भी तथा सच्चे धर्म का अनुयायी होकर भी तथा समस्त लोक को जड़ समझता हुवा भी ‘‘हे मन’’ मिथ्यादृष्टियों से दिये हुवे दु:ख से दु:खित होता है यह बड़ा आश्चर्य है।।८६।। मार्दव धर्म का वर्णन वसंततिलका धर्मङ्गमेतदिह मार्दवनामधेयं जात्यादिगर्वपरिहरमुषन्ति सन्त :। तद्धार्यते किमु न वोधदृशा समस्तं स्वप्नेन्द्रजानसदृशं जगदीक्षमाणै:।।८७।। अर्थ—उत्तम पुरूष जाति वल ज्ञान कुल आदि गर्वों के त्याग को मार्दव धर्म कहते हैं तथा यह धर्मों का अंगभूत है इसलिये जो मनुष्य अपनी सम्यग्ज्ञानरूपी दृष्टि से समस्त जगत को स्वप्न तथा इन्द्रजाल के तुल्य देखते हैं वे अवश्य ही इस मार्दवनामक धर्म को धारण करते हैं।।८७।। शार्दूलविक्रीडित कास्था,सद्मनि, सुन्दरेऽपि, परितो,दंदह्यमानेऽग्निभि: कायादौतुजरादिभि:प्रतिदिनं गच्छत्यवस्थान्तरम् । इत्यालोचयतो, हृदि, प्राशमिन: १ भास्वद्विवेकोज्वले गर्वस्यावसर: कुतोऽत्र घटते भावेषु सर्वेष्वपि।।८८।। अर्थ—अत्यन्त मनोहर भी है किन्तु जिसके चारों तरफ अग्नि जल रही है ऐसे घर के बचने में जिस प्रकार अंशमात्र भी आशा नहीं की जाती उस ही प्रकार जो शरीर वृद्धावस्थाकर सहित है तथा प्रतिदिन एक अवस्था को छोड़कर दूसरी अवस्था को धारण करता रहता है वह शरीर सदाकाल रहेगा यह कब विश्वास हो सकता है ? इस प्रकार निरन्तर विवेक से अपने निर्मलहृदय में विचार करने वाले मुनि के समस्त पदार्थों में अभिमान करने के लिये अवसर ही नहीं मिल सकता इसलिये मुनियों को सदा ऐसा ही ध्यान करना चाहिये।।८८।। आर्जव धर्म का वर्णन हृदि यत्तद्वाचि वहि: फलित तदेवार्जवंभवत्येतत् । धर्माे निकृतिरधर्माे द्वाविह ‘‘सुरसद्मनरकपथौ’’।।८९।। अर्थ—मन में जो बात होवे उस ही को वचन से प्रकट करना (ना कि मन में कुछ दूसरा होवे तथा वचन से कुछ दूसरा ही बोले) इसको आचार्य आर्जव धर्म कहते है तथा मीठी बात लगाकर दूसरे को ठगना इसको अधर्म कहते हैं और इसमें आर्जवधर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा अधर्म नरक को ले जाने वाला होता है इसलिये आर्जव धर्म के पालन करने वाले भव्य जीवों को , किसी के साथ माया से बर्ताव नहीं करना चाहिये। शार्दूलविक्रीडित मायित्वं कुरुतेकृतं सकृदपिच्छायाविघातं गुणेष्वाजातेर्यमिनोऽर्जितेष्विह गुरुक्लेशै: १शमादिष्वलम ् । सर्वे तत्र यदासते विनिभृता: क्रोधादयस्तत्वतस्तत्पापं वत येन दुर्गतिपथे जीवश्चिरंभ्राम्यति।।९०।। अर्थ—आचार्य कहते हैं कि यदि एक बार भी किसी के साथ मायाचारी की जावे तो वह मायाचारी बड़ी कठिनता से संचयकिये हुवे अहिंसा सत्यादि मुनियों के गुणों को फीका बना देती है अर्थात् वे गुण आदरणीय नहीं रहने पाते और उस मायारूपी मकान में नाना प्रकार के क्रोधादि शत्रु छिपे हुवे बैठे रहते हैं और मायाचार से उत्पन्न हुवे पाप से जीव नाना प्रकार के दुर्गति मार्गों में भ्रमण करता फिरता है इसलिये मुनियों को माया अपने पास भी नहीं फटकने देना चाहिये।।९०।। सत्यधर्म का वर्णन आर्या स्वपरहितमेव मुनिभिर्मितममृतसमं सदैव सत्यं च। वक्तव्यं वचनमथ प्रतिधेयं धीधनैर्मौनम् ।।९१।। अर्थ—उत्कृष्टज्ञान के धारण करने वाले मुनियों को प्रथमतो बोलना ही नहीं चाहिये यदि बोले तो ऐसा वचन बोलना चाहिये जो समस्त प्राणियों के हित का करने वाला हो तथा परमित हो और अमृत के समान प्रिय हो तथा सर्वथा सत्य हो किन्तु जो वचन जीवों को पीड़ा देने वाला हो तथा कड़वा हो तो उस वचन की अपेक्षा मौन साधना ही अच्छा है।।९१।।