दिगम्बर जैन मंदिर, शिवपुरी के महत्त्वपूर्ण जैन कलावशेष

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दिगम्बर जैन मंदिर, शिवपुरी के महत्त्वपूर्ण जैन कलावशेष

सारांश

जैन पुरातत्व में पुरास्थलों पर बिखरे र्मूित एवं स्थापत्य अवशेषों के अलावा भारी संख्या में कलाकृतियां नगरों में स्थित जैन मंदिरों में सुरक्षित हैं जिन पर पुराविदों का ध्यान है तो है किन्तु कई कारणों से वे इन मंदिरों में प्रवेश नहीं कर पाते हैं जिससे ये कृतियाँ जैन पुरातत्व एवं इतिहास में निर्माण में महत्वपूर्ण होते हुए भी सहयोग नहीं दे पाती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए लेखक ने अपने शोध कार्य के दौरान जैन मंदिरों के सर्वेक्षण पर विशेष ध्यान दिया और इस दौरान काफी प्राचीन र्मूितयां व अभिलेख खोजे गये। इस आलेख में लेखक ने ऐसे ही एक दिगम्बर जैन मंदिर जो शिवपुरी नगर में मुख्य मार्ग पर स्थित है, का सर्वेक्षण कर वहाँ कुछ ऐतिहासिक र्मूितयों एवं अभिलेखों की खोज की, जिनका विवरण इस आलेख में प्रस्तुत है। इस खोज में तीन प्राचीन अभिलेख और एक आधुनिक काल का शिलालेख विदित हुए।

शिवपुरी ग्वालियर संभाग का एक प्रमुख नगर एवं जिला मुख्यालय हैं यह ग्वालियर से लगभग १०० किमी. की दूरी पर आगरा—मुम्बई राजमार्ग पर स्थित है। शिवपुरी जिला प्राचीन काल से ही जैन धर्म एवं संस्कृति का प्रमुख केन्द्र रहा है। शिवपुरी नगर में आधुनिक काल के कई जैन मंदिर हैं, जिनमें एक जैन मंदिर उल्लेखनीय है। यह दिगम्बर जैन मंदिर शिवपुरी नगर में मुख्य मार्ग पर स्थित है। इस मंदिर में आधुनिक प्रतिमाओं के अतिरिक्त तीन प्राचीन जिन प्रतिमाएं, एक प्राचीन चरण—चिह्न अभिलेख युक्त एवं एक आधुनिक युग का शिलालेख संरक्षित हैं। ये प्राचीन जिन प्रतिमाएं व चरण—चिह्न वर्तमान में पूजनीय हैं। पुरातात्त्विक दृष्टि से ये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। चरण चिह्न व शिलालेख मंदिर की आंतरिक दीवार में जड़े हुए हैं। इस प्रकार इस मंदिर में दो अभिलेख हैं। जिन प्रतिमाओं में एक प्रथम जिन ऋषभनाथ की, एक पंद्रहवें जिन धर्मनाथ की और एक तेईसवें जिन पाश्र्वनाथ की है। ये तीनों ही प्रतिमाएं प्रतिमा—विज्ञान की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। प्रस्तुत आलेख में इन्हीं प्रतिमाओं एवं अभिलेखों का अध्ययन समाविष्ट है।

इनमें सबसे उल्लेखनीय प्रतिमा तीर्थंकर पाश्र्वनाथ (चित्र १) की है जो शिवपुरी जिले में ही स्थित खलारा नामक ग्राम से लाकर यहाँ विराजमान कर दी गयी है। बलुए प्रस्तर पर र्नििमत इस र्मूित में जिन को पद्मासन मुद्रा में सप्त सर्पफणों के छत्र से शोभित दिखाया गया है। जिन के हाथ एवं पैर खंडित थे जिन्हें वर्तमान में नवीनीकृत कर दिया गया है। इस प्रतिमा का परिकर अत्यन्त भव्य है। परिकर में अष्टप्रातिहार्यों—अशोक वृक्ष, दिव्यध्वनि, सुरपुष्वृष्टि, त्रिछत्र, िंसहासन, चामरधर, प्रभामण्डल और देवदुन्दुभि का संपूर्ण व सुंदर अंकन है। दिव्यध्वनि के प्रतीक रूप में परिकर में सबसे ऊपरी भाग में दोनों ओर त्रिभंग मुद्रा में एक—एक स्त्री आकृतियाँ अपने हाथों में वीणा धारण किये हुए हैं। इसी प्रकार सुरपुष्पवृष्टि के प्रतीक रूप में मूलनायक के सर्पफणों के दोनों ओर स्थित देव—युगल आकृतियाँ पुष्पवृष्टि करते प्रर्दिशत हैं। सिंहासन के ऊपर जिन के दोनों ओर चामरधारी स्त्री आकृतियां दृष्टव्य हैं। सर्पफणों के छत्र के कारण प्रभामण्डल ढ़क गया है, अत: दृष्टव्य नहीं है। परिकर में ही सर्पफणों के दोनों ओर एक—एक लघु कुलिका में एक—एक पद्मासन जिन आकृति प्रर्दिशत हैं। परिकर में दोनों पाश्र्वों में शार्दूल आकृतियाँ प्रर्दिशत हैं। मूलनायक के दायीं ओर पद्मावती और बायीं ओर धरणेन्द्र का अंकन है। गजारूढ़ धरणेन्द्र एवं पद्मावती के मस्तकों पर तीन सर्पफणों का निरूपण है वे विविध वस्त्राभूषणों से सज्जित हैं। धरणेन्द्र की दायीं भुजा में चामर एवं बायीं भुजा जंघा पर टिकी है। पद्मावती के बायीं भुजा में एक लंबा दण्ड युक्त छत्र है जिसका छत्र भाग पाश्र्वनाथ के सिर के ऊपर दृष्टव्य है। यह पाश्र्वनाथ के जीवन की उस घटना का मूत्र्ताकन है जब मेघमाली को उपसर्गों से उनकी रक्षा के लिए धरणेन्द्र एवं पद्मावती देवलोक से प्रकट हुए थे। अत: यह पाश्र्व के जीवन की इस घटना का कथात्मक मूत्र्ताकन है जो अत्यन्त सजीव ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यह तब और भी जीवन्त हो गया है। जब परिकर में सर्प के सात मुखों को भयावह उद्वेलित आकृति में दिखाया गया है जो पाश्र्व की रक्षार्थ आसुरी ताकतों को चेतावनी देते हुए प्रतीत हो रहे हैं। सर्प—कुण्डलियां मूलनायक के पीछे होकर िंसहासन तक जा रही हैं और इन्हीं सर्प—कुण्डलियों पर पाश्र्वप्रभु विराजमान हैं। पाश्र्वनाथ के आमूत्र्तन ने इस घटनांकन को सजीवता के चरम पर रख दिया है। पाश्र्व की गहन ध्यान मुद्रा उनके मुख पर अंकित नासाग्र दृष्टि, एकान्तिक भाव एवं सिर पर बढ़ी हुई केशराशि से सुस्पष्ट है। इस प्रकार पाश्र्वनाथ की यह प्रतिमा तत्कालीन कुशल प्रतिमाविदों एवं कलाकारों के निर्देशन में र्नििमत प्रतीत होती है। अपने आप में यह एक अनूठा एवं इस प्रकार का विरल अंकन है। कालक्रम की दृष्टि से इसे ११ वीं सदी ई. में रखा जा सकता है।

दूसरी प्रतिमा प्रथम जिन ऋषभनाथ (चित्र—२) की है। संगमरमर से र्नििमत इस प्रतिमा में मूलनायक को पदमासन मुद्रा में आसन पर विराजमान दिखाया गया है। आसन पर ही उनका लांछन वृषभ अंकित है। प्रतिमा बिल्कुल सादी है और इसमें परिकर भी नहीं है। संगमरमर निर्मित प्राय: इसी प्रकार की प्रतिमाएँ देखने में आती हैं। प्रतिमासन पर उत्कीर्ण अभिलेख अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह अभिलेख पांच पंक्तियों में संस्कृत भाषा एवं देवानागरी लिपि में है।३ इसमें वुंâदवुंâद अन्वय बलात्कार गण के भट्टारक श्री जिनचन्द्र के पट्टशिष्य भट्टारक िंसहर्कीित के निर्देशन में साधु रामदेव की पत्नी जसोवई (जसोबाई) और उनके पुत्र संघवी विजरसी, संघवी भीमी व संघवी अमरसी द्वारा प्रतिमा प्रतिष्ठा का उल्लेख मिलता है। संघवी अरमसी की दो पत्नियों के नाम महासिरि एवं मधुसिरि भी मिलते हैं, संघवी अमरसी के पुत्रों होरिल एवं वीरभान का भी उल्लेख हुआ है।४ इस लेख की तिथि संवत् १५२९ (१४७२ ई.) बैशाख सुदि ७ बुध (बुधवार) अंकित है।

तीसरी प्रतिमा पंद्रहवें जिन धर्मनाथ (चित्र ३) की है और पूर्ववत् ऋषभ प्रतिमा के समान ही प्रर्दिशत हैं प्रतिमासन पर पांच पंक्तियों का संस्कृत भाषा एवं देवनागरी लिपि में लेख उत्कीर्ण है। इस लेख की तिथि भी संवत् १५२९ (१४७२ ई.) बैशाख सुदि ७ बुध (बुधवार) है५ इस लेख में भी लगभग पूर्ववत् विवरण मिलता है। मंदिर कमेटी के अधिकारियों से ज्ञात हुआ है कि ये दोनों प्रतिमाएं (ऋषभ व धर्मनाथ) पनिहार (जिला—ग्वालियर) से लाकर यहां इस मंदिर में विराजमान कर दी गयी है। पनिहार से ज्ञात िंकवदन्तियों से विदित होता है कि पनिहार में इसी काल की इस प्रकार की चौबीस र्मूितयों का उत्कीर्णन हुआ था और इन्हें चौबीसी के नाम से जाना जाता था। वर्तमान में पनिहार में एक भी इस प्रकार की र्मूित उपलब्ध नहीं हैं। इस िंकवदन्ति की पुष्टि में उल्लिखित विवरण से भी होती है। इसमें पनिहार से विदित समान तिथि की १२ प्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है जिसमें उपर्युक्त ऋषभ प्रतिमा भी सम्मिलित हैं६ जो कालांतर में शिवपुरी के जैन मंदिर में लाकर रख दी गयी है। इसमें धर्मनाथ र्मूित को नहीं गिना गया है। इस प्रकार कुल ज्ञात प्रतिमाओं की संख्या १३ है। एक प्रश्न उठता है कि में उल्लिखित १२ प्रतिमाओं के अलावा अन्य प्रतिमाओं का उल्लेख क्यों नहीं हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि इस समय तक पनिहार में केवल १२ प्रतिमाएं ही शेष रह गयी थीं और बाकी या तो अन्यत्र चली गयी या नष्ट हो गयी। पुन: शिवपुरी की दो प्रतिमाओं को छोड़कर शेष ११ प्रतिमाएं वर्तमान में कहा हैं। लेखक ने इन प्रतिमाओं का पता लगाने की काफी कोशिश की किन्तु वह केवल दो प्रतिमाओं को ही ढूंढ पाया, जो उपर्युक्त हैं। आश्चर्यजनक रूप से ये सभी प्रतिमाएं (पनिहार की) एक ही तिथि को एक ही परिवार के लोगों द्वारा स्थापित करायी गयी थीं और इनकी प्रतिष्ठा कुन्दकुन्द अन्वय बलात्कार गण के भट्टारक श्री जिनचन्द्र के पट्टशिष्य भट्टारक िंसहर्कीित के निर्देशन में सम्पन्न हुयी थी जैसा कि इन र्मूितभिलेखों से ज्ञात होता है। इसके अलावा एक शिलालेख (चित्र—४) मंदिर की आंतरिक दीवार में जड़ा हुआ है। नौ पंक्तियों के इस लेख की भाषा संस्कृत व लिपि देवनागरी है। इस लेख का पाठ इस प्रकार है—

१. णमो अर्हत् नम: सिद्धाणं।। संवत् १९०८ वर्षे र्काितक मासे कृष्ण पछे (पक्षे) ११ बुधे।

२. मालव देशे शिवपुरी महा नगरपति साहू महिपाल विजयराजे तस्य नजीकी

३. महाराजा श्री अमरिंसध (िंसह) जीत साराभ (?) श्रीम काष्ठा संघे नंदीतट गच्छे वि—

४. द्या गणे भट्टारक श्री रामसेनान्वय तद्त्क्रमेण भ. (भट्टारक) श्री रत्नभूषण।

५. तत्पट्टे भ. श्री जयर्कीित तदान्वये मंडलाचार्य श्री केशवसेन तत्पट्टे।

६. मंडलाचार्य श्री विश्वर्कीित तस्य लघु गुरु भ्रातार आ. (आचार्य) श्री राज (म) चन्द्र द्वय श्री

७. प्रदीप जी ब्र. (ब्रह्मचारी) गुणमार ब्र. (ब्रह्मचारिणी) मनोहबाई.......पं. भोगीदास.....

८. ..................................श्री

९. कारापित।। शुभं भवतु।। .................।।श्री।।।।

इस लेख में अंग्रेजी के अंकों में तिथि का अंकन हुआ है। इस लेख में मालव देश के शिवपुरी महानगर के प्रमुख साहू महिपाल के विजयराज्य में महाराजा श्री अमरिंसह जीत का उल्लेख हुआ है। यह अभिलेख काष्ठा संघ नंदितट गच्छ विद्यागण की भट्टारक परम्परा का विवरण इस क्रम में देता है—भट्टारक श्री रामसेन—भट्टारक श्री रत्नभूषण—भट्टारक श्री जयर्कीित—मंडलाचार्य श्री केशवसेन—मंडलाचार्य श्री विश्वर्कीित। आगे अभिलेख विश्वर्कीित के लघु गुरु भाई आचार्य श्री रामचन्द्र और श्री प्रदीप जी का आलेखन करता है। तदुपरान्त लेख ब्रह्मचारी गुणमार और ब्रह्मचारिणी मनोहबाई का उल्लेख करता है। इसके अलावा पंडित भोगीदास का भी नाम मिलता है। आगे अभिलेख का पाठ (पंक्ति ८ व ९) लेखक की समझ में नहीं आ सकता है। इसी कारण इस अभिलेख को उत्कीर्ण करवाने का मन्तव्य स्पष्ट नहीं हो सका है। इस लेख की तिथि १९०८ (१८५१ ई.) र्काितक मास कृष्ण पक्ष ११ बुधवार है। यह अभिलेख शिवपुरी नगर के आधुनिक इतिहास में विशेष रूप से सहयोगी हो सकता है। इस अभिलेख में महाराजा श्री अमरिंसह जीत को शिवपुरी नगर के प्रमुख श्रेष्ठी साहू महिपाल के विजयराज्य के अंतर्गत बताया गया है जो उस काल में श्रेष्ठियों मुख्यत: जैन श्रेष्ठियों के प्रभुत्व एवं उनकी श्रेष्ठता को प्रर्दिशत करता है। एक और बात यहाँ ध्यान देने योग्य है कि नंदितट गच्छ का ग्वालियर संभाग में कमोवेश प्रभाव देखने को मिला है, इसीलिए यह अभिलेख इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस अभिलेख का इस मंदिर (जिसमें वह जड़ा है) ये क्या संबंध है, वह तभी स्पष्ट हो सकता जब इस लेख की पंक्ति ८ व ९ का पाठान्तर हो जाये। अभिलेख पाठकों के समक्ष अध्ययन हेतु उपस्थित है, आशा है कि शीघ्र ही कुछ महत्वपूर्ण तथ्य प्रकाश में आयेंगे। इसी अभिलेख की दायीं ओर दीवार में दो चरण पादुका युगल युत् एक पाषाण खण्ड (चित्र ५) जड़ा हुआ है जिसके नीचे दो पंक्तियों का एक अभिलेख है।८ यह अभिलेख तिथिविहीन एवं अस्पष्ट है, किन्तु लगभग पंद्रहवी सदी ई. का प्रतीत होता है। इसका प्राप्ति स्थल अज्ञात है एवं इस मंदिर के साथ इसका क्या संबंध है, ज्ञान की वर्तमान अवस्था में यह कह पाना मुश्किल है। इस प्रकार शिवपुरी स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में स्थित जैन पुरावशेष विशेष महत्व के हैं।

संदर्भ एवं टिप्पणियाँ

१. लेखक ने इस मंदिर का सर्वेक्षण जून २००५ में किया था। इन प्रतिमाओं का संक्षिप्त उल्लेख लेखक ने अपने शोध—प्रबंध, ग्वालियर क्षेत्र की जैन कला—प्रारम्भ से तोमर काल तक, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर, २००६, में किया है। प्रस्तुत आलेख इन पर विहंगम दृष्टिपात करता है।

२. त्रिशष्टिशलाकापुरुषचरित्र, खण्ड ५, गायकवाड़ ओरियण्टल सीरिज, १३९, बड़ौदा, १९६२, ३९४-९६; पासनाहचरिउ, १४.२६; पाश्र्वनाथचरित्र ६.१९२-९३।

३. Annual Report of Indian Epigraphy (ए.रि. इं. इ.), १९७१-७२, बी: क्रमांक ८७; इसमें इस प्रतिमा को पनिहार में बताया है जबकि कालांतर में वह शिवपुरी स्थित जैन मंदिर स्थापित कर दी गयी।

४. इस अभिलेख का अध्ययन लेखक ने स्वयं किया है और प्रस्तुत पाठ लेखक का मौलिक है। ए. रि. इं. इ. में इस संबंध में अल्प सूचना है।

५. ए. रि. इं. इ. एवं अन्यत्र इस प्रतिमा का उल्लेख नहीं मिलता। इससे प्रतीत होता है कि यह इसके संकलन से पूर्व ही शिवपुरी स्थानांतरित कर दी गयी थी। यह लेखक द्वारा प्रथमत: सूचना व विवरण है।

६. ए. रि. इं. इ., १९७१-७२, बी: क्रमांक ८१, ८२, ८३, ८४, ८५, ८६, ८७, ८८, ८९, ९०, ९१ व ९२ये क्रमश: शीतल, सुमति, सुविधि, कुन्थु, विमल, मल्लि, ऋषभ, अजित, मुनिसुव्रत, सुपाश्र्व, चन्द्रप्रभ और श्रेयांसनाथ की १२ प्रतिमाएँ हैं। इसमें धर्मनाथ की प्रतिमा का मिलाकर कुल १३ हो जाती हैं। ७. इस शिलालेख की सूचना एवं विवरण लेखक द्वारा प्रथमत: प्रस्तुत है।

८. इस चरण चिन्ह युत शिलालेख की सूचना एवं विवरण लेखक द्वारा प्रथमत: प्रस्तुत है।


नवनीत कुमार जैन एवं टीकम तेनवार
प्रा. भा. इ. सं. एवं पुरातत्व अध्ययनशाला, जीवाजी वि. वि., ग्वालियर।
अर्हत वचन जुलाई—सितम्बर २००८, पेज नं. ४१-४६