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दिगम्बर मुनि दीक्षा बिना मोक्ष नहीं

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दिगम्बर मुनि दीक्षा बिना मोक्ष नहीं

धर्म नाशे क्रिया ध्वंसे,

स्व सिद्धान्त विप्लवे।
अपृष्ठेनापि वक्तव्यं,
स्व सिद्धान्त रक्षणे।।

वर्तमान समय में कुछ लोग दिगम्बर गुरूओं को नमोस्तु एवं विनय नहीं करते हैं, उन्हें सिद्धान्त शास्त्रों का अध्ययन कर यह श्रद्धान करना चाहिए कि बिना मुनि दीक्षा लिए मोक्ष नहीं मिलता है। भगवान पार्श्वनाथ के चरित्र में पूर्व भव के आनन्दकुमार राज पुत्र के भव से ज्ञात करना चाहिए कि जिन दीक्षित आनन्द मुनि पर कमठ का जीव सिंह बनकर नख, दाढ़ आदि द्वारा भयंकर उपसर्ग कर विदारण करता है किन्तु समाधि स्थित मुनि स्वर्ग में इन्द्र पद एवं क्रमश: अंत में मोक्ष जाते हैं। अत: यह निश्चित है कि कर्म बंध रहित अवस्था प्राप्त करने के लिए प्रत्येक जीव की भावना जिन दीक्षा ग्रहण करने की होनी चाहिए। उक्तं च—

आत्मा प्रभावनीयो रत्नत्रय तेजया सततमेव।

दान तपो जिन पूजा, विधाति शयैश्च जिनधर्म:।।

श्री अमृतचंद्राचार्य ने पुरुषार्थ सिद्ध्युपाय में लिखा है कि रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन,सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र का निरतिचार पालन कर आत्मा को प्रभावशाली बनाना चाहिये। अनादिकालीन मिथ्यात्व संबंधी संस्कारों का त्याग कर जिनोदित सात तत्वों का यथार्थ श्रद्धान, प्रतीति व विश्वास का सम्यग्दर्शन का धारक कहा गया है। अत: देव शब्द सर्वज्ञ वाचक है, सर्वज्ञ का श्रद्धानी आत्मा श्रद्धानी है, यह निश्चय समझो।

आजकल कतिपय लोग देव को मानते हैं, कुछ लोग देव वाणी को मानते हैं और कुछ शास्त्र को ही मानते हैं। आजकल के कुछ मुमुक्षुगण गुरू को भी नहीं मानते हैं और न विनय करते हैं। पहिले चारों अनुयोग शास्त्रों का अध्ययन कर परिणामों में दृढ़ता लानी चाहिये न केवल अपनी मन मरजी माफिक यद्धा—तद्धा प्रवृत्ति कर कल्याण मार्ग से विमुख होना चाहिये। अन्यथा व्यर्थ कर्म बन्ध होता है। सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति के लिये पुरातन आवरणी बंधन को तोड़ना है उसके लिए अनादि कालीन विपरीत प्रवृत्तियों का त्याग होगा। पुन: अपना उपयोग निर्मल बनाना है जिससे कर्म बन्ध न हो और सहज स्वभाविक गुणों का विकास हो। उक्तं च—

चारित्तं खलु धम्मो , धम्मो जो से समोत्त परिणामो।

मोह क्षोभ विहीणो, परिणामो अप्पो हु समो।।

सहज स्वाभाविक गुणों की प्राप्ति के लिये सम्यग्चारित्र की प्रधानता है। मोह और क्षोभ से रहित आत्म परिणाम को सम्यग्चारित्र कहा गया है। अत: शक्ति अनुसार चारित्र अवश्य धारण करना चाहिये तथा दान, तपस्या, जिन पूजा एवं विद्या के अतिशय द्वारा जैन धर्म की प्रभावना करना और कराना चाहिये। इन सत्कार्यों द्वारा हम आत्मोत्थान कर सकते हैं। मानव पर्याय में अपना कर्तव्य निभाना चाहिये और ऐसी प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिये जिससे ‘धोबी का कुत्ता घर का न घाट का’ की कहावत के अनुसार न इधर के और न उधर के रहे। कुछ करना सीखना चाहिये ताकि यह आत्मा महान बने। केवल आत्मा शुद्ध है, के नारे लगाने से आत्मा शुद्ध न हो सकेगी प्रत्युत कार्य करने से याने चारित्र धारण करने से ही कल्याण हो सकेगा।

कपूरचन्द जैन पाटनी, गुवाहटी
जैन गजट १६ फरवरी २०१५