देवी सरस्वती के वरदान से जो महाकवि बन गया

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देवी सरस्वती के वरदान से जो महाकवि बन गया

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प्रो. (डॉ.) राजाराम जैन

वरदायिनी देवी सरस्वती युगों—युगों से अपभ्रंश कवियों के लिए एक आराध्यादेवी के रूप में पूजित रही है । यही कारण है कि अपने लेखन कार्य के प्रारम्भ में वे आराध्य देव के मंगलाचरण के बाद प्राय: ही सरस्वती को वन्दन नमस्कार करते रहे हैं । यहाँ यह ध्यतव्य है कि चाहे वह श्रुतदेवी हो, चाहे वागेश्वरी, शारदा या जिनवाणी—पुत्री हैं, वे सभी सरस्वती के अपर नाम ही है ।

सरस्वती वरदायिनी देवी है । एतद्विषयक उदाहरण खोजने पर अनेक मिल सकते है किन्तु महाकवि रइधू (१५वीं—१६वीं सदी) ने एतद्विषयक एक आपबीती घटना की चर्चा की है, जो बड़ी ही मार्मिक तथा भक्तजनों के लिए सहज ही आकर्षित तथा प्रेरित करने वाली है । उक्त रइधू प्रारम्भ में एक सामान्य भावुक व्यक्ति थे । पूर्ववर्ती या समकालीन कुछ कवियों की रचनाओं का पाठ कर वे भी कवि बनना चाहते थे किन्तु लिखने में अक्षम होने के कारण वे बड़े ही निराश और उदास रहा करते थे । एक दिन वे अत्यन्त व्यथित मन से रोते—रोते और सरस्वती देवी की स्तुति करते—करते सो गये। तब अर्धरात्रि के समय सरस्वती देवी ने स्वप्न में आकर उनसे क्या कहा,

इसे रइधू के ही शब्दों में सुनिये—

सिविणंतरे दिट्ठ सुयदेवि सुपसण्ण,

आहासए तुज्झ हउॅ जाए सुपसण्ण।
परिहिंरहि मणिंचत करि भव्वु णिसु कव्वु,
खलयणहॅमा डरहि भउ हरिउ मइ सव्वु।
तो देवि—वयणेण पडिउ वि साणंदु,
तक्खणेण सयणाउ उट्ठिउ जि गय—तंदु।


—(सम्मइजिणचरिउ, १/४/२—४)

अर्थात् प्रसन्नचित्त सरस्वती देवी ने स्वप्न में मुझे दर्शन दिया और कहा—‘‘हे भव्य, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ। मन की सारी चिन्ताएँ छोड़ और काव्य—रचना प्रारम्भ कर। दुर्जनों से मत डर क्योंकि भय सम्पूर्ण बुद्धि का अपहरण कर लेता है । उस देवी के वचनों से प्रतिबुद्ध होकर मैं आनन्दित हो गया। उसी समय मेरी निद्रा टूट गयी और मैं अतन्द्र होकर अपने बिस्तर से उठ बैठा।’’

उक्त स्वप्न ने रइधू को प्रबुद्धिचित्त बना दिया। उसके बाद से उन्होंने अपनी समस्त शक्ति काव्य—रचना में लगा दी। यही कारण है कि वे अपने जीवन के अल्पकाल में भी समकालीन प्राकृत, अपभ्रंश एवं हिन्दी में ३० ग्रंथों का प्रणयन कर सके और उत्तर मध्यकालीन साहित्य के इतिहास में अपनी विशिष्ट पहिचान बना सके। प्रो. (डॉ.) ए. एन. उपाध्ये जैसे महारथी भाषा—विशेषज्ञ ने उनकी रचनाओं की भाषा को देखकर बड़ी प्रशंसा की थी और भाषा—विज्ञान के साथ—साथ समकालीन इतिहास एवं संस्कृति की दृष्टि से उन्हें अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बतलाते हुए उनके तत्काल प्रकाशन को अत्यावश्यक बतलाया था।

महत्वपूर्ण है रइधू कवि का साहित्य

भाषा—विज्ञान के अध्ययन की दृष्टि से तो रइधू का समग्र साहित्य महत्त्वपूर्ण है ही, प्रत्येक रचना के आदि एवं अन्त में लिखित प्रशस्तियों के माध्यम से रइधू ने पूर्ववर्ती एवं समकालीन ग्रंथकारों एवं उनके ग्रंथों के उल्लेख, राजाओं, भट्टारकों, नगरसेठों, प्रेरक एवं आश्रयदाता अग्रवालों, जैसवालों एवं पद्मावती पुरवालों के पारिवारिक परिचयों, गोपाचल (ग्वालियर) के दुर्गे में निर्मित अगणित जैन मूर्तियों की प्रतिष्ठाओं के उल्लेखों के कारण तथा समकालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों पर प्रकाश डालने के कारण वह समकालीन इतिहास एवं संस्कृति की दृष्टि से भी विशेष महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है । उक्त समस्त बहुआयामी रचनात्मक कार्य महाकवि रइधू सरस्वती देवी का वरदान प्राप्त करके ही कर सके थे । यही कारण है कि उन्होंने (रइधू ने) अपनी कुछ रचनाओं में सरस्वती का बहुमान कर उसका बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया है ।

रूपक आदि अलंकारों के माध्यम से महाकवि (रइधू) ने ‘पूर्व—साहित्य’ तथा ‘द्वादशांग’ वाणी में अन्तर्गर्भित समस्त प्रमुख जैन सिद्धान्त, दर्शन एवं अध्यात्म को सरस्वती देवी के अंग—प्रत्यंगों में प्रतिबिम्बित करते हुए तथा उसे अपनी वात्सल्यमयी माता के रूप में पुकारते हुए उसके प्रति अपनी आस्था, श्रद्धा एवं कृतज्ञता आलंकारिक भाषा—शैली में इस प्रकार व्यक्त की है—

सरस्सइ सुसामिणी सुसत्थ—पाय—गामिणी।

जिणेस वत्त—वासिणी पमाण—वाय भासिणी।
सुवण्ण—वण्ण देहया कईय—णाण—मोघ्या।
कुमग्ग णाण रोहिणी जडाण—चित्त—बोहिणी।
सुमायरी महंसया हवेउ णेह संजुया।
सुभव्व कव्व भोयणं जणाण चित्त—मोयणं।
पयत्थिऊण पीणउं हवामि जीय वीणउ।।

अर्थात् जो सरस्वती सुरस्वामिनी (भगवती) हैं, सुशास्त्रों के पादरूपी चरणों से जो गमन करने वाली हैं, जिनेश के वक्त्र (मुख) में जो वास करने वाली हैं, जो प्रमाण—वाक्य बोलने वाली हैं, जो प्रशस्त वर्ण—अक्षर रूपी शरीर वाली हैं, अपने कवित्वज्ञान (संगीत) से जो मोहित करने वाली हैं, जो कुमार्ग रूपी यान को नष्ट करने वाली हैं, जड़ों अज्ञानियों (अथवा वक्रजड़ों) के चित्त को जो सम्बोधित करने वाली हैं, जो वात्सल्यगुण वाली सुमाता है, जो सुभव्य जनों के चित्त को प्रमुदित करने वाले काव्यरूपी भोजन को प्रदान करती हैं, वह सरस्वती देवी मुझे भी वैसी ही शक्ति प्रदान करें, जिससे कि मैं भी काव्य—रचना में प्रवीण हो जाऊँ। —(जीवंधरचरिउ, १/२—१—७, अद्यावधि अप्रकाशित अप्रभ्रंश महाकाव्य) और भी—

केवलणाण—सतणु पहवंती सायवाय मुहकमल हसंती।

विण्णि—पमाण—पयण जोवंती दोदह णिय अंगइँ गोवंती।।
बे—णय—कोमल पयहिं चलंती चउदह—पुव्वाहरण धरंती।
तिजय—चत्ति विब्भमु विहुणंती अत्थ—पसत्थ—वयण भासंती।
कुणय विहंडणि संतावंती णाणा सद्द—दसण सोहंती।
छंद दुविह भुयडाल खण्णी वायरणंगु णाहिं सुयवण्णी।
जिणमय सुत्त—वत्थ पंगुरणी सील महाकुल हर—हर धरणी।
दुविहालंकारेण पहाणी होउ पसण्ण जिणेसहु वाणी।
धत्ता—स्त्रुयदेवि भडारी तिजय पियारी दुरियवहारी सुद्धमई।
कइयण जण—जणणी सुहफल—जणणी सा महु दिज्जउ विमलमई।।


—(सम्मइजिणचरिउ, १/२/१—१०)

अर्थात् केवलज्ञान रूपी शरीर से उत्पन्न हुई, स्याद्वाद रूपी मुख कमल से हँसती हुई, प्रत्यक्ष—परोक्ष रूप दो प्रमाण रूपी नेत्रों से देखती हुई, द्वादशांग रूप अपने अंगों को छिपाती हुई, द्रव्यार्थिक तथा पर्यायार्थिक अथवा निश्चय एवं व्यवहार रूपी कोमल—पदों से चलती हुई, चतुर्दश—पूर्व रूपी आभरणों को धारण करती हुई, तीनों लोकों के जीवों के चित्त में विभ्रम को नष्ट करती हुई आगामिक—अर्थों का प्रशस्त—वचनों से संभाषण करती हुई, कुनयरूपी विट को खण्ड—खण्ड कर उसे सन्तप्त करने वाली, विविध प्रकार के शब्द रूपी दन्तों से सुशोभित, दोनों (मात्रा एवं वर्ण) प्रकार के छन्द रूपी भुजशाखाओं से रम्य, श्रुत में व्याकरणांग रूपी नाभि के रूप में वर्णित, जिनागम सूत्र रूपी वस्त्र (साड़ी) को धारण करने वाली, विविध (शब्द अर्थ) अलंकारों से प्रधान जिनेश्वर की वाणी—सरस्वती मुझ पर प्रसन्न होवें । धत्ता—तीनों लोकों को प्यारी, समस्त पापों को हरने वाली, शुद्धमति वाली कवि—जनों की जननी स्वरूपा एवं शुभ फलों को देने वाली वह भट्टारिका श्रुतदेवी—सरस्वती मुझे विमलमति प्रदान करें ।

सायवाय मुह—कमल हसंती बे—पमाण—णयणहिं पेच्छंती।

पवयण—अत्थ भणइ गिरि कोमल णाणा—सद्द—दसण पह—णम्मल ।
बे—उवओय कण्ण जुमु संठिउ णासावंस सुचरित्तु परिट्ठउ ।
रेहा—वग्गह तह गल—वंदलि बे—णय उररुह सहहि उरत्थलि ।
वायरणंगु उयरु णिरु दुग्गमु णाहि अत्थ—गंभीर मणोरमु ।
दुविह छंद भुयदंड खण्णी जिणमय सुत्त सुवत्थहिं छण्णी ।
सुकह पसारु णियंवु विसालउ अंग—पुव्वओ तूसु रमालउ ।
संधि—विहत्ति पयहि णिरु गच्छइ रस—णव णट्ठभाव सुपयच्छइ ।
पंच—णाण आहारणहि—लंकिय मिच्छावाइहि कहिव ण पंकिय ।
विमल—महाजस पसर विहूसिय जम्म—जरा—मरण त्ति अदूसिय ।
धत्ता—सा होउ महुप्परि तुट्ठमणा कुमइ—पडल णिण्णासणि ।
तिल्लोय पयासणि णाणधरा रिसहहु वयण—णवासिणि ।।


—(मेहेसरचरिउ (मेघश्वरचरित), १/२)

अद्यावधि अप्रकाशित अपभ्रंश महाकव्य) अर्थात् स्याद्वाद रूपी मुख—कमल से हँसने वाली, दो प्रमाण रूपी नेत्रों से देखने वाली, प्रवचन—आगम के अर्थ का सुकोमल—वाणी से कथन करने वाली, नाना प्रकार के निर्दोष शब्दों रूपी दाँतों की प्रभा से युक्त, दो उपयोग रूपी कर्ण—युगल में संस्थित, सुचरित्र रूपी नासावंश में प्रतिष्ठित, आगम रूपी शरीर में रत्नत्रय रूपी त्रिवलीयुक्त गल—कन्दली से सुशोभित, दो नयों रूपों स्तनों से सुशोभित उरुस्थल वाली, व्याकरण के अंगों रूपी दुर्गम (गम्भीर) उदरवाली, मनोरम गम्भीर अर्थरूपी नाभि से युक्त, द्विविध छन्दों रूपी भुजदण्डों से सुरम्य, जिनेन्द्र—मत के सूत्रों रूपी सुन्दर सूतों (धागों) से बने हुए उत्तम वस्त्र (शाटी) को धारण करने वाली, उत्तम कथाओं के विस्तार रूपी रम्य विशाल नितम्ब वाली (चौदह) पूर्वों एवं द्वादशांग रूपी जघनों से सुन्दर, संधि एवं विभक्ति युक्त पदों (चरणों) से गमन करने वाली, नव—रसों के नाट्यभाव को प्रदान करने वाली, पंच—ज्ञान रूपी गहनों से अलंकृत, मिथ्यावादियों के कथन से अदूषित विमल महायश के प्रसार से विभूषित जन्म, जरा एवं मरण रूप दोषत्रयों से रहित, धत्ता—कुमति के पटल (प्रसार) को नष्ट करने वाली, त्रिलोक की प्रकाशिनी, श्री ऋषभदेव के मुख में निवास करने वाली, ज्ञान की भूमि वह सन्तुष्ट मना सरस्वती देवी मेरे ऊपर सदा प्रसन्न रहें ।

सचित्र पाण्डुलिपि

महाकवि रइधूकृत पासणाहचरिउ की सचित्र पाण्डुलिपि का प्रारम्भ चतुर्भुजी देवी सरस्वती के चित्र से हुआ है । उसके एक दाएँ हाथ में एक पाण्डुलिपि (या पोथी) प्रदर्शित है, तो दूसरे दाएँ हाथ में हंसमुख वाला कमण्डलु। इसी प्रकार एक बायें हाथ में वीणा है, तो दूसरे बाएँ हाथ में माला। उसका वाहन अस्पष्ट है । उसकी पृष्ठभूमि में एक तोरण द्वार है, जिसे ऊध्र्वभाग में एक विशाल शिखर तथा उसके आस—पास ३ छोटे—छोटे शिखर अंकित हैं, जिन पर दो—दो ध्वजा—पताकाएँ फहरा रही हैं । सरस्वती के दायीं ओर पाँच व्यक्तियों के चित्र बने हुए हैं । वे तीन और दो की पंक्ति बनाए हुए आमने—सामने बाएँ घुटने के बल पर बैठे हुए हैं । उन सभी में से एक व्यक्ति का एक हाथ तो घुटने के बल पर टिका है और दूसरा हाथ धर्मोपदेश देने के कारण ऊपर, सम्भवत: स्वर्ग या मोक्ष की ओर इंगित कर रहा है । अवशिष्ट सभी के हाथ जुड़े हुए हैं । यह चित्र देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि चित्रकार ने उसमें उक्त रचना (पासणाहचरिउ) के प्रणेता महाकवि रइधू उनके गुरु भट्टारक यश:कीर्ति एवं उनके आश्रयदाता दिल्ली—निवासी अग्रवाल कुलोत्पन्न गोत्रीय......खेऊ साहू का चित्रांकन किया है ।

ग्रंथ—प्रशस्ति के अनुसार हमारे अनुमान का आधार यह है कि सरस्वती के चित्र वाले पृष्ठ पर सरस्वती के महान भक्त तथा सरस्वती के वरदान प्राप्त महाकवि रइधू ने प्रस्तुत ग्रंथ प्रणयन के पूर्व अपने गुरु भट्टारक यश:कीर्ति का सादर स्मरण करते हुए उन्हें सरस्वती निकेत, सरस्वती निलय जैसे विशेषणों से विभूषित किया है ।

उक्त पासणाहचरिउ के कडवक सं. १/८ के अनुसार शिखर वाले एक जिनमंदिर में ही रइधू उनके गुरु एवं आश्रयदाता की उक्त ग्रंथ के प्रणयन सम्बन्धी बातचीत हुई थी; अत: चित्र में वही मन्दिर तथा उक्त तीनों के चित्र प्रदर्शित हैं ।