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धर्म का लक्षण

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धर्म का लक्षण

‘‘जो संसार के दुख से प्राणियों को निकालकर उत्तम सुख में पहुँचाता है, वह धर्म है।’’ ‘‘रत्नत्रय२ स्वरूप धर्म के ईश्वर ऐसे श्री जिनेन्द्र भगवान सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को धर्म कहते हैं। इनसे विपरीत मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र संसार के कारण होते हैं।’’

सम्यग्दर्शन

‘‘सच्चे३ देव, शास्त्र, गुरु का तीन मूढ़ता रहित, आठ गर्व से रहित और आठ अङ्ग सहित श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है।’’ अथवा-
‘‘तत्त्वों४ का यथार्थ श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है।’’ अथवा-
‘‘जिनके५ आठ मद, तीन मूढ़ता, छह अनायतन, आठ शंकादि दोष, सात व्यसन, सात प्रकार के भय और पाँच अतीचार ये चवालीस दोष नहीं हैं, वे सम्यग्दृष्टि हैं।’’
श्रावक के ७० गुण-‘‘आठ६ मूलगुण और बारह उत्तरगुणों (बारह व्रत-५ अणुव्रत, ३ गुणव्रत, ४-शिक्षाव्रत) का प्रतिपालन, सात व्यसन और पच्चीस सम्यक्त्व के दोषों का परित्याग, बारह प्रकार की वैराग्य भावना का चिन्तवन, सम्यग्दर्शन के पाँच अतिचारों का परित्याग और भक्ति-भावना इस प्रकार सम्यग्दृष्टि श्रावक के ७० गुण हैं।’’
सच्चे देव का लक्षण-जो क्षुधा, तृषादि दोषों से रहित, ‘वीतराग’, ‘सर्वज्ञ’ और हितोपदेशी हैं, वे ही सच्चे आप्त हैं।
अठारह दोष-क्षुधा, तृषा, रोग, शोक, जन्म, मरण, बुढ़ापा, भय, गर्व, राग, द्वेष, मोह, चिन्ता, अरति, निद्रा, विस्मय, पसीना तथा खेद ये १८ दोष अरहन्त-सच्चे देव में नहीं होते हैं।
सच्चे शास्त्र का लक्षण-सच्चे आप्त का कहा हुआ प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणों से विरोधरहित जीवादि तत्त्वों का प्रतिपादन करने वाला ही सच्चा शास्त्र है।

[[श्रेणी:चरणानुयोग]‎]