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धर्म की महिमा

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धर्म की महिमा

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सर्पो हारलता भवत्यसिलता सत्पुष्पदामायते,

संपद्येत रसायनं विषमपि प्रीतिं विधत्ते वपु:।
देवा यान्ति वशं प्रसन्नमनस: कि वा बहु ब्रूमहे,

धर्मो यस्य नभोऽपि तस्य सततं रत्नै: परैर्वर्षति।।

धर्मात्मा प्राणी के लिए विषैला सर्प हार बन जाता है, तलवार सुन्दर फुलों की माला हो जाती है, विष भी उत्तम औषधि हो जाता है, शत्रु भी मित्र बन जाता है तथा देव प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा का पालन करने लगते हैं और अधिक तो क्या कहा जाये? आचार्य पद्मनंदि स्वामी कहते हैं कि जिसके पास धर्म है उसके ऊपर आकाश भी निरन्तर रत्नों की वर्षा करता है।

भव्य जीवों! जिस प्रकार अमृत का पान करने से पथिक के मार्ग की थकावट दूर हो जाती है और उसे अतिशय आनंद प्राप्त होता है उसी प्रकार इस धर्मोपदेश के सुनने से भव्य जीवों के संसार परिभ्रमण का दुख दूर हो जाता है तथा उन्हें अनंत सुख का लाभ होता है। जैसे अमृत दुर्लभता से प्राप्त होता है उसी प्रकार धर्म का उपदेश भी अत्यन्त दुर्लभता से प्राप्त होता है।

कुन्दकुन्ददेव ने भी समयसार में कहा है-

सुदपरिचिदाणुभूदा सव्वस्स वि कामभोगबंधकहा।
एयत्तस्सुवलंभो णवरि ण सुलहो विहत्तस्स।।

अर्थात् अनादिकाल से श्रुत, परिचित और अनुभूत पंचेन्द्रियों के विषयभूत काम, भोग, बंध की कथाओं में ही यह जीव आनंदानुभूति कर रहा है किन्तु आत्मतत्व जिसकी प्राप्ति आज तक नहीं हुई है उससे जीव दूर भागता है। आज के युग में प्रथम तो कोई समीचीन धर्म का उपदेश करने वाले धर्माचार्य ही बड़ी कठिनाई से मिलते हैं और यदि कहीं से उन सच्चे गुरुओं का मार्गदर्शन मिल भी जावे तो उसको ग्रहण करने वाले और भी अधिक दुर्लभ हैं।

जैसे शेरनी का दूध स्वर्णपात्र में ही ठहरता है उसी प्रकार सच्चा धर्म मिथ्यात्व रहित शुद्ध सम्यग्दृष्टि के हृदय में ही टिकता है।

आप दुखहरण स्तुति में सती सोमा का नाम पढ़ते हैं-

सोमा से कहा जो तू सती शील विशाला।

तो कुभ तें निकाल भला नाग ही काला।। उस वक्त तुम्हें ध्याके सती हाथ जु डाला।

तत्काल ही यह नाग हुआ फूल की माला।।

वह सोमा सती रात्रि में भोजन नहीं करती थी किन्तु उसकी सास ने जबर्दस्ती उसे अपने नियम से डिगाना चाहा। जब सोमा अपने धर्म में दृढ़ रही तब सास ने एक घड़े में काला सर्प रखवाकर उस सती की परीक्षा करनी चाही।

बंधुओं! एक छोटा सा नियम भी यदि दृढ़तापूर्वक पालन किया जाता है तो देवता तक उसकी रक्षा करते हैं और सोमा सती के साथ भी वही हुआ। उसने धर्म पर विश्वास करके जिनेन्द्र भगवान का स्मरण कर घड़े में हाथ डाल दिया। परन्तु आश्चर्य हो गया उसकी सास एवं पूरे परिवार को, वह काला नाग तो सुन्दर फुलों की माला बनकर सोमा के हाथों में आ गया।

आप लोग ऐसा मत सोचना कि सोमा का जमाना और था और हमारा जमाना बदल गया है। मैं कहती हूँ आप भी दृढ़तापूर्वक नियम का पालन करें और फिर देखें कि आपकी भी देवता रक्षा करते हैं या नहीं?

धर्म के बारे में कवि भूधरदास जी ने कहा है-

जाचें सुरतरु देय सुख, चिंतत चिंता रैन।
बिन जाचें बिन चिन्तये, धर्म सकल सुख दैन।।

कल्पवृक्ष तो याचना करने से फल देता है और चिंतामणि रत्न भी मन में चिंतन करने से इच्छित वस्तु देता है परन्तु धर्म तो एक ऐसा वृक्ष है जो बिना याचना के ही अचिन्त्य फल को प्राप्त कराता है।

आपने अभी मंगलाचरण में सुना ‘‘सर्पो हारलता भवत्यसिलता सत्पुष्पदामायते’’ अर्थात् सर्प का हार तो सोमा ने बनाया और वारिषेण राजकुमार ने तलवार के प्रहार को पुष्पमाल बना दिया था।

जानते हो कैसे थे वारिषेण?

राजगृही नगरी के सम्राट् राजा श्रेणिक के पुत्र वारिषेण प्रत्येक अष्टमी, चतुर्दशी को श्मशान में जाकर नग्न होकर ध्यान किया करते थे। एक दिन वे इसी रूप में वहाँ ध्यान में लीन थे और इधर विद्युतचोर नाम का एक वेश्यागामी चोर रात्रि में नगरसेठ के गले का वेशकीमती हार चुराकर भागा जा रहा था किन्तु हार की दिव्य चमक को वह छिपा न सका तो भागते हुए उसे सिपाहियों ने देख लिया। वे उसे पकड़ने को दौड़े। विद्युतचोर भागता हुआ श्मशान की ओर निकल आया। उसने वारिषेण को ध्यान में खड़े देखा और सिपाहियों के पंजे से छूटने के लिए उस हार को वारिषेण के सामने पटक कर वहाँ से भाग खड़ा हुआ।

इतने में सिपाही भी वहीं आ पहुँचे। वे वारिषेण को हार के पास खड़ा देखकर भौचक्के रह गये। वे राजपुत्र को इस अवस्था में देखकर हँसे और बोले-अच्छा ढोंग रचा है तूने, चोरी करके योगी बनकर खड़ा है। यह कहकर वे वारिषेण को बांधकर राजा श्रेणिक के पास ले गये और बोले-महाराज! इन्होंने हार की चोरी की है।

सुनते ही श्रेणिक का चेहरा क्रोध के मारे लाल हो गया, उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए आज्ञा दे दी-

‘‘इस दुष्ट को श्मशान में ले जाकर मार डालो।’’

अपने खास पुत्र के लिए महाराज की ऐसी कठोर आज्ञा सुनकर सबके सब सन्न रह गये। किन्तु राजाज्ञा के समक्ष बोलने की हिम्मत कौन करता? जल्लाद लोग उसी समय वारिषेण को श्मशान में ले गये और उनकी गर्दन पर जैसे ही तलवार का प्रहार किया कि वारिषेण के ऊपर पुष्पवृष्टि होने लगी और तलवार का उस पर कोई असर नहीं हुआ। वारिषेण के पुण्य ने उसकी रक्षा की।

सत्य आखिर कहाँ छिपता।

वारिषेण की यह हालत देखकर सब उसकी जय-जयकार करने लगे। देवों ने प्रसन्न होकर उस पर सुगंधित फूलों की वर्षा की। जब राजा श्रेणिक को यह समाचार ज्ञात हुआ तब उन्होंने स्वयं जाकर बेटे से क्षमा याचना की किन्तु वारिषेण को तो संसार से वैराग्य हो गया था अत: उसने दैगंबरी दीक्षा धारण कर ली।

इस प्रकार से आगम में तो न जाने कितने उदाहरण भरे पड़े हैं यदि पुण्य का उदय होता है तो विष भी अमृत बन जाता है और पाप कर्म का उदय है|