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धर्म की रक्षा से ही अपनी रक्षा है

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धर्म की रक्षा से ही अपनी रक्षा है

धर्मो रक्षति रक्षितो ननु हतो हन्ति ध्रुवं देहिनाम्।

हन्तव्यो न तत: स एव शरणं संसारिणां सर्वथा।।
धर्म: प्रापयतीह तत्पदमपि ध्यायान्ति यद्योगिन:।

धर्मात्सत्सुहृदस्ति नैव च सुखी नो पण्डितो धार्मिकात्।।

जो प्राणी धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। परन्तु जो प्राणी धर्म को नष्ट कर देता है, छोड़ देता है, धर्म उसको भी नष्ट कर देता है, संसार में डुबो देता है। यह ध्रुव सिद्धांत है। अत: भव्यजीवों को धर्म का हनन-त्याग कभी भी नहीं करना चाहिए। क्योंकि सर्वथा-सब प्रकार से वह धर्म ही प्राणियों के लिए शरण है-सहायक है-रक्षक है। जिस पद का योगीश्वर सदा ध्यान करते रहते हैं, यह धर्म उस मोक्ष पद को भी देने वाला है इसलिए धर्म से बढ़कर कोई सच्चा मित्र नहीं है तथा धर्मात्मा मनुष्य से बढ़कर और कोई अधिक सुखी नहीं है और न धर्मात्मा से बढ़कर अन्य कोई पंडित ही है।