धर अकिंचन धरम, कर ले तू शुभ करम, भव्य प्राणी

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धर अकिंचन धरम


तर्ज—तुमसे लागी लगन......

उत्तम आिंकचन्य धर्म
 
धर अकिंचन धरम, कर ले तू शुभ करम, भव्य प्राणी,
धन्य होगी तेरी जिन्दगानी।। टेक.।।

ना मे कचन अकिंचन धरम है, पर को निज मानना ही भरम है।
तज दे मिथ्या भरम, पाल ले दश धरम, भव्य प्राणी।
धन्य होगी तेरी जिन्दगानी।।१।।

पांच पापों में परिग्रह भी इक है, इसको मुनिवर न धरते तनिक हैं।
उनके पद में नमन, करके पावन हो मन, भव्य प्राणी,
धन्य होगी तेरी जिन्दगानी।।२।।

इसका कुछ त्याग श्रावक भी करते, पांच अणुव्रत का पालन जो करते।
अणुव्रतों का कथन, जिनवरों का वचन, भव्य प्राणी,
धन्य होगी तेरी जिन्दगानी।।३।।

व्रत सहित श्रेष्ठ मानव जनम है, व्रत रहित मन को रखना न तुम है।
व्रत से शिक्षा लें हम, ‘चन्दनामति’ है मन, सुन ले प्राणी,
धन्य होगी तेरी जिन्दगानी।।४।।