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ध्यान और ध्याता

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ध्यान और ध्याता

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मुनिवरगण ध्यान लगा करके, इन द्विविध मोक्ष के कारण को।

जो निश्चय औ व्यवहार रूप, निश्चित ही पा लेते उनको।।
अतएव प्रयत्न सभी करके, तुम ध्यानाभ्यास करो नित ही।

सम्यक् विधि पूर्वक बार-बार, अभ्यास सफल होता सच ही।।४७।।

मुनिराज निश्चित ही ध्यान के द्वारा व्यवहार और निश्चय इन दोनों प्रकार के मोक्ष के कारण को प्राप्त कर लेते हैं इसलिए तुम प्रयत्नपूर्वक चित्त को एकाग्र करके उस ध्यान का अभ्यास करो।

निश्चयरत्नत्रय ही निश्चयमोक्षमार्ग है और व्यवहाररत्नत्रय व्यवहारमोक्षमार्ग है। इनमें निश्चय मोक्षमार्ग साध्य है और व्यवहार मोक्षमार्ग साधन है। साधन से ही साध्य की सिद्धि होती है, इस नियम के अनुसार मुनिराज व्यवहार रत्नत्रय के द्वारा निश्चय रत्नत्रय को प्राप्त करते हैं। इन दोनों प्रकार के मोक्षमार्ग को ध्यान के बल पर ही प्राप्त किया जाता है इसलिए यहाँ ध्यान के लिए प्रेरणा दी है।

ध्यान करने वाला ध्याता पुरुष कैसा होना चाहिए, सो ही बताते हैं-

सब इष्ट अनिष्ट पदार्थों में, मत मोह करो मत राग करो।

मत द्वेष करो इन तीनों का, जैसे होवे परिहार करो।।
इस विध के ध्यान सुसाधन के, हेतू यदि तुम अपने मन को।

स्थिर करना चाहो तो तुम, बस सब विभाव से दूर हटो।।४८।।

यदि तुम अनेक प्रकार का ध्यान सिद्ध करने के लिए मन को स्थिर करना चाहते हो तो इष्ट और अनिष्ट पदार्थों में मोह मत करो, राग मत करो और द्वेष मत करो।

माता, स्त्री, पुत्र, मित्र, धन, मकान, चंदन, तांबूल, वस्त्र, आभूषण आदि पाँचों इन्द्रियों के लिए रुचिकर सामग्री इष्ट विषय है। इनसे विपरीत सर्प, विष, कांटा, शत्रु, रोग आदि अप्रिय वस्तुएँ अनिष्ट हैं।

मोह, राग और द्वेष इन इष्ट-अनिष्ट विषयों में ही होता है। इनके छोड़े बगैर ध्यान की सिद्धि नहीं हो सकती है क्योंकि ये सब वस्तुएँ और मोहादि आकुलता को उत्पन्न करते रहते हैं। धर्मध्यान और शुक्लध्यान के इच्छुक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह मन की एकाग्रता के लिए इन विषयों का त्याग कर देवे।

ध्यान के भेद-प्रभेद - ध्यान के चार भेद हैं-आर्तध्यान, रौद्रध्यान, धर्मध्यान और शुक्लध्यान। इन चारों के भी चार-चार भेद हैं।

आर्तध्यान के ४ भेद - इष्टवियोग, अनिष्टसंयोग, वेदना और निदान।

अपने इष्ट का वियोग हो जाने पर बार-बार उसके प्राप्त होने की चिंता करना इष्टवियोगज आर्तध्यान है।

अनिष्ट का संयोग हो जाने पर, यह मेरे से वैसे दूर हो ? ऐसा बार-बार सोचते रहना अनिष्टसंयोगज आर्तध्यान है। रोग आदि के हो जाने पर, यह कैसे मिटे ? ऐसा चिंतन करते रहना वेदनाजन्य आर्तध्यान है। आगामी काल में भोगों की वांछा करना निदान आर्तध्यान है। ये चारों आर्तध्यान तरतमता से पहले मिथ्यात्व गुणस्थान से लेकर छठे गुणस्थानवर्ती मुनियों तक पाए जाते हैं। इनमें निदान आर्तध्यान मुनियों के नहीं होता है। यद्यपि ये दुध्र्यान हैं और मिथ्यादृष्टि आदि जीवों को तिर्यंचगति में ले जाने वाले हैं फिर भी सम्यग्दृष्टि, देशव्रती अथवा महाव्रती मनुष्य अपनी शुद्ध आत्मा को ही उपादेय मानते हैं इसलिए विशेष भावना के बल से उनके परिणामों में तिर्यंचगति के लिए कारण ऐसा संक्लेश नहीं होता है।

रौद्रध्यान के ४ भेद - हिंसानन्द, मृषानन्द, चौर्यानन्द और विषयसंरक्षणानन्द।

हिंसा करने में आनन्द मानना हिंसानंद है। झूठ बोलने में आनंद मानना मृषानन्द है। चोरी करने में आनंद मानना चौर्यानंद है और पंचेन्द्रियों के विषयों के संरक्षण में आनंद मानना विषयसंरक्षणानंद है। इसे परिग्रहानंद रौद्रध्यान भी कहते हैं।

यह तरतमता से पहले गुणस्थान से लेकर पाँचवें गुणस्थान तक जीवों के होता है। यह रौद्रध्यान मिथ्यादृष्टि जीवों के नरकगति का कारण है तो भी जिस सम्यग्दृष्टि ने नरक आयु बांध ली है उसके सिवाय अन्य सम्यग्दृष्टियों के नरकगति का कारण नहीं होता क्योंकि सम्यग्दृष्टि के देवायु के सिवाय अन्य आयु का बंध नहीं होता, यह नियम है और इसका भी कारण यह है कि सम्यग्दृष्टि निज शुद्ध आत्मा को ही उपादेय मानता है अत: उसके नरकगति या तिर्यंचगति के लिए कारणभूत ऐसे तीव्र संक्लेश परिणाम नहीं हो सकते हैं।

यह दोनों ध्यान अप्रशस्त कहलाते हैं। इन्हें संसार का हेतु ही कहा है अत: इन दुध्र्यानों से बचने के लिए धर्मध्यान का अवलम्बन लेना चाहिए।

धर्मध्यान के ४ भेद - आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय। यह ध्यान तरतमता से असंयतसम्यग्दृष्टि, देशविरत श्रावक, प्रमत्तसंयत मुनि और अप्रमत्तसंयत मुनि तक इन चार गुणस्थानों में होता है। यह मुख्य रूप से पुण्यबंध का कारण होते हुए भी परम्परा से मुक्ति का कारण है।

अब क्रम से इन चारों का लक्षण देखिए-

स्वयं की बुद्धि मंद है और विशेष उपाध्याय गुरु मिल नहीं रहे हैं, ऐसे समय यदि कदाचित् जीव आदि पदार्थों में या अन्य किसी भी विषय में सूक्ष्मता होने से समझ में नहीं आ रहा है, तब यह सोचना कि ‘जिनेन्द्रदेव द्वारा कहे गये वाक्य-तत्व सूक्ष्म हैं, उनका किसी हेतु आदि के द्वारा खण्डन नहीं हो सकता है, इसलिए उनकी आज्ञा को प्रमाण मानकर इन पर श्रद्धान करना है क्योंकि ‘नान्यथावादिनो जिना:’’ जिनेन्द्र भगवान असत्यवादी नहीं हैं।’ ऐसा चिंतवन करके जिनेन्द्रदेव की आज्ञा को प्रमाण मानकर प्रवृत्ति करना आज्ञाविचय नाम का धर्मध्यान है।

भेद-अभेद रत्नत्रय की भावना से हमारे अथवा अन्य जीवों के कर्मों का नाश कब होगा ? ऐसा बार-बार सोचना अपायविचय धर्मध्यान है।

यद्यपि शुद्ध निश्चयनय से यह जीव शुभ -अशुभ कर्म के विपाक फल से रहित है फिर भी अनादिकालीन कर्मबंध के निमित्त से पाप के उदय से अनेक दु:खों को भोग रहा है और पुण्य के उदय से देवादि के सुखों का अनुभव करता रहता है। इस प्रकार कर्मों के उदय-फल, बंध, सत्व आदि का बार-बार चिंतवन करना विपाकविचय धर्मध्यान है।

लोक के आकार का, उसके ऊध्र्व, मध्य, अधोलोक आदि के विस्तार का, जंबूद्वीप, धातकी खण्ड आदि के स्वरूप का बार-बार चिंतन करना संस्थानविचय धर्मध्यान है।

सातवें गुणस्थान में निर्विकल्प ध्यान में भी यह धर्मध्यान ही होता है न कि शुक्लध्यान। इस ध्यान का ही सतत अभ्यास करना चाहिए।

शुक्लध्यान के ४ भेद - पृथक्त्ववितर्ववीचार, एकत्ववितर्वीचार, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवृत्ति।

प्रथम शुक्लध्यान उपशम श्रेणी में चढ़ने वाले मुनि के आठवें, नवमें, दशवें और ग्यारहवें गुणस्थान में होता है। क्षपकश्रेणी में आरोहण करने वाले मुनियों के आठवें, नवमें और दशवें गुणस्थान में होता है।

दूसरा ध्यान बारहवें गुणस्थान में होता है। इसी से घातिया कर्मों का नाश होकर केवलज्ञान प्रगट हो जाता है।

तीसरा शुक्लध्यान तेरहवें गुणस्थान में होता है और चौथा शुक्लध्यान चौदहवें गुणस्थान में माना गया है।

यद्यपि केवलियों के भावमन का अभाव होने से ‘एकाग्रचिंतानिरोध’ लक्षण ध्यान नहीं घटता है फिर भी कर्मों का क्षयरूप कार्य ध्यान से माना है अत: उपचार से केवली भगवान के भी ध्यान कहे गये हैं।

इन चारों ध्यानों में एक धर्मध्यान ही वर्तमान में हम और आपके लिए उपयोगी है। अध्यात्मभाषा से सहज शुद्ध परम चैतन्यस्वरूप, परिपूर्ण आनंद का धारी भगवान आत्मा ही निज आत्मा है, उपादेय बुद्धि करके ‘अनंतज्ञानोहं, अनंतसुखोहं’’ मैं अनन्तज्ञान का धारक हूँ, मैं अनंत सुखस्वरूप हूँ इत्यादि रूप जो भावना है सो अंतरंग धर्मध्यान है। पंचपरमेष्ठी की भक्ति, पूजा आदि तथा उनकी आज्ञा के अनुकूल शुभ अनुष्ठान का करना बहिरंग धर्मध्यान है। उसी प्रकार निज शुद्ध आत्मा में विकल्प रहित ध्यानावस्था शुक्लध्यान है।

इन सब ध्यान का स्वामी चेतन आत्मा ही है। गुणस्थान की अपेक्षा से सम्यग्दृष्टि श्रावक और मुनि धर्मध्यान के अधिकारी हैं।