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ध्यान का स्वरूप एवं उसके भेद तथा गुण-दोष विवेचन

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ध्यान का स्वरूप एवं उसके भेद तथा गुण-दोष विवेचन

ध्यान शब्द भ्वादि गण की परस्मैपदी ध्यै धातु से ल्युट् प्रत्यय करने पर निष्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ सोचना, मनन करना, विचार करना, चिन्तन करना, विचार-विमर्श करना आदि है । वस्तुत: एकाग्रता का नाम ध्यान है ऐसा एक भी क्षण नहीं रहता है, जब व्यक्ति किसी न किसी विषय में सोच-विचार या चिन्तन-मनन न करता हो । किन्तु रागद्वेषजन्य होने से ऐसा ध्यान श्रेयस्कर नहीं होता है साम्यभाव में एकाग्रता ही श्रेयोमार्ग में ग्राह्य है ।

ध्यान का स्वरूप

किसी एक विषय में निरन्तर ज्ञान का रहना ध्यान है । पंचाध्यायी में कहा गया है

'यत्युनर्ज्ञानमेकत्र नैरन्तर्येण कुत्रचित्।

अस्ति तद्ध्यानमत्रापि क्रमो नाप्यक्रमौडर्थत: ।।'[१]

किसी एक स्थान पर या एक विषय में निरन्तर रूप से ज्ञान का रहना ध्यान पै और वह वास्तव में क्रम रूप ही है, अक्रम नहीं । आचार्य शुभचन्द्र ने भी लिखा है- एकाचिन्ता- निरोधो यस्तद् धगनम्' [२]जो एक ज्ञेय में चिन्ता का निरोध है, वह ध्यान है । सर्वार्थसिद्धि में एक प्रश्न उपस्थित किया गया है कि यदि चिन्ता के निरोध का नाम ध्यान है तब तो ध्यान गधे के सींग की तरह असत् ठहरता है क्योंकि निरोध अभाव स्वरूप होता है उत्तर में कहा गया है कि यह कोई दोष नहीं है क्योंकि अन्य की चिन्ता निवृत्ति की अपेक्षा वह असत् कहा जाता है और अपने विषय में प्रवृत्ति होने के कारण वह सत् कहा जाता है । अभाव भावान्तर स्वभाव होता है । अभाव वस्तु का धर्म है यह बात सपक्षसत्व और विपक्षव्यावृत्ति आदि हेतु के अगों द्वारा सिद्ध होती है ।[३] जैन दर्शन के अनुसार ऐसा निरोध या अभाव तुच्छाभाव नहीं है ।

ध्यान के अग

ध्यान के चार अगों का उल्लेख करते हुए ज्ञानार्णव में कहा गया है- 'ध्याता ध्यान तथा ध्येय फल चेति चतुष्टयम् ।[४] ध्याता, ध्यान, ध्येय और ध्यानफल ये चार ध्यान के आ हैं । शुभचन्दाचार्य के अनुसार मोक्ष का इच्छुक, ससार से विरक्त, शान्त चित्त वाला, मन को वश में रखने वाला, आसनादि में स्थिर रहने वाला जितेन्दिय, संवरयुका और धैर्यशाली को ध्यान की सिद्धि के योग्य ध्याता कहा गया है । उन्होंने गृहस्थावस्था में ध्यान की सिद्धि का निषेध करते हुए मुनि अवस्था में ही ध्यान की सिद्धि मानी है 1 वे स्पष्टतया लिखते हैं कि -

'न प्रमादजन्य कर्तु धीधनैरपि पार्यते ।

महाव्यसनसंकीर्णे गृहवासेऽतिनिन्दिते[५]

अर्थात्( अनेक कष्टों भरे हुए अतिनिन्दित गृहवास में बड़े-बडे बुद्धिमान् भी प्रमाद को पराजित करने में समर्थ नहीं है इस कारण गृहस्थावस्था में ध्यान की सिद्धि नहीं हो सकती है इसी प्रकार यति हो जगने पर भी मिथ्यादृष्टियों को ध्यान की सिद्धि नहीं होती है ध्यानसिद्धिर्यतित्वेडपि न स्यात्पाषण्डिना क्वचित्( । [६]उक्त दोनों कथनों की आचार्यश्री ने अनेक दृष्टान्तो तर्को के साथ सिद्धि की है ।

ध्येय विषय का विवेचन करते हुए आचार्य शुभचन्द्र स्पष्ट करते हैं कि निर्मल वस्तु ध्येय है अवस्तु ध्येय नहीं है ध्येय दो प्रका का है- चेतन और अचेतन 1 चेतन तो जीव है और अचेतन पन्थ द्रव्य है । ये सर्वथा नित्य या अनित्य नहीं हैं इनमें मूतिक भी वै और अमूतिक भी हैं । चैतन्य ध्येय सकल एव निकल परमात्मा अर्थात् अरहनेत भगवान् एवं सिद्ध भगवान् हैं वे लिखते हैं -

'शुद्धध्यानविशीर्णकर्मकवचो देवश्च मुक्तेर्वर: ।

सर्वज्ञ: सकल: शिव: स भगवान् सिद्ध: परी नेष्कल: । ।[७]

जो चेतन या अचेतन जिस रूप में अवस्थित है, उसका वही रूप ध्येय है । कहा भी है-

' अमी जीवादयो भावाश्चिदचिल्लक्षणलाच्छिता

तत्स्वरूपाविरोधेन ध्येया धर्मे मनीषिभि: ।।[८]

ध्यान का फल दो प्रकार कहा गया है लौकिक और पारमार्थिक । लौकिक फल वाले सभी ध्यान अप्रशस्त कहे गये हैं, अत: वे कुध्यान हैं तत्वानुशासन में तो स्पष्टतया कहा गया है कि लौकिक फल को चाहने वालों को जो ध्यान होता है, वह या तो आर्तध्यान या रौद्रध्यान । [९]ये दोनों ही ध्यान अप्रशस्त होते हैं ।

यहाँ यह अवधेय है कि अन्य परम्परा में अपान की सिद्धि के लिए जो अष्टाग योग का विवेचन किया गया है अथवा यम, नियम को छोडकर आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन छह अंगों का विवेचन किया गया है, वह मन की स्थिरता और शुद्धता के लिए है । इनका जानना भी योग्य है । कहा भी गया है

'अंगान्यष्टावपि प्राय: प्रयोजनवशात्क्वचित्

उक्तान्यत्रैव तानयुच्चैर्विदान्क्रुर्वन्तु योगिनः ।।[१०]

ध्यान और भावना

लगन ]रप भावना का सूक्ष्म अन्तर स्पष्ट करते हुए आचार्य शुभचन्द कहते हैं -

'एकाचिन्तानिरोधो यस्तद्ध्यान भावना परा ।

अनुप्रेक्षार्थचिन्ता वा तज्जैरभ्युपगम्यते । ।

अथात्( जो एक विषय या ज्ञेय में चित्त ठहरा हुआ है, वह तो ध्यान है और ड्ससे भिन्न है सो भावना है । इसे ध्यान के जानकारों ने अनप्रेक्षा या अर्थचिन्ता कहा है।

ध्यान और ज्ञान

यद्यपि ध्यान ज्ञान की ही पर्याय है तथापि ध्यान में अन्तःकरण के संकोच के कारण कथंचित् भिन्नता भी कही गई है ।[११]

ध्यान के भेद

सामान्यतया ध्यान के दो भेद किये जाते हैं प्रशस्त ध्यान और अप्रशप्त ध्यान । ज्ञानार्णव मै जीव के आशय के आधार पर ध्यान के तीन भेद किये हैं - प्रशस्त ध्यान, अप्रशस्त ध्यान और शुद्ध ध्यान पुण्य रूप आशय के वश से तथा शुद्ध लेश्या के अवलंबन से और वस्तु के यथार्थ स्वरूप के चिन्तन से जो ध्यान उत्पन्न होता है, वह प्रशस्त कहलाता है जीवों के पाप रूप आशय के वश मे तथा मोह, मिथ्यात्व, कषाय एव तत्त्वो के अयथथि चिन्तन से जो ध्यान उत्पन्न होता है, वह अप्रशस्त कहलाता है रागादि की सन्तान के क्षीण -होने पर अन्तरंग आत्मा के प्रसन्न होने से जो अपने स्वरूप की प्राप्ति होती है, उसे शुद्ध ध्यान कहते हैं । शुद्ध ध्यान के फल से मनुष्य को स्वर्ग एव क्रम से मोक्ष की प्राप्ति होती है । अशुभ ध्यान या दुध्यीन से दुर्गति की प्राप्ति होती है तथा प्रयासपूर्वक भी अशुभ कर्म का क्षय नहीं होता है । शुद्ध ध्यान से जीवों को केवलज्ञान की प्राप्ति होती है ।[१२] वास्तव में प्रशस्त ध्यान पुण्यबन्ध अपशस्त ध्यान पापबंध तथा शुद्धध्यान मोक्षप्राप्ति का कारण है

श्री शुभचन्दाचार्य ने अन्यत्र ध्यान के प्रशस्त एवं अप्रशस्त दो भेद भी किये हैं । वे कहते है कि ये इष्ट एव अनिष्टफल की प्राप्ति के कारण भूत है । जिस ध्यान में मुनि वीतराग होकर वस्तु स्वरूप का चिन्तन करे वह ध्यान प्रशस्त एव मोही जीव वस्तु का अयथार्थ चिन्तन करे वह ध्यान अप्रशस्त है । अप्रशस्त ध्यान जीवों के अनादि वासनाजन्य है तथा उपदेश के बिना स्वयमेव होता है अप्रशस्तध्यान अति एव रौद के भेद से दो प्रकार का तथा प्रशस्त ध्यान धर्म एव शुक्ल के भेद से दो प्रकाg का होता है । इनमें आर्त एव रौद नामक अप्रशस्त ध्यान अत्यन्त दु खदायी है तथा धर्म एव शुक्ल नामक प्रशस्त ध्यान कर्मो का नाश करने में समर्थ है ।[१३] तत्त्वार्थसूत्र में आर्तरौदधर्म्यशुक्लानि '[१४] कहकर अति, रौद, धर्म, शुक्ल ध्यानों का विवेचन किया गया है, वे अप्रशस्त एव प्रशस्त दो ध्यानों मे अन्तर्भूत हैं ।

१. अति ध्यान अति शब्द की निरुक्ति करते हुए आचार्य पूज्यपाद ने लिखा है कि 'ऋतं दुःखम् अर्दनमर्तिर्वा तत्र भवमार्तम् [१५] अर्थात् अति शब्द ऋत अथवा अर्ति से बना है । इनका अर्थ दुःख है । इनमें जो होता है, वह आर्त ध्यान है ससारी जीव के हर समय कलुषित परिणाम रहते है । अति ध्यान का विवेचन करते हुए ज्ञानार्णव में कहा गया है -

'ऋते भवमथार्त्त स्याद् असद्ध्यान शरीरिणामू ।

द्वदिग्मोहान्मततातुल्यमविद्यावासनावशात् । ।

[१६]

ऋत अर्थात् पीडा मे जो उत्पन्न होता पै, वह आर्त ध्यान है, यह अप्रशस्त है जैसे किसी प्राणी के दिशाओं के भल जाने से उन्मत्तता होती है, यह ध्यान उसके समान है यह ध्यान अविद्या की वासना से उत्पन्न होता है

आर्त ध्यान के भेद

आर्त ध्यान चार प्रकार का होता है - अनिष्टसयोगज, इष्टवियोगज़, रोगप्रकोपज या वेदनाजन्य और निदानजन्य ।[१७] इनका स्वरूप नाम से ही स्पष्ट है । मनुष्यो के इष्ट भोगादिन्झ की सिद्धि के लिए तथा शत्रु के धात के लिए अथवा उच्च पद की प्राप्ति के लिए जो वांछा है या पूजा-प्रतिष्ठा की याचना के लिए जो चिन्तन है, वह निदानजन्य आर्तध्यान है ।

आर्तध्यान के स्वामी

यह आर्तध्यान छठे गुणस्थान तक हो सकता है पाँचवें गुणस्थान तक तो यह चारों प्रकार का होता है किन्तु छठे गुणस्थानवर्ती मुनि के निदानजन्य आर्तध्यान को छोड्कर शेष तीन प्रकार का ही होता है । यह आर्तध्यान कृष्ण, नील और कापोत लेश्याओं के बल से प्रकट होता है तथा यह पाप रूपी दावाग्नि को उत्पन्न करने वाला है

आर्तध्यान का फल

आर्तध्यान से तिर्यचगति की प्राप्ति होती है यह क्षायोपशमिक भाव है तथा एक विषय पर अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त ही रहता है शका, भय, प्रमाद, असावधानी, कलह चित्तभ्रम, भ्रान्ति, विषय भोग की उत्कण्ठा, निद्रागमन, मूर्च्छा आदि इसके चिह्न हैं ।[१८]

२ रौद्र ध्यान - आचार्य पूज्यपाद ने रौद्र शब्द की निरुक्ति इस प्रकार की है - 'रुद्र: क्रूराशयस्तस्य कर्म तत्र भव वा रौद्रम् ।[१९] अर्थात्( रुद्र का अर्थ क्रूर आशय है, इसका कर्म या इसमें होने वाला भाव रौद्र है । इसी को ज्ञानार्णव में इस प्रकार कहा गया है

'रुद्र: क्रूराशय प्राणी प्रणीतस्तत्त्वदर्शिभि: ।

रुद्रस्य कर्म भावो वा रौद्रमित्यभिधीयते ।।--

तत्वदृष्टाओं ने क्रूर आशय वाले प्राणी को रुद्र कहा है । उस रुद प्राणी के कार्य अथवा भाव को रौद्र कहते हैं । हिसा आदि पाप कार्य करके विकत्थना डींगें मारने का भाव रौद्र ध्यान कहलाता है ।

रौद्रध्यान के भेद

रुद्र आशय से उत्पन्न हुआ भयानक रौद्र ध्यान चार प्रकार का कहा गया है हिसानन्द, मृषानन्द चौयनिन्द और विषयसंरक्षणानन्द इनका स्वरूप नाम से ही स्पष्ट है ।

रौद्रध्यान के स्वामी

रौदध्यान पञ्चम गुणस्थान तक हो सकता है यह छठे गुणस्थानवर्ती साधु को कदापि सभव नहीं है रौद ध्यान के स्वामी का वर्णन करते हुए आचार्य शुभचन्द्र ने लिखा है कि कृष्ण लेश्या के बल से युक्त, नरकपात रूप फल वाला यह रौद्रध्यान पचम गुणस्थान तक की भूमिका में होता है ।

यहाँ यह अवधेय है कि पंचम गुणस्थान में कृष्ण लेश्या तो होती नहीं है और न नरकायु का बध है, अत: पचम गुणस्थान् में रौदध्यान गृहकार्य के सस्कार से लेशमात्र समझना चाहिए ।

रौद्रध्यान का फल

रौद्र ध्यान से नरक गति की प्राप्ति होती है। इसे शुचन्द्राचार्य ने 'श्वभपातफलांकितम् कहकर स्पष्ट किया है। क्रूरता, दण्ड की कठोरता, वंचकता, निर्दयता इसके अन्तरंग तथा नेत्रों की लालिमा, भकुटियों का टेढापन भयानक आकृति, देह का कापना पसीना बन बाह्य चिन्ह है?'

३ धर्मध्यान साधक साम्यभाव का तक-- करने के लिए जब एकाग्र होकर किसी इष्ट पदार्थ को निरन्तर ध्याता है, उसका ज्वर धमध्यान कहलाता है । शुभचन्दाचार्य का कथन है कि प्रशमता का अवलबन करके अपने मन को वश में करके विषयसेवन से विरक्त होकर धर्म ध्यान होता ।

धमध्यान के ध्याता में ज्ञानवैराग्यसम्पन्नता, संसार से विरक्तता, हृदय की दृढता, मोक्ष की इच्छा, शाल परिणाम तथा धैर्य का होना आवश्यक है 1 धर्म ध्यान की सिद्धि तभी होती है, जब ध्याता के हृदय में मैत्री, प्रमोद, कारुण्य एव माध्यस्थ भाव हो

धर्मध्यान के भेद - धमध्यान के भेदों का कथन करते हुए ज्ञानार्णव में कहा गया है -

आज्ञापायविपाकाना क्रमश: संस्थितेस्तथा

विचयो य पृथक् तद्धि धर्मध्यानं चतुर्विधमू ।।'-'

अर्थात् आज्ञा, अपाय, विपाक और सस्थिति या सस्थान का री विचार-चिन्तन (विचय) है इन चारो नाम वाले चार प्रकार के धर्मध्यान हैं। अर्थात् धर्मध्यान के चार भेद हैं - आज्ञाविचय अपायविचय, विपाकविचय और सस्थानविचय । भगवान् की आज्ञा का चिन्तन आज्ञाविचय धर्मध्यान है । कमीके उपाय-नाश का चिन्तन अपायविचय कहलाता है। कर्मोदय या कर्म के फल के उदय चिन्तन विपाकविचय धर्मध्यान है। विपाक का अर्थ फल है लोक के आकार आदि का चिन्तन सस्थानविचय नामक धर्म ध्यान कहलाता है ।

धर्मध्यान के स्वामी

धर्मध्यान सलग्यदर्शनपूर्वक होता है अत: वह चतुर्थ, पंचम, षष्ठ एवं सप्तम गुणस्थानों में होता है यह श्रेणी आरोहण के पहले होता है । तत्त्वार्थाधिगमभाष्य में धर्मध्यान केवल अप्रमत्तसंयम नामक सप्तम गुणस्थान में कहा गया है, जो ठीक प्रतीत नहीं होता है दृ आगे श्रेणी आरोहण में शुक्ल ध्यान ही माना गया है । धर्म ध्यान वाले के क्षायोपशमिक भाव और शुक्ल लेश्या होती है

धर्मध्यान का फल

श्री शुभचन्दाचार्य ने धर्मध्यान के फल का विस्तृत विवेचन किया है धर्मध्यान के प्रभाव गे जीव वैभवशाली कल्पवासी देव, ग्रैवेयक, अनुत्तर विमान तथा सर्वार्थसिद्धि के देव बनते हैं । उमके बाद मनुष्य भव पाकर शुक्लध्यान धारण कर ममस्त कर्मो का नाशकर अविनाशी मोक्ष पद को प्राप्त होते हैं ।इस प्रकार धर्मध्यान का फल परम्परया मोक्षप्राप्ति कही गई है । इन्द्रियों में मलपटता का भाव, आरोग्य, मन की अचचलता, निष्ठुरता का न होना, शरीर में सुगन्धित, मल मूत्र की अल्पता, शरीर की कान्ति, प्रसन्नता, सुस्वरता आदि धर्मध्यानी के चिन्ह कहे गये हैं । धर्मध्यान से 4-5-67 गुणस्थानों में आगे-आगे असंख्यातगुणी कर्मो की निर्जरा होती है

पञ्चमकाल में भी धर्मध्यान

पञ्चम काल में शुक्ल ध्यान नहीं हो सकता है, अत: इस काल में साक्षात्( मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं है । कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि जब इस पचम काल में मोक्ष नहीं है तो ध्यान करने से क्या लाभ है) उन्हें ग्रह समझने की आवश्यकता है कि यद्यपि पंचम काल में शुक्ल ध्यान न होने से साक्षात् मोक्ष नहीं है, किन्तु मोक्ष के परम्परा साधक धर्मध्यान का अभाव नहीं है । शुभचन्दाचार्य लिखते हैं -

'दुःषमत्वादयं काल: कार्यसिद्धेर्न साधकम् ।

इत्युक्त्चा स्वस्य चान्येषां कैश्चिद्ध्यान निषिध्यते ।।'

अर्थात् कोई-कोई ऐसा कहकर अपने तथा पर के ध्यान का निषेध करते हैं कि दु.खम् काल होने से इस काल में ध्यान की योग्यता नही है ऐसा कहने वालों को ध्यान कैसे हो सकता है अर्थात् नहीं हो सकता । वस्तुत: धर्म ध्यान साक्षात् नहीं परम्परा से मोक्ष का कारण है । कहा

'शुभध्यानफलोद्भूतां श्रिय त्रिदशसभवामू।

निर्विशन्ति नरा: नाके क्रमाद् यान्ति पर पदम् ।।

४ शुक्ल ध्यान - शुक्लध्यान के स्वरूप रक्षा विवेचन करतेहुए भी शुभचन्द्राचार्य ने कहा है-

'निष्कियं करणातीतं ध्यानधारणवर्जितमू ।

अन्तर्मुखं च यच्चित्तं तच्छुक्लमिति पठ्यते ।।

जो निष्किय अर्थात् क्रिया रहित है, इन्द्रियातीत है, और ध्यान की धारणा से रहित है अर्थात् 'मैं इसका ध्यान करूँ' ऐसी इच्छा से रहित है और जिसमें चित्त अन्तर्मुख अर्थात्( अपने स्वरूप के ही सन्मुख है, उस ध्यान को शुका ध्यान कहते हैं इस ध्यान के शुक्ल नामकरण के सम्बन्ध में ज्ञानार्णव में एक आर्या को उद्धृत किया गया है-

'शुचिगुणयोगाच्छुक्लं कषायरजस: क्षयादुपशमाद् वा!

वैडूर्यमणिशिखामिव सुनिर्मलं निष्प्रकम्पं च ।।

अर्थात् आत्मा के शुचि गुण के सम्बन्ध से इसका नाम शुक्ल_ पडा है । कषाय रूपी राज के क्षय से अथवा उपशम से आत्मा के अत्यन्त निर्मल परिणाम होते हैं, वही शुचि गुण का योग है यह शुक्ल ध्यान वैडूय मणि की शिखा के समान सुनिर्मल एव निष्कप है ।

शुक्लध्यान के भेद

शुक्ल ध्यान के चार भेद हैं - पृथकत्वविर्तकवीचार, एकत्ववितर्क अवीचार, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्यूपरतक्रियानिवृत्ति । इनमें प्रथम शुक्ल ध्यान विर्तक, वीचार एवं पृथक्त्व सहित है । द्वितीय एकत्व एव वितर्क सहित है, किन्तु वीचार रहित है । तृतीय शुक्ल ध्यान में उपयोग की किया नही है किन्तु काय की किया अत्यन्त सूक्ष्म है, अत: इसकी सूक्ष्म क्रिया अप्रतिपाति ऐमा सार्थक नाम है । चतुर्थ शुक्ल ध्यान में काय की क्रिया भी बिल्कुल नष्ट हो जाती है अत: इसे अन्वर्थ व्यूपरतक्रियानिवृति या समुच्छिन्नक्रिया नाम से कहा जाता है विर्तक धुत को कहने हैं तथा वीचार का अर्थ सक्रमण है । संक्रमण एक पदार्थ से अन्य पदार्थ में, एक व्यंजन से अन्य व्यंजन में तथा एक योग से अन्य योग में होता है । कहा भी गया है-

' अर्थादर्थ चचा शब्दं योगाद्योगं समाश्रयेत्

पर्यायादपि पर्याय द्रव्याणोश्चिन्तयेदणुम्।।'

अर्थात् एक अर्थ से अन्य अर्थ का, एक शब्द से अन्य शब्द का, एक योग से अन्य योग का, एक पर्याय से अन्प पर्याय का और एक दव्याणु से अन्य द्रव्याणु का चिन्तन करे

शुक्ल ध्यान के स्वामी

प्रथम पृथक्त्वविर्तकवीचार नामक प्रथम शुका ध्यान मन, वचन, काय तीनों योगों वाले मुनियों के होता है । द्वितीय एकत्वविर्तक-अवीचार तीनों में से किमी एक योग से ही होता है । तृतीय सूक्ष्मक्रियाऽप्रतिपाति शुक्ल ध्यान केवल काय योग वाले के ही होता है तथा चतुर्थ व्युपरतक्रियानिवृत्ति नामक चतुर्थ शुक्ल ध्यान योगें से सर्वथा रहित अयोगकेवली के होता है ।

ये चारों प्रकार के शुक्लध्यान वज़वृषभनाराच संहनन के धारी, १४ पूवों के ज्ञाता एवं निर्मल चारित्र के धारक के ही होते हैँ ।

शुक्ल ध्यान का फल

शुक्ल ध्यान का फल साक्षात् मोक्ष की प्राप्ति है । तृतीय शुक्ल ध्यान के अनन्तर अयोग गुणरस्थान के उपान्त्य भाग में मुक्ति की प्रतिबन्धक ७२ कर्म प्रकृतियों का नाश हो जाता है तथा चतुर्थ शुक्ल ध्यान प्रकट हो जाता है । तदन्तर अयोग गुणस्थान के अन्त में शेष बची १३ कर्मप्रवृतियां भी नष्ट हो जाती हैं तथा मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है

चतुर्विध ध्यानों में हेयोपादेयता

उपर्युक्त चतुर्विध ध्यानों में आदि के दो आर्त और रौद्र ध्यान त्याज्य हैं, क्योंकि वे खोटे हैं तथा संसार को बढ़ाने वात्ने हैं तथा अन्त के दो धर्म और शुक्ल ध्यान ग्राह्य हैं, क्योंकि वे परम्परया या साक्षात् मोक्ष के साधक हैं । ऐहिक फल वाले जो भी ध्यान हैं वे सब अप्रशस्त हैं तथा उनका समावेश आर्त या रौद्र के अन्तर्गत होता है । ज्ञानी मुनियों ने विद्यानुवाद पूर्व से असंख्यात प्रकार के विद्वेषण, उच्चाटन आदि कर्म प्रकट किये है ।, परन्तु वे सब कुमार्ग एवं कुध्यान हैं । शुभचन्दाचार्य का कहना है -

'स्वप्नेपि कौतुकेनापि नासद्ध्यानानि योगिभि ।

सेव्यानि यान्ति बीजत्व यत: सन्मार्गहानये । ।

अर्थात् योगी मुनियों को चाहिए कि अप्रशस्त ध्यानों को वे कौतुक से स्वप्न में भी न विचारें । क्योंकि अप्रशस्त ध्यान सन्मार्ग की हानि के लिए कारण है ।

खोटे ध्यान के कारण सन्मार्ग से विचलित हुए चित्त को कोई सैकड़ों वर्षो में भी सन्मार्ग में लाने में समर्थ नहीं हो सकता है, इस कारण खोटा ध्यान कदापि नहीं करना चाहिए । खोटे ध्यान कुतूहल में भी किये जाने पर अपने ही नाश के कारण बनते हैं । जो लोग रागाग्नि से प्रज्वलित होकर मुटा, मंडल, यन्त्र, मन्त्र आदि साधनों के द्वारा कामी-क्रोधी कुदेवों का आदर से समाराधन करते हैं, वे दूध आशा से पीड़ित तथा भोगों की पीड़ा से वंचित होकर नरक में पड़ते हैं । अत: वही ध्यान उपादेय है जो कर्मो का नाश करने में समर्थ है

यद्यपि यह सत्य है कि अप्रशस्त ध्यानों से भी अनेकों लौकिक प्रयोजनों की सिद्धि हो जाती है, ऐसे मन्त्रादि का भी विस्तृत विवेचन हुआ है, तथापि ऐसे ध्यान करणीय नही है । क्योंकि ध्यान करने वाला योगी वीतराग का ध्यान करता हुआ वीतराग होकर कर्मो से छूट जाता है और रागी का अवलंबन करके ध्यान करने से रागी होकर क्रूर कर्मो के आश्रित हो जाता है अर्थात्( अशुभ कर्मो से बंध जाता है लौकिक ध्यानों का निर्देश मात्र ध्यान की शक्ति को दिखाने के लिए किया गया है, अन्य कोई इसका प्रयोजन नहीं है । ज्ञानार्णव में कहा गया है कि अनेक प्रकार की विक्रिया रूप असार ध्यान मार्ग का आश्रय लेने वाले क्रोधी तक को ऐसी शक्ति उत्पन्न हो जाती है, जिसका देवता भी चिंतन नहीं कर सकते हैं । फिर स्वभाव से अनन्त और जगत्पसिद्ध प्रभाव का धारक यह आत्मा यदि समाधि में जोड़ा जाये तो समस्त जगत को अपने चरणों में लीन कर लेता है अर्थात् केवलज्ञान प्राप्त कर लेता है

अरहंत का ध्यान करने वाला योगी स्वय अरहत बन जाता है, ऐसी हयात में अप्रतिम शक्ति है । अभ्यास के सामर्थ्य मे मुनि को सवइज्ञ के स्वरूप से तन्मयता हो जाती है तथा वह मुनि ऐसा मानने लगता है कि यह आत्मा वही सर्वज्ञ देव है, अन्य नहीं है

तत्तवानुशासन में इसी तथ्य को इस प्रकार प्रकट किया गया है -

'परिणमते येनात्मा भावेन स तेन तन्मयो भवति ।

अर्हद्ध्यानाविष्टो भावार्हन्स्पात् स्वयं तस्मात्।?'

अर्थात् जो आत्मा जिस भाव रूप परिणमन करता है, वह उस भाव के साथ तन्मय होता है 1 अत: अरहन्त के ध्यान से व्याप्त आत्मा स्वयं भाव अरहन्त होता है ध्यान के अयोग्य साधुओं की पहिचान आत्मा का हित ध्यान में ही है । इस कारण जो कर्मो से मुक्त होने के इच्छुक साधु हैं, उन्हें कषायों की मन्दता के लिए तत्पर होकर कर्मो का नाश करने के लिए ध्यान ही एकमात्र अवलम्बन है ।' किन्तु सिद्धान्त में ध्यान केवल मिथ्यादृ।उयों को ही नहीं, अपितु जिनेन्द्र- आज्ञा के प्रतिकूल चलित चित्त वाले साधुओं को भी निषिद्ध कहा गया है जिनमें मुनि अवस्था में भी ध्यान की योग्यता नही है, श्री शुभचन्द्राचार्य ने उनकी पहिचान इस प्रकार बतलाई है -

1 मन-वचन-कर्म में भिन्नता वाले मायाचारी

2 निर्गन्ध होकर भी परिग्रह रखने वाले

3 सयमधारी होने पर भी धैर्य से रहित

4 कीर्ति, प्रतिष्ठा और अभिमान में आसक्त

5 मिथ्यात्व के कारण तत्त्वों को प्रमाण रूप न मानने वाले ।

6 न्य सिद्धान्तों से ठगी गई बुद्धि वाले

7 नास्तिक वादियों की कुयुक्तयों से प्रभावित चित्त वाले ।

8 रागरजित कान्दर्पी, कैल्विषी, आभियोगिकी, आसुरी एवं सम्मोहिनी भावनाओं वाले।

9 भेद विज्ञान से रहित ।

10 सुख, अणिमा-महिमादि ऋद्धि एवं रसीले भोजनांझी

11 पापाभिचार खोटे कर्मो में रत ।

12 धनोपजिन में संलग्न आदि अनेकविध कार्यो में रत मुनियों को ध्यान के अयोग्य कहा है धनोपार्जन करने वाले साधु के लिए कहा गया है कि जैसे कोई अइपनी माता को वेश्या बनाकर उससे धनोपार्जन करता है, वैसे ही जो मुनि होकर उस मुनि दीक्षा को जीवन का उपाय बनाते हैं और उसके धनोपार्जन करते हैं, वे अत्यन्त निर्लज्ज हैं सदर्भ -

१९ वही, २५/३८-४० ३०.ज्ञानार्णव, ४१/१४ ४० वही, ४२/५

टिप्पणी

  1. पंचाध्यायी उत्तरार्ध, ८४२
  2. ज्ञानार्णव, सर्ग २५ कारिका १६
  3. सर्वार्थसिद्धि, ९7२७
  4. ज्ञानार्णव, सर्ग ४, कारिका '५
  5. वही, ४7९
  6. वही, ४7१९
  7. वही, ३१7१७ का उत्तराध
  8. ज्ञानार्णव, ३१7१८
  9. तत्वानुशासन, २२०
  10. ज्ञानार्णव, २२7४
  11. आदिपुराण, २१/१५-१६
  12. ज्ञानार्णव, ३/२८-३४
  13. वही,२५/१७-२१
  14. तत्त्वार्थसूत्र, ९/२८
  15. सर्वार्थसिद्धि, ९/२२८
  16. ज्ञानार्णव २५/२३
  17. वही, २५/४
  18. वही/41-43
  19. सर्वार्थसिद्धि,९/२८


-डॉ जयकुमार जैन
उपाचाय एवं अध्यछ संस्कृत एसडी कालेज, मुजक्करनगर (उप्र.)
अनेकान्त जनवरी माच 2013 पेज नं 5 से 13