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निंदक नियरे राखिये........!

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निंदक नियरे राखिये........!

ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो कभी आलोचना का शिकार न बना हो। अपने मित्रों, परिजनों, प्रियजनों, सहकर्मियों की आलोचना का शिकार समय—समय पर हमें होना ही पड़ता है। आलोचना हमें डराती है, धमकाती है और कभी—कभी घेरती सी नजर आती है। अधिकतर लोग आलोचना से बचने का प्रयास करते हैं परन्तु सच यह है कि आलोचना का सामना करना चाहिये। यदि हम अध्यात्म मार्ग का अनुसरण करें तो आलोचना का सामना करने में सहजता का अनुभव कर सकते हैं। आलोचना में समता रखना किसी साधु की सहज साधना हो सकती है। सर्वप्रथम आलोचक कौन है ? हमारा हितैषी स्वार्थी है या आलोचना करने का आदतन अपराधी है। आपके चहेते भी आलोचना कर सकते हैं ऐसी स्थिति में अपने अहं को एक तरफ रखकर आप विचार कर सकते हैं कि आलोचना क्या हमारे अंदर पाये जाने वाली कमजोरी की तो नहीं हो रही है यदि हाँ तो हमें अपनी बुरी बातें, आदतें और कमजोरियों को बाहर निकालना चाहिए। आप यह भी निश्चय करें कि आपके बारे में जो कहा जा रहा है वह कितना ठीक हैं और कितना गलत ? निष्पक्ष होकर अपने बारे में निर्णय करें। तभी आप सही दिशा में कदम उठाने में सफल होंगे।

आलोचना सुनकर दबाव और तनाव इतना बढ़ जाता है कि हम आलोचना से उत्पन्न अपनी भावनाओं को दबा नहीं पाते हैं विपरीत परिस्थितियों से बाहर निकलने के लिये हम अपनी भावनाओं से खिलवाड़ कर बैठते हैं। ऐसा न करते हुए हमें अपनी भावनाओं को समझना चाहिए कि वे किस ओर संकेत कर रही हैं, आप किस परिस्थिति में किस प्रकार के विकल्प अपनाकर खुश रह सकते हैं। इस बारे में सोचें अपने मन की सुनें उसी के अनुरूप चलें।

आपको किसी परिजन या गुरुजन की आलोचना अनावश्यक लगती है और दुखी कर देती है तो आपको स्पष्ट कर देना चाहिए कि हमें आपकी इन हस्तक्षेपों से पीड़ा पहुँचती है अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है कि आप नकारात्मक ऊर्जा से अपने आप को दूर रखें।

चाहे कितना भी बड़ा या निकटतम प्रियजन हो आप उसे बता दें कि आप के इस तरह के व्यवहार का हम समुचित प्रतिकार कर सकते हैं और स्पष्ट कर दें हम ऐसे व्यवहार को सहन नहीं करेंगे तथा दूरी बना सकते हैं।

हमारे घर—ऑफिस या कार्यस्थल में मिलने वाले लोग दर्पण की भाँति होते हैं। वे हमारे बोल—चाल व्यवहार की प्रतिध्वनि होते हैं। वे हमें जागरुक करते हैं गलतियों के प्रति सचेत करते हैं, हमें उनकी आलोचना सहना करना चाहिए हमें अपने आलोचकों से पूछना चाहिए कि बिगड़ी बात को कैसे बनाया जा सकता है और हम कैसे बेहतर हो सकते हैं ?

जब कोई आपके कैरियर और व्यक्तिगत जीवन व संबंधों के बारे में मनगढ़ंत अफवाह फैलाए तब आपको बेपरवाह नहीं रहना चाहिए। कोई न कोई सशक्त कदम अवश्य उठाना चाहिए। अफवाहों को एक कागज पर लिख लें फिर उसी कागज के दूसरी तरफ सच लिख लें। जिसने अफवाह फैलाई है उसे सारी चीजें स्पष्ट कर दें।

सभी नीतिकारों का मानना है कि हम शांत मन से सोचें कि सही जवाब क्या हो सकता है ? किसी की शिकायत पर तत्काल प्रतिक्रिया न दें, सोच—समझकर शांत मन से सही समय पर सही स्थान, सही परिस्थिति, सही व्यक्ति को सही जवाब दें। कठिन समय में अब उन पलों के बारे में सोचें जिनसे आपको खुशी मिली थी। आपको कौन सी बात एवं कौन सी जगह शांति मिलती है उसी के बारे में सोचें।

कुछ लोग अपनी आलोचना सुनते ही काम अधूरा छोड़कर भाग जाते हैं, लक्ष्य भूल जाते हैं। कार्य की लय बिगाड़ लेते हैं। लक्ष्यनिष्ठ होकर कई चीजों को छोड़ने की कला होना बहुत जरूरी है।

सच तो यह है कि जो आपकी आलोचना करता है वह खुद अपने आप में परेशान रहता है जो आलोचना करते हैं वे साबित करना चाहते हैं कि वे आपसे ज्यादा दु:खी हैं। ऐसे लोगों के प्रति उदारता दिखाकर आप उनसे पार पा सकते हैं। आप उनसे कहें कि आपसे मुझे उम्मीद तो नहीं थी। इसके बाद आप उसकी बातें शांत रहकर सुनें वह पानी—पानी हो जायेगा। सामने वाला आपका जवाब नहीं दे पायेगा।

जब किसी से आपका विवाद हो, चाहे मीटिंग ही क्यों न हो यदि आपका अपमान करता है तो आपका आत्मविश्वास डगमगा जाता है। आपके अंदर यदि बौखलाहट पैदा हो जाती है तो आपकी शक्ति समाप्त हो जाती है पर ऐसे समय में आप सौम्य बनें रहे तो जीत आपकी निश्चित होती है। आपके जवाब में कड़वाहट न रहे तथा यह भी कहा जा सकता है कि हम आपसे चर्चा बाद में करेंगे।


प्रस्तुति : डॉ० सुभाष जैन, नेहरू महाविद्यालय, ललितपुर
जैन प्रचारक सितम्बर अक्टूबर नवम्बर २०१४