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पंचकल्याणक: क्या क्यों , कैसे?

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पंचकल्याणक: क्या क्यों , कैसे?

१) पंचकल्याणक किसे कहते हैं ? जिन्होंने हमें आत्मकल्याणक का मार्ग बतलाया एवं स्वयं भी उस कल्याण मार्ग पर चलकर जन्म—मरण से रहित हुए, उन तीर्थंकर परमात्माओं के जीवन की वे पांच घटनाएं — गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष के रूप में मानी जाती है, पंचकल्याणक कहलाती हैं। देव, विद्याधर एवं मनुष्यों द्वारा विशेष प्रकार से हर्षोल्लास मनाया जाता है। इस कलिकाल में साक्षात् तीर्थंकरों का हमारे क्षेत्र में अभाव है। अत: उनके जिनबिम्बों पर स्थापना निक्षेप से इन पंचकल्याणकों की विधि सम्पन्न की जाती है।

२) पंचकल्याणक तो एकान्त में भी किये जा सकते हैं, उसके लिए इतने वृहद्स्तर पर प्रचार—प्रसार करके क्यों किया जाता है ?

यह कथन समीचीन है किन्तु आत्मार्थीजनों को पंचकल्याण की विधि प्रत्यक्ष देखने को मिले तथा उन घटना विशेष से परिणामों में निर्मलता आती है। सम्यक्तव प्राप्ति में भी निमित्त बन सकते हैं। अत: अधिकाधिक सहधर्मीजन लाभान्वित हों इसलिए वृहद्स्तर पर ये अनुष्ठान किये जाते हैं।

३) वर्तमान में अनेक स्थलों पर पंचकल्याणक महोत्सव सम्पन्न होते हैं किन्तु उनका उद्देश्य सम्यक् नहीं दिखाई देता है ?

सच्चाई तो यह है कि पंचकल्याणकों का उद्देश्य आत्मा से परमात्मा बनने की कला को सीखने का होना चाहिए किन्तु वर्तमान में यह स्वरूप विकृत होता जा रहा है। कारण यह है कि अर्थोन्मुख दृष्टि हो जाने से आयोजकगण इन आयोजनों के उद्देश्यों से शून्य होते जा रहे हैं। प्रतिष्ठाचार्यों की ढिलाई, समितियों का अर्थोन्मुखी दृष्टिकोण और जनसमूह का धूमधाम तथा मनोरंजन के प्रति बढ़ता रूझान।

४) पंचकल्याणक को हम किस प्रकार समझ सकते हैं ?

पंचकल्याणक को हम अंतर्बाह्य दृष्टि से समझ सकते हैं। आत्मकल्याणक में इस उत्सव को साधन बनाना इसका अंतरंग स्वरूप है, जो किसी भी प्रकार से विस्मृत नहीं करना चाहिए। आभ्यन्तर विधियां वे होती हैं, जो प्रतिष्ठाचार्य बिना प्रदर्शन के करते हैं। बाह्य विधियां वे होती हैं, जो जनसाधारण को मंच के माध्यम से दिखाई जाती हैं। आभ्यन्तर विधियों में शांतिजाप, अज्र्न्यास, सूरीमन्त्र, प्राण—प्रतिष्ठा मन्त्र इत्यादि इन क्रियाओं को पर्दें के अंदर ही विशुद्ध भावों से किया जाता है। बहिरंग विधियों में झण्डारोहण, शोभायात्रा, १६ स्वप्नों का प्रदर्शन , पाण्डुकशिला पर अभिषेक, पालनाझूलन , राजसभा, इन्द्रसभा, दीक्षा, आहारदान, दिव्यध्वनि प्रदर्शन, निर्वाण कल्याणक का प्रदर्शन, रथयात्रा इत्यादि आता है।

५) पंचकल्याणक का मंगलाचरण ध्वजारोहण/ झण्डारोहण से किया जाता है, इसका वैशिष्ट्य क्या है ?

किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का शुभारम्भ ध्वजारोहण से किया जाता है। ध्वजा का फहराना, सब तरफ धार्मिकता का फैल जाना है। जैन धर्म में पंचवर्ण के ध्वज की परिकल्पना भी की गई है जो पंचपरमेष्ठी का प्रतीक है। जैन ध्वज के पांच रंग ऊपर से नीचे की ओर क्रमश: सफेद, लाल, पीला, हरा और नीला है। वैसे धार्मिक अनुष्ठान विधि—विधान पंचकल्याणक आदि में केसरिया ध्वज ही फहराया जाता है और इसी रंग के परिधान धारण करके इन्द्र—इन्द्राणी भगवान की भक्ति, पूजा—विधान करते हैं। केशरिया रंग पीतलेश्या का प्रतीक होने से शुभ माना गया है। ऐसे शुभ और सुखद संदेहवाही ध्वज को देखकर जिन शासन के प्रति सहज ही श्रद्धा उमड़ती है, जिसकी शीतल छांव में सारी समाज अपने आपको निरापद और आनंदमय महसूस करती है। यही कारण है कि धर्मध्वज को शिवपुर पथ परिचायक, दु:खहारक, सुखकारक, दयाप्रवाहक, भविजनतारक, कर्म—विदारक, चिरसुख—शांति—विधायक आदि विशेषणों से सम्बोधित किया जाता हैै।

६) प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान में मंङ्गल कलश की स्थापना क्यों की जाती है ?

भारतीय संस्कृति में कलश को माङ्गलिक माना गया है, अत: उसमें मङ्गल द्रव्यों का क्षेपण करके, उनकी स्थापना मण्डल विधान आदि श्रेष्ठ स्थान पर की जाती है। कलश की स्थापना के माध्यम से मंगल कार्य करने का संकल्प लिया जाता है। घटयात्रा आदि के समय वेदी, मंदिर—कलश, शिखर, ध्वज शुद्धि आदि के लिए मंत्रित जल भी कलशों में ले जाते हैं।

७) आचार्य निमंत्रण का क्या महत्व है ?

पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का मुख्य कर्णधार ‘प्रतिष्ठाचार्य’ माना गया है। अत: कार्यक्रम के प्रारम्भ में प्रतिष्ठाचार्य से यजमान, यज्ञनायक अथवा समाज निवेदन करती है कि आप इस पवित्र कार्य को सानंद सम्पन्न करवायें। प्रतिष्ठाचार्य स्वीकृति प्रदान करते हैं।

८) प्रतिष्ठाचार्य के क्या लक्षण शास्त्रों में बतलायें हैं ?

प्रतिष्ठा प्रदीप के अनुसार—स्याद्वादविद्या मेंं निपुण, शुद्ध उच्चारण वाला, स्वस्थ, क्रिया कुशल, प्रमाद रहित, दया—दान—शीलवान, इन्द्रियविजयी, देव—शास्त्र—गुरु भक्त, शास्त्रज्ञ, धर्मोपदेशक, क्षमावान, समाजमान्य, व्रती, दूरदर्शी , शज्र समाधान कत्र्ता, उत्तम कुलवाला, आत्मज्ञ, जिनधर्मानुयायी, गुरू से मंत्र शिक्षा प्राप्त, अल्पभोजी, निद्रा विजयी, नि:स्पृही , परदु:खहत्र्ता, विधिज्ञ और उपसर्गहत्र्ता प्रतिष्ठाचार्य होता है।

९) यज्ञनायक, यजमान या प्रतिष्ठाकारक कैसा होना चाहिए ?

‘प्रतिष्ठाप्रदीप’ ग्रन्थानुसार—न्यायोपजीवी, गुरूभक्त, निंदा से रहित, विनयी, पूर्णांग, शास्त्रज्ञ, उदार,अपवादरहित, उन्मादरहित, राज्य व निर्माल्य द्रव्य का हत्र्ता न हो, प्रतिष्ठा में सम्पत्ति का व्यय करने वाला, कषायरहित व रात्रिभोजनत्यागी, अभक्ष्य भक्षण त्यागी, धार्मिक व्यक्ति होना चाहिए।

१०) प्रतिष्ठादि कार्यों में शांतिजाप का क्या महत्त्व है ?

बड़े—बड़े प्रतिष्ठा, विधान आदि के कार्यों की निर्विघ्न—समाप्ति की भावना से शान्तिजाप का आयोजन किया जाता है। इसमें जाप में बैठने वाले को विषय कषायों से दूर रहने तथा धर्मध्यान करने का अवसर भी मिलता है। जाप में बैठने वाले व्यक्तियों को सदाचारी, रात्रि भोजन त्यागी , अभक्ष्यभक्षण त्यागी, न्यायोपजीवी एवं मंदकषायी होना चाहिए। जाप करने वाले व्यक्ति मंत्रों का शुद्ध उच्चारण करें।

११) गर्भकल्याणक के दिन घटयात्रा क्यों निकाली जाती है ?

जिस प्रकार माता के गर्भ में तीर्थंकर का जीव आता है तो अष्टदेवियां आदि सभी काम करती हैं। उसी प्रकार जिस वेदी पर भगवान विराजमान होंगे, उस वेदी की शुद्धि , मंदिर—कलश, शिखर,ध्वज आदि की शुद्धि भी गर्भकल्याणक के अवसर पर सम्पन्न होती है। गर्भकल्याणक के साथ इस बाह्य शुद्धता का भावनात्मक सम्बन्ध होता है।

प्रतिष्ठामण्डप से जिनमंदिर तक वेदीशुद्धि हेतु शुद्ध मंत्रित जल कलशों में लेकर आते हैं उन घटों को यात्रा में सौभाग्यवती महिलायें तथा कुमारी बालिकायें धारण करके चलती है। इसे ही घटयात्रा कहते हैं।

१२) इन्द्र—इन्द्राणी के लक्षण प्रतिष्ठा ग्रन्थों में क्या बतलाये हैं ?

नीचकुल एवं नीच विचार रहित, संपत्तिवान, सुन्दर, भाग्यवान, बलवीर्यगुण सहित, युवावस्था वाला, मनोज्ञ, बहुमूल्य आभूषण सहित, शुद्धिाqवचारवान् दृढ़चित्तवाला, जिनेन्द्र भक्त, त्रिकाल सामायिक करने वाला, प्रतिष्ठा विधि का ज्ञाता,मंत्रशास्त्र का ज्ञाता, इन्द्रिय विजय वाला, व्रत—नियम पालने वाला, रात्रि भोजन त्यागी, परिवार वाला, निंदनीय व्यापार नहीं करने वाला इन्द्र होना चाहिए। अंगहीन, व्यसनी, अभक्ष्यभक्षण करने वाला इन्द्र नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार यथायोग्य उपरोक्त लक्षणों को धारण करने वाली इन्द्राणी होना चाहिए।

१३) छप्पन कुमारी एवं अष्टकुमारी देवियाँ कैसी होनी चाहिए ?

अविवाहित , सुन्दर, वस्त्राभूषण से सहित, कुलवान, ज्ञानवान, सेवाभावी आज्ञाकारी, रात्रि भोजन त्यागी बालिकाओं को अष्टकुमारी एवं छप्पनकुमारी देवियां बनाना चाहिए। ये माता की सभी प्रकार से सेवा करती हैं एवं माता से वैराग्यवद्र्धक तत्वचर्चा करके धर्मध्यान पूर्वक समय व्यतीत करती हैं।

१४) इन्द्रसभा और राजसभा का क्या महत्व होता है ?

जब तीर्थंकर जैसे महापुरुष इस भूमण्डल पर अवतरित होतें हैं तो सम्पूर्ण भूमण्डल उनसे प्रभावित हो जाता है। स्वर्ग में देवता तथा मध्यलोक में राजा— चक्रवर्ती आदि अपने—अपने स्थान पर सभाओं में उन तीर्थंकर महापुरूष का गुणगान करते हैं तथा उनके गर्भ, जन्म आदि पंचकल्याणकों में महोत्सव करने के सम्बन्ध में गहन मन्त्रणा करते हैं —यही इन्द्र सभा और राजसभा के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है।

१५) ‘नान्दीविधान’ तथा इन्द्र प्रतिष्ठा की विधि क्यों की जाती है ?

‘नान्दीविधान’ यह पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का प्रारम्भिक मंगलाचरण माना गया है। इसके माध्यम से ’ मङ्गलकलश स्थापना’ के बाद भगवान के माता—पिता बनने वाले सद्गृहस्थों का गोत्र परिवर्तन कराया जाता है तथा उन्हें आचरण सम्बन्धी योग्य नियमों की जानकारी दी जाती है। इसी प्रकार ‘इन्द्र प्रतिष्ठा’ के माध्यम से इन्द्र—इन्द्राणी बनने वाले गृहस्थों की इन्द्र—इन्द्राणियों के रूप में स्थापना की जाती है ।

१६) यागमण्डल—विधान क्यों कराया जाता है ?

योग मण्डल विधान में पञ्चपरमेष्ठी , जिनप्रतिमा, जिनमंदिर , जिनागम और जिनधर्म इन नवदेवताओं की आराधना की जाती है। इस विधान में यह भावना भायी जाती है कि हम नवदेवताओें के सानिध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा करना चाहते हैं। देव, शास्त्र, गुरु हमें ऐसा आशीर्वाद दें कि हमारा यह पावन महोत्सव सानंद सम्पन्न होवे।

१७) पाण्डुकशिला का क्या महत्व है ?

जन्म कल्याणक के अवसर पर जब सौधर्म इन्द्र अपने देव परिवार के साथ जन्मोत्सव मनाने आते हैं, तब सर्वप्रथम वे शचि इन्द्राणी से बाल तीर्थंकर को अनुनय भाव से प्राप्त करते हैं। पश्चात् जन्माभिषेक के उद्देश्य से बाल तीर्थंकर को ऐरावत हाथी पर विराजमान करके सुमेरु पर्वत पर ले जाते हैं। सुमेरु पर्वत पर पाण्डुक वन में उन बाल तीर्थंकर का १००८ कलशों द्वारा क्षीरसागर के जल से अभिषेक किया जाता है। इसे ही पाण्डुक शिला कहते हैं।

१८) ताण्डव नृत्य कब किया जाता है ?

जन्माभिषेक के बाद जब तीर्थंकर बालक को सौधर्म इन्द्र देवोपनीत वस्त्र धारण कराता है और ऐरावत हाथी पर बैठकर वापिस आता है तो उनके अद्भुत रूप को देखकर स्वयं अचम्भित हो जाता है। भगवान के रूप को देखने के लिए सौधर्म इन्द्र एक हजार नेत्र बनाता है और हर्षपूर्वक महाताण्डव नृत्य करता है। तब भी उसे तृप्ति नहीं मिलती है। यह क्रिया उत्साह एवं आनंद की सूचक है। इस नृत्य में इन्द्र कभी वायुवेग से भी चपलतापूर्वक धरती पर आ जाता है। इस तरह वह षट्कुलाचल व सप्तक्षेत्रों को अपना नृत्य स्थल बनाता हुआ भक्ति में डूब जाता है। देवगण नभ से पुष्प वृष्टि करते हैं।

१९) पालना झूलन का क्या महत्व है ?

जिस प्रकार लोक में बालक को पालने में झुलाया जाता है, उसी प्रकार बाल तीर्थंकर को भी पालने में झुलाया जाता है। तीन ज्ञान के धारी बाल तीर्थंकर को पालने में झुलाते हुए कैसी—कैसी आध्यात्मिक लोरिया सुनाई जाती हैं, किस प्रकार उनका मन रञ्जायमान किया जाता है ? इसी उत्साहवर्धक विधि का नाम ‘पालनझूलन’ है। इस क्रिया के प्रति विशेष उत्साह जनसमूह के मध्य देखा जाता है ।

२०) तीर्थंकर को वैराग्य कैसे आता है ?

यह नियम है कि प्रत्येक तीर्थंकर के समय दीक्षा कल्याणक के पूर्व ऐसी कोई न कोई घटना अवश्य घटती है कि जो उन्हें वैराग्य का निमित्त बन जाती है। जैसे—तीर्थंकर ऋषभदेव को नीलाञ्जना का नृत्य करते समय मरण हो जाना और तीर्थंकर महावीर को जाति स्मरण होना, निमित्त माना गया है। वैराग्य होने के बाद उसकी अनुमोदना करने हेतु ब्रह्मस्वर्ग से अखण्ड ब्रह्मचारी लौकान्तिक देवों का आगमन होता है। पश्चात् तीर्थंकर कुमार की दीक्षाविधि सम्पन्न होती है। तीर्थंकर दीक्षा हेतु वनगमन करते हैं उस समय देवताओं और मनुष्यों में किसी बात को लेकर संवाद होता है ? दीक्षा कल्याणक के अवसर पर तीर्थंकर पालकी में विराजमान होते हैं, देवगण पालकी को उठाने लगते हैं, मनुष्य कहते हैं कि हम पहले पालकी उठायेंगे। संवाद जब बढ़ जाता है तो इस बात को लेकर तीर्थंकर के पिता के पास जाते हैं, उनसे यह समाधान प्राप्त होता है कि ‘जो तीर्थंकर के समय दीक्षा लेगा, वही पालकी उठाने का प्रथम पात्र होगा’। उस समय एक कारूणिक दृश्य भी उपस्थित होता है। देवता अपनी देव पर्याय के बदले में मनुष्यों से उनकी मनुष्य पर्याय थोड़ी देर को मांगते हैं और मनुष्य किसी भी कीमत पर उसे स्वीकार नहीं करते , तब मनुष्यों को ही पालकी उठाने का प्रथम अवसर मिलता है। बाद में देवगण पालकी लेकर आकाशमार्ग से गमन करके दीक्षा वन पहुंचते हैं। पालकी से उतरकर तीर्थंकर भगवान स्वच्छ मणिमयी शिला पर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठते हैं, वे अपने वस्त्राभूषण उतारकर पंचमुष्ठि केशलुञ्चन कर ‘नम: सिद्धेभ्य:’ बोलकर वीतरागमुद्रा को धारण कर बेला, तेला आदि उपवास का नियम लेकर आत्मध्यान में लीन हो जाते हैं ।

२१) पंचकल्याणक में तीर्थंकरों का आहारदान किस प्रकार और क्यों किया जाता है ?

मुनि दीक्षा के उपरांत बेला—तेला आदि उपवास करने के बाद मुनिराज की प्रथम पारणा आहारदान के माध्यम से होती है। आहारदान के माध्यम से दानतीर्थ की प्रवृत्ति का उदय होता है तथा मुनियों की निर्दोष आहारचर्या का प्रदर्शन भी इसके माध्यम से जगत के सामने प्रस्तुत होता है।

२२) दिव्यध्वनि का प्रसारण किस प्रकार किया जाता है ?

केवलज्ञान प्राप्ति के बाद समवशरण में तीर्थंकर भगवान को चतुर्मुख विराजमान किया जाता है। उपस्थित मुनिराजों द्वारा दिव्यध्वनि के रूप में प्रवचन करवाया जाता है।

२३) ऐरावत हाथी की विशेषता क्या होती है ?

सौधर्म इन्द्र का हाथी । अभियोग्य देवों में यह वाहन जाति का देव होता है। यह अपनी विक्रिया से एक लाख योजन प्रमाण ऐरावत हाथी का शरीर बना लेता है। दिव्य रत्न मालाओं से युक्त इसमें बत्तीस मुख होते हैं। प्रत्येक मुख में रत्न निर्मित आठ दांत होते हैं । प्रत्येक दांत पर सरोवर, प्रत्येक सरोवर में एक कमलिनी, प्रत्येक कमलिनी में बत्तीस कमल, प्रत्येक कमल में बत्तीस दल और प्रत्येक दल पर एक एक अप्सरा नृत्य करती है।

अनेकान्त दर्पण
जुलाई —दिसम्बर २०१४