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पंचकल्याणक क्यों और कैसे

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पंचकल्याणक क्यों और कैसे

तीर्थंकर परम देवों के गर्भावतरण, जन्म, तप (दीक्षा), ज्ञान और निर्वाण की महान क्रान्तिकारी,, चमत्कारी, विस्मयकारी विशेष घटनाओं को ‘पंचकल्याणक’ कहते हैं। ये घटनाएँ भरत — ऐरावत—क्षेत्रीय प्रत्येक तीर्थंकर के जीवन में घटित होती हैं जो जगत के जीवों के लिए कल्याणकारी/ मंगलकारी होती हैं और तो और इन विशेष घटनाओं के समय कुछ क्षणों के लिए नारकियों को भी अत्यन्त सुखद अनुभूति होती है— ‘नारका अपि मोदन्ते यस्य कल्याणकर्मसु’

तीर्थंकर भगवन्तों की इन पांच विशेष घटनाओं के वक्त चतुर्निकाय के देव आदि मिलकर विशेष प्रकार का जश्न/उत्सव मनाते हैं, उनकी विशेष प्रकार से आराधना—भक्ति करते हैं, जिसमें सौधर्म इन्द्र की भूमिका प्रमुख होती है।

तीर्थंकरों के जीवन में घटित होने वाली इन पांचों महत्वपूर्ण घटनाओं को इन पंचकल्याणकों में चयनित पात्रों द्वारा सीमित समय (७-८ दिनों) में अभिनय की भाँति मंच पर अभिनीत (मंचित) किया जाता है। ये पंचकल्याणक देवों के द्वारा मनाये जाने वाले पंचकल्याणकों की असली नकल होते हैं, जिनका निर्देशन प्रतिष्ठाचार्य करते हैं और दिगम्बर निग्र्रन्थ साधु के पावन सान्निध्य में सम्पन्न कराये जाते हैं।

ये पंचकल्याणक महोत्सव नर से नारायण,आत्मा से /पशु से/ पाषाण से परमात्मा बनने —बनाने की प्रक्रिया के महोत्सव हैं। इनमें पंचकल्याणक सम्बन्धी क्रियाओं की विधि के माध्यम से पाषाण से परमात्मा बनने की प्रक्रिया का प्रदर्शन होता है। प्रतिष्ठा विधि द्वारा धातु और पाषाण से निर्मित तीर्थंकरों की तदाकार मूर्तियों में प्राणप्रतिष्ठा करके उन्हें जीवन्त और पूज्य बनाया जाता है जिन्हें जिनालयों में ससम्मान विराजमान किया जाता है जिनके दर्शन पूजन भक्ति प्रतिदिन सैंकड़ों/हजारों श्रद्धालु भक्तजन करते हैं और अपने दैनिक पापों का प्रक्षालन करते हुए अपने जीवन को परिमार्जित करते हैं। इसीलिए इन पंचकल्याणकों के साथ जैन धर्मावलम्बियों की आस्थाएँ और धार्मिक भावनाएँ जुड़ी होती हैं।

ये प्रतिष्ठित जिनबिम्ब हमारी आस्था के केन्द्र , आराधना के आधार, संस्कृति के प्रतीक और संरक्षक भी हैं। इनसे हमारी संस्कृति सदा हरी—भरी और फलती—फूलती रहती है तथा सांस्कृतिक प्रवाह की धारा अक्षुण्ण बनी रहती है। इन पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सवों में हमारे गुरुवृन्द, प्रतिष्ठाचार्य एवं जैनधर्म—दर्शन के मनीषी विद्वान प्रतिदिन इन कल्याणकारी घटनाओं को, उनके महत्व को बड़े प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर हमें सन्मार्ग पर चलने की तथा तदनुकूल पुरूषार्थ करने की प्रेरणा देते हैं।

प्रतिष्ठाओं में विधिनायक

इन पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं में किसी एक तीर्थंकर को विधिनायक मानकर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा विधि सम्पन्न की जाती है। इसके सभी कार्यक्रमों का निर्धारण इन्हीं विधिनायक के जीवन के आधार पर ही होता है।पंचकल्याणकों में प्राय: आदि प्रभु श्री ऋषभदेव तीर्थंकर को ही विधिनायक बनाकर पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएँ करायी जाती हैं। सभी प्रतिष्ठा पाठ भी इन्हीं आदिनाथ को ही विधिनायक मानकर रचे गये हैं। वैसे प्रतिष्ठा हेतु किसी भी तीर्थंकर भ. को विधिनायक बनाकर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा विधि सम्पन्न करायी जा सकती है। नाम, जन्मस्थान, माता—पिता तथा वैराग्य का निमित्त इनको छोड़कर पांचों कल्याणकों की घटनाएँ चौबीसों तीर्थंकरों के जीवन में समान रूप से घटित हुई हैं। जिन तीर्थंकर प्रभु को विधिनायक बनाया जाता है उन्हीं के जीवन की घटनाओं के अनुसार ही पंचकल्याणक के कार्यक्रमों को तय करके उन्हें सम्पन्न कराते हैं तथा सामान्य प्रतिष्ठा विधि द्वारा शेष सभी मूर्तियों को प्रतिष्ठित किया जाता है। इस तरह वे सभी मूर्तियाँ प्राण प्रतिष्ठित होकर स्थापना निक्षेप से साक्षात् (जीवन्त) अर्हन्त परमेष्ठी के समान ही प्राणवन्त, आराध्य और पूज्य बन जाती हैं।

प्राण प्रतिष्ठा उन्हीं मूर्तियों की की जाती है जो पूर्णत: निर्दोष , समुचतुरस्र संस्थान तथा वीतरागी मुद्रा की छवि वाली होती हैं। सदोष प्रतिमाओं को प्रतिष्ठा के योग्य नहीं माना जाता, क्योंकि वे प्रभावी और मंगलकारी न होकर अनिष्ट और अमंगलकारी होती हैं। सदोषता—निर्दोषता का निर्णय हमारे पूज्य गुरूवृन्द के पावन सान्निध्य में प्रतिष्ठाचार्य करते हैंं।

पंचकल्याणकों में स्थानीय के अलावा अन्य स्थानों की मूर्तियाँ भी प्रतिष्ठा हेतु लायी जाती हैं, जिनकी निर्दोषता का परीक्षण कर न्यौछावर की उचित राशि लेकर प्रतिष्ठा विधि में शामिल कर लिया जाता है और वे भी प्रतिष्ठित होकर पूज्य बन जाती है।

विचारणीय बिन्दू

१) अनेक जिनालयों में प्रतिष्ठित मूर्तियों की भरमार है और ख्याति/ नाम के खातिर नई—नई मूर्तियों की प्रतिष्ठा कर उन्हें मन्दिरों में विराजमान करायी जा रही हैं, जिनका प्रतिदिन प्रक्षाल भी ठीक से नहीं हो पाता। ऐसे स्थानों पर नई प्रतिष्ठित मूर्तियों की स्थापना नहीं की जानी चाहिए तथा किसी अन्य नवनिर्मित जिनालय में नई मूर्तियों की प्रतिष्ठा न कराके आधिक्य वाले जिनालयों से प्रतिष्ठित मूर्तियाँ ससम्मान वहाँ लाकर विराजमान करना—कराना चाहिए और वहाँ के अपने साधर्मी जैनी भाई —बहिनों को प्रतिदिन दर्शन — पूजन भक्ति का सुअवसर प्रदान करना चाहिए।

२) नगर में एक जिनालय के पास ही दूसरे जिनालय का निर्माण नहीं कराना चाहिए क्योंकि इससे सामाजिक विघटन होता है, आपसी वैमनस्य बढ़ता है, सौहार्द समाप्त होता है। हाँ , कॉलोनियाँ बहुत दूर—दूर हों , जिनालय भी दूर — दूर हों। वहाँ के हमारे साधर्मीजन प्रतिदिन मंदिर नहीं जा पाते हों, ऐसी कॉलोनियों में नये मंदिर बनाये जा सकते हैं और उनमें नई मूर्तियों की प्रतिष्ठा न करके उन आधिक्य वाले जिनालयों से मूर्तियाँ लाकर विराजमान कर लेना चाहिए। इसमें समाज को अपनी उदारता तथा साधर्मी वात्सल्य भाव का परिचय देना चाहिए।

३) मंदिरों में वेदियों और श्रीजी पर व्यक्तिगत आधिपत्य/नाम नहीं होना चाहिए। सभी जिन प्रतिमाएँ , वेदियाँ, मंदिर समाज की अमूल्य निधि हैं, धरोहर हैं। अत: समाज के आधिपत्य एवं संरक्षण में इनकी समुचित व्यवस्था एवं प्रबन्ध संचालन होना चाहिए। सामाजिक सौहार्द वात्सल्य और एकता की दृष्टि से आवश्यक है।

प्रतिष्ठित मूर्तियाँ प्रभावक चमत्कारी एवं मंगलकारी हों इसके लिए कुछ ध्यातव्य बिन्दु

१) प्रतिष्ठा हेतु लायी गई सभी मूर्तियाँ पूर्णत: निर्दोष हों।

२) प्रतिष्ठा विधि पूर्ण शुद्धता/ पवित्रता के साथ सम्पन्न करायी जाए।

३) सूरिमंत्र दिग. जैन मुनिराजों द्वारा दिये जाएँ ।

४) जाप, पूजा—पाठ शुद्ध उच्चाण के साथ निर्दोष रूप से सम्पन्न कराये जाएँ ।

५) प्रतिष्ठा विधि की सभी क्रियाएँ शुभ मुहूर्त में पवित्रता के साथ सम्पन्न हों।

६) अशुद्ध वस्त्रधारियों का प्रवेश पुजारी , इन्द्र—इन्द्राणियों के बीच न होने पाये।

७) बनयान के ऊपर पीले/सफेद वस्त्र पहिन कर अभिषेक न होवे।

८) मन्त्रोच्चारण भी शुद्ध व सही होना चाहिए।

९) सभी को पांडाल में देव—शास्त्र गुरू की विनय का सदा ही ध्यान रखना चाहिए। अविनय पूर्वक की गई सारी क्रियाएँ निष्फल होने के साथ —साथ अमंगलकारी तथा कर्मबन्ध का कारण बनती है।

१०) मंच पर देव—शास्त्र —गुरू के समक्ष , पूजनादि क्रियाओं के बीच बोलियाँ तो कतई नहीं होनी चाहिए। इससे तीनों की अविनय होती है।

११) पंचकल्याणक या अन्य महापूजन—विधान आय (आमदनी) को लक्ष्य करके नहीं किये जाने चाहिए।

१२) पात्रों का चयन अलग से किसी कक्ष में बैठकर या सामाजिक चौपाल पर बैठकर राशि निर्धारित करके या बोलियाँ करके करना चाहिए। देव — शास्त्र —गुरू के समक्ष नहीं।

१३) अर्थ प्राप्ति के लोभ में व्यसनी और चारित्रहीन लोगों को पात्र नहीं बनाया जाए।

१४) प्रतिदिन की पूजनादि की सभी क्रियाएँ समयावधि में सम्पन्न करानी चाहिए। समय अधिक होने पर पूजनादि में सम्मिलित भाई—बहिनों को, दर्शन भक्त लोगों को आकुलता—व्याकुलता होने लगती है, परिणामों में विशुद्धता नहीं रह पाती।

१५) पूजनादि के बीच—बीच में भक्ति के नाम पर भौड़े —अशिष्ट नाच — गान तो कतई नहीं होने चाहिए । भजन, स्तुतियाँ , मंगलगीत मधुर स्वरों में गाये जा सकते हैं।

१६) अभिनीत होने वाले प्रहसन या नाटिकाएँ पूर्णत: धार्मिक तथा नैतिक शिक्षा एवं सत्संस्कार देने वाले होना चाहिए।

१७) पूजनकर्ता द्रव्य का विसर्जन सावधानी पूर्वक थाली में ही करें। आजू—बाजू में नीचे या टेबिल पर न गिरायें। जिनवाणी, पुस्तकों के पन्नों में चावल आदि न जाएँ। उन पर पानी भी न गिरायें। उन्हें मोड़े नहीं। यह सब प्रमाद और अविनय को दर्शाता है।

१८) पांडाल के भीतर जूते—चप्पल, चमड़े की वस्तुएँ या अन्य कोई अपवित्र पदार्थ नहीं जाने पावे।

१९) दुधमुँहे बच्चों की माँ को इन्द्राणी या अन्य पात्र न बनाया जाए।

२०) पूजन द्रव्य का शोधन भली प्रकार से होना चाहिए। पूजन द्रव्य की थाली में धुली द्रव्य में से तिरूला निकलते देखे जाते हैं। घुनी और सड़ी द्रव्य का उपयोग नहीं होना चाहिए।

२१) प्रदर्शन और अपव्यय से बचा जाए।

२२) सभी के परिणामों में जितनी विशुद्धि रहेगी, मूर्तियाँ उतनी अधिक प्रभावी चमत्कारी होंगी।

पंचकल्याणकों की निर्विघ्न सम्पन्नता हेतु भी कतिपय ध्यान देने योग्य बातें—

१) अतिथियों की आवास व्यवस्था — अभ्यागतों के रूकने ठहरने की व्यवस्था सुविधा सम्पन्न हो ताकि उन्हें किसी प्रकार की परेशानी न उठानी पड़े। पानी, प्रकाश, वस्त्रादि की समुचित व्यवस्था हो।

२) भोजन व्यवस्था — भोजनालय का सभी सामान शुद्ध,शोधा हुआ हो तथा सावधानी पूर्वक तैयार किया गया हो।

३) उपर्युक्त सम्पूर्ण कार्यों के सम्पादनार्थ विभिन्न समितियों का निर्माण कर उनमें उचित रीति से कार्य विभाजन करना तथा सभी को अपने—अपने दायित्वों की निष्ठापूर्वक सम्पादन करने की ट्रेनिेंग / समझा देना। समितियों के सभी सदस्य एवं मुखिया (नायक) कर्मठ व लगनशील हों।

४) ट्रेन्ड युवक — युवतियों की स्वयं सेवकीय सेना का भी सबसे बड़ा दायित्व होता है जो यूनिफार्म में विशिष्ट पहचान के साथ अपना कर्तव्य निर्वहन में बड़ी दृढ़ता के साथ डटे रहते हैं।

वर्तमान में पंचकल्याणक ख्याति लाभ पूजादि की इच्छा से भावना से प्रदर्शन, बड़े आडम्बरपूर्ण और बहुत खर्चीले होने लगे हैं, जिनमें बाह्य आडम्बर में अपव्यय भी अधिक होता है। वे बड़े सादगीपूर्ण हों, कम खर्चीले धार्मिक भावों / परिणामों के साथ होें।

अपने — अपने नामों की मूर्तियाँ और वेदियाँ बनवाकर प्रतिष्ठायें करायी जा रही हैं जिससे जिनालयों में मूर्तियों और वेदियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है, पर उनकी पूजन—प्रक्षाल करने वालों की संख्या नहीं बढ़ रही है, अपितु घट रही है जो हमारी परम्परा और सांस्कृतिक धारा को क्षीण कर रही है।

गलाफाड़ संगीत की कर्कश ध्वनि प्रदूषण ज्यादा फैलाती है। अत:संगीत से मन्द स्वर में शालीनता और मधुर भावों की प्रशान्त धारा प्रवाहित होनी चाहिए।

पंचकल्याणक के सभी कार्यक्रम और आयोजन बड़े सादगीपूर्ण , आडम्बर एवं प्रदर्शनविहीन विशुद्ध भावों / परिणामों के साथ उत्साह — उल्लासमय धार्मिक वातावरण में ही सम्पन्न किये — कराये जाने चाहिए। ऐसे आयोजन ही सुफलदायी होते हैं। ऐसे आयोजनों में धार्मिक मंचों पर व्यसनी, शराबी, मांसाहारी, राजनैतिक व्यक्तियों को लाया जाता है, जो मंच की पावनता को दूषित करता है। इसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए। यह मंच तो संयमी, व्रती, धार्मिक सदाचारी सज्जन व्यक्तियों से ही शोभा पाता है तथा वहाँ का वातावरण भी विशुद्ध बना रहता है।

अनेकान्त दर्पण
जुलाई —दिसम्बर २०१४