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पंचकल्याणक महोत्सव - आत्मा से परमात्मा बनने का सेतु तीर्थ और तीर्थंकर

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पंचकल्याणक महोत्सव - आत्मा से परमात्मा बनने का सेतु तीर्थ और तीर्थंकर

तीर्थ यानि घाट। जिसे पाकर संसार—समुद्र से तरा जाय वह तीर्थ है। अत: मोक्षप्राप्ति के उपायभूत रत्नत्रयधर्म को भी तीर्थ कहा जाता है। ‘तीर्थं करोति इति तीर्थंकर:’ धर्मरूपी तीर्थ के जो प्रवर्तक होते हैं वे तीर्थंकर कहलाते हैं। तीर्थंकरों का तीर्थ, उनका शासन सर्वजन हितकारी , सर्वसुखकारी होने से सर्वोदय तीर्थ कहा जाता है। जीव यदि सम्यक् पुरूषार्थ करे तो पतित से पावन, नर से नारायण एवं अपूर्ण से पूर्ण बन सकता है। सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय की पवित्र भावना से प्रेरित होकर कोई भव्य जीव दर्शनविशुद्धि आदि १६ कारण भावनाओं की भावना भाता है तो तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लेता है। कालचक्र के परिणमन में एक कल्पकाल के अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल में क्रमश: २४—२४ तीर्थंकर जन्म लेते हैं। जगत उद्धारक, आत्मकल्याणकारी तीर्थंकर भगवान ऐसा पुण्य/संस्कार लेकर आते हैं कि जिससे उन्हें पंचकल्याणक रूपी विभूति प्राप्त होती है। उनका गर्भ में आना, जन्म लेना, दीक्षित होना, केवलज्ञान पाना और निर्वाण को प्राप्त होना ये सभी बीज से वृक्ष तक की सार्थक/सफल यात्रा का द्योतक है। जीवन के इन्हीं पंच पावन प्रसंगों पर देवगण, विद्याधर और मनुष्यादि पूजा आदि महोत्सव करते हैं। यदि महोत्सव के पांच दिन पंचकल्याणक’ के नाम से जाने जाते हैं। धातु या पाषाण के नवनिर्मित जिनबिम्ब की प्रतिष्ठा/ शुद्धि करने के लिए जो पंच कल्याणक किये जाते हैं वह उन्हीं प्रधान पंचकल्याणकों की परिकल्पना है , जिसके गुणावरोपण से पाषाण, धातु निर्मित प्रतिमा परमात्मा के रूप को प्राप्त कर पूज्यनीयता को प्राप्त हो जाती है। इस कलिकाल में साक्षात तीर्थंकर भगवान का विरह (अभाव) है अत: श्रावक श्रद्धालुजन अपने उन आदर्श/ आराध्य की भक्ति पूजा, आराधना हेतु बिम्बों को ही प्रतीक बनाकर प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा करते हैं। प्रथम तीर्थंकर, आद्यशासन नायक तीर्थंकर आदिनाथ हुए हैं। अत: मूल परम्परा और इतिहास की दृष्टि से प्राय: उन्हें ही विधिनायक बनाकर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा की जाती है, जिसमें उन्हीं के जीवन से सम्बंधित चरित्र चित्रण किया जाता है।

गर्भकल्याणक

तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाला जीव जब स्वर्ग से चय होने के निकट होता है और देवायु मात्र छह माह शेष रह जाती है तब इन्द्र अवधिज्ञान से जानकर कि तीर्थंकर गर्भ में आयेंगे इसकी सूचना कुबेर को देता है। कुबेर आज्ञा पाकर रत्नों की वृष्टि करता है। यह रत्नवृष्टि गर्भावतरण के छह माह पूर्व से लेकर जन्म पर्यन्त (कुल १५ माह तक) प्रात:, मध्याह्न और सांय, दिन में तीन बार राजभवन के प्रांगण में होती है और एक बार में साढ़े तीन करोड़ प्रमाण होती है। श्री, धृति, कीर्ति आदि निन्यानवे विद्युत्कुमारी और दिक्कुमारी देवियाँ भी छह मास पहले से बड़े हर्ष के साथ दिशाओं और विदिशाओं से आ जाती हैं। वे आकर बड़े सन्तोष से जिनेन्द्र भगवान् के होनहार माता—पिता को नमस्कार करती हैं और कहती हैं कि हम इन्द्र की आज्ञा से स्वर्गलोक से यहाँ आयी हैं, ‘ हे देवि! आज्ञा दो, समृद्धि सम्पन्न होओ और चिरकाल तक जीवित रहो’, इस प्रकार की उत्तम वाणी को बोलती हुई वे देवियाँ महान आदर के साथ भगवान की माता के आदेश की प्रतीक्षा करने लगती हैं। उस समय परम आश्चर्य को प्राप्त कितनी ही देवियाँ माता की आवश्यक सेवा, परिचर्या में, कितनी ही शृ्रंगार सज्जा में, कितनी ही रक्षा में और कितनी ही देवियाँ मात्र शोभा बढ़ाने के लिए तत्पर हो जाती हैं।

इस प्रकार , सुखपूर्वक समय व्यतीत होता है कि एक दिन रात्रि के पश्चिम प्रहर में जब माता उत्तम शय्या पर सुखपूर्वक शयन कर रही थीं तब वह हाथी, वृषभ, सिंह, दो माला, लक्ष्मी अभिषेक, पूर्णचन्द्र, सूर्य, कलश युगल, मीन युगल, सरोवर, समुद्र, सिंहासन, देव विमान, नागेन्द्र भवन, रत्न राशि और निर्धूम अग्नि रूप सोलह स्वप्न देखती हैं और अन्त में अपने मुख में प्रवेश करते हुए शुभ्र वृषभ को देखती हैं। प्रात: कालीन जय जयकार और वाद्यों की मंगल ध्वनि से जागकर स्नानादि कार्य से निवृत्त हो, मंगल वस्त्राभूषण धारणकर प्रश्नचित्त वह अपने पति के समीप जाती हैं और रात्रि में आये हुए स्वप्नों का वृत्तान्त कहकर उनका फल जानने की इच्छा प्रकट करती हैं। स्वप्नों को सुनकर तीर्थंकर के पिता अवधिज्ञान से विचारक उनका फल बतलाते हैं।

आयोजन

यह कल्याणक पूर्व और उत्तर क्रियाओं के रूप में दो दिन का रहता है। गर्भ कल्याणक के पूर्व रूप में प्रथम दिन रात्रि में इन्द्र दरबार लगाया जाता है, जिसमें तत्वचर्चा के रूप में सौधर्म इन्द्र शेष इन्द्रादिकों प्रश्नों का समाधान करता है। कुबेर द्वारा रत्नवृष्टि की जाती है। अष्ट कुमारियों द्वारा माता को भेंट समर्पित की जाती हैं, तत्पश्चात् शयन करते हुए माता के सोलह स्वप्न दिखाये जाते हैं। तदनन्तर मध्यरात्रि में गर्भ कल्याणक की आंतरिक क्रियायें की जाती हैं। गर्भ कल्याणक के उत्तर रूप में गर्भ कल्याणक की पूजन की जाती है। रात्रि में महाराजा नाभिराय का दरबार लगाया जाता है। महारानी मरूदेवी द्वारा पूछे गये स्वप्नों का फलादेश बताया जाता है। सौधर्म इन्द्र और इन्द्राणी स्वर्ग से लाई हुई भेंट अर्पित करती हैं। छप्पन कुमारी देवियों द्वारा माता को भेंट समर्पित की जाती है एवं गर्भ संबंधी शेष क्रियायें सम्पन्न की जाती हैं।

प्रयोजन

गर्भधारण करना एवं कराना साधारण सी बात है , जो सभी संसारी प्राणी करते रहते हैं। यह पाप की क्रिया है, निन्द्य है किन्तु यही क्रिया यदि वंश और धर्म संतति के उद्देश्य से होती है तो अनिन्द्य हो जाती है। प्रशस्त, शुभ भावनाओं से गर्भ धारण करना और कराना प्रशस्त, पुण्यशाली सन्तान को अपनी वंश परम्परा में लाना है। शिशु के गर्भ में आने से लेकर जन्म पर्यन्त माता—पिता अच्छी भावनाएँ रखें, खान—पान सात्त्विक एवं रहन—सहन में सादगी रखें ताकि वह संस्कार उस शिशु पर भी पड़ता है, यह बात आज का विज्ञान भी स्वीकार करता है तो उसके फल से भयभीत क्यों ? काम तो करे पर उसका फल न मिले इस आशय से गर्भपात जैसा जघन्य अपराध वह कभी न करे। किसी भी वैज्ञानिक पद्धति को अपनाकर यदि गर्भपात किया/ कराया जाता है तो वह एक ऐसा अक्षम्य अपराध है जिसमें सिर्फ एक भू्रण की नहीं बल्कि जीते—जागते एक वंश की ही हत्या है।

जन्म कल्याणक

गर्भावतरण के नवमाह व्यतीत होने पर बाल प्रभु तीर्थंकर का जन्म होता है। संसार के कल्याणक के निमित्त हुए जन्म के प्रति कृतज्ञता और भक्ति प्रदर्शित करने हेतु जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया जाता है। इन्द्र की आज्ञा से नियुक्त देवांगनाओं द्वारा परिचर्चा में माता की गर्भकालीन अवधि प्रसन्नता और विवेकपूर्ण हास—परिहास में सहज व्यतीत हो जाती है। गर्भावधि पूर्ण होने पर शुभ व सुमंगल नक्षत्रों के अत्यंत शुभ संयोगों से युक्त श्रेष्ठ सुखदायक मुहूर्त में तीर्थंकर कुमार का जन्म होता है। यह जन्म किसी साधारण पुरूष का नहीं है, यह जन्म है अतिशय पुण्यशाली तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाले तीर्थ—प्रवर्तक का। तीर्थंकर शिशु का जन्म होते ही आकाश और दिशाएं निर्मल हो जाती हैं, तीनों लोकों में आनन्द छा जाता है।यहाँ तक कि नरकों मेंं भी नारकी जीवों को क्षणभर को शांति हो जाती है। मन्द—मन्द पवन सुख शान्ति के उस वातावरण को और भी आनन्द —सुरभि से भर देता है। कल्पवासी देवों के यहाँ घंटे बजने लगते हैं, ज्योतिषी देवों के भवनों में सिंहनाद होने लगता है, भवनवासी देवों के भवनों में शंख ध्वनि होने लगती है एवं व्यन्तर देवों के निवास स्थान पर भेरियाँ (नगाड़े) बज उठती हैं। सभी इन्द्रों के आसन कम्पायमान हो जाते हैं। इन विविध लक्षणों के प्रकट होने पर सौधर्म इन्द्र अवधिज्ञान से जान लेता है कि मध्यलोक में तीर्थंकर प्रभु का जन्म हो गया है। विनय, भक्ति पूर्वक वह अपने आसन से उतरकर तथा सात कदम आगे जाकर ‘जिनेन्द्र भगवान की जय हो’ यह कहते हुए तीर्थंकर कुमार को हाथ जोड़कर नमन करता है। तदनन्तर सौधर्म इन्द्र का आदेश पाते ही अच्युत स्वर्ग तक के समस्त इन्द्र देवताओं सहित चलने को एकत्रित हो जाते हैं। कुबेर जन्म नगरी की शोभा करता है।

सौधर्म इन्द्र सभी इन्द्र—इन्द्राणियों के साथ राजमहल में प्रवेश करता है। वहाँ वह बालक जिनेन्द्र के लाने के लिए अपनी इन्द्राणी को आज्ञा देता है। इन्द्राणी आज्ञा पाते ही माता के प्रसूतिगृह में प्रवेश करती है। माता और पुत्र की प्रदक्षिणा देकर और देवकृत माया से माता को सुखनिद्रा में सुलाकर वह बालप्रभु के अनुपम सुन्दर रूप को अपलक निहारने लगती है। हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर उनकी स्तुति करती है। मायामयी पुत्र को माता के पास रखकर तीर्थंकर कुमार को अपने कोमल हाथों में उठा लेती है।

प्रसूतिगृह से निकलकर इन्द्राणी उस शिशु को अतृप्तभाव से अपने स्वामी इन्द्र के कर कमलों में सौंप देती है। सौधर्म इन्द्र भगवान के उस अलौकिक रूप सौंदर्य को जो देखता है, सो देखता ही रह जाता है।

बालप्रभु को लेकर सौधर्म इन्द्र ऐरावत हाथी पर आरूढ़ हो सुमेरु पर्वत की ओर गमन कर देता है। ऐशान इन्द्र भगवान के मस्तक पर छत्र लगाता है तथा सानतकुमार एवं माहेन्द्र इन्द्र दोनों तरफ चंवर ढ़ोरते हैं। मंगलकारी उच्च स्वरों में जय—जयकार करते हुए सभी देवगण अपनी—अपनी भक्ति भावनाएँ व्यक्त करते हैं।

पहले इन्द्र देव समूह के साथ गिरिराज मेरू पर्वत की प्रदक्षिणा देता है फिर सुमेरू पर्वत के पाण्डुक वन की ईशान दिशा में निर्मित सुवर्ण वर्ण वाली पाण्डुक शिला के मध्य सिंहासन पर पूर्व दिशा की ओर मुँह करके बाल जिनेन्द्र को विराजमान कर देता है। पाण्डुक शिला के दोनों ओर बने हुए भद्रासनों पर सौधर्म व ईशान इन्द्र अभिषेक करने के लिए आसीन हो जाते हैं। जन्म कल्याणक की महाविभूति देखने के लिए सभी देवगण भी उस पांडुकशिला के चारों ओर तदनन्तर क्षीर सागर से देवों द्वारा लाये गये जल के एक हजार आठ स्वर्णमय कलशों से अभिषेक किया जाता है।

आयोजन

जन्म कल्याणक की क्रियाओं में प्रात: काल सर्वप्रथम इन्द्र द्वारा प्रतिष्ठा मण्डप की तीन प्रदक्षिणा दी जाती हैं। जन्मातिशय के संस्कार होते हैं । तत्पश्चात् प्रभु तीर्थंकर के जन्म की घोषणा होते ही जन्मोत्सव की बधाइयाँ होती हैं तथा कुबेर द्वारा याचकों को दान दिया जाता है। शची द्वारा बालक को गर्भगृह से लाया जाता है। इन्द्र द्वारा शची से बाल प्रभु लेने के प्रयास की नृत्य प्रस्तुति शिशु प्राप्त होने पर इन्द्र द्वारा सहस्र नेत्रों से बालप्रभु का रूप-दर्शन तथा ऐरावत हाथी पर जिन—बालक को लेकर जन्मकल्याणक का भव्य जुलूस निकाला जाता है। पाण्डुक शिला पर एक हजार आठ कलशों से शिशु तीर्थंकर का जन्माभिषेक किया जाता है। शची द्वारा बालक का वस्त्राभूषणों से शृ्र्रंगार किया जाता है तथा महाराजा के दरबार में सौधर्म इन्द्र द्वारा भक्ति से आपूरित तांडव नृत्य किया जाता है। भगवान के जन्म कल्याणक की पूजा की जाती है। रात्रि में बालक का पालना झुलाना एवं बाल क्रीड़ाओं का मनोहारी प्रदर्शन किया जाता है।

प्रयोजन

भगवान का जन्म, जगत का कल्याण करने वाला है। वह जगत उद्धारक है। जन्म—जन्म की साधना और पुण्य के फलस्वरूप उन्हें मानव जीवन की सर्वोत्कृष्ट पर्याय प्राप्त हुई है। तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता के लिए जन्म से ही मति, श्रुत, अवधिज्ञान के धारी, क्षायिक सम्यग्दृष्टि और तद्भवमोक्षगामी वे प्रभु होते हैं इसलिए उनके जन्म का कल्याणक अर्थात् उत्सव मनाया जाता है। वे इस उत्सव के अधिकारी हैं। पञ्चमकाल में सभी का जन्म मिथ्यात्व के साथ होता है, अत: मिथ्यात्व की पर्याय में जन्मे इस शरीर का जन्मोत्सव मनाना सैद्धांतिक दृष्टि से उचित नहीं है।

फिर संसारी जन अपने बच्चों का जन्म दिन कहाँ  ? वह तो ‘बर्थ डे’ मनाते हैं। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होने वाले, अपने बच्चों से केक कटवाते हैं एवं मोमबत्तियाँ बुझवाते हैं। अब आप स्वयं ही सोचिये कि जो बालक शुरू से ही काटने और बुझाने के संस्कार लेंगे वे आगे चलकर जोड़ने और उजाला करने के क्या कार्य करेंगे ? इसलिए जीवन की बीतती घड़ियाँ ‘बर्थ डे’ क्या, व्यर्थ डे बनती जा रही हैं। इस देव— दुर्लभ पर्याय को व्यर्थ नहीं किन्तु सार्थक बनाना है।

आपके कल्याणक को मनाकर हम अपने जीवन में भी परम कल्याण रूप उत्सव को प्राप्त करें यही जन्म कल्याणक को मनाने का प्रयोजन है।

दीक्षा कल्याणक

तीर्थंकर कुमार के जन्म के पश्चात् देव कुमारों सहित बाल क्रीड़ा करते हुए यौवन को प्राप्त होते हैं। माता—पिता की भावना और तीर्थंकर कुमार की मौन सहमति को पाकर इन्द्र किन्हीं सुयोग्य कन्याओं से शुभ—मुहूर्त में उनका विवाह संस्कार सम्पन्न कराता है। राज्य व्यवस्था संभालने के लिए वह राजपद भी स्वीकार करते हैं। (वर्तमान चौबीसी में पाँच तीर्थंकर अविवाहित रहे अर्थात् कुमार अवस्था में ही वह दीक्षित हुए थे) इस तरह देवोपनीत सुख—सामग्री का उपभोग करते हुए उनका काल सुख से व्यतीत होता है। राज्य वैभव को भोगते हुए जब तीर्थंकर भगवान जगत और जीवन के रहस्योद्घाटक किन्हीं निमित्त विशेष को पाकर संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति का अनुभव करते हैं तब पाँचवें ब्रह्मा स्वर्ग के अन्त में रहने वाले शुक्ल लेश्याधारी, स्त्रीराग विरहित , एक भवावतारी , देवर्षि लौकान्तिक देव आकर उन स्वयंभू भगवान के विरक्त होने और मुक्ति —प्राप्ति के उद्यम की प्रशंसा करते हैं, अनुमोदना करते हैं।

हे तरण तारण! त्रिलोकी नाथ! तीर्थ पुरुष ! आपकी जय हो .... जय हो... जय हो...। इसे अपनाकर आप मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करें। यह मार्ग हमें भी प्राप्त हो, इस प्रकार लौकान्तिक देव विभिन्न प्रकार से भगवान की स्तुति करते हुए उनकी वन्दना/ भक्ति कर अपना नियोग साधकर चले जाते हैं। तत्पश्चात् सौधर्म इन्द्र आदि चतुर्णिकाय के देव भगवान का दीक्षा कल्याणक महोत्सव मनाने आते हैं। महोत्सव की तैयारी के निमित्त विभिन्न मंगल-सूचक कार्य किये जाते हैं। इन्द्रादि देव क्षीरसागर से जल लाकर प्रभु को आसन पर विराजमान कर उनका अभिषेक करते हैं । यह अभिषेक दीक्षाभिषेक कहलाता है। अभिषेक के बाद शरीर में उत्तम गंध का लेपन कर, उत्तमोत्तम वस्त्र, आभूषण तथा मालाओं से उन तीर्थंकर जिन को विभूषित करते हैं। तदनन्तर संसार की स्थिति के जानकार वे जिनेन्द्र भगवान आकुल—व्याकुल और भाव विह्वल पिता आदि परिवारजनों को अच्छी तरह समझकर इन्द्र द्वारा लाई हुई कुबेर निर्मित पालकी उठाकर चंवर ढोरते हुए सात कदम चलते हैं, फिर विद्याधर राजा उसी भाँति पालकी उठाकर सात कदम चलते हैं। तत्पश्चात् इन्द्रादि देव पालकी उठाकर आकाश मार्ग से वन को ले जाते हैं। निश्चित स्थान पर इन्द्राणी सघन वृक्ष के नीचे स्वच्छ मणिमयी शिला पर स्वस्तिक का चिन्ह अंकित करती है। पालकी से उतरकर भगवान उस शिला पर पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके विराजमान होते हैं, वे अपने वस्त्राभूषण उतार देते हैं और पञ्चमुष्टि केशलुञ्च करते हैं। इस प्रकार बाह्याभ्यन्तर परिग्रह से रहित निग्र्रन्थ दिगम्बर मुद्रा धारण कर हाथ जोड़कर ‘नम: सिद्धेभ्य:’ का उच्चारण कर समस्त सिद्धों को नमन करते हैं और बेला, तेला आदि उपवास का नियम लेकर आत्मध्यान में लीन हो जाते हैं। अन्य अनेक राजा भी उनके साथ दीक्षा धारण करते हैं । तीर्थंकर किसी से दीक्षा नहीं लेते, वह स्वयं दीक्षित होते हैं क्योंकि वह स्वयं जगतगुरू हैं। दीक्षा धारण करते ही सभी तीर्थंकरों को मन: पर्ययज्ञान के साथ समस्त ऋद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। इन्द्रादि देव भगवान की भक्ति पूजा कर अपना नियोग साधकर चले जाते हैं।

भगवान अखण्ड मौन धारण कर विहार करते हैं। बेला तेला आदि उपवास रूप नियम पूर्ण होने पर मुनि तीर्थंकर आहारार्थ नगर में जाते हैं और विधिपूर्वक किसी सुकुल श्रेष्ठि श्रावक के यहाँ आहार ग्रहण करते हैं। जिस भाग्यशाली पुण्यशाली, दातार के घर आहार होते हैं वहाँ देवों द्वारा पंचाश्चर्य किये जाते हैं।

आयोजन

यदि विधि नायक के रूप में आदिनाथ भगवान की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा है तो मध्याह्न काल में महाराजा नाभिराय का दरबार दर्शाया जाता है। युवराज आदिकुमार का राज्याभिषेक, राज्य संचालन , षट् कर्म व्यवस्था का प्रतिपादन, दण्ड व्यवस्था , ३२ हजार मुकुटबद्ध राजाओं द्वारा आदिनाथ को भेंट समर्पण, ब्राह्मी, सुन्दरी को क्रमश: अक्षर लिपि और अंक—विद्या सिखाना। नीलांजना का नृत्य , उसका मरण और इन्द्र द्वारा तत्काल दूसरी नीलांजना का नृत्य, महाराजा आदिनाथ का वैराग्य, भरत और बाहुबली को राज्य सौंपना, लौकान्तिक देवों द्वारा भगवान के वैराग्य भावों की प्रशंसा/स्तुति और भगवान् का दीक्षा वन के लिए प्रस्थान दर्शाया जाता है। उपस्थित मुनिजनों द्वारा दीक्षा—विधि और मूर्तियों पर अंक न्यास तथा संस्कार आरोपण का कार्य किया जाता है । जन्माभिषेक के बाद वस्त्राभूषणों से सजाई गई समस्त प्रतिमाओं से आज वस्त्राभूषण अलग कर दिये जाते हैं, तभी अंकन्यास और संस्कार आरोपण का कार्य होता है।

प्रयोजन

आचार्य कुन्दकुन्द देव कहते है कि ‘ पडिवज्जदु सामण्णं जदि इच्छदि दु:ख परिमोक्खं’ यदि तुम दु:ख से छुटकारा चाहते हो तो श्रामण्य को अंगीकार करो। श्रामण्य/साधना का मार्ग ही सुख शांति का मार्ग है। भगवान ने अपनी आत्मकथा की अक्षय निधि को पाने के लिए संसार की भौतिक जड़ निधियों का त्याग कर दिया। नीलांजना का मरण देखकर उन्हें अपनी आत्म—निरंजना की सुध आ गई।

मर कर तो सभी छूट जाता है विशेषता तो छोड़कर मरने में है। हमारी चिता जले कि उससे पहले ही हमारी चेतना का दीप प्रज्ज्वलित हो जाना चाहिए। जीवन में संयम लें, दीक्षा लें, पिच्छका लें यह तो सर्वश्रेष्ठ है ही किन्तु यदि इतना नहीं हो सकता तो कम से कम पिच्छिका—धारियों के पीछे तो लग ही जाना चाहिए। सन्तोष और सदाचरण को धारण कर जीवन की आपाधापी /आकुलता समाप्त करनी चाहिए। जीवन में हम वैभव को नहीं विराग को महत्व दें। त्यागी—त्तपस्वियों के सिर्फ चरण ही नहीं उनके आचरण का भ्ी स्पर्श करें। दीक्षा कल्याणक मनाने का यही प्रयोजन है।

ज्ञान कल्याणक

तपस्या काल में मुनिनाथ तीर्थंकर विविध तपों को तपते हुए अपनी आत्म—विशुद्धता को बढ़ाते जाते हैं। इसी साधना के काल में शुद्धोपयोग की उत्कृष्टता से क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ होकर वे भगवान शुक्लध्यान के बल पर घातिया कर्मों का नाश करते हैं। चार घातिया कर्मों के नाश से उन्हें अनन्तज्ञान,अनन्तदर्शन अनन्तसुख और अनन्तवीर्य रूप अनन्त चतुष्टय की प्राप्ति होती है। भगवान को केवलज्ञान होते ही तीनों लोकों में हलचल मच जाती है। उस समय कल्पवासी देवों के यहाँ अपने—आप घण्टा बजने लगता है, ज्योतिषी देवों के यहां सिंहनाद, व्यन्तरदेवों के यहाँ नगाड़ों की ध्वनि एवं भवनवासी देवों के भवनों में शंखनाद होने लगता है। दिशाएँ निर्मल हो जाती हैं। संसार का संताप दूर हो जाता है और सर्वत्र सुख—शांति का संचार हो जाता है। अवधिज्ञानी इन्द्र इन समस्त चिन्हों से जान लेता है कि भगवान को केवलज्ञान प्राप्त हो गया है और परम हर्ष को प्राप्त वह इन्द्र भक्ति—पूर्वक मस्तक झुकाकर नमस्कार करता है।

केवलज्ञानोत्पत्ति के वृत्तान्त से अवगत परम हर्ष को प्राप्त वह इन्द्र अनेक देवों के साथ भगवान के केवलज्ञान की पूजा करने के लिए निकलता है। समवशरण में पहुँचकर इन्द्र तीर्थंकर प्रभु को नमस्कार करते हुए उनकी स्तुति करता है और अष्ट द्रव्यों से पूजा करता है।

तीर्थंकर प्रकृति के उदय से भगवान के समवशरण की रचना होती है। इन्द्र की आज्ञा से कुबेर देव कारीगरों के साथ सुन्दर समवशरण की रचना करता है। समवशरण भगवान की उस धर्मसभा का नाम है जहाँ बैठकर सभी प्राणी अपनी—अपनी भाषा में भगवान की दिव्यवाणी का धर्मोपदेश के रूप में अमृत — पान करते हैं । भगवान की यह दिव्यवाणी (दिव्यध्वनि) दिन में तीन बार, तीन—तीन मुहूर्त प्रमाण अर्थात् एक बार में २ घंटे २४ मिनट तक खिरती है। इसके अतिरिक्त सौधर्म इन्द्र या चक्रवर्ती आदि कोई पुण्यशाली प्रधान पुरूष पहुँचता है तो उसके निमित्त से असमय में भी दिव्यध्वनि खिर जाती है । इस तरह भव्य जीवों को धर्मोपदेश देते हुए भगवान का देशान्तर में विहार होता है। भगवान के इस श्री विहार में चरणों के नीचे देवकृत स्वर्णकमलों की रचना होती जाती है किन्तु भगवान के चरण कमल से चार अंगुल ऊपर अस्पृश्य ही रहते हैं। आगे—आगे धर्मचक्र चलता है।

आयोजन

यदि विधिविनायक के रूप में भगवान आदिनाथ स्वामी की पञ्चकल्याणक प्रतिष्ठा की जा रही है तो प्रात:काल मुनिराज वृषभनाथ जी की आहारचर्या हेतु राजा सोमप्रभ और युवराज श्रेयांस को आहारदान के लिए तैयार किया जाता है। हस्तिनापुर में उनके यहाँ विधि मिल जाने पर भगवान का इक्षुरस का आहार सम्पन्न कराया जाता है। इस दिन जो भी श्रावक/श्राविकाएँ भगवान को आहार देते हैं वह कुछ न कुछ नियम संयम ग्रहण करके ही आहार दान देते हैं एवं व्यवस्था और शुद्धता का पूर्ण ध्यान रखते हैं। दोपहर को विधिनायक की प्रतिमा और अन्य प्रतिमाओं के लिए भी मंत्राराधन, अधिवासना, तिलकदान, मुखोद्घाटन, नेत्रोन्मीलन, सूरिमंत्र एवं केवलज्ञानोत्पत्ति की क्रिया सम्पन्न की जाती है।पाँच दीपक जलाकर पञ्चम ज्ञान केवलज्ञान को दर्शाया जाता है। जय—जयकार और वाद्ययंत्रो की ध्वनि कराई जाती है। समवशरण की रचना में चारों दिशाओं में भगवान को विराजमान कर उपस्थित मुनिराजों द्वारा दिव्यध्वनि के रूप में प्रवचन कराये जाते हैं। तत्पश्चात् केवलज्ञान की पूजा होती है। केवलज्ञान प्रकट होने के पूर्व समस्त क्रियाएं परदे के अन्दर होती हैं; जिनमें मन की एकाग्रता और विशुद्धता बहुत जरूरी है। ये क्रियाएं प्रतिष्ठाचार्य एवं उपस्थित मुनिजन करते हैं। केवलज्ञान प्रकट होने पर परदा खोल दिया जाता है।

प्रयोजन

जेण रागा विरज्जेज्ज जेण सेएसु रज्जदि।

जेण मित्ती पभावेज्ज तं णाणं जिणसासणे।।

(मूलाचार—५/२६८)

जिससे राग से छुटकारा मिले, जिससे श्रेयोमार्ग में अनुरक्ति हो तथा जो मैत्री का विस्तार करे उसे जिनशासन में ज्ञान कहा है। चार अनुयोगों में निबद्ध द्वादशांग रूप वाणी को पाकर हमें वे सारे कार्य करना चाहिए जिनसे प्रेम मैत्री का विस्तार हो और हम कल्याण के मार्ग में लगें।

तज्जयति परं ज्योति: समं समस्तैरनन्त पर्यायै: ।

दर्पणतल इव सकला प्रतिफलति पदार्थ मालिका यत्र।।

(पु.सि.उ.१)

जिसमें दपर्ण के तल की तरह समस्त पदार्थों का समूह अतीत, अनागत और वर्तमान काल की अनन्त पर्यायों सहित प्रतिबिम्बित होता है वह सर्वोत्कृष्ट ज्ञानज्योति जयवन्त होवे। वीतरागता का आलम्बन लेकर अन्तर्मुख होना समयसार है और रागद्वेष के द्वन्द्व में फंसकर बहिर्मुख होना संसार है। रंग और तरंग रूप परणति से परे अन्तरंग आत्मतत्व की अनुभूति से भगवान ने कैवल्य ज्योति प्राप्त की है। हम भी उस कैवल्य ज्योति की पूजा करें। हमारा ज्ञान और समूचा जीवन ही दर्पण—स्वभावी हो। यही इस कल्याणक को मनाने का प्रयोजन है।

मोक्ष कल्याणक

सर्व कर्मों से छुटकारा पाने का नाम मोक्ष है । भाव कर्म के रूप में रागद्वेष और द्रव्य कर्म के रूप में ज्ञानावरणादि अष्ट कर्म प्रत्येक संसारी आत्मा में लगे हुए हैं। इन अष्ट कर्मों से छुटकारा पाने वाली आत्मा ही मोक्ष प्राप्त करती है। केवलज्ञान प्राप्ति से तेरहवें गुणस्थान में स्थित तीर्थंकर भगवान का धर्मतीर्थ प्रवर्तन करते हुए आयु का जब थोड़ा समय शेष रहता है तब वह समवशरण छोड़कर योग निरोध करने के लिए चले जाते हैं। पद्मासन या कायोत्सर्गासन में स्थित वे केवली भगवान सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती नामक तीसरे शुक्लधान से मन, वचन, काय का रूप योग का निरोध कर जब चौदहवें गुणस्थान में स्थित होते हैं तब वहाँ व्युपरतक्रियानिवृत्ति नामक चौथे शुक्लध्यान से अघातिया कर्मों की ७२ और १३ प्रकृतियों का नाश कर अन्त समय में अ—इ—उ—ऋ—ऌ इन पाँच लघु स्वर अक्षरों के उच्चारण में जितना समय लगता है उतने समय में मोक्ष चले जाते हैं।

भगवान के निर्वाण क्षेत्र की पहचान अक्षुण्ण बनी रहे इस अभिप्राय से इन्द्र निर्वाण स्थल पर सिद्धशिला का निर्माण कर वङ्का से उस पर स्वस्तिक या जिनेन्द्र भगवान के लक्षणों को चिन्हित करता है। जिस स्थान से भगवान को मोक्ष होता है वह भूमि सिद्ध भूमि/निर्वाण भूमि मानी जाती है तथा पवित्र तीर्थ के रूप में प्रसिद्धि को प्राप्त होती है।

आयोजन

यदि विधिविनायक के रूप में भगवान आदिनाथ भगवान की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हो रही है तो मंच पर कैलाश पर्वत की रचना कर उस पर विराजित भगवान आदिनाथ को दर्शाया जाता है। उपस्थित मुनि संघ अथवा प्रतिष्ठाचार्य द्वारा निर्वाण संबंधी भक्ति पाठ सम्पन्न होते ही शुभ मुहूर्त में भगवान को मोक्ष प्राप्त कराकर वहाँ थोड़ी देर के लिए एक सिद्धाकृति दर्शा दी जाती है। प्रतिष्ठाचार्य द्वारा भगवान के मोक्ष जाने की घोषणा होते ही घण्टा, दिव्य—घोष आदि वाद्ययन्त्र बजाकर हर्ष उल्लास व्यक्त किया जाता है। भगवान के परमौदारिक शरीर के कपूर की तरह उड़ जाने के बाद शेष बचे नख और केशों को वहाँ बने कुण्ड में स्थापित किया जाता है तथा अग्निकुमार के देवेन्द्रों द्वारा उनके मुकुटों से प्रज्ज्वलित अग्नि से नख केशों का अग्नि संस्कार किया जाता है तत्पश्चात् निर्वाण कल्याणक की पूजा तथा बृहद शान्ति हवन किया जाता है। इस तरह मोक्षकल्याणक की क्रिया सम्पन्न हो जाती है। समयानुसार उसी समय या मध्याह्न में जिनालय में जिनबिम्ब की स्थापना और कलशारोहण आदि कार्यक्रम किये जाते हैं। दोपहर के विशेष कार्यक्रमों में श्रीमज्जिनेन्द्र रथोत्सव किया जाता है।

प्रयोजन

बन्धन दु:खदायी है, आनन्ददायी तो है स्वतन्त्रता। भगवान अष्ट कर्मों के बन्धन से मुक्त होकर स्वतन्त्र , स्वाधीन हो गये। अब उनके जन्म, जरा, मरण कभी नहीं होगा क्योंकि वह निर्माण को प्राप्त हो गये हैं। हम भी भगवान की तरह समस्त बन्धनों से छुटकारा पाकर परम निर्वाण को प्राप्त करें। हमने निर्वाह तो बहुत किया, निर्माण भी किया पर अब निर्वाण प्राप्ति का पुरुषार्थ भी करें। स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। आजादी का अपना यह अधिकार किसी कृपा से नहीं बल्कि हमें अपने पुरुषार्थ से पाना है। भगवान के समान हम भी संसार से पार हो और सिद्ध शिला के वासी बनें यही इस कल्याणक को मनाने का प्रयोजन है।

अनेकान्त दर्पण,जुलाई — दिसम्बर २०१४