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पदमनंदी पंचविंशतिका

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‘‘श्री ऋषभदेवाय नम: ॐ श्री महावीराय नम:’’ ‘‘श्री ज्ञानमती मात्रे नम:’’ ‘‘श्री रत्नमती मात्रे नम:’’ ।।पद्मनंदि पञ्चिंवशतिका।। मंगलाचरण श्री नाभिराज सुत ऋषभ को कोटि कोटि प्रणाम। पुन: ज्ञानमती मात का श्रद्धा से कर ध्यान।। जिनने पढ़ इस ग्रंथ को किया आत्मकल्याण। ऐसी माता मोहिनी को मरो बारम्बार प्रणाम।। (१) श्री आदिनाथ तीर्थंकर बन कर्मों को नष्ट किया ऐसे। इक पल में पवन झकोरे से सब काष्ठ समूह जले जैसे।। उनकी ध्यानाग्नि सूर्य से भी थी अधिक तेज वाली देखो। जयवंत रहे श्री ऋषभेश्वर विस्तीर्ण कायधारी थे वो।। (२) करने लायक कुछ कार्य नहीं इसलिए भुजाएं लटका दी। जाने को बची न कोई जगह इसलिए खड़े थे निश्चल ही।। न रहा देखने को कुछ भी इसलिए दृष्टि नासां पर की। अत्यन्त निराकुल हुए प्रभो इसलिए उन्हें पूजें नित ही।। (३) जो रागद्वेष और अस्त्र शस्त्र से रहित अर्हंत जिनेश्वर हैं। जो इन सबसे हो सहित देव रहता भयभीत निरन्तर है।। वह क्या रक्षा कर सकता है हम सबकी जो खुद डरा हुआ। इसलिए वीतरागी प्रभु के चरणों की ही है शरण लिया।। (४) भगवन के चरण कमल जैसे धूली से रहित प्रभावाले। इंद्रों के मणिमय मुकुटों की आभा से लगते अति प्यारे। जन्मान्तरों के बैर को गुरूजन धिक्कारते।। ऐसे चरणों के वंदन से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। हैं कमल अचेतन पर प्रभु के पदकमल तो पाप नशाते हैं।। (५) तीनों लोकों के जो स्वामी श्री शांतिनाथ भगवान हुए। उनको मैं शीश झुकाती हूँ मन का संताप दूर करिए।। देवों के नीलमणि से युत मुकुटों की जो कांती रहती। लगता प्रभु के पदकमलों पर भ्रमरों की ही पंक्ति चलती।। (६) सब ज्ञाता दृष्टा त्रिभुवन के और क्रोध लोभ से रहित प्रभु। सत् वचन बोलने वाले वे जिनदेव सदा जयवंत विभु।। वे मोक्षगमन करने वाले प्राणी के लिए खिवैया हैं। उत्कृष्ट धर्म को बतलाया जिससे तिरती हर नैया है।। (७) ।।धर्मोपदेशामृत।। अब आवो बताएँ तुम्हें जिनधर्म की व्याख्या। सब जीवों पर दया करो उसके भेद हैं क्या क्या।। दो रूप धर्म मुनियों और गृहस्थ के कहे। फिर रत्नत्रय स्वरूप से त्रयभेद भी कहे।। इस एकदेश धर्म को गृहस्थ पालते। उत्कृष्ट रत्नत्रय धर्म को साधु धारते।। यहाँ और भी क्षमादि गुण से दश धरम कहे। उसमें जो आत्मा की परिणति से सुख लहे।। (८) सबमें व्रतों में मुख्य यह दया ही श्रेष्ठ है। जैसे बिना जड़ के ठहर सकता न पेड़ है।। जिसमें नहीं दया वो शून्य के समान है। निर्दयी हृदय को कुछ भी रहता न मान है।। (९) चिरकाल भवभ्रमण में हम क्या क्या नहीं बने। माता पिता भाई बहन हम सबके बन चुके। पिछले भवों के रागद्वेष वश हो मारते।

(१०) यदि किसी दरिद्री से कहिए वह अपने प्राणदान दे दे। बदले में जितनी चाहे वो मुझसे मेरी संपति ले ले।। लेकिन जब इसको ठुकरा दे तो समझो तुम हे पुरुषोत्तम। ये अभय आहार औषधि शास्त्र ये चार दान सबसे उत्तम।। (११) व्रत रहित अव्रती भी यदि हो इस दया भाव से भरा हुआ। वह स्वर्गमोक्ष का अधिकारी बन जाता है यह कहा गया।। लेकिन जो दया रहित प्राणी कितनो भी भीषण तप कर ले। वह पापी ही समझा जाता सब दान पुण्य है व्यर्थ रहें।। (१२) जो रत्नत्रय धारी मुनि को भक्ति से उत्तम दान करे। ऐसे गृहस्थ और मुनियों को खुद सुरगण सदा प्रणाम करें।। क्योंकि इस मानुष तन द्वारा ही साधु मुनि बन सकते हैं। इस तन से ही बस मोक्ष मिले वहाँ इंद्र नहीं जा सकते हैं।। (१३) जिस घर में पूजा होती है अर्हंत सिद्ध आचार्यों की। भक्ति से दान दिया जाता निग्र्र्रंथ तपस्वी गुरुओं को।। करूणा से दान दिया जाता जो दुखी दरिद्र मनुष्य दिखें। ऐसे गृहस्थ सम्यग्दृष्टि विद्वानों से भी पूज्य हुए।। (१४) ग्यारह प्रतिमाओं के नाम आचार्य पद्मनंदि स्वामी ने ग्यारह प्रतिमा बतलाई हैं। जो दर्शन, व्रत, सामायिक और चौथी प्रोषध कहलाई है।। सचित्तत्याग, रात्रिभोजन सातवीं ब्रह्मचर्य प्रतिमा। आरम्भ, परिग्रह व अनुमति त्याग, भिक्षापूर्वक भोजन लेना।। (१५) श्री समन्तभद्र आदिक आचार्य ने और भी विस्तृत व्याख्या की। इसलिए उपासकाध्ययन ग्रंथ से पढ़ने की भी आज्ञा दी।। इन आचार्यों ने सप्तव्यसन त्याग बिन प्रतिमा लेना व्यर्थ कही। जो व्यसन रहित सज्जन प्राणी उनको ही पूज्यता प्राप्त हुई।। (१६) ।।सप्तव्यसन के नाम।। जुआँ खेलना, मांस, मद्य, वेश्यागमन, शिकार। चोरी, पररमणी रमण ये सातों व्यसन निवार।। इन सातों व्यसनों का क्रमश: आचार्य प्ररूपण करते हैं। इनसे क्या हानि होती है उसका कुछ वर्णन करते हैं।। (१७) ।।जुआँ का स्वरूप।। इस जुआँ खेलने से जग में अपर्कीित पैâलती है सच में। क्यों कि चोरी वेश्यावृत्ति इन सबका मेल हुआ इसमें।। जिस तरह राज्य में राजा के आधीन मंत्रीगण होते हैं।। बस इसी तरह यह जुआँ व्यसन आपत्ति कारक होते हैं।। (१८) आचार्यों ने सारे व्यसनों में जुआँ को सबसे मुख्य कहा। क्योंकि इससे दरिद्र बनकर आगे आगे विपदा में घिरा।। जब विपदा आती तब मानव क्रोधित हो लोभ में पंâसता है। इसलिए त्याग कर दो भविजन इससे सब ही दुख मिलता है। (१९) ।।मांस भक्षण का विरोध।। जो सज्जन पुरुषों के द्वारा आँखों से देखा जा न सके। जो दीन प्राणियों का बध कर खाते उनको हम छू न सके।। ऐसे सर्वथा अपावन मांसाहार का जो भक्षण करते। ना जाने कितने पापों का संचय कर नरकगति लहते।। (२०) यदि कोई अपना पिता पुत्र बाहर से लौट के ना आये। तो नर हो या फिर नारी हो वह बिलख बिलख कर चिल्लाये। फिर वैâसे मूक प्राणियों का वह माँस बनाकर खाता है। दया और लज्जा आती वैâसे कट कर चिल्लाता है।। (२१) ।।मदिरा का निषेध।। यह मदिरा पीने वाला भी धन धर्म सभी को नष्ट करे। नरको, में जाने का भी डर इनको न कभी भी त्रस्त करे।। यदि समझाने से भी मानव मदिरा सेवन को न छोड़े। तो समझो वह व्यसनी कोई उत्कृष्ट कार्य न कर पावे।। (२२) मदिा पीने वाला व्यक्ति माता को भी स्त्री माने। खोटी चेष्टाएँ कर करके कोई भी बात नहीं माने।। उससे भी अधिक जब नशा चढ़े तब कुत्ते भी यदि मूत्र करें। उसको भी मिष्ट मिष्ट कहके वह पापी उसको गटक रहें।। (२३) ।।वेश्यागमन।। जो मद्य माँस सेवन करती जिनका स्नेह दिखावा है। विषयी पुरुषों को बहलाकर धन लेकर करे छलावा है।। ऐसी वेश्याओं का सेवन करने से नरकद्वार खुलता। धन और प्रतिष्ठा भी खोकर आगे कुछ हाथ नहीं लगता।। (२४) जैसे धोबी सबके कपड़े एक शिला पे जाकर धोता है। वैसे ही वेश्या के समीप सब तरह का प्राणी रमता है।। जिस तरह माँस के एक पिण्ड पर कुत्ते लड़ते रहते हैं। ऐसे वेश्यागामी पुरुषों को तत्सम उपमा देते हैं।। (२५) शिकार का निषेध जो सदा वनों में भ्रमण करें जिनका निजदेह सिवा न कोई। जो तृण खाकर जीवित रहते रक्षक भी जिनका नहि कोई।। ऐसे में जो मांसाहारी लोभी शिकार करते मृग का। इहलोक व्याधियों से पीड़ित परलोक नरक में घर उनका।। (२६) आचार्य पुन: समझाते हैं एक चींटी जब पीड़ा देती। तो भी क्यों मानव दया छोड़ पशु पक्षी का जीवन हरते।। जो भलीभाँति यह समझ रहे कि इनको भी पीड़ा होती। फिर भी ऐसे दुष्कर्म करें फिर इनकी कौन गति होगी।। (२७) जिनको तुम आज मारते हो भव भव में आगे मारेगा। जिसको तुम सब ठग रहे आज वह कल तुमसे बदला लेगा। शास्त्रों का और सब जन जन का यह ही तो कहना रहा सदा। पर फिर भी इनमें लगे रहे कुछ भी ना ज्ञान हमें रहता।। (२८) चोरी करनेकादोष छल कपट दगाबाजी से जो परद्रव्य हड़प कर लेते हैं। वे प्राणहरण से भी ज्यादा उस प्राणी को दुख देते हैं।। क्योंकि धन प्राणों से प्यारा होता है सूक्ति कही जाती। इसलिए कहा है गुरुओं ने पर द्रव्य में प्रीति ना की जाती।। (२९) परस्त्री सेवन की हानि परस्त्री का सेवन करता जो भय िंचता आकुलता रहती। संतप्त सदा रहता प्राणी निंह बुद्धि ठिकाने पर रहती।। क्षुध तृषा रोग से पीड़ित वह जब नरकगति में जाता है। लोहे की बनी पुतलियों से आिंलगन कराया जाता है।। (३०) इतना ही नहीं स्वप्न में भी जो परस्त्री का ध्यान करे। आचार्य उसे समझाते हैं ऐसा पौरुष भी व्यर्थ रहे।। पर धन वनिता दिलवाने में जो बनते बड़े सहायक हैं। ऐसे मित्रों से दूर रहे दुर्बुद्धी देते घातक है।। (३१) सप्तव्यसन में जिनको हानि हुई जुएं में सब कुछ हार गये वे हुए युधिष्ठिर राजा हैं। अरु मांस का भक्षण करने में सब छूटा वे बक राजा हैं।। मदिरा पीने से यदुवंशी राजा के पुत्र विनष्ट हुए। वेश्यासेवन में चारुदत्त होकर दरिद्र अतिकष्ट सहे।। (३१) ब्रह्मदत्त नाम के राजा भी करके शिकार पद भ्रष्ट हुए। चोरी करने में सत्यघोष को गोबर भक्षण दण्ड दिए।। पर स्त्री सेवन से रावण ने दुख सहे अरु नरक गए। इसलिए सप्तव्यसनों को तज आचार्य हमारे यही कहें।। (३२) आचार्य और भी कहते हैं केवल ये व्यसन न दुखदायी। इनसे अतिरिक्त अल्पबुद्धि मिथ्यादृष्टि जो हैं भाई।। वे कई तरह के गलत मार्ग से जन धन की हानि करते। इसलिए कुमार्ग छोड़ करके सत्पथ पर चलने को कहते।। (३३) जिनकी बुद्धी अति निर्मल है जो आत्मा का हित चाह रहे। वे कभी न झुकते व्यसनों में जो स्वर्ग मोक्ष सुख चाह रहे।। सब व्रत के नाशक परमशत्रु ये व्यसन प्रथम तो मधुर लगे। पर अंत में कटु फल मिलता है इसलिए स्वप्न में भी न गहें।। (३४) हे भव्यजीव यदि सुख चाहो तो दुर्जन की संगति न करो। क्योंकि जैसी संगति होती वैसी ही बुद्धि की प्राप्ति हो।। यदि उत्तमपथ पर चलना है तो सत्पुरुषों के संग रहो। इससे निंह बुद्धि भ्रमित होगी निंह दुर्गतियों में भ्रमण करो।। (३५) जब दुष्ट पुरुष को काम पड़े तो मीठे वचन प्रयोग करे। लेकिन गुरुवर समझाते हैं उससे न कभी संबंध रखें।। जैसे सरसों जब खली रूप पर्याय में परिणत होती है। ाब उसका तेल अगर आँखों में लगे आँखे रोती हैं।। (३६) जिस तरह ग्रीष्म ऋतु में मछली जल के अभाव में मर जाती। कुछ एक अगर जीवित बचती तो बगुले उन्हें गटक जाते।। बस इसी तरह इस कलियुग में सज्जन प्राणी कम ही होते। यदि हो भी जाएं एक आधे तो दुष्ट नहीं जीने देते।। (३७) आचार्य अंत में कहते हैं यदि रहे दरिद्री तो अच्छा। नाना पीड़ाये सह करके मर जाना भी तो है अच्छा।। पर नहीं दुर्जना के संग में व्यापार आदि संबंध करे। क्योंकि वैसी ही बुद्धि से प्राणी कर्मों का बंध करे।। मुनिधर्म का वर्णन (३८) आचार पांच दशधर्म और बारह संयम तप भी बारह। और अष्टमूलगुण उत्तरगुण चौरासी लख धारे मुनिवर।। मिथ्यात्व मोह मद त्याग और शमदम से ध्यान प्रमाद रहित।। वैराग्य और रत्नत्रय गुण धरते मुनि अंत समाधि रहित।। (३९) मुनि अपने शुद्ध चैतन्यरूप से रंचमात्र भी डिगे नहीं। यदि पर पदार्थ में बुद्धि लगे तो कर्मबंध हो निश्चय ही।। शारीरिक सभी पदार्थों को तजना ही मुनि की क्रिया कही। जब तक है आयू कर्म तब तक मुनिव्रत ही धरो सही।। (४०) जो यति पूजा की इच्छा से निंह मूलगुणों को पाल रहे। उनको आचार्य मूल छेदक दे करके दण्ड बताए रहें।। जैसे अंगुलि का अग्रभाग शिर छेदक वाण न रोक सके। वैसे ही मुनि के उत्तरगुण निंह मूलगुणों के दोष ढ़के।। (४१) यदि वस्त्र संयमी रखता है तो धोने की िंचता रहती। जब फट जाए तब वस्त्र मांगने की है आकुलता रहती।। यदि एक लंगोटी भी रखले तो खो जाने से दुख होगा। इसलिए मुनिव्रत ही धारो तब दिशारूप अंबर होगा।। (४२) नहि रुपये पैसे ये रखते जिससे बालों को कटा सके। वैंâची आदिक निंह अस्त्र रखे निंह केशों की वे जटा रखें।। जूँ आदिक जीवों की िंहसा से विरत अयाचक वृत्ति रखें। वैराग्यबृद्धि के लिए मुनि हाथों से केश का लोंच करें।। (४३) मुनिगण ममत्व से विरहित है इसलिए प्रतिज्ञा करते हैं। जब तक पैरों में शक्ति रहे तब तक ही भोजन लेते हैं।। क्योंकि हाथों की अंजलि में आहार खड़े होकर लेते। वरना समाधि को धारणकर वे धर्ममार्ग को है चुनते।। (४४) केवल शरीर में यह मेरा ऐसी ममत्व बुद्धि से है। संसार में परिभ्रमण होता फिर बाह्य वस्तु में क्या रमते।। फिर कोई कुल्हाड़ी से मारे अथवा चंदन का लेप करें। दोनों ने साम्यभाव रखते अपने से खुद्ध को भिन्न रखे।। (४५) तृण, रत्न, शत्रु व मित्रों में वे सबमें समता रखते हैं। सुख-दुख स्तुति व िंनदा में निंह जरा क्लेश वे धरते हैं।। शमशान भूमि व राज्यों में जीवित व मरणावस्था में। समभाव रखे जो इन सबमें वे भावमुनि ही होते हैं।। (४६) वीतरागी इस प्रकार विचार करते हैं जिस तरह हिरण अपने समूह से जुदा हुआ विचरण करता। हरपल सचेष्ट रहकर पर से एकला ही आनन्दित होता।। अपने कुटुम्बियों से हम भी कब होकर जुदा मोह त्यागे। एकान्तवास में रह करके आत्मा का सुख हम भी भोगे।। (४७) ना जाने कितनी बार बने सम्राट चक्रवर्ती राजा। ना जाने कितनी बार बने चींटी हाथी पशु योनिको पा।। संसार में सब कुछ चंचल है सुख दुख में हर्ष विषाद न कर। जिससे भवभ्रमण छूट जावे संसार से तर जाता है नर।। (४८) उपरोक्त भावना करने से होता है परमशुद्ध संवर। जो भी प्राचीन कर्म आत्मा के गल जाते होता निर्जर।। तब परमशांत मुद्राधारी मुनि के न नवीन कर्म बंधते। इससे वे मुक्ति बल्लभा के अति निकट पहुँच कर दुख हरते।। (४९) जिन मुनि के पास छिद्र विरहित है सम्यग्ज्ञानमयी नौका। तपरूपी पवन पास जिनके आशीर्वाद हो गुरुओं का। उन उद्यमि मुनि के लिए नहीं है दूर मोक्ष का मार्ग सुनो। कर लेगा झट से पार उसे कितना ही बड़ा समुन्दर हो।। (५०) हे मुनिगण ! इस आनंदमयी शुद्धात्मा का अनुभव न करो। मत लोक रिझाने में पड़ना कृष मोह करो तन को न करो।। जब तक तुम इन दो बातों को निंह दोगे ध्यान व्यर्थ सारा। जप तप उपवास नियम आदिक से नहीं किसी ने भव तारा।। (५१) जो मुनिवर दुष्ट कषायों को निंह छोड़े मन को शुद्ध करे। वे क्या संसार त्याग सकते सब परिषह सहना व्यर्थ रहे।। आचार्य प्ररुपण करते हैं उनके सब कार्य कपट वाले। ऐसे ढोंगी मुनि होते हैं संसार भ्रमण करने वाले।। (५२) धन को जिसने संचयन किया वह सभी पाप में रत रहता। क्योंकि धन से आरंभ और उससे ही लोभ प्राप्त होता।। प्राणी िंहसा से पाप कहा वह पाप आरम्भ का कारण है। इसलिए द्रव्य जो ग्रहण करे सत्मार्ग नाश का कारण है।। (५३) निग्र्रंथ मुनि शय्या के कारण घास आदि यदि स्वीकारें। दुध्र्यान कहा आचार्यों ने लज्जाकर भी इसको माने।। फिर यदि निर्गंथ यती सोना आदिक वस्तु लेकर रखे। तो इस कलियुग का दोष कहा वरना वे नहीं कुछ भी रखें।। (५४) क्रोधादि कषायों के द्वारा प्राणी के कर्मबंध होते। पर प्रतिक्षण बंध नहीं होता ये कभी कभी ही है होते।। लेकिन परिग्रह धारी जीवों की किसी काल में सिद्धि न हो। इसलिए भव्यजीवों सुन लो धनधान्य से प्रीति नही रखो।। (५५) अभिलाषा अगर मोक्ष की भी की जाये दोष स्वरूप कहा। फिर स्त्री पुत्र जनों की क्या जब तक शरीर से मोह रहा।। इसलिए कहा है मुनियों को अपनी आत्मा में लीन रहो। तब मोक्ष स्वयं पा जावोगे निंह पर पदार्थ में प्रीति रखो।। (५६) यदि परिग्रह धारी जीवों का भी मोक्ष गमन माना जाये। तो अग्नि को शीतल मानो इंद्रियसुख सुख माना जाये।। विष भी अमृत कहलायेगा और तन को भी स्थिर मानो। यदि इंद्रजाल रमणीय कहो नभ की बिजली स्थिर मानो।। (५७) ऐसे यतिवर जयवंत रहे जो कामदेव के योद्धा को। उनकी ध्यानाग्नि से जलकर भय से ही भाग रहे हैं जो।। फिर लौट के ना वापस आये सारा प्रभाव ही खत्म हुआ। ऐसे ध्यानी को नमन करूँ जिन मुनि के आगे हार गया।। (५८) जो रत्नत्रय रूपी संपति के धारी हैं मगर दिगम्बर हैं। हे परमशांत मुद्राधारी फिर भी वे युद्ध में तत्पर हैं।। क्योंकि वे कामदेव रूपी बैरी को मार गिराते हैं। उसकी स्त्री को विधवा कर सब जग में पूज्य बन जाते हैं।। (५९) आचार्य परमेष्ठी की स्तुति जो स्वयं पंच आचार पालते सौख्य वृक्ष का बीज कहा। ऐसे आचार्य शिष्य को भी पालन करवाते सौख्य प्रदा।। निंह लेशमात्र भी परिग्रह है जो ऐसी मुक्ति स्वयं पाते। रत्नत्रयधारी ऐसे गुरु पर को भी मुक्ति दिलवाते।। (६०) इस जग में भ्रम के कारक जो ऐसे अनेक ही मार्ग कहे। उनसे छुड़वाकर जो गुरुवर सच्चा सुखकारी मार्ग जो है।। ले जाते हैं ऐसे गुरु को मैं शीश झुकाकर नमन करूँ। मिथ्यामारग में जा जाऊँ ऐसा मैं सत् आचरण करूँ।। (६१) उपाध्याय परमेष्ठी की स्तुति यह मोहकर्म का परदा जो है लगा अनादि कालों से। शिष्यों को संबोधन देते वे उपाध्याय निज वचनों से।। स्याद्वाद से अविरोधी उनके उपदेश दृष्टि निर्मल करती। ऐसे उपझाय मेरी रक्षा करिए बिन हेतु व्याधि हरती।। (६२) साधु परमेष्ठी की स्तुति जो साधु पांचवें परमेष्ठी गृह बंधन को ठुकराय दिया। अपने शरीर से मोह छोड़ मोहान्धकार को नष्ट किया।। निज सम्यग्ज्ञान रूप ज्योति को सूर्य प्रभासन बृद्धि करे। ऐसे वे साधु परमेष्ठी हम सबको भी समृद्धि भरे।। (६३) वीतरागता की महिमा जैसी बिजली के गिरने से सब लोग भयातुर हो जाते। लेकिन शांतात्मा मुनि देखो निंह ध्यान से हैं ढिगने पाते।। जिसमें सज्ज्ञानरूप दीपक से मोहान्धकार का नाश किया। वे सम्यग्दर्शन के धारी परिषह सह सब कुछ जीत लिया।। (६४) ग्रीष्म ऋतु में पर्वत शिखर पर ध्यानी मुनीश्वरों की स्तुति जिस ग्रीष्म ऋतु की तीक्ष्ण धूप और लू के प्रबल थपेड़ों में। अत्यन्त ताप देने वाली भूमि रेता को ओदे हो।। जिस समय सूख जाती नदियाँ ऐसे ऋतु में पर्वत नट पर।। जो ध्यान अग्नि से भस्म करे ऐसे मुनि होवें क्षेमंकर।। (६५) वर्षा ऋतु में वृषों के नीचे ध्यानी मुनियों का तप वर्षा ऋतु में तरु के नीचे जो ध्यान मुनीश्वर करते हैं। वे मुनिगण रक्षा करे मेरी हम नमन चरण में करते हैं।। जब मेहा भयंकर शब्द करें पृथ्वी भी नीचे धंस जाती। बरसे ओले शोले पत्थर फिर भी कुछ विकृति न आती।। (६६) शीतकाल में मुनियों का तप जिस शीतकाल को सर्दी से हैं कमलपत्र कुम्हला जाते। अत्यन्त कष्ट देने वाली दीनों के रोम खड़े करते।। बंदर का मद भी गल जाता वृक्षों के पत्ते जल जाते। ऐसे क्षण में अत्यन्त तपस्वी के तप से सब कर्म विनश जाते।। (६७) और भी मुनिधर्म का स्वरूप जो आत्मज्ञान से रहित मुनी इन तीनों ऋतु के दुख सहे। आचार्य प्ररूपण करते हैं उनका सारा तप व्यर्थ रहे।। जैसे कि धान कट जाने पर खेतों में बाड़ लगाये क्यों। वैसे ही निज में ध्यान करे यह कहा गया है मुनियों को।। (६८) यद्यपि इस कलियुग में तीन लोक से पूज्य केवली प्रभु नहीं। फिर भी जग में प्रकाश करने वाली वाणी मौजूद सही।। उस वाणी को गुरु बदलाते इसलिए सरस्वतिसुत मानो। उनकी पूजन वंदन कर लो ये जिनवर की पूजन जानो।। (६९) यह यतिवर ध्यानलीन होकर जहाँ चरण कमल रख देते हैं। वह भूमि तीरथ बन जाती उन्हें इंद्र देवगण नमते हैं।। उनके स्मरण मात्र से ही सब पाप शमन हो जाते हैं। ऐसे यत्रियों को सदा ध्यान में रखकर शीश झुकाते हैं।। (७०) रत्नत्रय धारी ये मुनिवर दुष्टों से भी अपमानित होकर। समता को धारण करते हैं आत्मा की शुद्धि में रमकर।। जो िंनदा करने वाले हैं वे निज आत्मा का घात करें। और कर्मों का बंधन करके जाकर नरको में वास करे।। (७१) इस मानुष भव को पा करके भोगों को रोग तुल्य समझे। ऐसे परिग्रह से रहित मुनि वन में जाकर तप रहत रहते।। उनके गुण को गाने वाला निंह वन में कोई होता है। यदि कोई स्तुति कर सकता वो महापुरुष ही होता है।। इति मुनिधर्म वर्णन




रत्नत्रय धर्म का कथन (७२) जिनदेव शास्त्र और गुरुओं पर श्रद्धान ही सम्यग्दर्शन है। जो बाधा विरहित ज्ञान वही जिसमें संदेह न विभ्रम है।। सम्यग्चरित्र में प्रमाद सहित कर्मों का आगमन रुक जाता। संसार नाश करने वाला रत्नत्रय धर्म कहा जाता।। (७३) जो अंत:करण रूप पृथ्वी में बोया हुआ बीज सम है। वह नि:शंकित आदिक गुण से िंसचित जल सम्यग्दर्शन है।। जहाँ सम्यग्ज्ञान रूप शाखा चारित्र रूप है पुष्प खिले। तब वृक्षरूप में परिणत हो मुक्ति का मारग शीघ्र मिले।। (७४) चारित्र अलंकृत थोड़ा भी तप करे मगर रत्नत्रय से युत। रत्नत्रय रहित न मोक्ष मिले चाहे जितना तप से संयुत।। जो पंथिक मार्ग का ज्ञाता है धीमी गति भी पहुँचा देती। पर जिसे नहीं है मार्ग पता द्रुतगति भी नहीं पहुँचा सकती।। (७५) अंधा नहि देख सका अग्नि इसलिए दौड़ता हुआ मरा। लंगड़े को जंगल की अग्नि दिख रही न चल सकता है मरा।। पर जिसके आँख पैर दोनों वह आलस वश ही पड़ा रहा। इसलिए ज्ञान चारित्र में भी सम्यग्दर्शन ही श्रेष्ठ रहा।। (७६) संसार में यद्यपि रत्नों की संज्ञा पत्थर में कही गयी। लेकिन वे भार सहित केवल तन को ही खिन्न किया करती।। इसलिए गुरूजन कहते हैं हे मुनिवर ! जो तम नाश करे। रत्नत्रय रूपी तीन रत्न से ही तन शोभावान बने।। (७७) जिस सम्यग्दर्शन बिना ज्ञान मिथ्या ही ज्ञान कहाता है। चारित्र भी गर सम्यक्त्व रहित मिथ्याचारित्र कहाता है।। यह मनुष जनम भी प्राप्त हुआ पर बड़ा निरर्थक लगता है। यदि सम्यग्दर्शन नहीं मिले तो मोक्ष नहीं मिल सकता है।। (७८) संसार सर्प को डसने में जो नाग दमनी के सदृश है। दुख रूप महा दावानल को जो शांत करे जल निर्भर है।। वह मोक्षरूपी सुख अमृत का मानो सुख पूर्ण सरोवर है। ऐसा रत्नत्रय इस जग में हम सबका ही मंगलकर है।। (७९) व्यवहार नया पेक्षा तीनों ये जुदा कहलाते हैं। पर निश्चय नय से तीनों में ना भेद कोई कर पाते हैं।। ये तीनों आत्मस्वरूप मगर भगवन इनसे भी भिन्न रहे। क्योंकि वे आत्म मगन होकर इन सबसे सदा अभिन्न रहें।। (८०) जीवा जीवादिक तत्त्वों में जिनकी मति स्थिर रूप हुई। निश्चयनय के अवलम्बन से बुद्धि तद्रूप विलीन हुई।। वे निर्मल चित के धारक नर उत्कृष्ट ज्योति को पाते हैं। अपनी चैतन्य आत्मा में रमकर वे भव तर जाते हैं।। दशलक्षण धर्म का वर्णन उत्तम क्षमा (८२) जो मूर्ख जनों से किए हुए बंधन और हास्य क्रोध में भी। निंह मन में जरा विकार करे समताधारी वह साधू ही।। यह उत्तम क्षमा धार सकते जो मोक्षमार्ग में ले जाती। बाकी हम सब गृहस्थजन से निंह एकदेश पाली जाती।। (८३) यतिरूपी वृक्ष की शाखा में गुणरूपी पुष्प फल से शोभित। उसमें यदि क्रोध मान आदिक अग्नि से मुनि हो जाए सहित।। जैसे िंचगारी क्षणभर में उत्तम फलयुत तरु जला सके। वैसे ही मुक्ति न मिल सकती इसलिए क्रोध ना कभी करें।। (८४) रागद्वेषादि रहित होकर स्वेच्छा से निज में मगन रहे। यह लोक भला या बुरा कहे उसकी न कोई परवाह करे।। क्योंकि जो हमारे साथ द्वेष या प्रीतिपूर्ण व्यवहार करे। उसका फल उसको ही मिलता यह पद्मनंदि आचार्य कहें।। (८५) मेरे दोषों को सबसे कह करके यदि मूर्ख सुखी होता। अथवा धन संपत्ति लेकर के मेरा जीवन भी ले लेता।। खुश रहे सभी कुछ लेकर भी अथवा मध्यस्थ रहे कोई। मुझसे न किसी को दुख पहुँचे ऐसी बुद्धि होए मेरी।। (८६) मिथ्यादृष्टि दुर्जन जन से दी गयी वेदना से हे मन। तुम दुख का अनुभव नहीं करो होता है कर्मों का बंधन।। जिनधर्म का आश्रय तुझे मिला ये धर्म तुझे बतलाना है। यह सारा लोक अज्ञानी जड़ तू इससे क्यों घबराता है।। उत्तम मार्दव (८७) जो श्रेष्ठ पुरुष कुल ज्ञान जाति बल आदि गर्व को त्याग करे। वह सब धर्मों का अंगभूत मार्दव इस धर्म को पाल रहें।। जो सम्यग्ज्ञान रूपी दृष्टि से जग को इंद्रजाल समझे। वे निश्चय ही मार्दव गुण को अपने अंदर धारण करते।। (८८) अति सुंदर घर भी यदि अग्नि से चारों तरफ घिर गया हो। तब उसके बचने की आशा वैâसे कर सके ज्ञानिजन जो।। बस इसी तरह इस काया को वृद्धावस्था ने घेर लिया। नहि सदाकाल रहता कोई यह गर्व छोड़कर मान हिया।। आर्जव धर्म का वर्णन (८९) जो मन में वही वचन बोले इसको ही आर्जव धर्म कहा। पर मीठी चिकनी बातों से ठगना ये बड़ा अधर्म कहा।। ये आर्जव धर्म स्वर्गदाता अरु कपट नरक ले जाता है। इसलिए सदा जो इसे तजे वही सरल भाव अपनाता है।। (९०) मायाचारी से मुनियों के सद्गुण फीके पड़ जाते हैं। और माया से उत्पन्न पाप दुर्गति में भ्रमण कराते हैं।। क्रोधादि शत्रु जो छिप करके माया के ग्रह में बैठे हैं। उनको निकाल करके मुनिवर निंह पास फटकने देते हैं।। (९१) सत्य धर्म का वर्णन उत्कृष्ट ज्ञान के धारी मुनि को सदा मौन रखना चाहिए। यदि बोले भी तो हित मित प्रिय और सत्य वचन होना चाहिए।। जो कड़वे वचन दूसरों को पीड़ा पहुँचाने वाले हो। आचार्य प्ररूपण करते हैं निंह सच्चे साधु बोलते वो।। (९२) जो सत्य धर्म का पालक है सब व्रत उसमें र्गिभत होते। तीनो लोकों में पूज्यनीय माँ सरस्वती सिद्धी करते।। इस व्रत का है माहात्म्य इतना वसु का िंसहासन पृथ्वी में। था समा गया मरकर राजा और स्वर्ग गया नारद सच में।। (९३) आचार्य और भी कहते हैं सतवादी परभव में जाकर। इंद्रादि, चक्रवर्ती राजा का वैभव पाते हैं आकर।। इस जीवन में ही र्कीित बदे आदर सम्मान बहुत होता।। उत्तम फल मिले कई उनको अरु मोक्ष प्राप्त भी कर लेता।। (९४) शौच धर्म का वर्णन परधन परस्त्री में जोजन निष्पृह वृत्ती से रहता है। और किसी जीव का बध करने की नहीं भावना करता है।। अत्यंत कठिन क्रोधादि लोभ मल का जो हरने वाला है। वह प्राणी ही तब शौच धर्म को धारण करने वाला है।। (९५) अति घृणित मद्य से भरा हुआ घट धोने से नहि स्वच्छ हुआ। वैसे ही तीर्थ स्थानों के स्नान से न कोई पवित्र हुआ।। जब अंतकरण मलीमस है तो बाह्य शुद्धि से क्या होगा। इसलिए पवित्र करो मन को तब ही निज का दर्शन होगा।। (९६) संयम धर्म का वर्णन जो हृदय दया से ओत प्रोत पाँचों समिति पालन करते। ऐसे साधू षट्काय जीव की भी हरदम रक्षा करते।। पंचेन्द्रिय के जो विषय भोग उनसे भी सर्वक्षा विरत रहे। ऐसे मुनिश्रेष्ठ धर्म संयम को पाले गणधर देव कहें।। (९७) यह मनुष धर्म अति दुर्लभ है उसमें भी अच्छी जाति मिले। यदि दैवयोग से मिल जावे उसमें अर्हंत वचन ना मिले।। सद्वचन श्रवण को मिल जावे तो जीवन अधिक नहीं मिलता। सब कुछ मिलने के बाद रत्नत्रय धारण कर संयम धरता।। (९८) तप धर्म का वर्णन ज्ञानावरणादि अष्टकर्मों को क्षय करने हेतु जो ज्ञान कहा। उस सम्यग्ज्ञान रूपी दृष्टि से तप करते दो रूप कहा।। बाह्याभ्यंतर से दोनों के हैं बारह भेद कहे जाते। संसार जलधि से तरने में ये नौका सम माने जाते।। (९९) यद्यपि कषाय रूपी चोरों को जीता जाना मुश्किल है। लेकिन तपरूपी योद्धा के सम्मुख टिकना नहि मुमकिन है।। इसलिए योगिजन मोक्षनगर में बाधा रहित चले जाते। आचार्य प्ररूपण करते हैं योगी से न कोई जीत पाते।। (१००) मिथ्यात्व उदय से घोर दुख सहने पड़ते हैं नरकों में। फिर हे प्राणी ! क्यों घबराता है तप के थोड़े कष्टों से।। जैसे अथाह समुद्र आगे जल का कण छोटा होता है। वैसे ही तप में दुख बहुत कम करके देखो होता है।। (१०१) त्याग धर्म का वर्णन जो मुनियों के श्रुतपाठन के हेतू पुस्तक का दान करे। और संयम के साधन हेतू पिच्छी औ कमण्डलू दान करे।। उनके रहने के लिए श्रेष्ठ स्थान आदि भी दान करे। तन से भी ममता को तजकर ऐसे यति आंकिचन धर्म धरे।। (१०२) आकिञ्चन्य धर्म का वर्णन अपने हित में जो लगे हुए गृहत्याग पुत्र स्त्री तजकर। वे मोक्ष के लिए तप करते सबसे सर्वथा मोह तजकर।। ऐसे मुनि विरले होते हैं मिलते हैं बड़ी कठिनता से। पर को शास्त्रादि दान करके तप में भी बने सहायक वे।। (१०३) यदि कहो वीतरागी मुनि को सब त्याग दिया क्यों पुस्तक दे। तन से क्यों मोह नहीं त्यागा आचार्य देव तब कहते ये।। जब तक है आयुकर्म शेष इस तन को नष्ट न कर सकते। अपघातक दोष लगेगा तब निंह तन से वे ममता रखते।। (१०४) ब्रह्मचर्य धर्म का वर्णन जैसे कुम्हार का चाक तीक्ष्ण धारण से घट निर्माण करे। वैसे ही भव भ्रमण कराने में स्त्री दुख का आधार कहे।। इसलिए मुमुक्षु जन स्त्री में माता बहिन सुता देखें। जो ब्रह्मचर्य के धारी है वह स्त्री सुख में नही रमे।। (१०५) जो रागी पुरुष स्त्रियों में प्रीति उपजाने वाले हैं। उनको भी अच्छा कहा मगर जो नर विरक्त मन वाले है।। ऐसे वैरागी साधक के चरणों में चक्रवर्ती नमते। जो जगत पूज्य बनना चाहे वे नहीं स्त्रियों में रमते।। शुद्धात्मा की परिणति रूप धर्म का निरूपण (१०७) जो निर्मल शील और गुण स्वरूप समता से युक्त अवस्था है। अरु अनंतचतुष्टय रूप अमृत सरिता के भीतर रहता है।। उसको असह्य संसार दु:खरूपी अग्नि नहि जला सके। ऐसी शुद्धात्मा की परिणति रूपी आत्मा को नमन करे।। (१०८) कर्मादि वैरियों के नाशक तन का भी आश्रय नहीं रहा। ऐसी शुद्धात्मा सूर्य चंद्र अग्नि से जिसका तेज बड़ा।। उसके आगे सब पर पदार्थ क्षणभर में ऐसे अस्त हुए। चैतन्य स्वरूपी तेज पुंज को नमस्कार कर धन्य हुए।। (१०९) नहि जन्म मरण अरु जरा रोग कर्मों का भी संबंध नही। है सदा प्रकाशित प्रभु आत्मा स्वात्मैक ज्ञान का धारी ही।। जिनकी न किसी से उपमा हो सकती ऐसी उन सिद्धों की। मैं शरण गहूँ रक्षा करिए जो अविनाशी पद धरते भी।। (११०) इस चिच्चैतन्य आत्मा का िंकचित वर्णन जो किया मैंने। उसमें न कोई घल किया अत: अल्पज्ञानी मुझको समझे।। क्योंकि सब कर्मों के राजा मोहनीय अंतराय रूपी शत्रु। दर्शन ज्ञानावरणी चारों ये मेरे संग में लगे प्रभु।। (१११) विद्वान मानते अपने को शृंगारादिक के व्याख्याता। प्रिय वचनों के आडम्बर से सन्मार्ग भुला दे जो वक्ता।। इस दुनियाँ में है बहुत लोग ऐसे भाषण देने वाले। पर सम्यग्ज्ञान प्रणेता जो वे दुर्लभ है देखे जाते।। (११२) यह रागद्वेष माया आदिक सबके स्वभाव से होते हैं। इसलिए काव्य यदि ऐसा हो जो मन के मल को धोते हैं।। उस वीतरागता के वर्णन का काव्य सदा फल देता है। शृंगार आदि रस काव्य सदा प्राणी को दुख ही देता है।। (११३) मोहान्धकार से व्याप्त जगत में मोही बेचारे घूम रहे। उनको न दिखाई कुछ पड़ता उस पर यदि दुर्जन कथा सुने।। आचार्य हमें समझाते हैं सत्पुरुषों की संगति करे। आँखों में धूलि डालने वालों से सदैव ही दूर रहे।। (११४) यह तन विष्टा मूत्रादिक नाना कीड़ों से युत भरा हुआ। और प्रबल घृणाकारी अस्थी मज्जा रजवीर्य से पुष्ट हुआ।। ऐसे ही मल से बना हुआ जो कवी कुमाता से जन्मा। वह नारी को जब चंद्रमुखी कहते हैं तो आश्चर्य घना।। (११५) स्त्री के केश जुओं के घर मुख हाड़ समूह चाम्र वेष्टित। और मांसिंपड समस्तन है उदर आदिक विष्ठा से पूरित।। खम्भे की तरह पैर दोनों जिन स्थानों पर टिके हुए। अत्यन्त घृणित इस काया में निंह विद्वत जन हैं राग करे।। (११६) यह कामदेव रूपी धीवर उत्कृष्ट धर्म नदि से बाहर। जीवरूपी मछलियों को पकड़े मांसलिप्त कांटे में लटकाकर।। भू पर भूंजे बस उसी तरह स्त्रियों के जाल में पंâस करके। संभोगरूपी भू पर भूंजती ज्ञानीजन इससे दूर रहे।। (११७) जितने दुनियाँ में दोष कहे वे सभी अहित ही करते हैं। पर सबसे बड़ा अहितकारक नारी के रूप को कहते हैं।। इनसे अति मोह उत्पन्न होकर नाना प्रकार दुख सहते हैं। क्रोधादि कषाय बने दुर्जय भवदधि को निंह तर सकते हैं।। (११८) जिस तरह कबूतर आदि पक्षी दाना देकर पकड़े जाते। उस तरह विषयरूपी जालों में भोले जीव फांसे जाते।। इसलिए इन्हें दुख का कारण लख विद्वत जन नहि पंâसते हैं। कांक्षा न करें वे विषयों की अतएव सुखी वे रहते हैं।। (११९) जैसे कोई बैरी जिस पर मंत्रादि प्रयोग कर देता है। विपरीत बुद्धि हो जाती है नाना आपत्ति भोगता है।। वैसे ही मोहरूपी बैरी उसके प्रयोग से विषयों में। होकर प्रवृत्त दुख सहे सभी सुख माने चंचल भोगों में।। (१२०) भवरूपी घने जंगलों यह मोहरूपी ठग बैठे हैं। जो स्त्री क्रोध मान माया से सबको ठगते रहते हैं।। इसलिए ज्ञानरूपी आत्मा का ही आश्रय लेना चाहिए। आचार्य प्ररूपण करते हैं बस निज में ही रमना चाहिए।। (१२१) मैं ज्ञानी और मैं धनी बहुत इस तरह मूर्ख समझा करते। और चंचल बिजली के समान पुत्रादिक को अपना कहते।। जबकि कुछ भी निंह स्थिर है यह सभी लोग है देख रहे। इसलिए मोह को वश में कर आचार्य हमें सम्बोध रहें।। (१२२) क्या करे कहाँ जाये वैâसे लक्ष्मी को प्राप्त करे वैâसे। इस उलझन में हरदम प्राणी किस नृप की सेवा टहल करे।। सब जान बूझकर भी ये मन ना किसी तरह भी समझ सके। इसलिए ग्रंथकर्ता कहते यह मोह बहुत ही भ्रमित करे।। (१२३) हे बुद्धिमान ! तुम मोह तजो धन सदन पुत्र मित्रादि से। जिससे निंह जन्म दुबारा हो मिट जाये भ्रमण चौरासी से।। क्योंकि उत्तम कुल जैनधर्म की शरण बहुत ही दुर्लभ है। फिर मिले ना मिले पता नहीं जो मिला आज मानुष तन है।। (१२४) यह वीतराग अर्हंत देव की वाणी ही सद्वाणी है। जो रागद्वेष से रहित और सब ज्ञाता दृष्टा ज्ञानी है।। इसलिए भव्यजन मुक्ति की प्राप्ति के हेतु इसे मानो। क्यों इधर उधर तुम फिरते अज्ञानी वचन असत् मानो।। (१२५) जो मूर्ख लोग जिन वचनों में संदेह हमेशा करते हैं। अपनी जड़बुद्धि से हरदम वे असत् कल्पना करते हैं।। जैसे जन्मांध पुरुष पक्षी की गणना में यदि बहस करे। तब नेत्र सहित व्यक्ति वैâसे उसकी बातों से सहज रहे।। (१२६) श्रुत के दो भेद कहे प्रभु ने अंग बाह्यश्रुत रूपी है। उसमें बारह भेदों से युत अंगश्रुत पढ़ते वे ज्ञानी है।। और बाह्यश्रुत के हैं अनंत भेद उसमें जो ज्ञानमयी आत्मा। उसको ही ग्रहण योग्य कहते तद्भिन्न त्याज्य है परमात्मा।। (१२७) इस पंचमकाल में ज्ञान आयु आदिक सब क्षीण रह गये हैं। इसलिए नहीं सब पढ़ सकते जो सतत अभ्यास कर रहे हैं।। अभ्यास सदा जो किया करे वह मोक्ष मार्ग का अभिलाषी। यह श्रुताभ्यास ही मुक्ति पथ देता जो होता हितकारी।। (१२८) जो सूक्ष्म अगोचर है पदार्थ उनमें भी संशय नहीं करे। जो दिव्यध्वनि जिनवचनों की उसको अवश्य स्वीकार करें।। इस युग में जितने प्राणी है उनको निंह ज्यादा ज्ञान मिला। इसलिए हमें परमागम से जो मिला समझिए बहुत मिला।। (१२९) चैतन्य बिना सब ज्ञानवान है शून्य कहा है भव वन में। आत्मा के होने से पदार्थ में ज्ञान भान होता सच में।। इसलिए भव्यजीवों को ऐसी सारभूत इस आत्मा में। रमना चाहिए बस इसमें ही और ध्यान करें शुद्धात्मा में।। (१३०) अज्ञानी जीव करोड़ वर्ष में जिना तप कर कर्म नशे। इक क्षण में नष्ट करे ज्ञानी स्थिर होकर जब ध्यान करे।। (१३१) यदि कर्म उदयरूपी समुद्र में कोई व्यक्ति जब गिर जावे। जब तक न मिले ज्ञानरूपी नौका निंह पार उतर पावे।। नाना प्रकार आपत्ति रूप इसमें बैठे हैं मगरमच्छ। इसको तिरने के लिए मिले जब ज्ञानरूपी अनुवूâल।। (१३२) मोहरूपी सघन अंधेरे में है व्याप्त त्रिलोकरूपी मकान। उसमें प्रवेश करने वाला जिनवच रूपी दीपक महान।। तब ही पदार्थ का ज्ञान प्राप्त होगा क्या छोड़े ग्रहण करें। वरना अज्ञान अंधेरे में यह प्राणी कुछ न ढूंढ सके।। (१३३) जब कर्मों का उपशम होने से क्षेत्र काल शुभ योग बने। तब आत्मा में हो लीन मनुष अपने निज का िंचतवन करे।। संसार दुखों से छुड़वाये उसको ही धर्म कहा मुनि में। इसके अतिरिक्त न कोई धर्म इससे तल्लीन रहे निज में।। (१३४) आत्मा के वास्तविक स्वरूप का वर्णन निंह शून्य न जड़ निंह पंचभूत से आत्मा की उत्पत्ति है। निंह कर्ता, एक न क्षणिक लोकव्यापी नहि नित्य से बनती है।। अपने शरीर परिमाण तथा रत्नत्रण गुण से शोभित है। अपने ही कर्मों का कत्र्ता भोक्ता उत्पाद व्यय ध्रौव्य युत है।। (१३५) जो आत्मा को न पहचाने वो वैâसी और कहाँ रहती। यह प्रश्न पूछने वाली ही आत्मा में है जाग्रत बुद्धि।। क्योंकि जड़ वस्तु में कोई भी प्रश्न विकल्प नहीं होते। आत्मा का असली रूप समझ निज से कर्मों को क्षय करते।। (१३६) यद्यपि आत्मा र्मूितक नहीं यह तन के अंदर रहता है। प्रत्यक्ष नहीं दिखता फिर भी यह कर्ता और ये ज्ञाता है।। इत्यादि विकल्पों से आत्मा का है अस्तित्व जगतभर में। इसलिए इसे अनुभवन करो और मोह हटावो तुम मन से।। (१३७) यह व्यापक नहीं इसी हेतू तन के प्रमाण में रहता है। इसका स्वभाव है ज्ञानरूप पंचतत्व से न ये बनता है।। सर्वथा नित्य व क्षणिक नहीं क्योंकि ना जनम ना मरण इसे। यह एकरूप भी नहीं कही क्रोधादिक कई भाव इसमें।। (१३८) यह आत्मा शुभ और अशुभ कर्म से सुख दुख भोगा करता है। ना कोई दूसरा है सुख दुख जो दे आगम यह कहता है।। चिद्रूप आत्मा संसारी जीवन में कर्म सहित होता। पर मोक्ष अवस्था में कर्मों से रहित त्रिलोक पति होता।। (१३९) आचार्य हमें समझाते है हे भव्य ! अगर तिरना चाहो। तो एकचित्त होकर प्रमाण नय आदिक से इसको जानो।। यह मोहरूप जो मगरमच्छ से सहित भवोदधि विकट बड़ा। आत्मा के सिवा कोई वस्तु नाहें ग्राह्य यही मुनियों ने कहा।। (१४०) हे आत्मा ! जब तक मेरे साथ कर्मों का बंधन लगा हुआ। तब तक संसार रूपी बैरी दुख देगे यह ही कहा गया।। यह रागद्वेष ही बैरी है यदि इनको तू तज सकता है। तो मेरी आत्मा कर्मों के दुख से जल्दी छूट सकता है।। (१४१) इस लोक का ना तू लोक तेरा फिर क्यों प्रीति को धरता है। यह सुख दुख और संतोष क्रोध तू व्यर्थ ही सबसे करता है।। यह काया नश्वर इसीलिए अपने स्वरूप में रमण करो। विषयों की आशा में रमकर मत दीन हीन से भ्रमण करो।। (१४२) जहाँ प्रतिक्षण दुख ही दुख रहता ऐसी तिर्यंच नरकगति में। निंह जाना पड़े मगर सुरगति में लक्ष्मी रहती चरणों में।। उस देवगति से भी जब आयु पूर्ण होए तब दुख होता। इसलिए हमेशा अविनाशी पद प्राप्ति में हो सुख मिलता।। (१४३) हे मन् ! तूने दुख बहुत सहे स्त्री आदिक से न ममताकर। इन बाह्य पदार्थों में चेतन तू िंकचित भी अनुराग न कर।। श्री परमगुरु से दुखों के नाशक ऐसा उपदेश सुनो। जिससे मुक्ति की प्राप्ति हो और अंतरंग में प्रवेश करो।। (१४४) आचार्य और भी कहते हैं यदि आत्म रमण की इच्छा है। तो हे भव्यों ! इंद्रिय सुख को कर त्याग धार लो दीक्षा है।। कोलाहल में क्या करवा है सारे परिग्रह का त्याग करो। और चंचल मन को स्थिर कर एकांतवास का स्वाद चखो।। (१४५) जीव और मन का परस्पर संवाद रे मत तू वैâसे रहता है वह बोला िंचतित रहता हूँ। ये िंचता रागद्वेष वश से बस इसमें ही रहत रहता हूँ।। जो इष्ट अनिष्ट समागम से होता है वैâसे इन्हें तजूं। तब जीव कहे रे मन सब तज नरकों के दुख मैं क्यों भोगूं।। (१४६) जिसके स्मरण मात्र से ही मोहांधकार भग जाता है। अरु सम्यग्ज्ञान उदित होता आनंद हृदय में छाता है।। कृतकृत्यपने की प्राप्ति से आत्मा की शक्ति पहचानो। निज में ही आत्मा रहती है तुम व्यर्थ कहीं मत भटकाओ।। (१४७) इस जग में जीव अजीव रूप नाना प्रकार के बंधन में। हो वशीभूत इस मोहकर्म के रागद्वेष रखता मन में।। इससे ही हम चिरकालों तक दुख भोग रहे हैं इस जग में। सब जान बूझकर पर पदार्थ में बुद्धि रहती है सच में।। (१४८) मलमूत्रादिक के घर स्वरूप इस तन से सदा भिन्न हूँ मैं। मन के विकल्प और शब्द आदि रस से भी सदा पृथक््â हूँ मैं।। मैं शांत और आनंदरूप चैतन्यात्मा में स्थित हूँ। आरंभ परिग्रह छोड़ के मैं संसार से भी भयभीत ना हूँ।। (१४९) इस विचार से संसार से भय का निवारण निंह तुम्हें प्रयोजन लोक और उसके आश्रय से जो पदार्थ। निंह तुझे प्रयोजन द्रव्य और इंद्रिय संबंधी अशुभ भाव।। सब पुद्गल की पर्याय कही तू तो चैतन्य स्वरूपी है। फिर क्यों दृढ़ बंधन बांध रहा तू दर्शन ज्ञान स्वरूपी है।। (१५०) जिसके मन में ऐसे विचार उत्पन्न हो गये ज्ञानी है। जो भोगों के सुख अशुभ मान आत्मा के सुख सुख माने हैं।। लेकिन इसकी विपरीत अवस्था अज्ञानी की होती है। जो भोगे गये भोग उनकी हो हरदम स्मृति रहती है।। (१५१) जिस तरह खाज के रोगी को अग्नि से सेक कर सुख मिलता। लेकिन वह दुख ही देता है निंह रोग नष्ट उससे होता।। बस उसी तरह से क्षुधा तृषा से पीड़ित व्यक्ति होता है। खाने पीने में सुख माने पर वह क्षणभंगुर सुख होता है।। (१५२) जब यह आत्मा अपने स्वरूप को देख वही चेष्टा करता। उसमें ही होकर लीन उसी में खुद को आनंदित करता।। अपने ही हित में सुख माने अपना ही संबंधी होता। ऐसी प्रवृत्ति ही आत्मा की इसके अतिरिक्त न कुछ होता।। (१५३) जिस तरह भ्रमर सब पुष्पों में एक कमलपुष्प को चुनता है। वैसे ही योगीजन विकल्प तजकर निज में ही रमता है।। क्योंकि मनरूपी भ्रमर एक क्षण में ना जाने कहाँ कहाँ। उड़कर चल देता है उसको ज्ञानीजन वश में करे अहा।। (१५४) जो शुद्धात्मा में रम जाते उनको सारे रस विरस लगे। स्त्री पुत्रादिक कथा दूर तन से भी प्रीति नहीं रहे।। हो जाते वचन मौन उनके मन से रागादिक नष्ट हुए। ऐसे भव्यों के लिए कहा शुद्ध आत्मा में ही मगन रहें।। (१५५) जो दर्शन ज्ञानमयी आत्मा निंह उससे भिन्न मेरा कुछ भी। ऐसी हो गयी बुद्धि निर्मल पर से छूटी परिणति मन की।। फिर ग्राम नगर वन एक सदृश सबमें सुख दुख का न आना। आत्मा में हो तल्लीन यही उत्कृष्ट कही है आराधना।। (१५६) आचार्य और भी कहते हैं यदि इंद्रिय का शुद्धात्मा से। संबंध रहा तो व्यर्थ कहा तप करना बाह्य वस्तुओं से।। हो गये जुदा या बंधे हुए शुद्धात्मा से या नहीं रहे। तब भी तप करना व्यर्थ कहा जब तक अंतर में ममत्व रहे।। (१५७) यद्यपि नय शुद्ध है ग्रहण योग्य व्यवहार बिना कुछ ना होता। इसलिए शुद्धनय की व्याख्या व्यवहार से ही करना होता।। व्यवहार बिना निश्चयनय का निंह कोई प्रयोजन रह जाता। इन दोनों को संग लेकर ही साधक मुक्ति का पथ पाता।। (१५८) व्यवहारनयापेक्षा आत्मा दर्शन अरु ज्ञान से भिन्न कहा। अरु शुद्ध नयापेक्षा आत्मा निंह भिन्न सभी कुछ देख रहा।। जो दर्शनज्ञानरूप आत्मा को गुण पर्यायों युत जान लिया। उसने सब कुछ ही देख लिया अरु जान लिया अरु प्राप्त किया।। (१५९) ज्ञानीजन यह विचार करते रस गंधादिक पुद्गल विकार। इससे मैं भिन्न न भीतर हूँ नहि बाहर, हल्का वजनदार।। निंह मोटा पतला और नहीं स्त्री पुरु और नपुंसक हूँ। नहि शब्द वर्ण नहि गणना हूँ मैं दर्शन ज्ञान स्वरूपी हूँ।। (१६०) मोहांधकार को तप द्वारा जब नाश करे केवलज्ञानी। तब चिच्चैतन्य तेज को वे क्षण में जाने आनंदकारी।।। वह तेज सूर्य और चंदा की आभा से अधिक प्रभाशाली। ऐसा वह तेज त्रिलोकी में जयवंत रहे महिमाशाली।। (१६१) जिस तरह कर्म के वशीभूत नहि साता और असाता है। उनसे उत्पन्न विकल्प जाल नहि होते वही विधाता है।। वो मोक्षधाम में रहते है इंद्रादिक भी स्तुति करते। उस पद को पाने हेतू हम भी उनकी शरण ग्रहण करते।। (१६२) जिनमें अज्ञानी सुख माने संताप मिटाती चंद्रकिरन। कर्पूर मिला चंदन रस हो या स्त्री के हो कमल नयन।। ज्ञानीजन ऐसे चंचल सुख को सदा सदा धिक्कार रहे। बस गुरुओं के अमृतसम वचनों से ही शांति प्राप्त करे।। (१६३) जो योगीश्वर इस मोहरूपी ठग से निज की रक्षा करते। संसार रूपी बड़वानल में जो इधर उधर घूमा करते।। जैसे धनयुक्त पथिक कोई चोरों से निजधन वचा ले जब। घर जाकर सुख अनुभवन करे वैसे ही करते योगीतब।। (१६४) धर्म की महिमा तथा धर्म का उपदेश जो अब तक धर्म स्वरूप कहा वह धर्म बड़ा सुख देता है। वह इंद्र तथा अहमिन्द्र और षट्खंड राज्य भी देता है।। दुख का नाशक निर्वाणरूपी प्रासाद की सीढ़ी है ये धरम। इसका वर्णन केवली और गणधर ही कर सकते अपरम।। (१६५) हे भव्यजीव ! यदि जन्म जरा आदिक दुख से बचना चाहो। संसार रूपी जो महारोग उसको भी शमन करना चाहो।। तो धर्म रसायन का आश्रय लेकर कषाय का त्याग करो। मिथ्यात्व बड़ा दुखदायी है इसको न झांककर भी देखो।। (१६६) जैसे समुद्र में गिरा रत्न मिलना अत्यन्त कठिन होता। दो काष्ठखंड जो अलग दिशा में बहकर गया नहीं मिलता।। अंधे को निधि मिलना दुर्लभ वैसा ही दुर्लभ मनुष जनम। यह दुर्लभ मनुष जनम पाकर भव्यों ! जिनधर्म करो धारण।। (१६७) अंधे के हाथ बटेर लगे वैसे ही मनुष जन्म मिलता। पर इसको पाकर जो प्राणी खोटे गुरु देवों में रमता।। उनके खोटे उपदेशों से जो विषय व्यसन में पंâसा रहा। उसका निगोद राशी से मानव तन पाना भी व्यर्थ रहा।। (१६८) हे भव्यजीव ! बहुपुण्य उदय से मनुष जन्म ये तुझे मिला। इसको पाकर अतिशीघ्र कोई हितकारी कारज करो भला।। क्योंकि तिर्यंचगति में कोई भी ज्ञान नहीं दिलवा सकता। इसलिए ना खोटी गति मिले कर ले जो धरम तू कर सकता।। (१६९) आचार्य और भी कहते हैं जो उत्तमकुल है तुझे मिला। नरतन पाकर बहुपुण्य उदय से जैनधर्म भी तुझे मिला।। इतना सब कुछ पाकर भी यदि निंह धर्म मार्ग उपनाओगे। तो आया हुआ रत्न हाथों में खोकर व्यर्थ गवांओगे।। (१७०) अभी धर्म कार्य करने हेतू है उम्र बहुत ही पड़ी हुई। शारीरिक शक्ति धन आदिक है भोग भोगने हेतू मिली।। आगे भविष्य में वृद्धावस्था में आराधना कर लेगे। यह ही विचार करता मूरख इकदिन मृत्यु को वर लेगे।। (१७१) जो ज्ञानी है वे श्वेत केश लखकर विरक्त हो जाते हैं। अज्ञानी जन जब उम्र बढ़े तो तृष्णा और बढ़ाते हैं।। उनको वैराग्य जनित गुरु के उपदेश तनिक न भाते हैं। इस तरह मूर्ख अज्ञानीजन अपना संसार बढ़ाते हैं।। (१७२) हे तृष्णे तू है प्रिया मेरी आजन्म साथ रहने वाली। तू प्रौढ़ा है मेरी स्त्री फिर तू वैâसे सहने वाली।। यह दुष्ट जरा ने मेरे केश पकड़े है फिर भी तू चूप है। इससे मेरा संबंध छुड़ा क्योंकि ये तेरी सौतमन है।। (१७३) इस जग में रंक धनी होता और धनी रंक हो जाता है। क्षणभर का पता नहीं कुछ भी बलवान मृत्यु पा जाता है।। इसलिए नहीं विद्वान पुरुष धन जीवन का मद करता है। ज्यों कमल पत्र पर ओसिंबदु अस्थिर सब वस्तु समझता है।। (१७४) प्राणी के प्राण मित्र सुत सब पत्ते पर पड़े ओस सम है। चंचल है तथा इंद्रियों के सुख भी होते विष सदृश है।। अक्षय सुख एक धर्म ही है पर मोही समझ न पाते हैं। वह मोहजनित दुख को देने वाली वस्तु में सुख मनाते हैं।। (१७५) जब तक राजा जीवित रहता तब तक सेना में जोश रहे। तब तक तलवार शत्रुओं से लड़ने में खूब स्वरोस रहे।।