पद्मावती माता की आरती

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<poem>पद्मावती माता की आरती

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तर्ज—मैं तो आरती उतारूँ रे..............

मैं तो आरती उतारूँ रे, पद्मावती माता की जय जय माँ पद्मावती, जय जय माँ।।टेक.।। सदा होती है जयजयकार, माँ के मंदिर में-२ लागी भक्तन की भीड़ अपार, माँ के मंदिर में-२ पुष्प लाओ, धूप जलाओ, स्वर्णमयी दीप लाओ, आरती उतारो रे, हो सब मिल आरति उतारो रे।।मैं...।।१।। पाश्र्व प्रभुवर की शासन देवी, सब संकट हरणी-२ देव धरणेन्द्र की यक्षिणी, तुम मंगल करणी-२ भक्त जब पुकारते, संकट को टारते, महिमा को गाएं तेरी, हो सब मिल महिमा को गावें तेरी।।मैं...।।२।। पाश्र्व प्रभुवर के मुख से जब मंत्र नवकार सुना-२ बनें पद्मावती धरणेन्द्र, उपसर्ग दूर किया-२ स्थल वह अहिच्छत्र, तब से है जग प्रसिद्ध, पावन परम पूज्य है, हो देखो वो पावन परम पूज्य है।।मैं...।।३।। रोग, शोक, दरिद्र, नाशें, प्रेतादि की बाधा-२ धन-संपत्ति सुत देकर, पूरी करें वाञ्छा-२ सुन ले आज फिर पुकार, भक्त खड़े तेरे द्वार, अतुल शक्ति की धारिणी, हो तुम हो अतुल शक्ति की धारिणी।।मैं...।।४।। माँ सहस्रनाम से तेरी, करते जो आराधना-२ गोदी भरते जो माँ तेरी, पूरी हों सब कामना-२ ममतामयी मेरी मात, ‘इन्दु’ करे एक आश,

जीवन प्रकाशमान हो, हो मेरा भी जीवन प्रकाशमान हो।।मैं...।।५।।