परम पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चंदनामती माताजी की पूजन

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परम पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चंदनामती माताजी की पूजन

ब्र. कु. इन्दु जैन (संघस्थ)
तर्ज—जहां डाल.................

चंदनामती माताजी की पूजन को हम सब आए
चरणों में शीश झुकाएं, चरणों में शीश झुकाएं।।टेक.।।
हे माता तेरी ज्ञानवाटिका में जो प्राणी आता,
मिथ्या कल्मष धुल जाए और नव ज्ञानज्योति को पाता
नव ज्ञानज्योति को पाता।
आव्हानन स्थापन करते, जीवन सुरभित हो जाए,
चरणों में ............................।।१।।
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती मात:! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती मात:! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती मात:! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

तर्ज—आओ बच्चों तुम्हें............
अष्ट द्रव्य से थाल सजाकर, करते तेरा अर्चन है।
गणिनी ज्ञानमती माता की, शिष्या को शत वन्दन है।।
वन्दे मातरम्.-४।।टेक.।।
इन्द्रिय विषयों में पड़ करके, निज आत्मा को मैं भूला।
नहिं संसार समुद्र तिरा, बस राग द्वेष मद में फूला।।
गुरुभक्ती के द्वारा माता, मुक्ति सुफल को पाना है,
ज्ञानसुधा के कुछ कण पाकर, भव का भ्रमण मिटाना है।।
स्वर्णमयी झारी के द्वारा, इसी हेतु जल अर्पण है।
गणिनी ज्ञानमती माता की, शिष्या को शत वन्दन है।।।।
वन्दे मातरम्.-४।।१।।
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती मात्रे जलं निर्वपामीति स्वाहा।
यह क्रोधादि कषाएं मानव को कितने दुख देती हैं।
शान्तस्वरूपी आत्मा को यह प्रकट न होने देती हैं।।
अन्तर मन को शीतल करने, हेतु चरण में आया हूं।
आत्मा मेरी सुरभित हो, यह भाव हृदय में लाया हूं।।
स्वर्णकटोरी में चन्दन घिस, करते तव पद चर्चन है।
गणिनी ज्ञानमती माता की, शिष्या को शत वन्दन है।।
वन्दे मातरम्-४।।२।।
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती मात्रे चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
नाना सपने बुनकर प्राणी, अक्षय सुख को ढूंढ रहा।
आत्मा जिससे निर्मल हो, उस स्वातम निधि को भूल रहा।।
अक्षय सुख के हेतु मात, बस मुझे तेरा अवलम्बन है।
ऐसा ज्ञानामृत दे दो, मिल जावे अक्षय जीवन है।।
इसी भावना को ले करके, अक्षत से की पूजन है।
गणिनी ज्ञानमती माता की, शिष्या को शत वन्दन है।।
वन्दे मातरम्-४।।३।।
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती मात्रे अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
कामदेव के वश हो प्राणी, विषय भोग में है रमता।
तृष्णा तृप्त करे जितनी, उतनी ही बढ़ती जाए व्यथा।।
ब्रह्मचर्य के तप को लख, कामाग्नी रोग नशाना है।
तव पद का अनुसरण करूं, बस यही भावना भाना है।।
पुष्प समर्पण करते गुरुवर, भाव यही मेरे मन है।
गणिनी ज्ञानमती माता की, शिष्या को शत वन्दन है।।
वन्दे मातरम्-४।।४।।
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती मात्रे पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
हे माता! हरदम पापों में रत रसना इन्द्रिय करती।
कितने भी पकवान खाए पर क्षुधा हमारी नहिं मिटती।।
क्षुधारोग की व्यथा मात, भव-भव से मैं सहता आया।
तेरे दिव्य वचन अमृत को, पाकर तृप्त हुई काया।।
चढ़ा रहे नैवेद्य चरण में, मिले निजातम चिन्तन है।
गणिनी ज्ञानमती माता की, शिष्या को शत वन्दन है।।
वन्दे मातरम्-४।।५।।
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती मात्रे नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
विद्युत की इस चकाचौंध से, जगमग यह संसार करे।
अन्तर का यदि दीप जले ना, समझो जीवन व्यर्थ अरे।।
तेरी किंचित् ज्ञानकिरण माँ, गर मुझ पर पड़ जाएगी।
तो समझो मेरे जीवन में, ज्ञानज्योति भर जाएगी।।
दिव्य ज्ञान मिल जाए शीघ्र ही, यही भाव मेरे मन है।
गणिनी ज्ञानमती माता की, शिष्या को शत वन्दन है।।
 वन्दे मातरम्-४।।६।|
अष्ट कर्म प्राणी को जग में,नाना दुःख दिलाते हैं |
जो इसके जेता होते वे सिद्धात्मा कहलाते हैं ||
कहते हैं सच्ची गुरुभक्ती हर मनवांछित फल देती |
अशुभ कर्म के नाशन हेतू,हम करते तेरी भक्ती ||
धूप जलाकर करें प्रार्थना,कट जावे भवबंधन है |
गणिनी ज्ञानमती माता की शिष्या को शत वंदन है ||
वन्दे मातरम्-४।।७।|
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती मात्रे धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
बहुत मिष्ट स्वादिष्ट फलों को खाकर मन संतृप्त किया।
शिवपद की हो शीघ्र प्राप्ति, हम द्वार तिहारे आए हैं।
स्वात्मा में नित रमण करूं, यह सुन्दर भाव सजाए हैं।।
फल का थाल समर्प्य करूं, मिल जाएगा फल उत्तम है।
गणिनी ज्ञानमती माता की, शिष्या को शत वन्दन है।।
वन्दे मातरम्-४।।७।।
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती मात्रे फलं निर्वपामीति स्वाहा।
रत्नत्रयसंयुत माता, चंदनामती तुमको प्रणमन।
अष्टद्रव्ययुत अर्घ्य थाल से, तव पद अर्घ्य करूं अर्पण।।
गणिनी माता ज्ञानमती की, शिष्या माता आप महान।
पद अनर्घ्य मिल जाए मुझे, बस एक यही दे दो वरदान।।
जीवन यह क्षणभंगुर है, तव सन्निध से समझा मन है।
गणिनी ज्ञानमती माता की, शिष्या को शत वन्दन है।।
वन्दे मातरम्-४।।८।।
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती मात्रे अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
-शेर छन्द-
मां तेरे पदकमल में त्रयधार मैं करूं।
मम जन्म जरा मृत्यु नशे, प्रार्थना करूं।।
हो प्राप्ति रतनत्रय की, शुभ भावना मेरी।
शाश्वत मिले शान्ती, अतैव शान्तिधार की।। शान्तये शान्तिधारा।
सुन्दर सुगन्धियुक्त, पुष्प थाल में लिया।
गुरुवर तेरे पदपंकज में उसको अर्पिया।
निजगुण सुरभि के हेतु मैं पुष्पांजली करूं।
युग युग रहो जीवन्त, प्रभु से प्रार्थना करूं।। दिव्य पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
—जयमाला—
तर्ज—माई रे माई......................
ज्ञानसुरभि की प्राप्ति हेतु, जयमाल का थाल सजाया।
मात चन्दनामती तेरी, पूजन से मन हरषाया।।
जय हो माता तेरी जय, जय हो गुरुवर तेरी जय।।टेक.।।
ग्राम टिकैतनगर प्यारा, जहां ‘माधुरि’ कन्या जन्मीं।
छोटेलाल पिता तेरे, मोहिनी मां थीं तुम जननी।।
ज्येष्ठ कृष्ण मावस की तिथि को...............
ज्येष्ठ कृष्ण मावस की तिथि को, जन्म से सफल बनाया।।
मात चन्दनामती तेरी, पूजन से मन हरषाया।। जय हो ....।।१।।

ग्यारह वर्ष की लघुवय में, था त्यागमार्ग मन भाया।
बढ़े कदम शिवपथ पे, ज्ञानमती सम गुरु जब पाया।।
जो संस्कार मिले उससे ...............
जो संस्कार मिले उससे, कुल का यश है फैलाया।
मात चन्दनामती तेरी, पूजन से मन हरषाया।। जय हो .....।।२।।

अर्जुन सा निज लक्ष्य बनाया, ब्रह्मचर्य व्रत लेकर।
गुरुचरणों में जीवन का, हर क्षण कर दिया समर्पण।।
तिथि सुगन्धदशमी ने जीवन...................
तिथि सुगन्धदशमी ने, जीवन में सुगन्धि फैलाया।
मात चन्दनामती तेरी, पूजन से मन हरषाया।। जय हो ....।।३।।

हस्तिनागपुर तीर्थक्षेत्र की, पुण्यमयी वसुधा है।
ज्ञानमती मां से नारी का, पद उत्कृष्ट मिला है।।
सन् उन्निस सौ नवासी..................
सन् उन्निस सौ नवासी, श्रावण सुदि ग्यारस महकाया।
मात चन्दनामती तेरी, पूजन से मन हरषाया।। जय हो ....।।४।।

नाम चन्दनामती मिला, चन्दन सी सुरभि बिखेरी।
अनुशासनप्रिय, ममतामूरत, दिव्य प्रभा है तेरी।।
अट्ठाईस मूलगुणधारी, .....................
अट्ठाईस मूलगुणधारी, चरण शरण चित आया।
मात चन्दनामती तेरी, पूजन से मन हरषाया।। जय हो .....।।५।।

धर्म और संस्कृती सुरक्षा, में रत रहें हमेशा।
चलो सदा गुरु अनुशासन में, यही तुम्हारी शिक्षा।।
है व्यक्तित्व कृतित्व निराला..................
है व्यक्तित्त्व कृतित्त्व निराला, यशगाथा तव गाया।।
मात चन्दनामती तेरी, पूजन से मन हरषाया।। जय हो ...।।६।।

ज्ञानमती माता की छाया, तुम पद में शत वन्दन।
प्रज्ञाश्रमणी मात भावयुत है, जयमाल समर्पण।।
ज्ञान प्राप्ति के हेतु ‘इन्दु’ अब ...........
ज्ञान प्राप्ति के हेतु ‘इन्दु’ अब द्वार तिहारे आया।
मात चन्दनामती तेरी, पूजन से मन हरषाया।।७।।

ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चन्दनामती मात्रे जयमाला पूर्णाघ्यम् निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:।
तर्ज— हे वीर तुम्हारे .............
हे मात तेरी पूजन करके, बस एक भावना भाते हैं।
गुरुभक्ति में दृढ़ता रहे सदा, अतएव तुम्हें हम ध्याते हैं।।
डी. लिट् पदवी से युत माता, आदर्श हो हम बालाओं की।
जयशील रहो, जयवन्त रहो, प्रभुवर से प्रार्थना हम सबकी।।
मुक्ती तक तेरा वरदहस्त, हो भाव यही चित लाते हैं।।
गुरुभक्ति में दृढ़ता रहे सदा, अतएव तुम्हें हम ध्याते हैं।।१।।
।।इत्याशीर्वादः।।