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पर्यावरण , आर्थिक विकास और जैन धर्म के सिद्धान्त

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पर्यावरण , आर्थिक विकास और जैन धर्म के सिद्धान्त

पर्यावरण संरक्षण जैन जीवन शैली का मूलाधार है। समग्र जैन वाङ्मय में पर्यावरण विषयक सूक्ष्म चिन्तन व्याप्त है। मनुष्य के चारों ओर व्याप्त भूमंडल, वायुमंडल, जलमंडल और जीवमंडल ही पर्यावरण है। तत्त्वार्थसूत्र में लिखा है -

संसारिणस्त्रस स्थावरा:।

पृथिव्यप्तेजोवायु वनस्पतय: स्थावरा:। २/१२.१३[१]

अर्थात् जीव सृष्टि त्रस और स्थावर दो प्रकार की है। पृथ्वी, जल, अग्नि वायु और वनस्पति ये पांच स्थावर जीव हैं। इन सब से मिलकर सृष्टि का निर्माण हुआ। इस तरह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जीव तत्त्व से ओतप्रोत है और संपूर्ण पर्यावरण एक जीवन्त इकाई है और इसमें ‘‘परस्परोग्रहो जीवानाम्’’ कहकर बताया है कि प्रत्येक जीव एक दूसरे पर आश्रित है, सहयोगी है, पूरक है।

प्रत्येक जीव में सहअस्तित्व और एकत्व ही भावना है। आचारांग सूत्र१ में कहा भी है कि जिसे तू मारने योग्य समझ रहा है वह वास्तव में तू ही है, जिसे आज्ञा योग्य मानता है वास्तव में वह तू ही है, जिसे परिताप देने योग्य समझ रहा है वास्तव में तू ही है, जिसे पकड़ने योग्य समझ रहा है वास्तव में वह तू ही है, जिन्हें प्राणहीन करना चाहता है वास्तव में वह तू ही है। इस प्रकार यदि इन जीवों का अस्तित्व है तो ही हमारा अस्तित्व है। अत: हमारे अस्तित्व की रक्षा के लिए पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति तथा प्राणी जगत की सुरक्षा हमारा कर्तव्य है। आचार्य समन्तभद्र ने कहा है –

क्षिति-सलिल-दहन पवनारम्भं विफलं वनस्पति छेद्म।

सरणं सारणमपि च प्रमादचर्या प्रभाषन्ते ।।[२]

अर्थात् बिना प्रयोजन भूमि खोदना, जल बहाना, अग्नि जलाना, पंखा चलाना, वृक्षों को उखाड़ना, पत्र, पुष्प, डाल, फलादि को छिन्न-छिन्न करना प्रमादपूर्ण आचरण है। इसलिये बिना प्रयोजन इन कार्यों को नहीं करना चाहिए। जबकि आज मनुष्य यही प्रमाद कर रहा है। इसीलिए भूमि, जल, वायु, ध्वनि और प्रदूषण विकराल रूप ले रहे हैं। आज इच्छा और भोगवादी दृष्टिकोण ने हिंसा को जन्म दिया है साथ-साथ पर्यावरण संतुलन का विनाश किया। इन परिस्थितियों में अहिंसा आत्मशुद्धि के साथ पर्यावरण संतुलन का श्रेष्ठ मार्ग है।

जैनधर्म का मूलाधार अहिंसा है। अहिंसा केवल धर्म या दर्शन नहीं अपितु जीवन जीने की समग्र शैली है। जैन ऋषियों ने अहिंसा को अनेक पहलुओं से देखा, पर्यावरण विज्ञान उनमें से एक है। अहिंसा से तात्पर्य केवल बाह्य शरीर की हिंसा का अभाव नहीं है अपितु मन, वचन और काय से किसी जीव को आघात तक नहीं पहुँचाना है। इस भावना से पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति और प्राणी जगत की रक्षा से अहिंसा के द्वारा सभी प्रकार के प्रदूषण से मुक्ति सम्भव है।

पर्यावरण संतुलन का समग्र चक्र वनस्पति पर आधारित है। वृक्ष कार्बनडाई ऑक्साइड ग्रहण कर शुद्ध प्राणवायु ऑक्सीजन के रूप में प्रदान करते हैं। वर्षा चक्र को नियमित करते हैं। अतिवृष्टि के समय जल अवषोषित कर भूमिगत कर देते हैं। प्राणी जगत को पर्याप्त आहार प्रदान करते हैं। ये जल, फल, शुद्ध र्इंधन तो देते हैं साथ ही प्राणीमात्र की रक्षा भी करते हैं। प्रत्यक्ष देखा गया है कि गैस त्रादसी, सुनामी, बाढ़ जैसी घोर विपदाओं को पहले स्वयं वृक्षों ने सहन किया तथा मनुष्य और जीवों की रक्षा की। कृषि से खाद्यान्न तथा वन संपदा से प्राप्त ईंधन, लकड़ी, औषधि आदि से अनेक प्रकार के उद्योग धंधे विकसित होते हैं इस दृष्टि से वन संपदा की रक्षा तथा अवैध कटाई पर रोक से पर्यावरण सुरक्षित और अर्थ तंत्र विकसित होगा।

शाकाहार ही श्रेष्ठ आहार है। जैनधर्म में मद्य, मांस और मधु के सेवन और उत्पान का निषेध[३] किया है।[४]पर्यावरण की दृष्टि से मांसाहार प्रदूषित तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से कुपाच्य, तथा रोगकारी होता है। आर्थिक दृष्टि से देखा जाय तो मांस के उत्पादन और सुरक्षा में अधिक समय, स्थान और धन का व्यय होता है। सामान्यत: कृषि से वर्ष में दो बार आय होती है वही मांस के उत्पादन में वर्षों लगते हैं।[५]

वर्तमान में मांस उत्पादन से जलाभाव की समस्या उग्र रूप ले रही है। शोध के आँकड़े बताते हैं कि १ पौंड के उत्पादन मे पानी खपत टामाटर के लिए (२३ गैलन), आलू (२४), गेहूँ (२५), गाजर (३३), सेवफल (४९), संतरे (६५), अंगूर (७०), दूध (१३०), अण्डे (५००), सूअर मांस (१६३०), गोमांस (५२१४ गैलन) होती है।

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। कृषि में बैल उर्जा के स्रोत हैं। भोजन में प्रोटीन का प्रमुख माध्यम दूध है। भारत मे ८० मिलियन ढुलाई करने वाले पशुओं से ४० मिलियन हार्स पावर शक्ति मिलती है, जो १०,००० मेगावाट विद्युत उर्जा के बराबर है।[६] पशु दुध के अतिरिक्त, मल-मूत्र के रूप में खाद तथा अमूल्य श्रम देकर आर्थिक विकास में बहुमूल्य योगदान करते हैं। इनका पालन तो कृषि के उपोत्पादन से ही हो जाता है। इसमें विशेष खर्च नहीं होता। ऐसी स्थिति में पशु संपदा का संहार किया जाता है तो यह अर्थतंत्र और पर्यावरण का संहार है।

जैनाचार में प्राणियों की रक्षा के लिए विस्तार से निर्देश किया है। उनके अंगों के छेदन, बंधन, उन्हें मारना, शक्ति से अधिक भार लादना, अपर्याप्त आहार देना, समय पर आहार न देना आदि का निषेध कर पशु सृष्टि के संरक्षण और संवर्धन का मार्ग प्रशस्त किया है।[७]

वर्तमान में भौतिक सुविधा, आवश्यकता की पूर्ति तथा विकास के लिये भूमि उत्खनन, ऊर्जा के लिए पेट्रोल का, कोयला का, धातुओं का उत्खनन निरन्तर बढ़ता जा रहा है जिससे भूकम्प, सुनामी जैसे विपदाओं का ताण्डव बढ़ता जा रहा है।

आज स्थान-स्थान पर कल कारखानों का विषाक्त जल नदियों में या भूमि पर व्यर्थ बहा दिया जाता है। जैन दृष्टि से उनमें असंख्य जल के जीवों की हिंसा होती है। पर्यावरण वैज्ञानिक इसे जल प्रदूषण की संज्ञा देते हैं। जैन विधि[८] से जल की शुद्धि एवं मितव्ययिता से ही जल प्रदूषण से मुक्ति संभव है।

अग्नि उर्जा का प्रतीक है। उर्जा की बचत और संवर्धन के लिए अग्नि जीव अनावश्यक हिंसा का निषेध किया है। इस प्रकार अहिंसा के आचरण से मानव प्रकृति का संरक्षण कर विकास की ओर अग्रसर हो सकता है।

धर्म और अर्थ जीवन के महत्वपूर्ण पुरुषार्थ है। जिसमें धर्म प्रथम और अर्थ द्वितीय स्थान पर है। अर्थशास्त्र के केन्द्र में अर्थ है और परिधि में मानव है। इसका मूलाधार इच्छा है। इच्छा वृद्धि-आवश्यकता में वृद्धि-आवश्यकता की पूर्ति के लिये उत्पादन में वृद्धि-अधिक लाभार्जन और समृद्धि यह आर्थिक चक्र है। अधिक लाभ के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और शोषण से हिंसा में वृद्धि और पर्यावरण में असंतुलन निरन्तर देखा जा रहा है।

महावीर स्वामी ने कहा है कि ‘इच्छा हु आकाससमा अणंतया’[९] अर्थात् इच्छा आकाश के समान अनन्त है। ‘खणमेतसोक्खा बहुकाल दुक्खा’ - इच्छा पूर्ति के लिए प्राप्त भौतिक सुख क्षणिक होते हैं और परिणाम में दुखद होते हैं। एक इच्छा की पूर्ति के बाद दूसरी जन्म लेती है संतुष्टि नहीं होती है। जिस प्रकार अग्नि से अग्नि को शान्त नहीं किया जा सकता है, इच्छा का भी ऐसा ही स्वरूप है।

इसीलिये जैनधर्म की इच्छा को संयमित तथा आवश्यकता को सीमित करने की बात कहता है। आवश्यकता की पूर्ति के लिए जैन आगम जीविकोपार्जन और उत्पादन का निषेध नहीं करता है। जीविकोपार्जन गृहस्थ की आवश्यकता है। जैन धर्म में उत्पादन के लिए साधन की पवित्रता को आवश्यक माना है- इसके लिए जैनागम में तीन निर्देश दिये हैं।[१०]

१. अहिंसप्पयाणे हिंसक शस्त्रों का निर्माण न करना।
२. असंजुताहिकरणे शस्त्रों का संयोजन नहीं करना।
३. अपावकम्मोवदेसे पाप कर्म का, हिंसा प्रशिक्षण न देना।

हिंसक साधन, परशु कृपाण तलवार आदि शस्त्रों का निर्माण-व्यापार, अदान-प्रदान न करने का निर्देश दिया है।[११] विश्व शांति के लिए यह निर्देश वरदान है और आज इसकी महती आवश्यकता है।

अर्थोपार्जन के लिए जैनागमों में कर्म की शुद्धता तथा नैतिकता पर बल दिया है।

चौर प्रयोग चौरार्थदान विलोप सदृश सम्मिश्रा: ।

हीनाधिकं विनिमानं पंचास्तेये व्यतीपात: ।।[१२]

चोरी तस्करी के प्रयोग, चोरी का धन लेना, राज नियमों का उल्लंघन, मिलावट, नाप-तोल में कम ज्यादा करना, काम न करके वेतन लेना सर्वथा अनुचित है।

धन का उपार्जन जीविका के लिये किया जाना चाहिये। धन संग्रह के लिये नहीं। धन संगह से लोभ तथा सवार्थ की प्रवृत्ति प्रबल होगी तब गरीबी और असमानता की समस्या बढ़ेगी। इसके लिए अपरिग्रह का पालन करना चाहिए। आवश्यता से अधिक धन या वस्तुओं का संग्रह न करना अपरिग्रह है। धन का उचित उपयोग तथा दान करना चाहिए। धन के भोग और परिग्रह को सीमित करना चाहिए। अपरिग्रह से गरीबी, असमानता, प्रकृति का दोहन आदि अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है।

अनैतिकता से निरन्तर भ्रष्टाचार, अप्रामाणिकता, बेइमानी आदि आर्थिक अपराध बढ़ रहे हैं। अत: आवश्यक है कि आर्थिक विकास धर्म और नीति से अनुप्रमाणित हो। विकास इस तरह हो कि विश्व शांति को खतरा न हो, अपराध न हो, सभी की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो, अर्थजन में अप्रमाणिक सांधनों का प्रयोग न हो और दूसरों की हानि न हो, यह तभी संभव है जब विकास मानवता तथा नैतिकता प्रधान होगा।

अर्थशास्त्र का उद्देश्य अर्जन करना है। जैनधर्म का उद्देश्य संयोजन और विसर्जन (त्याग) है। अर्थशास्त्र व्यय की बात करता है, जैनधर्म मितव्यय का आग्रह और अपव्यय का निषेध करता है। अर्थशास्त्र में आर्थिक विकास, प्राकृतिक संसाधनों की बचत और समाधान है। आज की परिस्थिति में धर्म और अर्थ विरोधी बन गये हैं। किन्तु पृथक- पृथक दोनों सत्य है। अनेकान्त दृष्टि से विचार करें तो दोनों इच्छा, आवश्यकता और संतुष्टि की बात करते हैं। वर्तमान संदर्भ में आर्थिक विकास के और पर्यावरण संरक्षण के लिये मध्यम मार्ग अपनाना होगा। इसके लिए धर्म समन्वित अर्थ नीति को अपनाना होगा। आर्थिक विकास की अवधारणाओं पर पुनर्विचार करना होगा और इसके लिये जैनधर्म के सिद्धान्त ही सार्थक हैं, वरदान हैं।

डॉ. संगीता मेहता

अनेकान्त जुलाई -सित्म. २०१३

टिप्पणी

  1. आचारांग सूत्र- पंचम अध्ययन, पंचम उद्देशक, अहिंसा पद सूत्र १०१.१०२.१०३
  2. रत्नकरण्ड श्रावकाचार- आचार्य समन्तभद्र- पद्य ८०
  3. श्रावकाचार पूज्यपाद १४, ३५
  4. रत्नकरण्ड श्रावकाचार ६६,
  5. शाकाहार विज्ञान- डॉ. नेमीचन्द्र जैन, हीरा भैया प्रकाशन, पृ. ४९
  6. शाकाहार विज्ञान- डॉ. नेमीचन्द्र जैन, हीरा भैया प्रकाशन, पृ. ४९
  7. रत्नकरण्ड श्रावकाचार ८४
  8. वीरोदय काव्य १९/२९
  9. उपासकदशांग १/३८
  10. महावीर का अर्थशास्त्र- आचार्य महाप्रज्ञ, आदर्श साहित्य संघ, चुरू, पृ. ४२
  11. रत्नकरण्ड श्रावकाचार- आचार्य समन्तभद्र पद्य ७७
  12. वही ५८