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पांडुलिपियों के संरक्षण के कुछ अलक्षित पक्ष

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पांडुलिपियों के संरक्षण के कुछ अलक्षित पक्ष

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सूरजमल बोबरा
निदेशक ज्ञानोदय फाउन्डेशन ९/२ स्नेहलता गंज इन्दौर

पांडुलिपियों के संरक्षण का महत्त्वपूर्ण कार्य कई माध्यमों से प्रारम्भ हो चुका है और यह एक संतोष की बात है। आशा करना चाहिये कि इन का पंजीकरण शीघ्र हो जायेगा और यथासंभव इन का संरक्षण भी प्रारम्भ हो जायेगा। भारत के गाँव—गाँव में ये पांडुलिपियाँ हैं और कई सन्दर्भों के उजागर होने की सम्भावना है। इस कड़ी में एक बहुत महत्वपूर्ण कड़ी यह है कि विदेशों में बहुत से जैन ग्रंथ पांडुलिपि के रूप में होना चाहिये जो सदियों से विदेश जाते रहे हैं। हमारा पांडुलिपि संरक्षण का कार्य तब तक अधूरा है जब तक विदेशों में चले गये हमारे इन ग्रंथों की जानकारी हमें नहीं मिल जाती। हो सकता है विदेशों में चले गये मूल ग्रंथ हों। विदेशों में ग्रंथ चले गये, इस सोच का निम्न आधार है—

१. बहुत वर्षों पूर्व एक प्राचीन कथा मैंने पढ़ी थी। उसकी मूल कथा वस्तु इस प्रकार है कि एक विदेशी अध्ययन हेतु तक्षशिला आता है। अध्ययन के पश्चात् वह बहुत से ग्रंथ अपने साथ ले गया। उसे सिधु मार्ग से नौका द्वारा समुद्र तट तक पहुँचाने के लिये दो अन्य विद्यार्थी उसके साथ भेजे गये। यात्रा के मध्य में नौका के क्षतिग्रस्त होने के कारण तीन व्यक्ति और भारी ग्रंथों का बोझ उठाना कठिन हो गया। विदेशी यात्री ने प्रस्ताव किया कि ग्रंथों को नदी में फैक दिया जाय किन्तु भारतीय विद्यार्थियों ने कहा ‘ग्रंथ हमें प्राणो से ज्यादा प्यारे हैं। हम नौका से नदी में कूद जायेंगे, पर ग्रंथ नहीं फैकने देंगे। ऐसा ही हुआ। उन दोनों भारतीय विद्र्यािथयों ने कूद कर अपने प्राणों की आहुति दे दी और ग्रंथ सुरक्षित रह गये। यह विदेशी समुद्र तट पर कुशलता के साथ ग्रंथों सहित चला गया और अपने देश पहुँच गया। यह एक स्मृति कथा है किन्तु इसमें संकेत छिपा है कि भारत में अध्ययन करने के लिये विदेशी आते रहे और अपने साथ ग्रंथ ले जाते रहे। स्मरण रखा जाना चाहिये तब तक्षशिला सर्वप्रथम जैन, बाद में वैदिक और उसके बाद बौद्ध ज्ञान का केन्द्र बना।

२. भारत की यात्रा पर आने वाले कई प्रसिद्ध यात्री विदेशी हैं जिनमें फाह्यान (३९९-४१४ ई.) व व्हेनसांग (६२९-६४३ ई.) प्रमुख रूप से ज्ञात हैं जो अपने साथ कई ग्रंथ ले गये। इन्हीं ग्रंथों के आधार पर उन्होंने अपने यात्रा वृत्तान्तों में सामग्री दी है।

३. यह ऐतिहासिक संदर्भ युक्त है कि ई. पू. २६८०-२५६५ में कोई दिगम्बर मुनि मिश्र में लेखन ज्ञान का प्रवर्तन कर रहे थे। ये मुनि यदि वहाँ गये थे और लेखन कला से युक्त थे तो अवश्य कुछ न कुछ लिखा होगा या वहाँ से जाते समय कुछ न कुछ ग्रंथ अवश्य ले गये होंगे। यूनानी एलेक्जेन्डर (सिकन्दर) (३२७ ई.) हमलावर बनकर आया किन्तु पंजाब से वापिस लौटा तो भारतीय मुनियों का प्रशंसक बन कर लौटा। कथन है कि उसकी प्रेरणा से कल्याण मुनि यूनान तरफ गये। सिकन्दर के साथ कई लेखक भी आये थे जिनके लिखे ग्रंथों से भारत के तत्कालीन इतिहास का ज्ञान हुआ। निश्चित रूप से इनके साथ कुछ सन्दर्भ ग्रंथ गये होंगे। ये ग्रंथ कौन से थे और अब वे कहाँ हैं, उनके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है।

४. चाणक्य के पास ग्रंथों का भंडार था। जिसमें दर्शन शास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र व विज्ञान के कई अलभ्य ग्रंथ थे। चाणक्य के जैन मुनि बन जाने के बाद उन ग्रंथों का क्या हुआ? वे कहाँ गये ? जैन साहित्य के इतिहासकारों ने इस पर कोई प्रश्न चिन्ह पैदा नहीं किया है। चाणक्य को तक्षशिला का निवासी (तक्कसिल नगरवासी) बताया गया। जातक कथाओं से पता चलता है। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को ७—८ वर्ष तक तक्षशिला के प्रसिद्ध विद्यापीठ में शिक्षा दिलाई। वहाँ सिद्धान्त और व्यवहार दोनों की शिक्षा दी जाती थी। तक्षशिला अपनी विधिशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र तथा सैन्य विद्या की अलग अलग पाठशालाओं के लिये प्रख्यात था। संभवत: चाणक्य के पास का ग्रंथों का भंडार तक्षशिला का ही रहा हो। प्रारम्भ में तक्षशिला जैन और उसके बाद वैदिक शिक्षा के केन्द्र के रूप में जाना जाता था। बौद्ध शिक्षा के केन्द्र के रूप में वह बाद में विकसित किया गया। तक्षशिला की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि पश्चिमोत्तर से आने वाले सभी यात्री व आक्रांता इससे होकर जाते थे। आज इसकी कल्पना करना भी कठिन है कि विदेशियों की लूट के माल में सम्मिलित क्या क्या था। अरब देशों और यूनान में तो अवश्य प्राचीन पंडुलिपियाँ मिलनी चाहिये। भारत के बारे में लिखने वालों में मेगास्थनीज, निआर्वस, ओनेसिक्रिटस, दियोडोरस, अरिस्टोबुलस, र्अिरयन आदि प्रमुख थे। उन्होंने भारत में जो देखा उसके अतिरिक्त भी उन्होंने लिखा जिससे आभास होता है कि उनके पास सन्दर्भ सूचनाएँ थी जिनके आधार पर उन्होंने अपने विचार बनाये।

५. केम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इण्डिया में डॉ. एफ. डबल्यू टामस ने जैन धर्म पर भी बहुत सी टिप्पणियाँ की हैं। उनकी सूचना का आधार भी कुछ ग्रंथ होना चाहिये। वे ग्रंथ कहाँ हैं ? उनका स्वरूप क्या है ? वे ग्रंथ यदि हमें मिल सकते हैं तो कोई बात नहीं, किन्तु कम से कम उन्हें हमारे प्राकृत व संस्कृत के विद्वान देख लें। उसकी सुव्यवस्थित जानकारी हमारे शोध संस्थाओं को उपलब्ध हो।

६. सेव्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट, अंक २२ (जैन सूत्र, भाग—१) और अंक ४५ (जैन सूत्र भाग—२) जैन पवित्र ग्रंथों को सर्मिपत यह ग्रंथ हर्मन जेकोबी द्वारा अंग्रेजी में अनूदित है। उन्हें जैन धर्म और जैन साहित्य का बड़ा भारी विद्वान माना जाता है। इन अनूदित भागों का आधार जो ग्रंथ है क्या उन्हें एक बार मूलत: देखा जाना आवश्यक नहीं है और यदि नहीं तो कम से कम उनकी प्रतिकृति तो अवश्य जैन शोध संस्थानों के पास होनी चाहिये। हो सकता है जैन इतिहास को जोड़ने में इससे सहयोग मिले हो सकता है कुछ नये सन्दर्भ ग्रंथ प्राप्त हो जायें।

इसमें कुछ सन्देह नहीं कि अंग्रेज और जर्मन व अन्य पाश्चात्य विद्वान अध्ययनशील थे, उन्होंने उस समय कार्य किया जब भारतवासी सो रहे थे, किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि ब्रिटिश शासन के दौरान हमार बहुत सा मूल साहित्य विदेशों में चला गया। आज हमारी पांडुलिपियाँ कहाँ किस रूप में पड़ी हैं, इसकी चिन्ता करना हमारे लिये अत्यन्त आवश्यक है। अंग्रेज विद्वानों की कई समीक्षाएँ अब त्रूटिपूर्ण सिद्ध हो चुकी हैं अत: इन ग्रंथों की मूल पांडुलिपियों की उपयोगिता अब अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

७. श्रीलंका (सिहलद्वीप), नेपाल, अफागानिस्तान, पूर्व एशियाई द्वीपों आदि में जैन धर्म के अस्तित्व के प्रमाण हैं। वहाँ पर भी प्राचीन पांडुलिपियों के होने की सम्भावना है। इन्हीं स्थानों पर बौद्ध धर्म का भी प्रभाव रहा है। कई बौद्ध ग्रंथों में जैन सन्दर्भ निहित है। महावीर और बुद्ध के समकालीन होने के कारण यह संभावना प्रबल रूप से है।

८. जैन मन्दिरों के अतिरिक्त अजैन मन्दिरों व शोध संस्थानों के शास्त्र भंडारों को भी देखने का प्रयत्न किया जाना चाहिये। यह विर्विवाद सत्य है कि कई वैदिक परम्परा में जन्म लिये व्यक्तियों ने जैन मुनिमार्ग अपना लिया था। उनके द्वारा दोनों तरफ लेखन कार्य किया गया। शास्त्रार्थ की हमारे यहाँ परम्परा रही है। शास्त्रार्थ का आधार होता है सभी पक्षों का ज्ञान अत: परम्परागत वेदानुयाइयों और ब्राह्मण परिवारों के पास भी जैन ग्रंथ होना चाहिये।

९. पहले हम अपने आगम ग्रंथों को लोगों से दूर रखते थे, या वे केवल पंडितों और मुनियों की पहुँच में ही रहते थे। उस समय के लिये यह योजना ठीक थी किन्तु अब अधिसंख्य लोग शिक्षित हैं अत: इनके खुले रूप से प्रदर्शन और प्रकाश की व्यवस्था होनी चाहिये। ताड़पत्रों पर लिखी प्रतियाँ संभवत: कई लोगों ने अब तक देखी भी न हो। जैन जनसमूह उसे देख सके, ऐसी योजना होनी चाहिये। पांडुलिपि का संरक्षण अभी भी केवल विद्वानों की रुचि का विषय है। प्रत्येक जैन (जो मंदिर जाता है या नहीं) का इन ग्रंथों से एक बार साक्षात्कार हो जाये। आसपास जहाँ भी ऐसे ग्रंथ हों उन्हें दिखाया जाये। काल प्रकोप से बहुत कुछ नष्ट हो गया है, जो बचा है उनका संरक्षण भी हो और खुले रूप में उनका प्रदर्शन भी हो।


अर्हत् वचन जनवरी—मार्च २००५