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पूज्य आर्यिका ज्ञानमतीकृत नियमसार-स्याद्वाद चंद्रिका टीका-एक दृष्टि

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पूज्य आर्यिका ज्ञानमतीकृत नियमसार-स्याद्वाद चंद्रिका टीका-एक दृष्टि

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सारांश

जैन वाङ्मय के प्रकाशन के क्षेत्र में अपनी लौह लेखनी के द्वारा पूज्य १०५ गणिनी आर्यिकारत्न श्री ज्ञानमती माताजी ने कीर्तिमान स्थापित किया है। अभीक्ष्णज्ञानोपयोगी एवं प्रतिमूर्ति रूप उनके अकथित श्रम से चतुरनुयोगी विपुल साहित्य का सृजन हुआ है। निम्न पंक्तियाँ उन पर सटीक रूप से चरितार्थ होती हैं-

बहते ही जाओ, बहते ही जाओ, जहाँ तक धार हो।

सहते ही जाओ, सहते ही जाओ, जहाँ तक कर्मोदय की मार हो।
ढोते ही जाओ, ढोते ही जाओ, जहाँ तक कर्तव्य का भार हो।

लिखते ही जाओ, लिखते ही जाओ, जहाँ तक विकल्प के उस पार हो, निर्विकल्प का द्वार हो।।

पूज्य माताजी का प्राकृत, संस्कृत तथा हिन्दी आदि लोकभाषाओं तथा व्याकरण, छन्द, अलंकार, न्याय, दर्शन, सिद्धांत आदि विषयों पर अधिकार है। वे संस्कृत भाषा में धाराप्रवाह लेखनी चलाने में समर्थ हैं। यही कारण है कि उनकी पावन लेखनी से मौलिक ग्रंथ, टीका, अनुवाद तथा स्तोत्र आदि श्रेष्ठ साहित्य की रचना हुई है। हर्ष का विषय है कि इसी संस्कृत भाषा के टीकाक्रम में विश्ववन्द्य आचार्य कुन्दकुन्द के अध्यात्म ग्रंथ नियमसार पर माताजी ने पूर्व में हिन्दी पद्यानुवाद सहित टीका लिखने के पश्चात् संस्कृत भाषा में ‘स्याद्वाद चन्द्रिका’ नामक टीका का प्रणयन किया जो वस्तुत: वर्तमान में प्रशंसनीय कार्य है। मैंने प्रस्तुत टीका पर ‘एक अनुशीलन’ रूप शोध ग्रंथ लिखा जो दिनाँक ३ अप्रैल २००५ में दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर से प्रकाशित भी हुआ। उसमें विस्तार से माताजी द्वारा प्रकटित विषयों का खुलासा करने का सुयोग मुझे प्राप्त हुआ। पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी की प्रेरणास्वरूप यह कार्य सम्पन्न हुआ।

मुझे अनुभव हुआ कि व्यस्तता के परिवेश में एवं अपेक्षित ज्ञानाभ्यास की न्यूनता की स्थिति में सभी लोगों को इसका सामान्य रूप से रसपान कराया जाये तो उपयोगी होगा। एतदर्थ उपर्युक्त अनुशीलन के सार रूप में यह आलेख प्रस्तुत है। इससे स्याद्वाद चन्द्रिका के मन्तव्य पर पाठक पहुँच सकेगा।

स्याद्वाद चंद्रिका में उद्देश्य व्यक्त करते हुए माताजी ने लिखा है कि इस कार्य से मेरी रत्नत्रय रक्षा एवं निर्दोष चर्या हो। वर्तमान में आचार्य कुन्दकुन्द द्वारा उपदेशित आचरण पर मैं चलूँ तथा अगले भव में मुनिव्रत धारण कर कुन्दकुन्द स्वामी के समान मेरी चर्या हो। इस कृति के अन्य प्रमुख उद्देश्य भव्य जीवों का हित सम्पादन, आत्मतत्व भावना, समभाव की स्थिरता एवं पूर्व आचार्यों के उपकार स्वरूप ऋणोद्धार, अज्ञान का निराकरण एवं अनेकांत की सिद्धिपूर्वक एकान्त नयाभास का निरसन भी है। पूर्व में आचार्य पद्मप्रभमलधारी देव द्वारा विरचित तात्पर्यवृत्ति टीका की अपेक्षा वर्तमानजनों के लिए उपयोगी सरल टीका की आवश्यकता ने उनको प्रस्तुत टीका ग्रंथ के भी प्रणयन हेतु प्रेरित किया था।</center>

स्याद्वाद चंद्रिका नामकरण

नियमसार ग्रंथराज उभनयान्ता जिनेश्वरी देशना के अनुरूप ही निश्चय और व्यवहार मोक्षमार्ग का निरूपक श्रमणपरक अध्यात्म शास्त्र है। इसमें मुनियों के लिए निश्चयनय की प्रधानता के निरूपण में कहीं पाठक एकान्त निश्चयाभासी दृष्टिकोण का दुराग्रही न हो जावे एतदर्थ उन्होंने प्रकट किया है कि यह ग्रंथ नियमरूपी कुमुद को विकसित करने के लिए चंद्रमा के उदय के समान है अत: यह नियम कुमुद चन्द्रोदय है अथवा यतिकैरव चन्द्रोदय है। इसमें पद-पद पर व्यवहार निश्चय नयों की, व्यवहार निश्चय क्रियाओं की और व्यवहार निश्चय मोक्षमार्ग की परस्पर में मित्रता होने से इसका विषय स्याद्वाद से सहित है। इसकी टीका चंद्रमा के उदय की चांदनी के समान शोभित हो रही है अत: यह ‘स्याद्वाद चन्द्रिका’ नाम से सार्थकता को प्राप्त है। यह टीका वस्तुत: अनेकांत स्याद्वाद की प्रकाशक अर्थात् सापेक्ष दृष्टि से वस्तु समूह को प्रकाशित करती है अत: यह अन्वर्थ संज्ञा है। यह टीका नय पक्ष से रहित एवं स्वरूप सम्बोधन हेतु मील का पत्थर है, इसके सम्यक् अनुशीलन से हम आत्मकल्याण के प्रयासों को तीव्रता और तीव्रतम बनाने में सफल हो सकते हैं। अक्षय तृतीया सन् १९७८ को प्रारंभ की हुई यह कृति व्यवधानों के कारण श्रुतपंचमी १९८४ को पूर्ण हुई थी। निरन्तरता की दृष्टि से यह कार्य १९ माह में पूर्ण हुआ, तदनन्तर संघस्थजनों ने समारोहपूर्वक वंदना कर पालकी में विराजमान कर उत्सव सम्पन्न किया था। नियमसार की विषयवस्तु का विवेचन एवं टीका का स्वरूप-

नियमसार में तीन महाधिकार हैं। १. व्यवहार मोक्षमार्ग महाधिकार, २. निश्चय मोक्षमार्ग महाधिकार, ३. मोक्ष महाधिकार। इन तीन विषयों को जीवाधिकार, अजीवाधिकार, शुद्धभाव या सम्यग्ज्ञान अधिकार, व्यवहार चारित्राधिकार और परमार्थ प्रतिक्रमण, निश्चय प्रत्याख्यान, परम आलोचना, शुद्ध निश्चय प्रायश्चित, परम समाधि, परम भक्ति, निश्यच परमावश्यक एवं शुद्धोपयोगाधिकार इन १२ अधिकारों में वर्णित किया गया है। टीकाकर्त्री ने कुल १८७ गाथाओं को ३७ अंतराधिकारों में सुसंगत एवं सुगठित स्वरूप प्रदान करते हुए नियम रत्नत्रय अथवा मोक्षमार्ग का वृत्ति रूप व्याख्यान कर विश्लेषणात्मक पद्धति का परिचय दिया है। जिस विषय को उठाया गया है तत्संबंधी प्राय: सभी प्रकरणों को समाहित करते हुए पूर्ण किया गया है। विवेचन में शब्दार्थ, नयार्थ, मतार्थ, आगमार्थ और भावार्थ की दृष्टि सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। अंतराधिकार निर्धारण कर कथ्य को और अधिक स्पष्ट करने का सर्वत्र प्रयास है।

प्रारंभ में मंगलाचरण और उद्देश्य प्रकाशन कर पूरे ग्रंथ की संक्षेप में भूमिका लिखित है। माताजी का कथन है कि पूर्वाचार्यों की परम्परा तथा नय विवक्षा का सर्वत्र ध्यान करना चाहिए, प्रकरणों को गुण स्थानों में घटित करना अधिक उपयोगी है। इस भावना के दर्शन हमें स्याद्वाद चंद्रिका के प्रत्येक स्थल पर होते हैं। अध्यात्म और आगम की मैत्री एवं दोनों का मन्तव्य प्रकाशित करना विवेचन की महती विशेषता है। उन्होंंने कहा है कि सातवें गुणस्थानवर्ती अप्रमत्त व प्रमत्त मुनियों के भी मोक्षमार्ग व्यवहारनय से ही है वह परम्परा के कारण है। निश्चयनय से तो अयोगकेवलियों का अंतिम समयवर्ती रत्नत्रय परिणाम ही मोक्षमार्ग है वह साक्षात् कारण है अथवा भावमोक्ष की अपेक्षा से अध्यात्म भाषा में क्षीणकषायवर्ती मुनि का अंतिम समयवर्ती परिणाम भी निश्चय मोक्षमार्ग है। चौथी भाषा की टीका में प्रकट किया गया है कि मोक्षमार्ग चौथे गुणस्थान में नहीं है, मात्र उसका एक अवयव सम्यग्दर्शन है। इसको प्रवचनसार के आधार से स्पष्ट भी किया है। (यहाँ संभवत: उस दृष्टिकोण को गौण किया है कि जिसमें सम्यग्दर्शन के साथ चौथे गुणस्थान में सम्यक्त्वाचरण चारित्र की विद्यमानता है)

विवेचना में न्यायविद्या का उपयोग अष्टसहस्री, न्यायकुमुदचंद्र आदि के आधार से नियमसार के अध्यात्म रहस्य को पुष्ट और स्पष्ट करने हेतु माताजी ने किया है। यह प्रत्येक जिनतत्व विद्या के अभ्यासी को विदित ही है कि जैन अध्यात्म, जैन दर्शन के मान्य सिद्धान्तों पर टिका है। दसवीं-ग्यारहवीं गाथा की व्याख्या में उन्होंने सिद्ध किया है कि जैनागम के सिवाय अन्य शास्त्र पूर्वापर विरोध सहित है तथा सर्वज्ञ के ज्ञान में भूत, भविष्यत् पदार्थ वर्तमान के समान झलकते हैं। क्रियावाद, अक्रियावाद, ज्ञानवाद, शून्यवाद, क्षणिकवाद, नित्यैकवाद आदि एकान्तिक मान्यताओं का निरसन ग्रंथ के अनेक स्थलों पर स्याद्वाद पद्धति से करके अनेकांत की स्थापना की है।

पूज्य माताजी टीकाक्षेत्र की सिद्धहस्त लेखिका हैं। किसी भी ग्रंथ की टीका हेतु जितनी योग्यताएँ उपेक्षित हैं उनका समावेश प्रस्तुत कृति में पाया जाता है। आचार्य जयसेन स्वामी ने समयसार, प्रवचनसार आदि ग्रंथों की तात्पर्यवृत्ति टीकाओं में एवं ब्रह्मदेव सूरि ने परमात्मप्रकाश एवं वृहद्द्रव्यसंग्रह में जो टीकाशैली अपनाई है एवं टीका नैपुण्य समाहित किया है वही रूप माताजी ने प्रस्तुत किया है अत: इसे वृत्ति रूप संज्ञा देना अनुचित न होगा। आचार्य पद्मप्रभमलधारी की भी कलश काव्यों को समन्वित करते हुए वृत्ति संज्ञा है, किन्तु वह सामान्य रूप से तात्पर्य और भावार्थ को प्रस्तुत करने रूप है। वह सामान्य रूप से ही अध्यात्म की प्रखर प्रस्तुति एवं प्रशंसनीय मूल टीका है। उससे भी और आगे बढ़कर उसके आधार को लिए हुए गणिनी आर्यिका ज्ञानमती कृत ‘स्याद्वाद चंद्रिका’ विशेष और अपेक्षाकृत सरल, सुपाच्य, सामान्यजनों को भी अवगत कराने रूप वर्णन करती है। नियमसार के मूल में गुप्त एवं अभीष्ट तत्वों को स्पष्ट करने में यह समर्थ है। विशेष यह है इसमें षट्खण्डागम और कषायपाहुड की स्वनामधन्य प्रात:स्मरणीय आचार्य वीरसेन स्वामी द्वारा रचित धवला एवं जयधवला टीकाओं की प्रश्नोत्तरपरक शैली तथा सिद्धांत प्रस्तुतीकरण शैली के भी दर्शन होते हैं। स्वयं ही प्रश्न उठाना व समाधान भी स्वयं करना मानो एक स्वभाव सा ही दृष्टिगोचर होता है। टीका के पारायण से ही इसके विषयविवेचन के गुणों को समग्र रूप से हृदयंगम किया जा सकता है।

स्याद्वाद चंद्रिका की भाषाशैली की विशेषताएँ

प्रस्तुत कृति भाषा व्याकरणसम्मत परिमार्जित है। इसमें पातनिका सहित व्याख्यान तथा अंतराधिकार वर्गीकरण किया गया है। संदर्भ प्रसंग रूप विशेष उत्थानिका व पुष्पिका के मध्य में गाथा की टीका प्रस्तुत की गई है। शैली सरल एवं सुबोध है। सान्वय शब्दार्थ तथा पदखण्डना सहित व्याख्यान की प्रणाली को अपनाया गया है। प्रसाद, प्रांजलता, प्रवाह एवं मा़धुर्य इसके प्रधान गुण हैं। आवश्यकता पड़ने पर समासित लम्बे पदों का समावेश आचार्य अमृतचंद्र सूरि की स्मृति दिलाता है। सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन की सूचना से यह समाविष्ट है। व्युत्पत्तियों की बहुलता से यह प्रखर पाण्डित्य की प्रकाशक है। अपेक्षाकृत संधियों का अधिक प्रयोग है। इसे विधिवत् तात्पर्यवृत्ति कहा जा सकता है। खण्डान्वय एवं दण्डान्वय सहित पदलालित्य स्पष्ट प्रकट है। सामान्य गद्यात्मक स्वरूप को धारण किये यह टीका विस्तार रूप से अर्थसूचन करती है। इसमें आचार्य पद्मप्रभ से कुछ अर्थान्तरता का भी सद्भाव है।४ जहाँ तात्पर्यवृत्ति मात्र मूल विषय केन्द्रित है तथा विशेष रूप से मुनिजन उपयोगी है वहीं स्याद्वाद चंद्रिका संबंधित विषयों के विस्तार को लिए हुए तथा श्रावकों के लिए भी उपयोगी है। स्वोपज्ञ हिन्दी अनुवाद विशेष सहायक है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी की रोचक शैली आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी के नियमसारविषयक मन्तव्य पर विस्तार से प्रकाश डालती है। यह शैली मृदु एवं मधुर स्वरूप को लिए हुए है यह सबको प्रिय अनुभूत होकर यथेष्ट अर्थ पर पहुुँचाती है। इससे पाठक को अपेक्षित दिशाबोध होता है।

उपयोगी विषयों का समावेश

द्रव्यानुयोग एवं चरणानुयोग समन्वित अध्यात्म ग्रंथ नियमसार के अंतर में गर्भित अनेक उपयोगी विषयों को स्पष्ट करने हेतु स्याद्वाद चंद्रिका में प्रयत्न स्पष्ट झलकता है। इसमें अनेक विषयों को समाविष्ट किया गया है। अपेक्षित सूची निम्नांकित है।

१. अध्यात्म २. मुख्य रूप से द्रव्य-गुण-पर्याय विषय विवेचन ३. सिद्धांत: प्रमुखतया कर्म सिद्धांत ४. दार्शनिक दृष्टि ५. अनेकांत एवं स्याद्वाद नय ६. गुणस्थान परिपाटी से प्रकरण पुष्टि ७. आगमिक परम्परा का निर्वाह ८. उद्धरण वैभव ९. शांतरस एवं मार्गदर्शन १०. भक्ति एवं विनय की प्रचुरता ११. शंका समाधान १२. आचरण पक्ष १३. प्रथमानुयोग आदि

स्याद्वाद चंद्रिका: स्वोपज्ञ हिन्दी सानुवाद टीका

पूज्य माताजी ने प्रस्तुत कृति का हिन्दी अनुवाद स्वयं लिखा है इसके साथ विशेषार्थ लिखा है, इससे यह अनुवाद टीका जैसा ज्ञात होता है। यह अत्यंत उपयोगी है। एक दृष्टि से तो यह स्याद्वाद चंद्रिका का अंग ही बनी हुई है। यह केवल संस्कृत टीका का अनुवाद मात्र नहीं है, वरन् इसमें विशेषताएँ हैं जिनके कारण ही यह सामान्यजनों को हृदयंगम करने हेतु आवश्यक सिद्ध हुई है। वर्तमान में प्राय: संस्कृत भाषा की अनभिज्ञता ही दृष्टिगत होती है अत: भाषानुवाद आवश्यक है जो कि इसमें सरल और आकर्षक शब्दों में समाविष्ट किया गया है। जैसे पूज्य आचार्य विद्यासागर जी के गुरु आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज ने अपने संस्कृत टीकाग्रंथों में स्वोपज्ञ, संस्कृत व हिन्दी भाषाटीका भी प्रस्तुत की है उसी प्रकार माताजी ने अनिवार्यता अनुभव कर यह कार्य किया है। वास्तव में लेखक ही अपने विचारों का मूल ज्ञाता होता है अत: वही अपनी रचना का हार्द्र अधिक भली प्रकार से खोल सकता है अत: यह टीका भी जो कि स्याद्वाद चंद्रिका में ही साथ प्रकाशित हुई है सहायक के रूप में विशेष कही जावेगी। एक स्थल दृष्टव्य है-

‘‘भावार्थ-मार्गणादि का विस्तार गोम्मटसार जीवकाण्ड आदि ग्रंथों से समझ लेना चाहिए। वास्तव में गोम्मटसार के जीवकाण्ड और कर्मकाण्ड का अच्छी तरह से स्वाध्याय कर लेने पर ही नियमसार आदि अध्यात्म ग्रंथों का अर्थ ठीक से समझ में आ सकता है।’’ उपर्युक्त आशय को पुष्ट करने हेतु यहाँ गोम्मटसार की पं. प्रवर टोडरमल कृत ‘सम्यग्ज्ञान चंद्रिका’ टीका के मंगलाचरण का एक दोहा प्रस्तुत करना उपयोगी रहेगा-

लब्धिसार को पाइकै करिकै क्षपणासार।
हो है प्रवचनसार सों समयसार अविकार।।

इस स्याद्वाद चंद्रिका के हिन्दी अनुवाद की उपयोगिता समझते हुए आवश्यकता है, स्वाध्याय की रुचि बढ़ाकर उससे अनेकांतमय दृष्टिकोण रूप लाभ प्राप्त करने की। वर्तमान में सारे समय और स्वाध्याय रुचि को पश्चिमी जगत की अथवा भौतिक विज्ञान की साधना पूर्णतारूप संस्कृति के परिवेश में दूरदर्शन आदिगत विकार खा रहे हैं। इससे बचकर हम इन ज्ञानकृतियों का आनंद उठाकर सुख शांति प्राप्त कर सकते हैं।

कतिपय उद्धरण

अभी यहाँ हम अपनी बात न कहकर सीधे ‘स्याद्वाद चंद्रिका’ में प्रकट माताजी के सारस्वत विचारों को मूल रूप में प्रस्तुत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं। दृष्टव्य है, कतिपय स्थल।

‘जो अण्णवसो ण हवदि’-पिच्छि कमण्डलु मात्र परिकरो सहितो या महातपोधनोऽन्येषां पञ्चेषन्द्रियविषयाणां कषायाणां च वशे न भवति स एवानन्यवश:। ‘तस्स द्र कम्भं आवासं भणन्ति’-तस्य महामुनेऽस्तु कर्मक्रियाप्रवृत्तिश्च आवश्यकमिति भणन्ति। के ते भणन्ति? श्री गौतमप्रभृतिगणधर देवा:।.....इभाश्च व्यवहारक्रियाभि: साध्यानिश्चयावश्यकक्रिया एवं कर्मविनाशनकुशलास्ततो मोक्षमार्गोऽपि ता एव ‘ज्ञि पिज्जुत्तो’-इत्यनेनप्रकारेण गणधरादिदेव: प्ररूपितो न च रथ्यापुरुषे: समासितदीर्घ वाक्यावली-

‘‘वचनारचनारूपद्रव्य प्रतिक्रमणविवर्जित रागादिभावरहितव्रतविराधनारहित स्वशुद्धाराधना परिणतानाचारविवर्जितयत्याचार परिणतोन्मार्गरहितजिनमार्गस्थित त्रिशल्यविवर्जित नि:शल्यभावस्थितागुप्ति.............स्वरूपोऽहम्’’।

शंका समाधान स्थल

१.शंका-जीव द्रव्य तो त्रिकाल में ध्रुव शुद्ध है, उसकी गुण पर्यायें ही अशुद्ध हैं इसलिये द्रव्यार्थिक नय से जीव शुद्ध है और पर्यायर्थिक नय से अशुद्ध है ऐसा कहना चाहिए?

समाधान-आर्षग्रंथों में ऐसा नहीं सुना जाता है किन्तु ‘गुण और पर्यायों वाला ही द्रव्य है’, ऐसा सूत्र का वचन है (गुणपर्ययवद्द्रव्यं) इसका अर्थ है कि गुण-पर्यायों का समूह ही द्रव्य है। पुन: द्रव्य तो तीनों काल शुद्ध रहे और उसकी गुण पर्यायें अशुद्ध रहें यह कैसे संभव है क्योंकि गुण-पर्यायों के बिना तो द्रव्य का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं होगा इसलिए जब अथवा जिस नय से द्रव्य शुद्ध है तब अथवा उसी नय से गुणपर्यायें भी शुद्ध होंगी। इस कथन से जाना जाता है कि शुद्ध द्रव्यार्थिक और शुद्ध पर्यायार्थिक इन दोनों नयों से सभी संसारी जीव सिद्धों के समान अशुद्ध द्रव्यार्थिक नय से तथा अशुद्ध पर्यायार्थिक नय से संसारी जीव अशुद्ध है, उसकी गुण पर्यायें भी अशुद्ध ही हैं।

२. शंका-जैसे आपने सर्व पापोपयोग रूप से निवृत्ति रूप अभेदचारित्र को मुनियों में पहले मानकर तदनन्तर भेद चारित्र माना है वैसे ही श्रावकों को भी पहले निश्चय रत्नत्रय हो जावे, इसके बाद रत्नत्रय होवे, क्या हानि है?

समाधान-ऐसा नहीं मानना, यह असंभव है क्योंकि सिद्धांत शास्त्र में सुना जाता है कि सातवें गुणस्थान से छठा होता है किन्तु प्रथम, चतुर्थ या पाँचवें गुणस्थान से नहीं होता है और वैसा चतुर्थ, पंचम गुणस्थान के विषय में नहीं है बल्कि व्यवहार चारित्र का ही एकदेशरूप श्रावकों का चारित्र है।

उपर्युक्त उद्धरणों से ज्ञात होता है कि टीकाकर्त्री ने अत्यंत वैदुष्य के साथ नियमसार का हार्द स्पष्ट किया है।

किसी ग्रंथ की टीका करने में टीकाकार को परिश्रम, शोध, शब्द और अर्थ के तात्पर्य की ओर ध्यान देना पड़ता है वह अत्यंत कष्टसाध्य है। पुनश्च संस्कृत टीका करना तो और भी कठिन कार्य है। सभी प्रकार से अर्थ एवं मूल ग्रंथकार के अभिप्राय को समझना पड़ता है ।‘स्याद्वाद चंद्रिका’ पर दृष्टि डालने से विदित होता है कि वे सभी गुण इसमें हैं जो प्रबुद्ध टीकाकार की लेखनी से प्रकट किये जाते हैं। ज्ञातव्य है कि पूज्य माताजी ने अष्टसहस्री जिसे कष्टसहस्री की संज्ञा दी जाती है उसका प्रथम हिन्दी अनुवाद करके ‘लोहे के चने चबाने’ की कहावत चरितार्थ की है तथा वर्तमान में षट्खण्डागम की संस्कत भाषा में ‘सिद्धांत चिन्तामणि’ टीका का प्रणयन करने में दधीचि के समान संलग्न हैं। यह विशेष है कि नियमसार की इस संस्कृत टीका ने महिला समाज को एक उच्चासन पर विराजमान किया है। यह टीका नारी के मस्तक की टीका के समान सुशोभित होगी। प्रस्तुत आलेख में यत्र-तत्र से लेकर कतिपय विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है। उद्देश्य यह है कि इसके रसास्वादन हेतु यह ग्रंथ निरन्तर स्वाध्याय का विषय बनाया जावे। ६९ ग्रंथों के उद्धरणों से युक्त तथा जैनदर्शन एवं आचार की प्ररूपक इस महान कृति की जितनी प्रशंसा की जाये थोड़ी है। अंत में पूज्य गणिनी आर्यिका ज्ञानमती द्वारा रचित प्रस्तुत स्याद्वाद चंद्रिका टीका में उनके द्वारा समाहित स्वरचित श्लोकों में से अंतमंगल रूप श्लोक लिखकर विराम लेता हूँ।

वन्दे वागीश्वरीं नित्यं जिनवक्त्राम्बुज निर्गताम्।
वाक्शुद्ध्यै नयसिद्ध्यै च स्याद्वादामृत गर्भिणीम्।।

संदर्भ सूची

१. नियमसार प्राभृत, स्याद्वाद चंद्रिका टीका सहित, आ.कुन्दकुन्द-टीकाकार-गणिनी आ.ज्ञानमती, दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर, १९८५, प्रशस्ति-२३ वां श्लोक २. वही, पृ. ५५३ ३. वही, गाथा सं. ४ की टीका ४. वही गाथा ३९ व ५३ ५. जयोदय एवं वीरोदय आचार्य ज्ञानसागर, आचार्य ज्ञानसागर वागार्थ विमर्श केन्द्र, ब्यावर ६. संदर्भ-०१, गाथा ७८, पृ. २३४ ७. वही, गाथा १६७-६८ ८. वही, गाथा ८९ पृ. २६९ ९. मंगलाचरण, श्लोक-२ प्राप्त : १३.०३.२००६

शिवचरणलाल जैन, मैनपुरी