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प्रशान्तमूर्ति आचार्य श्री वीरसागर

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प्रशान्तमूर्ति आचार्य श्री वीरसागर

-गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी
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इस भारत वसुन्धरा पर समय-समय पर अनेकों रत्नों ने जन्म लेकर इस धरा को अलंकृत किया है। उनमें से एक श्रेष्ठरत्न श्री आचार्य वीरसागर जी महाराज हो चुके हैं, जिनसे मैंने आर्यिका दीक्षा को प्राप्त कर महाव्रत से अपने जीवन को पवित्र बनाया है। हैदराबाद राज्य के अन्तर्गत एक औरंगाबाद शहर है, जहाँ पर जैनधर्म के प्रेमी श्रावकगण हमेशा धर्म कार्यों में सक्रिय भाग लिया करते हैं। उसी जिले के अन्तर्गत एक ‘ईर’ नाम का ग्राम है जो छोटा सा ग्राम होते हुए भी ‘‘वीरसागर आचार्य’’ जैसी महान् आत्मा को जन्म देने के निमित्त से स्वयं भी महान बन गया है। इस पवित्र सुन्दर ग्राम में श्रावक शिरोमणि सेठ ‘रामसुख’ जी निवास करते थे जो कि ‘खंडेलवाल’ जाति के भूषण गंगवाल गोत्रीय थे। उनकी धर्मपत्नी ‘भागू बाई’ भी पति के अनुरूप धर्मात्मा और सती पतिव्रता थीं। उभय दम्पत्ति सदैव धर्माराधन में अपना काल व्यतीत करते थे।

महिलारत्न भागूबाई ने सबसे प्रथम एक पुत्ररत्न को जन्म दिया, वह गुलाब के सुन्दर पुष्प सदृश अपनी यश सुरभि पैâलाने वाला था इसलिए माता-पिता ने उसका नाम ‘गुलाबचंद’ रख दिया। कुछ दिन बाद माता भागूभाई ने सौभाग्य से स्वप्न में एक उत्तम बैल देखा उस समय उनके उदर में होनहार पुण्यशाली सूरिवर्य वीरसागर का जीव आ गया था। गर्भवती माता ने जिनेन्द्रदेव की पूजन, तीर्थों की वंदना आदि करते हुए अपनी भावनाएं सफल की थीं। विक्रम संवत् १९३३ सन् १८७६ में आषाढ़ सुदी पूर्णिमा के दिन माता ने चन्द्रमा की चांदनी के समान अपने गुणों की उज्ज्वलतारूपी चन्द्रिका सर्वत्र छिटकाने वाले ऐसे एक क्रम से द्वितीय किन्तु अद्वितीय पुत्ररत्न को जन्म दिया। गंगवाल वंश को अलंकृत करने वाले हीरारत्न के सदृश ऐसे इस बालक का नामकरण ‘‘हीरालाल’’ किया गया। माता-पिता और समस्त परिवार के हर्षरूपी समुद्र को वृद्धिंगत करते हुए इस बालक ने आठ वर्ष की शैशव अवस्था में प्रवेश किया। पिता ने विधिवत् उपनयन संस्कार से बालक को संस्कारित कराके रत्नत्रय का चिन्ह स्वरूप ऐसा यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करा दिया और शुभ मुहूर्त में पाठशाला भेजकर विद्याध्ययन कराया। बालक हीरालाल पाठशाला में सभी बालकों में होशियार थे। वे हिन्दी और उर्दू इन दोनों भाषाओं को पढ़ते थे। सप्तम कक्षा तक पढ़कर घर में आ गये और पिता ने इन्हें व्यापार कार्य में लगा दिया। जब बालक हीरालाल यौवन अवस्था में आये तब पिता ने विवाह के लिए सोचा किन्तु युवक हीरा ने सर्वथा इंंकार कर दिया तथा विरक्त चित्त होते हुए ग्रंथों का स्वाध्याय करने लगे।

वि.सं. १९७३-सन् १९१६ में औरंगाबाद के निकट कचनेर नामक अतिशय क्षेत्र में धार्मिक पाठशाला खोलकर हीरालाल जी बालकों को धार्मिक शिक्षण देने लगे, पुन: औरंगाबाद में भी एक विद्यालय खोलकर उन्होंने धार्मिक अध्ययन कराया। दोनों जगह इन्होंने अवैतनिक अध्ययन कराया था और उस प्रान्त में सभी के द्वारा गुरुजी कहे जाने लगे थे। वि. संवत् १९७८-सन् १९२१ में नांदगांव में ऐलक श्री पन्नालाल जी का चातुर्मास हुआ था। आप वहां पहुँचकर आषाढ़ सुदी ग्यारस के दिन ऐलक जी से सप्तम प्रतिमा के व्रत ग्रहण कर ब्रह्मचारी कहलाये थे। पुन: आपने नांदगांव के एक श्रावक खुशालचंद को सप्तम प्रतिमा के व्रत दिये थे। आप दोनों ब्रह्मचारी का परस्पर में अत्यधिक प्रेम था। आपने घी, नमक, तेल और मीठे का यावज्जीवन के लिए त्याग कर दिया था।

वि.सं. १९७९-सन् १९२२ में आपने कोन्नूर में विराजमान श्री आचार्यवर्य चारित्रचक्रवर्ती शांतिसागर जी के दर्शन किये और उनके तप त्यागमयी जीवन से प्रभावित होकर गुरुदेव के पास दीक्षा लेने का निश्चय कर लिया। सम्वत् १९८०-सन् १९२३ में फाल्गुन सुदी सप्तमी के दिन गुरुदेव ने उभय ब्रह्मचारी को क्षुल्लक दीक्षा प्रदान कर दी। ब्र. हीरालाल का नाम ‘वीरसागर’ और ब्र. खुशालचंद का ‘चन्द्रसागर’ नाम रखा। पुन: वि. सं. १९८१-सन् १९२४ में समडोली नगर में आचार्यश्री का चातुर्मास हुआ, उस समय आपने गुरुदेव से परम दिगम्बर वेश की याचना करते हुए लंगोटी और चादर का त्याग करके मुनिव्रत धारण कर लिया और आप आचार्य श्री के मुनियों में प्रथम शिष्य कहलाए। आपने मुनि दीक्षा के बाद आचार्यश्री के साथ विहार करते हुए श्रवणबेलगोल, गिरनार, सम्मेदशिखर, हस्तिनापुर, अयोध्या आदि अनेक तीर्थों की वंदना की थी।

आचार्यश्री के साथ आपने १२ चातुर्मास किये हैं। उन गांवों के नाम-बाहुबलि, कुम्भोजनगर, समडोली, बड़ी नांदनी, कटनी, मथुरा, ललितपुर, जयपुर, ब्यावर, प्रतापगढ़, उदयपुर तथा देहली शहर इन प्रमुख स्थानों में संघ सहित आचार्यश्री शांतिसागर जी ने चातुर्मास किये थे। अनन्तर किसी समय आचार्यदेव ने सभी शिष्यों को बुलाकर धर्मप्रभावना हेतु यत्र-तत्र विहार करने की आज्ञा दी। उस समय संघ में वीरसागर, नेमिसागर, कुंथुसागर, सुधर्मसागर, पायसागर, नमिसागर, श्रुतसागर, आदिसागर, अजितसागर, विमलसागर और पाश्र्वकीर्ति इन नाम वाले ग्यारह साधु थे। यद्यपि गुरु-वियोग किसी को इष्ट नहीं था फिर भी सभी ने गुरुदेव की आज्ञानुसार अन्यत्र विहार किया था। उस काल में प्रमुख शिष्य मुनिवर श्री वीरसागर जी ने आदिसागर और अजितसागर को साथ में लेकर गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करके विहार कर दिया और वि. सं. १९९२ सन् १९३५ में सबसे प्रथम चातुर्मास गुजरात के ‘ईडर’ शहर में किया। उस समय सभी साधुओं के विहार कर जाने के बाद भी मुनिश्री नेमिसागर जी आचार्यश्री के सानिध्य में ही रहे थे।

अनेक गांवों में विहार करते हुए आपने अनेक शिष्यों को क्षुल्लक, ऐलक, मुनि बनाया तथा अनेकों महिलाओं को आर्यिका और क्षुल्लिका के व्रत प्रदान किये। वि. सं. १९६५ में इंदौर चातुर्मास में आपने अपने गृहस्थाश्रम के बड़े भाई गुलाबचंद्र को सप्तम प्रतिमा के व्रत दिये थे। आगे जाकर वे दसमी प्रतिमाधारी उत्कृष्ट श्रावक प्रसिद्ध हुए थे। विक्रम संवत् २००० में आप खातेगांव चातुर्मास करके सिद्धवर कूट क्षेत्र आये। वहां पर औरंगाबाद के अन्तर्गत अड़गांव के निवासी खण्डेलवाल जाति में जन्म लेने वाले ऐसे रांवका गोत्रीय हीरालाल को क्षुल्लक दीक्षा प्रदान की और उनका शिवसागर नाम रखा। आगे ये ही मुनि होकर आचार्य वीरसागर के प्रथम शिष्य बने एवं आचार्यश्री के आचार्यपद को प्राप्त करके द्वितीय पट्टाचार्य पद पर सुशोभित हुए हैं।

सन् १९५५ में कुंथलगिरि क्षेत्र में आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज ने चातुर्मास किया था। उसी चातुर्मास में आपने यम सल्लेखना ग्रहण करके अपने प्रथम शिष्य श्री वीरसागर जी मुनिराज को सुयोग्य समझकर उन्हें अपना आचार्यपद दिया था। उस समय आचार्यश्री ने जयपुर समाज को आज्ञापत्र और श्री वीरसागर मुनिराज को आचार्य पद प्रदान पत्र ऐसे दो पत्र भिजवाये थे। जयपुर खानिया में वीरसागर मुनिराज ने ससंघ चातुर्मास किया था। आचार्यश्री द्वारा लिखाया गया समाज को पत्र- कुंथलगिरि ता.-२४-८-५५ स्वस्ति श्री सकल दिगम्बर जैन पंचान जयपुर धर्मस्नेह पूर्वक जुहारू। अपरंच आज प्रभात में चारित्रचक्रवर्ती १०८ परमपूज्य श्री शांतिसागर जी महाराज ने सहस्रों नर-नारी के बीच श्री १०८ मुनिराज वीरसागर जी महाराज को आचार्य पद प्रदान करने की घोषणा कर दी है। अत: उस आचार्यपद प्रदान करने की नकल साथ भेज रहे हैं। उसे चतुर्विध संघ को एकत्रित कर सुना देना। विशेष आचार्य महाराज ने यह भी आज्ञा दी है कि आज से धार्मिक समाज को इन्हें-श्री वीरसागर जी महाराज को आचार्य मानकर इनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। लि. गेंदमल, बम्बई लि. चन्दूलाल ज्योतिचंद, बारामती आचार्यपद प्रदान का समारोह दिवस भाद्रपद कृष्णा सप्तमी, गुरुवार निश्चय किया गया था। विशाल प्रांगण में सहस्रों नर-नारियों के बीच श्री वीरसागर जी मुनिराज को गुरुदेव द्वारा दिया गया आचार्य पद प्रदान किया गया था। उस समय पंडित इंद्रलाल जी शास्त्री ने गुरुदेव द्वारा भिजवाये गये आचार्यपद प्रदान पत्र को सभा में पढ़कर सुनाया गया, जो कि निम्न प्रकार है- कुंथलगिरि ता. २४-८-१९५५ स्वस्ति श्री चारित्रचक्रवर्ती १०८ आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की आज्ञानुसार यह आचार्यपद प्रदान पत्र लिखा जाता है। ‘‘हमने प्रथम भाद्रपद कृष्णा ११, रविवार, ता.२४-८-५५ से सल्लेखना व्रत लिया है। अत: दिगम्बर जैन धर्म और श्री कुन्दकुन्दचार्य परम्परागत दिगम्बर जैन आम्नाय के निर्दोष एवं अखंडरीत्या संरक्षण तथा संवर्धन के लिए हम आचार्यपद प्रथम निग्र्रन्थ शिष्य श्री वीरसागर जी मुनिराज को आशीर्वादपूर्वक आज प्रथम भाद्रपदशुक्ला सप्तमी विक्रम संवत् दो हजार बारह बुधवार के प्रभात के समय त्रियोग शुद्धिपूर्वक संतोष से प्रदान करते हैं।’’ आचार्य महाराज ने श्री पूज्य वीरसागर जी महाराज के लिए इस प्रकार आदेश दिया है। इस पद को ग्रहण करके तुमको दिगम्बर जैनधर्म तथा चतुर्विधसंघ का आगमानुसार संरक्षण तथा संवर्धन करना चाहिए। ऐसी आचार्य महाराज की आज्ञा है। आचार्य महाराज ने आपको शुभाशीर्वाद कहा है। इति वर्धताम् जिन शासनम् लिखी-गेंदमल बम्बई-त्रिबार नमोस्तु लिखी-चंदूलाल ज्योतिचंद बारामती-त्रिबार नमोस्तु

उपर्युक्त आचार्यपद प्रदान पत्र पढ़ने के बाद श्री शिवसागर जी मुनिराज ने उठकर पूज्य श्री आचार्य शांतिसागर जी द्वारा भेजे गये पिच्छी एवं कमण्डलु को श्री पूज्य वीरसागर जी मुनिराज के करकमलों में प्रदान किया। सर्वत्र सभा में आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज की जयकार गूंज उठी। इसके पूर्व श्री वीरसागर जी ने कभी भी अपने को आचार्य शब्द से संबोधित नहीं करने दिया था। वुंâथलगिरि में आचार्यश्री शांतिसागर जी की सल्लेखना देखकर तथा म्हसवड़नगर महाराष्ट्र में चातुर्मास पूर्णकर वहां से छह प्रतिमाधारिणी सौ. सोनाबाई एवं दश प्रतिमाधारिणी कु. प्रभावती को साथ लेकर मैं१ जयपुर में आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज के चरण सानिध्य में आ गई। वुंâथलगिरि चातुर्मास के पूर्व बारामती में मैंने आचार्यश्री शांतिसागर जी से आर्यिका दीक्षा देने की प्रार्थना की थी। उस समय आचार्यश्री ने यह कहा था कि तुम श्री वीरसागर जी के संघ में जाकर उन्हीं से आर्यिका दीक्षा लेओ। आचार्यश्री ने मुझसे पढ़े हुए और स्वाध्याय किये हुए ग्रंथों के नाम पूछे। मैंने भगवती आराधना, परमात्म प्रकाश, गोम्मटसार, कातंत्र रूपमाला, अमरकोष आदि नाम बताये। महाराज जी बहुत ही प्रसन्न हुए। पुन: उन्होंने कहा कि तुम अनगार धर्मामृत, मूलाचार और समयसार इन तीनों ग्रंथों का अच्छी तरह से मनन करो। इस प्रकार से मैंने गुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य कर क्षुल्लिका विशालमती माताजी के साथ म्हसवड़ गांव में चातुर्मास किया। वहां से गुरुदेव की सल्लेखना के प्रसंग पर मैं वुंâथलगिरि क्षेत्र पर एक महीना तक रही थी।

विक्रम सं. २०१३ वैशाख वदी द्वितीया के दिन जयपुर के निकट माधोराजपुरा ग्राम में मध्यान्हकाल में गुरुदेव आचार्य श्री वीरसागर महाराज के करकमलों द्वारा मेरी आर्यिका दीक्षा का कार्यक्रम चल रहा था। इसी बीच में तमाम भीड़ को चीरते हुए एक सांड वहाँ आ गया। सभी दर्शकगण और व्यवस्थापकगण भी घबरा गये किन्तु वह सीधा आचार्यश्री के सम्मुख स्टेज के पास आकर खड़ा हो गया और शांतभाव से गुरुदेव के सामने मस्तक टेक दिया। इस आकस्मिक घटना को भक्त लोेगों ने चमत्कार के रूप में ही समझा था। आचार्यश्री ने उस बैल को आशीर्वाद दिया और जनता ने उसे लड्डू खिलाया।

मुझे आचार्यश्री वीरसागरजी ने कई बार यह कहा था कि देखो मैंने तुम्हारा क्या नाम रखा है उस नाम का हमेशा ध्यान रखो बस तुम्हें हमारा इतना ही उपदेश है। आचार्यश्री में अगणित गुण थे। वे धीर, वीर और परम गंभीर थे, मित भाषी थे प्राय: सूत्र रूप वाक्य बोलते थे। उनके कुछ उदाहरण देखिए- १. ‘‘जिसने सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र की वंदना नहीं की, श्रवणबेलगोल में स्थित भगवान बाहुबली की अतिशय मनोज्ञ मूर्ति के दर्शन नहीं किए और गुरुओं में आचार्यश्री शांतिसागर जी के दर्शन नहीं किये उसने कुछ नहीं किया।’’ मनुष्य जन्म को पाकर व्यर्थ ही गवां दिया। अर्थात् तीर्थों में सम्मेदशिखर, मूर्तियों में श्रवणबेलगोल में स्थित भगवान बाहुबली की मूर्ति और गुरुओं में आचार्य शांतिसागर जी महाराज सर्वश्रेष्ठ महान् हैं। सचमुच में गुरुवर्य वीरसागर जी महाराज की गुरुभक्ति अलौकिक थी। २. ‘‘सुई का काम करना केची का काम नहीं करना।’’ अर्थात् सुई जैसे अनेकों वस्त्रों को जोड़कर एक कर देती है, वैसे ही संगठन की नीति को ग्रहण करना किन्तु केची के समान टुकड़े-टुकड़े नहीं करना, तोड़-फोड़ की नीति से दूर रहना और इसी प्रकार गुरुदेव ने स्वयं मात्र परोपदेशक ही न होते हुए क्रियान्वित करके दिखाया भी है। ३. ‘‘तृण मत बनो पत्थर बनो।’’ पाश्चात्य हवा के झकोरे में जो तृणवत् हलके हैं, अस्थिर बुद्धि के हैं वे बह जाते हैं किन्तु जो पत्थर के समान अचल हैं, जिनवाणी के दृढ़ श्रद्धालु हैं, वे अपने स्थान पर एवं सम्यक्त्व में अचल रहते हैं, और वे गुरुदेव स्वयं भी अचल रहे तथा अपने शिष्यों को भी आगम मार्ग में अचल रखा। ४. कभी-कभी महाराज जी कहा करते थे कि ‘‘मुझे दो रोग हैं एक तो भूख लगती है और दूसरे नींद आती है।’’ अर्थात् जिनके ये दो रोग समाप्त हो जावेंगे वे संसारी ही नहीं रहेंगे बल्कि मुक्त कहलायेंगे। अत: इन्हीं दो रोगों के नष्ट करने का उपाय करना चाहिए। ५. ‘‘अपने दीक्षा दिवस को कभी मत भूलो’’ अर्थात् दीक्षा के समय परिणामों की उज्ज्वलता विशेष रहती है इसलिए उस दिवस के उज्ज्वल भावों को हमेशा याद रखने वाला साधु कभी भी अपने पद से च्युत नहीं हो सकता है और उत्तरोत्तर चारित्र की वृद्धि ही होती है। ऐसे अनेकों सूत्ररूप वाक्य हैं। आचार्यश्री को मृगी का रोग था, जब उसका असर होता था उस समय वे ‘‘सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्ग:’’ इत्यादि सूत्रों को उच्च स्वर से बोलते हुए उनका अर्थ करने लगते और उपदेश देने लगते थे। तब पास में बैठे हुए साधुओं को अनुमान होता था कि आचार्यश्री को इस समय दौरे का प्रकोप है। कभी-कभी वे उच्चस्वर में महामंत्र का जाप्य करने लगते थे, तब यह निर्णय हो जाता था कि आचार्यश्री को मृगी का प्रकोप हो रहा है। कहने का मतलब यह है कि आचार्यश्री के स्वाध्याय और जाप्य के संस्कार इतने विशेष थे कि मूर्छित अवस्था में भी वे काम किया करते थे। वे धवला की पुस्तकों का स्वाध्याय दिन भर किया करते थे। एक बार उन्होंने कहा कि इन ग्रंथों के बहुत से विषयों को मैं समझ नहीं पाता हूँ फिर भी धवला की प्रथम पुस्तक में यह लिखा है कि स्वाध्याय के समय असंख्यात गुणित रूप से कर्मों की निर्जरा होती है इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैं सतत इन ग्रंथों का स्वाध्याय करता रहता हूँ। शुद्धोपयोगरूप वीतराग निर्विकल्प समाधि में स्थित नहीं रह सकने वाले साधुओं के लिए श्री कुन्दकुन्ददेव ने कहा है कि-

'दसंणणाणुवदेसो, सिस्सग्गहणं च पोषणं तेसिं।
चरिया य सरागाणं, जिणिंदपूजोवदेसो य।।२४८।। प्रव.।।

सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान का उपदेश, शिष्यों का ग्रहण तथा उनका पोषण और जिनेन्द्रदेव की पूजा का उपदेश वास्तव में सरागियों की (आचार्यों की) चर्या है। शिष्यों का संग्रह और उनका पोषण आदि करना ये सब गुण आचार्यश्री वीरसागर जी में विद्यमान थे। श्री कुन्दकुन्दचार्य ने मूलाचार में बताया है कि आर्यिकाओं के ऊपर अनुशासन करने वाले, उन्हें शिक्षा, प्रायश्चित्त आदि देने वाले आचार्य कैसे होते हैं-

'पियधम्मो दिढधम्मो संविग्गो वज्जभीरु परिसुद्धो।

संगहणुग्गह कुसलो सददं सारक्खणाजुत्तो।।
गंभीरो दुद्धरिसो मिदवादी अप्पको दुहल्लो य।
चिरपव्वइदो गिहिदत्थो अज्जाणं गणधरो होदि।।
एवं गुणवदिरित्तो जदि गणधारित्तं करेदि अज्जाणं।

चत्तारि कालगा से गच्छादि विराहणा होज्ज।।

जिसको धर्म प्रिय है, जो धर्म में दृढ़ है, धर्म और धर्मफल में उत्साह युक्त है, पापों से भयभीत है और जिसका चारित्र अखंडित है, जो शिष्यों के संग्रह और उनके अनुग्रह में कुशल है तथा सतत पाप क्रियाओं की निवृत्ति से युक्त है, गंभीर स्थिर मन वाला, मितवादी, अल्पकुतूहली चिरकाल का दीक्षित, पदार्थों के स्वरूप को जानने वाला है, वही आर्यिकाओं का गणधर-आचार्य होता है। इन गुणों से व्यतिरिक्त जो मुनि आर्यिकाओं के गणधर बनते हैं उनके गणपोषण, आत्म संस्कार, सल्लेखना और उत्तमार्थ ऐसे चार काल नष्ट हो जाते हैं और गच्छ आदि की विराधना हो जाती है।

इन मूलाचार की गाथाओं के अनुसार आचार्यश्री में उपर्युक्त सभी गुण विद्यमान थे। वे आर्यिकाओं को उचित शिक्षा देते थे। संघ में जो प्रमुख योग्य और कुशल आर्यिका होती थी उन्हीं के ऊपर उनके निकट रहने वाली आर्यिकाओं का भार रहता था। गुरुदेव इन छोटी नव दीक्षिता आर्यिकाओं को गुर्वानी आर्यिका के अनुशासन में ही रहने का उपदेश देते थे। उदाहरण स्वरूप भाद्रपद के प्रारंभ में क्षुल्लिका पद्मावती जी एक महीने सोलह कारण व्रत करते हुए एकांतर उपवास करती थीं। उन्होंने मेरी आज्ञा ले ली। श्रावण पूर्णिमा को आहार करके गुरुदेव के पास जाकर सोलहकारण व्रत की याचना की। तब आचार्यश्री ने कहा कि अपनी गुर्वानी को लेकर आवो। उन्होंने कहा कि मैं आज्ञा लेकर आई हूँ फिर भी आचार्यश्री ने उन्हें वापस कर दिया, जब मैंने उनके साथ जाकर आचार्यश्री से व्रत देने का निवेदन किया, तब उन्होंने क्षुल्लिका पद्मावती को व्रत दिया और पुन: यह शिक्षा दी कि जीवन में प्रत्येक कार्य गुर्वानी की आज्ञा से ही करना और हमारे पास व्रत या प्रायश्चित्त आदि ग्रहण करने के लिए गुर्वानी को आगे करके ही आना। ऐसे ही अनेकों उदाहरण हैं जिससे आर्यिकाओं के संघ की मर्यादा और व्यवस्था आगमानुकूल रहती है।

अंत में मैं ऐसे आचार्यश्री के गुणों का स्मरण करते हुए उनकी ५०वीं पुण्यतिथि के पुण्य अवसर पर उनके पवित्र चरण कमलों में अपनी भक्ति के श्रद्धा सुमन अर्पित करती हुई उन्हें कोटि-कोटि नमस्कार करती हूँ।