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गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ टिकैतनगर बाराबंकी में विराजमान हैं |

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बाराबंकी

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आचार्यों द्वारा कथित यह श्लोक महापुरुषों की चरणरज से पवित्र भूमियों के लिए अत्यन्त सटीक है-

यत्रापि कुत्रापि भवंति हंसा:, हंसा: मही-मंडलमंडनानि।

हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां, येषां मरालै: सह विप्रयोग:।।

अर्थात् मानसरोवर के कारण हंस को गौरव नहीं मिलता है, हंस के कारण मानसरोवर सन्मान का पात्र बनता है। हंस जहाँ भी रहता है, वही स्थल महत्त्वपूर्ण बनता है। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की जन्मभूमि टिकैतनगर से लगभग ६० किमी. दूर एवं लखनऊ राजधानी से २० किमी. दूर स्थित बाराबंकी शहर उस समय अधिक प्रसिद्धि में आया जब उसी अवध प्रान्त के टिकैतनगर में जन्मी एक १८ वर्षीय कु. मैना ने बीसवीं शताब्दी में प्रथम बार सन् १९५२ में शरदपूर्णिमा की पावन तिथि में आचार्यरत्न श्री देशभूषण महाराज से ब्रह्मचर्यव्रत लेकर न सिर्पक अपने त्यागमयी जीवन का प्रारंभीकरण किया अपितु कुमारिकाओं के लिए त्यागमार्ग की परम्परा को प्रादुर्भूत करके उसे संसार के क्षितिज पर स्थापित कर दिया। जिसके फलस्वरूप वर्तमान में हमें सैकड़ों बाल ब्रह्मचारिणी आर्यिका माताओं के दर्शन सुलभतया हो रहे हैं। पूज्य माताजी ने छोटी सी उम्र में उस समय घर-कुटुम्बीजनों एवं समाज का संघर्ष झेलकर शास्त्रीय उद्धरण प्रस्तुत करते हुए व्रत लेने हेतु त्यागमार्ग को अंगीकार करने हेतु अपनी माता मोहिनी से जिस प्रकार स्वीकृति करवाई, वह इस स्थल का गौरवमयी ऐतिहासिक पृष्ठ बन गया है, जिसे यादकर आज भी यहाँ के प्रत्यक्षदृष्टा रोमांचित हो उठते हैं और प्रत्येक धर्मानुरागी भाई-बहन स्वयं को गौरवान्वित भी महसूस करते हैं।

उस बाराबंकी शहर के सरावगी

मोहल्ले में वर्तमान में छ: जिनमंदिर हैं, जिसमें लगभग १२५ वर्ष प्राचीन श्री १००८ चन्द्रप्रभु दिगम्बर जैनमंदिर (बड़ा मंदिर) अतिशय युक्त माना जाता है। यही वह जिनमंदिर है जहाँ सन् १९५२ में श्री ज्ञानमती माताजी ने सामाजिक संघर्षों एवं पारिवारिकजनों के विरोधों को देखते हुए अतिशयकारी भगवान चन्द्रप्रभु के चरण सानिध्य में बैठकर यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘‘ब्रह्मचर्यव्रत प्राप्ति के बाद ही मैं अन्न जल ग्रहण करूँगी, उसके पूर्व तक मेरा चतुराहार त्याग है’’ और सचमुच यह चमत्कार ही था कि अगले दिन ही उन्हें आचार्य श्री से सप्तम प्रतिमारूप ब्रह्मचर्य व्रत की प्राप्ति हो गई थी। इसके अतिरिक्त अन्य जिनमंदिरों में लगभग १०० वर्ष प्राचीन फुलवाड़ी मंदिर है, जो चन्द्रप्रभु दि. जैन मंदिर के परिसर में ही बना है और उसमें मूलनायक भगवान महावीर की प्रतिमा विराजमान है, इसी मंदिर परिसर में ५० वर्ष पुराना मानस्तंभ है। फुलवाड़ी परिसर में ही ३०-४० वर्ष प्राचीन महावीर स्वामी चैत्यालय भी है। ५० वर्ष प्राचीन समवसरण मंदिर एवं छोटे मंदिर के रूप में कहा जाने वाला श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर है, जहाँ मूलनायक प्रतिमा भगवान पार्श्वनाथ की है। वर्तमान में यहाँ जैन समाज के लगभग १२५ घर हैं, जिसमें अग्रवाल, पल्लीवाल एवं खण्डेलवाल जाति के लोग सामाजिक एकता के साथ रहते हैं। यहाँ पर सकल दि. जैन समाज ट्रस्ट द्वारा संचालित ‘‘महावीर जैन विद्यालय’’ है, जहाँ नन्हीं-मुन्नी बाल फुलवारी अपने उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करते हैं, साथ ही उसी ट्रस्ट द्वारा संचालित ‘‘महावीर जैन औषधालय’’ भी है, जो प्रत्येक आगन्तुक रोगी को औषधियाँ प्रदान कर उन्हें रोगमुक्त करता है। ऐसी परम पावन वंदनीय प्रथम त्याग भूमि, बाल ब्रह्मचारिणी माताजी की जननी बाराबंकी नगरी की पावन धरा को शतश: नमन।