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२२ जून से २४ जून २०१८ तक ऋषभदेवपुरम मांगीतुंगी में लघु पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आयोजित किया गया है |

प्रतिदिन पारस चैनल के सीधे प्रसारण पर प्रातः 6 से 7 बजे तक प.पू.आ. श्री चंदनामती माताजी द्वारा जैन धर्म का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त करें |

बाहुबली भगवान

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बाहुबली भगवान

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कृतयुग की आदि में अंतिम कुलकर महाराजा नाभिराज हुए हैं। उनकी महारानी मरुदेवी की पवित्र कुक्षि से इस युग के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म हुआ है। वैदिक परम्परा में इन्हें अष्टम अवतार माना गया है। ऋषभदेव के दो रानियाँ थीं-यशस्वती और सुनन्दा। यशस्वती के भरत, वृषभसेन आदि सौ पुत्र हुए और ब्राह्मी नाम की कन्या हुई हैं। सुनन्दा ने बाहुबली नाम के एक पुत्र को और सुंदरी नाम की कन्या को जन्म दिया। वृषभदेव ने ब्राह्मी और सुन्दरी इन दोनों पुत्रियों को सर्वप्रथम विद्याभ्यास कराया। दाहिनी तरफ बैठी हुई ब्राह्मी को अपने दाहिने हाथ से ‘अ आ इ ई’ सिखाई और बायीं तरफ बैठी हुई सुन्दरी को १, २, ३ आदि संख्याएँ लिखकर गणित विद्या सिखाई। ऋषभदेव ने स्वयं ही इन दोनों कन्याओं को सर्व विद्याओं में पारंगत करके साक्षात् सरस्वती का अवतार बना दिया। इसी तरह भरत, बाहुबली आदि एक सौ एक पुत्रों को भी सर्व विद्याओं में, सर्व कलाओं में, सर्व शास्त्रों और शस्त्रों में भी निष्णात बना दिया। ऋषभदेव ने प्रजा को असि, मसि आदि षट् क्रियाओं का उपदेश दिया जिससे प्रजा उन्हें युगादि पुरुष, युगस्रष्टा, विधाता, प्रजापति आदि नामों से पुकारने लगी। किसी समय ऋषभदेव राजपाट से विरक्त हो वन को जाने लगे तब उन्होंने भरत को अयोध्या का राज्य सौंपा और बाहुबली को पोदनपुर का अधिकारी बनाया। इसी तरह अन्य निन्यानवे पुत्रों को भी अन्य देशों का राज्य देकर आप मुनिमार्ग को बतलाने के लिए निग्र्रन्थ दिगम्बर मुनि हो गये।

अनेक वर्षों बाद भरत महाराज के दरबार में एक साथ तीन संदेशवाहक आते हैं। एक कहता है-राजन्! आपके पूज्य पिता ऋषभदेव को केवलज्ञान प्रगट हुआ है। दूसरा कहता है-राजाधिराज! आपकी आयुधशाला में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ है पुन: तीसरा समाचार पुत्ररत्न की उत्पत्ति का आता है। इन हर्षवर्धक तीनों समाचारों को एक साथ सुनकर भरतराज मन में विचार करने लगे कि पहले कौन सा उत्सव मनाना चाहिए। पुन: वे सोचते हैं पहले केवलज्ञान उत्सव की पूजा करना अत: वे भगवान ऋषभदेव के समवसरण में पहुँचकर भगवान की पूजा करके दिव्य उपदेश श्रवण करते हैं। उसी समय भरत के तीसरे भाई वृषभसेन आकर दीक्षा लेकर भगवान के प्रथम गणधर हो जाते हैं। बहन ब्राह्मी-सुन्दरी भी आर्यिका दीक्षा लेकर आर्यिकाओं में प्रमुख बन जाती हैं।

भरत महाराज वहाँ से आकर चक्ररत्न की पूजा करके पुत्र जन्म के उत्सव को सम्पन्न करते हैं। पुन: चक्ररत्न को आगे कर दिग्विजय के लिए प्रस्थान कर देते हैं। दशों दिशाओं के सभी राजाओं को अपने अधीन करके भरत साठ हजार वर्ष बाद अयोध्या में प्रवेश करना चाहते हैं कि इसी समय उनका चक्ररत्न अयोध्या के गोपुर द्वार पर रुक जाता है। जब भरत को पता चलता है कि अभी हमारी दिग्विजय यात्रा अधूरी है, हमारे भाई ही हमारे अधीन नहीं हैं तब वे अपने अनंतविजय आदि अट्ठानवे भाइयों के पास दूत भेजते हैं। इस अवसर पर वे सभी भाई भरत की अधीनता स्वीकार न कर पूज्य पिता ऋषभदेव के पास जाकर मुनि बन जाते हैं पुन: भरत बाहुबली के पास भी दूत भेजते हैं किन्तु बाहुबली भी भरत को राजाओं का राजा चक्रवर्ती मानकर अधीनता स्वीकार करना नहीं चाहते हैं। तब दोनों पक्ष में युद्ध का तुमुल बज उठता है, इस दृश्य को देख दोनों पक्ष के मंत्री विचार करते हैं कि यह महायुद्ध महान हिंसा को कराने वाला होगा अत: इन दोनों भाइयों में ही आपस में धर्मयुद्ध क्यों न हो जावे, मंत्रियों की प्रार्थना को स्वीकार कर भरत-बाहुबली के बीच दृष्टि युद्ध, जल युद्ध और मल्ल युद्ध इन तीन युद्धों का निर्णय हो जाता है।


भरत का वर्ण सुवर्ण सदृश है और ऊँचाई पाँच सौ धनुष प्रमाण है। बाहुबली का वर्ण मरकतमणि के समान हरा है और ऊँचाई सवा पाँच सौ धनुष है। दृष्टियुद्ध में दोनों भाई अपलक दृष्टि से एक-दूसरे को देख रहे हैं। कुछ क्षण बाद भरत की पलक झपक जाती है अत: बाहुबली की विजय मान ली जाती है। दोनों भाई सरोवर में उतरकर एक-दूसरे पर जल उछालते हैं। यहाँ भी भरत कद में नीचे होने से व्याकुल हो उठते हैं तब बाहुबली की जीत हो जाती है। ऐसे ही मल्ल युद्ध में भी बाहुबली भरत को उठा लेते हैं। पुन: सोचते हैं बड़े भाई का अविनय करना उचित नहीं है अत: वे उन्हें जमीन पर न पटक कर अपने वंधे पर बिठा लेते हैं। उस समय बाहुबली के पक्ष में जयकारे की ध्वनि होने लगती है और भरत के पक्ष में राजा लोग मस्तक नीचा कर लेते हैं। इधर बाहुबली भरत को अपने वंधे से उतारकर उच्चासन पर बिठा देते हैं। उस समय भरत अपमान से संतप्त हो उठते हैं और अपना चक्ररत्न बाहुबली के ऊपर चला देते हैं। तब सभी जनता के मुख से हाहाकार शब्द निकलने लगते हैं। बड़े-बड़े राजागण कह उठते हैं-राजन्! बस हो, बस हो, आपका यह अतिसाहस बस हो। उधर चक्ररत्न बाहुबली की तीन प्रदक्षिणा देकर उन्हीं के पास खड़ा रह जाता है।

इस घटना से बाहुबली का हृदय विरक्त हो उठता है। अहो! मेरे बड़े भाई भरत ने यह क्या किया ? जब इन्हें मालूम है कि चक्ररत्न अपने स्वजनों का घात नहीं कर सकता, तब पुन: क्रोध के आवेश में आकर यह लोकनिंद्य कार्य कैसे कर डाला ? बाहुबली कहते हैं-हे भाई! जिस नश्वर राज्य के लिए आपने यह साहस किया है वह आप का ही रहे, मैंने जो भी अपराध किया है उसे क्षमा करो, अब मैं जैनेश्वरी दीक्षा लेना चाहता हूँ। भरत का हृदय पानी-पानी हो जाता है, वह पश्चात्ताप करते हुए बार-बार बाहुबली को रोकना चाहते हैं परन्तु बाहुबली अपने बड़े पुत्र महाबली को राज्य देकर वन में जाकर नग्न दिगम्बर दीक्षा लेकर एक वर्ष के उपवास का नियम लेकर एक ही जगह निश्चल खड़े हो जाते हैं। इधर चक्रवर्ती का चक्ररत्न अयोध्या में प्रवेश करता है, भरत का साम्राज्य पद पर अभिषेक होता है। वह चक्रवर्ती इस छह खण्ड पृथ्वी के एकछत्र स्वामी बन जाते हैं।

इधर बाहुबली योग साधना में लीन हैं। सर्पों ने उनके चरणों के निकट वामियाँ बना ली हैं। लताएँ चरणों के आश्रय से उन्हें वेष्टित करती हुई वंâधे पर जा पहुँची हैं। बासंती बेल के सफेद-सफेद पुष्प उनके ऊपर पड़ते हुए अतिशय सुन्दर दिख रहे हैं। बाहुबली के ध्यान के प्रभाव से उस वन के क्रूर हिंसक सिंह, व्याघ्र आदि अपनी व्रूâरता छोड़कर हरिण, गाय, मोर, नेवला आदि के साथ-साथ घास चरते हैं और क्रीड़ा करते हैं। सर्प भक्ति में विभोर हो नाच रहे हैं। उसी समय मयूर भी अपने पंख फैला कर नाचते हैं। सिंहनी हरिणी के बच्चे को दूध पिलाती है तो गाय शेरनी के बच्चे को दूध पिलाती है। सभी जात विरोधी जीव आपस में परम प्रीति को प्राप्त हो गये हैं। आकाश मार्ग में विद्याधर के विमान रुक जाते हैं, तब वे नीचे आकर बाहुबली महामुनि की भक्ति करके अतिशय पुण्य कमा लेते हैं। कभी-कभी स्वर्ग में देवों के आसन कंपने लगते हैं, तब वे अवधिज्ञान से बाहुबली के ध्यान का माहात्म्य समझकर उस तपोवन में आकर उनकी पूजा करते हैं।
उस समय उनकी ध्यान की मुद्रा को देखकर ऐसा भास होता है कि-

करना नहीं रहा कुछ भी कृतकृत्य प्रभो! भुजलंबित हैं।

नहीं भ्रमण करना जग मे, अतएव-चरण युग अचलित हैं।।
देख चुके सब जग की लीला अंतरंग अब देख रहे।

सुन-सुन करके शांति न पाई अत: विजन में खड़े हुए।।


इस तरह अपनी आत्मा का ध्यान करते हुए उन महामुनि को एक वर्ष पूर्ण हो चुका है, उसी दिन भरतेश्वर आकर उनकी पूजा करते हैं, तब तत्क्षण ही बाहुबली को केवलज्ञान प्रगट हो जाता है। बाहुबली के मन में कभी-कभी यह विकल्प हो जाया करता था कि ‘‘भरत को मुझसे क्लेश हो गया है।’’ इसी कारण से केवलज्ञान होने में भरत के पूजन की अपेक्षा हुई थी।

केवलज्ञान होने के बाद इंद्र की आज्ञा से कुबेर गंधकुटी की रचना कर देते हैं। बाहुबली भगवान अपने दिव्य उपदेश से असंख्य भव्य जीवों को मोक्षमार्ग में लगाते हैं अनंतर श्री ऋषभदेव के पहले ही शेष कर्मों का नाश कर अक्षय, अनंत, अविनाशी मोक्षपद को प्राप्त कर लेते हैं।

ये बाहुबली इस युग के चौबीस कामदेवों में प्रथम कामदेव हुए हैं और सर्वप्रथम ही मोक्ष गये हैं तथा इनके एक वर्ष के ध्यान की विशेषता भी अपने आप में विलक्षण ही रही है। यही कारण है कि चक्रवर्ती भरत उनके निर्वाण गमन के बाद उन बाहुबली की सवा पाँच सौ धनुष प्रमाण पन्ने की मूर्ति बनवाते हैं। इस इतिहास को आज असंख्य वर्ष व्यतीत हो चुके हैं।

आज से १००० वर्ष पूर्व दक्षिण प्रान्त के गंगवंशी राजा राचमल्ल के प्रधानमंत्री और सेनापति श्रावक शिरोमणि चामुण्डराय हुए हैं। कहा जाता है कि एक दिन जब उन्हें पता चला कि भगवान बाहुबली की मूर्ति के दर्शन हेतु मेरी माता ने दूध का त्याग कर रखा है, तब वे पोदनपुर के लिए प्रस्थान कर देते हैं। मार्ग में श्रवणबेलगोल में पड़ाव डालते हैं। रात्रि में वष्माण्डिनी देवी के स्वप्न देने पर गुरुदेव आचार्य श्री नेमीचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती की आज्ञा से चामुण्डराय ५७ पुट ऊँची इस विशालकाय मूर्ति का निर्माण कराते हैं। ईसवी सन् ९८१ में इस गोम्मटेश बाहुबली मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई है।

बाहुबली का योग

आदि ब्रह्मा भगवान् ऋषभदेव के पुत्र कामदेव बाहुबली द्वितीय होकर भी अद्वितीय थे। उन्होंने एक वर्ष तक योग साधना के द्वारा अनेक ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त करके अपने में ही परम ज्योति स्वरूप केवलज्ञान को प्रगट किया था।

जब महामुनि बाहुबली ध्यान में खड़े थे, तब उनके शरीर पर पूरी वर्षा व्यतीत हो गई, ठण्डी ने बर्प और तुषार से उनके शरीर को ढ़क दिया और गर्मी ने भी सूर्य की संतप्त किरणों से उनके शरीर को संतप्त करने में कोई कमी नहीं रखी किन्तु बाहुबली बराबर ३६५ दिन तक निश्चल खड़े रहे। सर्पों ने वामियाँ बना लीं, लताएं उनके शरीर से लिपट गर्इं और चिड़ियों ने घोंसले बना लिये फिर भी वे आत्मतत्त्व के चिंतन में और परमात्म तत्त्व के ध्यान में स्थिर थे, धर्मध्यान के अंतर्गत पिंडस्थ, पदस्थ, रूपस्थ, रूपातीत ध्यान के बल से अपनी आत्मा को शुक्लध्यान के सन्मुख ले जाने में तत्पर थे। उनकी मुखमुद्रा उनके मन के आल्हाद को व्यक्त कर रही थी।

हम उनकी मूर्ति को देखकर उनका इतिहास पढ़कर २४ घंटे भी ऐसे निश्चल खड़े होने का अभ्यास करें। नहीं तो एक घंटा भी निश्चल पद्मासन मुद्रा से बैठने का ही अभ्यास करें। इतना भी नहीं कर सकते, तो कम से कम ५ मिनट भी शरीर को निश्चल करें, वाणी से मौन रहें और मन को इधर-उधर जाने से रोवे।

पदस्थध्यान के अंतर्गत ‘‘ह्रीं’’ एक बीजपद है। यह पाँच रंग का है और चौबीस तीर्थंकर का वाचक है। इसके पाँचों वर्णों में मन को घुमावें पुन: किसी एक वर्ण पर मन को रोवें-केन्द्रित करें। इस ह्रीं का वश्लेषण इस प्रकार है-

‘‘ह्र’’ पीत वर्ण का है, इसमें स्वर्ण सदृश वर्ण वाले सोलह तीर्थंकर स्थित हैं। ‘ई’ हरित है इसमें हरे वर्ण वाले दो तीर्थंकर विराजमान हैं। कला ‘‘-’’ लाल वर्ण की है, इसमें लालवर्ण वाले दो तीर्थंकर स्थित हैं। नाद-अर्धचंद्राकार श्वेत वर्ण का है, इसमें श्वेतवर्ण वाले दो तीर्थंकर स्थित हैं और बिन्दु नीलवर्ण की है, इसमें नील वर्ण वाले दो तीर्थंकर स्थित हैं। इसके चारों तरफ किरणें निकल रही हैं। ऐसे इस बीजपद को अपने हृदय में विराजमान करके ऐसा चिंतवन करें, इस मंत्र पद की किरणों से मेरा सर्वांग व्याप्त हो रहा है। इस मंत्र का ध्यान करने से तमाम कर्मों की निर्जरा हो जाती है।

वैदिक परम्परा के अनुसार इन पाँच वर्णों को पाँच तत्त्व रूप से घटित किया जा सकता है। पीतवर्ण पृथ्वीतत्त्व है, हरितवर्ण जलतत्व है, लालवर्ण अग्नितत्त्व है, श्वेतवर्ण वायुतत्त्व है और नीलवर्ण आकाश तत्त्व है। वैसे यह पौद्गलिक शरीर भूतचतुष्टय से बना हुआ है। कोई-कोई इसमें आकाश तत्त्व को भी गर्भित करते हैं तथा अपनी पाँचों इन्द्रियों को इन पाँच तत्त्वों से संबंधित कहते हैं। इन तत्त्वों के दूषित होने से ही शरीर और इन्द्रियों में नाना प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न होती हैंं। उन-उन वर्णों के ध्यान से उन-उन संबंधी व्याधियाँ भी नष्ट हो जाती हैं।

इस ‘‘ह्रीं’’ के उन-उन वर्णों में उन्हीं-उन्हीं वर्ण वाले तीर्थंकरों के नाममंत्र भी लिखे जाते हैं। इसका विशेष स्पष्टीकरण गुरुओं से समझना चाहिए। ‘ध्यान साधना’ पुस्तक से भी जानकारी ले सकते हैं।

भगवान् बाहुबली का दर्शन करने के लिए और उनका अभिषेक देखने के लिए आप लोग अति उत्सुक रहते हैं। उन्होंने जिस योग साधना के द्वारा आत्मसिद्धि प्राप्त की है, उसका प्रारंभिक विंचित् मात्र अंश यह बीजपद है। इसी प्रकार से ‘ॐ’ ‘अर्हं’ आदि अनेक बीजपद होते हैं। इनके ध्यान से, चिंतन से अथवा जाप से चिरसंचित पापों का नाश होता है, पुण्य का संचय होता है, अनेक मनोरथ सफल हो जाते हैं। सांसारिक सुख, संतति, संपत्ति की समृद्धि होती है। दु:ख, दारिद्र्य, रोग, शोक आदि नष्ट हो जाते हैं। मस्तिष्क का तनाव खत्म होता है। मानसिक शांति होती है और ब्लडप्रेशर, हृदय रोग आदि शांत हो जाते हैं। भूत, व्यंतर आदि के प्रकोप भी शांत हो जाते हैं और परम्परा से यह आत्मा अपने आपको परमात्मा भी बना लेता है अत: यह ‘‘ह्रीं’’ बीजपद रूप एकाक्षरी मंत्र का ध्यान अथवा जाप्य हमें उन महामना बाहुबली के निकट पहुँचाने वाला है, ऐसा दृढ़ विश्वास करके इसका ध्यान करना चाहिए।

क्या बाहुबली के शल्य थी ?

भगवज्जिनसेनाचार्य ने महापुराण में भगवान बाहुबली के ध्यान के बारे में जैसा वर्णन किया है उसके आधार से उनके शल्य मानना अवर्णवाद है। सो ही देखिए- ‘‘एकल विहारी अवस्था को प्राप्त बाहुबली ने एक वर्ष तक के लिए प्रतिमायोग धारण किया१। वे रस गौरव, शब्द गौरव और ऋद्धि गौरव इन तीनों से रहित थे, अत्यंत नि:शल्य थे२ और दस धर्मों के द्वारा उन्हें मोक्षमार्ग में अत्यंत दृढ़ता प्राप्त हो गई थी।’’

तपश्चरण का बल पाकर उन मुनिराज के योग के निमित्त से होने वाली ऐसी अनेक ऋद्धियाँ प्रगट हो गई थीं। मतिज्ञान की वृद्धि से कोष्ठ बुद्धि आदि ऋद्धियाँ एवं श्रुतज्ञान की वृद्धि से समस्त अंग पूर्वों के जानने की शक्ति का विस्तार हो गया था। वे अवधिज्ञान में परमावधि को उल्लंघन कर सर्वावधि को और मन:पर्यय में विपुलमति मन:पर्ययज्ञान को प्राप्त हुए थे।[१]

सिद्धान्त ग्रंथ का यह नियम है कि भावलिंगी व वृद्धिंगत चारित्र वाले मुनि के सर्वावधिज्ञान होता है तथा विपुलमति मन:पर्यय तो वद्र्धमान चारित्र वाले एवं किसी न किसी ऋद्धि से समन्वित मुनि के ही होता है।[२] आगे भगवान जिनसेन सभी प्रकार की ऋद्धियों की प्रगटता मानते हुए कहते हैं। ‘‘उनके तप के प्रभाव से आठ प्रकार की विक्रिया ऋद्धि प्रगट हो गई थी। आमर्शौषधि, जल्लौषधि, क्ष्वेलौषधि आदि औषधि ऋद्धियों के हो जाने से उन मुनिराज की समीपता जगत का उपकार करने वाली थी। यद्यपि वे भोजन नहीं करते थे तथापि शक्तिमात्र से ही उनके रस ऋद्धि प्रगट हुई थी।[३]

उनके शरीर पर लतायें चढ़ गई थीं। सर्पों ने वामियाँ बना ली थीं और वे निर्भीक हो क्रीड़ा किया करते थे। परस्पर विरोधी तिर्यंच भी व्रूâर भाव को छोड़कर शांतचित्त हो गये थे। विद्याधर लोग गति भंग हो जाने से उनका सद्भाव जान लेते थे और विमान से उतरकर ध्यान में स्थित मुनिराज की बार-बार पूजा करते थे। तप की शक्ति के प्रभाव से देवों के आसन भी बार-बार वंपित हो जाते थे जिससे वे मस्तक झुकाकर नमस्कार करते रहते थे।’’ कभी-कभी क्रीड़ा के लिए आई हुई विद्याधरियाँ उनके सर्व शरीर पर लगी हुई लताओं को हटा जाती थीं।[४]

इस प्रकार धारण किए समीचीन धर्मध्यान के बल से जिनके तप की शक्ति उत्पन्न हुई है, ऐसे वे मुनि लेश्या की विशुद्धि को प्राप्त होते हुए शुक्लध्यान के सन्मुख हुए। एक वर्ष का उपवास समाप्त होने पर भरतेश्वर ने आकर जिनकी पूजा की है, ऐसे महामुनि बाहुबलि केवलज्ञान ज्योति को प्राप्त हो गये। यह भरतेश्वर मुझसे संक्लेश को प्राप्त हो गया, यह विचार बाहुबली के हृदय में रहता था इसीलिए केवलज्ञान ने भरत की पूजा की अपेक्षा की थी। प्रसन्नबुद्धि सम्राट भरत ने केवलज्ञान के उदय के पहले और पीछे विधिपूर्वक उनकी पूजा की थी। भरतेश्वर ने केवलज्ञान के पहले जो पूजा की थी वह अपना अपराध नष्ट करने के लिए की थी और केवलज्ञान के बाद जो पूजा की थी वह केवलज्ञान की उत्पत्ति का अनुभव करने के लिए की थी।[५]

इस प्रकार महापुराण के इन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि भगवान बाहुबली को कोई शल्य नहीं थी। मात्र इतना विकल्प अवश्य था कि ‘‘भरत को मेरे द्वारा संक्लेश हो गया है, सो भरत के पूजा करते ही वह दूर हो गया।

आप जाइये, कहाँ जायेंगे, भरत की भूमि पर ही तो रहेंगे, ऐसे मंत्रियों के द्वारा व्यंगपूर्ण शब्द के कहे जाने पर बाहुबली कुछ क्षुब्ध से हुए और मान कषाय को धारण करते हुए चले गये तथा दीक्षा ले ली। उस समय से लेकर उन के मन में यही शल्य लगी हुई थी कि ‘‘मैं भरत की भूमि में खड़ा हूँ अत: उन्हें केवलज्ञान नहीं हो रहा था, तब भरत ने जाकर भगवान वृषभदेव से प्रश्न किया कि बाहुबली को एक वर्ष के लगभग होने पर भी अभी तक केवलज्ञान क्यों नहीं हुआ है। भगवान ने कहा-भरत! उसके मन में शल्य है अत: तुम जावो और समझाओ कि भला यह पृथ्वी किसकी है ? हमारे जैसे तो अनंतों चक्रवर्ती हो चुके हैं, फिर भला यह पृथ्वी मेरी कैसे है ? इत्यादि समाधान करने पर बाहुबली की शल्य दूर हुई और उन्हें केवलज्ञान प्रगट हो गया।

यह किवदंती महापुराण के आधार से तो गलत है ही, साथ ही सिद्धान्त की दृष्टि से भी बाधित ही है। जैसे कि शल्य तीन होती हैं-माया, मिथ्या और निदान। माया का अर्थ है वंचना-ठगना, छल, कपटपूर्ण व्यवहार करना। सो तो उन्हें थी नहीं। मिथ्याशल्य-मिथ्यात्व को कहते हैं।’’ मैं भरत की भूमि पर खड़ा हूँ, यह विपरीत मानना ही मिथ्यात्व शल्य कही जा सकती है। सो भी बाहुबली के मानना संभव नहीं है क्योंकि मिथ्यादृष्टि साधु के सर्वावधिज्ञान, मन:पर्यय ज्ञान और अनेकों ऋद्धियाँ प्रगट नहीं हो सकती थीं।’’ निदान शल्य का अर्थ है आगामी काल में भोगों की वांछा रखते हुए उसी का चिंतन करना। सो भी उन्हें नहीं मानी जा सकती है।

दूसरी बात यह है कि तत्त्वार्थसूत्र में श्री उमास्वामी आचार्य ने कहा है कि ‘‘नि:शल्योव्रती’’ जो माया, मिथ्यात्व और निदान इन तीनों शल्यों से रहित होता है, वही व्रती कहलाता है। पुन: यदि बाहुबली जैसे महामुनि के भी शल्य मान ली जावे तो वे महाव्रती क्या अणुव्रती भी नहीं माने जा सवेंगे। पुन: वे भावलिंगी मुनि नहीं हो सकते और न उनके ऋद्धियों का प्रादुर्भाव माना जा सकता है।

यदि कोई कहे कि पुन: एक वर्ष तक ध्यान करते रहे और केवलज्ञान क्यों नहीं हुआ, सो भी प्रश्न उचित नहीं प्रतीत होता। एक वर्ष का ध्यान तो अन्य महामुनियों के भी माना गया है। जैसे कि उत्तरपुराण में भगवान शांतिनाथ के पूर्वभवों में एक उदाहरण आता है- ‘‘वङ्काायुध ने विरक्त हो सहस्रायुध को राज्य दिया पुन: क्षेमंकर तीर्थंकर के पास जैनेश्वरी दीक्षा ले ली और बाद में उन्होंने ‘‘सिद्धिगिरि’’ पर्वत पर जाकर एक वर्ष के लिए प्रतिमायोग धारण कर लिया। उनके चरणों का आश्रय पाकर बहुत से वमीठे तैयार हो गये। उनके चारों तरफ लगी हुई लतायें भी मुनिराज के पास जा पहुँचीं। इधर वङ्काायुध के पुत्र सहस्रायुध ने भी विरक्त हो अपना राज्य शतबली को दिया और दीक्षा ले ली। जब एक वर्ष का योग समाप्त हुआ तब वे अपने पिता वङ्काायुध के पास जा पहुँचे। अनंतर पिता-पुत्र दोनों ने चिरकाल तक तपस्या,[६] की, पुन: वैभार पर्वत पर पहुँचकर अन्त में सन्यास विधि से मरण कर अहमिन्द्र हो गये। यह प्रकरण भगवान शांतिनाथ के पाँचवें भव पूर्व का है। यह घटना पूर्व विदेह क्षेत्र की है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि विदेहादि क्षेत्रों में ऐसे-ऐसे महामुनि एक-एक वर्ष का योग लेकर ध्यान किया करते हैं।

भगवान बाहुबली चतुर्थकाल की आदि में क्या तृतीयकाल के अन्त में जन्मे थे और ध्यान मेें लीन हुए थे तथा मुक्ति भी तृतीय काल के अंत में प्राप्त की थी अत: उनमें एक वर्ष के ध्यान की योग्यता होना कोई बड़ी बात नहीं है, पुन: शल्य थी इसलिए केवलज्ञान नहीं हुआ, यह कथन संगत नहीं प्रतीत होता है। रविषेणाचार्य ने भी बाहुबली के शल्य का वर्णन नहीं किया है। यथा-‘‘उन्होंने उसी समय सकल भोगों का त्याग किया और निर्वस्त्र..........दिगम्बर मुनि हो गये तथा एक वर्ष तक मेरु पर्वत के समान निष्प्रवंप खड़े रहकर प्रतिमायोग धारण कर लिया। उनके पास अनेक वामियाँ लग गर्इं जिनके बिलों से निकले हुए बड़े-बड़े सांपों और श्यामा आदि की हरी-हरी लताओं ने उन्हें वेष्टित कर लिया, इस दशा में उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हो गया।[७] अतएव भगवान बाहुबली के शल्य नहीं थीं।

कोई कहते हैं कि भरत के साथ ब्राह्मी-सुंदरी बहनों ने भी जाकर उन्हें संबोधा जब उनकी शल्य दूर हुई। यह कथन भी नितांत असंगत है क्योंकि भगवान वृषभदेव को केवलज्ञान होने के बाद पुरिमतालनगर के स्वामी भरत के छोटे भाई वृषभसेन ने भगवान से दीक्षा ले ली और प्रथम गणधर हो गये। ब्राह्मी ने भी दीक्षा लेकर आर्यिकाओं में प्रमुख गणिनी पद प्राप्त किया एवं सुंदरी ने भी दीक्षा ले ली।[८] इसके बाद चक्रवर्ती ने घर आकर चक्ररत्न की पूजा करके दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया जहाँ उन्हें साठ हजार वर्ष लग गये। अनंतर आकर बाहुबली के साथ युद्ध हुआ है। अत: भगवान बाहुबली का आदर्श जीवन महापुराण के आधार से लेना चाहिए। चूँकि यह ग्रंथराज ऋषि प्रणीत होने से ‘‘आर्षग्रंथ’’ माना जाता है।

भगवान बाहुबली की मूर्तियाँ

दक्षिण कर्नाटक में मूडबिद्री के उत्तर में कारकल में एक बाहुबली की प्रतिमा विराजमान हैं जो कि ४१ पुट प्रमाण हैं। इसका निर्माण लगभग सन् १४३२ में हुआ है। मूडबिद्री से कुछ दूर वेणूर में ३५ पुट ऊँची बाहुबली की प्रतिमा है। इसका निर्माण सन् १६०४ में हुआ है। मैसूर के पास ‘गोम्मटगिरि’ नामक एक टीले पर १८ पुट ऊँची बाहुबली प्रतिमा है जो कि कुछ वर्ष पूर्व ही उपलब्धि में आई है।

कर्नाटक के बीजापुर जिले के ‘बादामिपर्वत’ शिखर के उत्तरी ढाल पर चार शैल में उत्कीर्ण गुहा-मंदिर हैं। उनमें से चौथे गुहा मंदिर के मण्डप में तीर्थंकर मूर्तियों के मध्य एक भगवान बाहुबली की मूर्ति है। यह ७ पुट ६ इंच है। इस मूर्ति की केशसज्जा दर्शनीय है। एक कांस्य मूर्ति भगवान बाहुबली की लगभग डेढ़ पुट ऊँची है। जो आज ‘प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय, मुम्बई’ में (क्र. १०५) रखी हुई है।

कालक्रम से तृतीय बाहुबली मूर्ति ऐहोल के इंद्रसभा नामक बत्तीसवें गुहा मंदिर की अद्र्धनिर्मित वीथि में उत्कीर्ण है। बीजापुर जिले के इस राष्ट्रकुलकालीन केन्द्र का निर्माण आठवीं-नवमी शती में हुआ है। इसी गुहा मंदिर में नौवीं-दशवीं शती में जो विविध चित्रांकन प्रस्तुत किये गये हैं उनमें एक बाहुबली का चित्र भी है। बाहुबली का इस रूप में यह प्रथम और संभवत: अंतिम चित्रांकन है। ऐसे ही अन्य स्थानों पर भी बाहुबली की मूर्तियाँ उपलब्ध होती हैं।

उत्तर भारत में भी जूनागढ़ संग्रहालय में एक मूर्ति बाहुबली की है जो नवमी शताब्दी की है, प्रभास पाटन से प्राप्त हुई है। खजुराहो में पाश्र्वनाथ मंदिर की बाहरी दक्षिणी दीवार पर बाहुबली की मूर्ति उत्कीर्ण है जो दशवीं शताब्दी की है। लखनऊ संग्रहालय में एक मूर्ति १०वीं शताब्दी की है, जिसके चरण-मस्तक खण्डित हैं।

देवगढ़ में प्राप्त १०वीं शताब्दी की र्मूित है जो वहीं के ‘साहू जैन संग्रहालय’ में रखी है। देवगढ़ में बाहुबली की ६ मूर्तियाँ प्राप्त हैं। बिलहरी (जिला-जबलपुर) म.प्र. से एक शिलापट्ट प्राप्त हुआ है जिस पर बाहुबली का प्रतिबिम्ब उत्कीर्ण है।

बीसवीं शताब्दी में आरा, फिरोजाबाद, धर्मस्थल-कर्नाटक, गोम्मटगिरि-इंदौर, सागर, हस्तिनापुर आदि स्थानों पर बाहुबली की प्रतिमा विराजमान हैं। भगवान ऋषभदेव के साथ भी बाहुबली-भरत मूर्तियों की परम्परा रही है। देवगढ़ में, खजुराहो में, ग्वालियर की गुफाओं में ऐसी मूर्तियाँ देखने को मिलती हैं। एलोरा की गुफाओं में भगवान पाश्र्वनाथ और बाहुबली की मूर्तियाँ कई जगह उत्कीर्ण हैं। कहीं-कहीं पर बाहुबली की मूर्तियों पर लता के साथ-साथ सांप और बिच्छू भी चढ़ते हुए दिखाए गये हैं। कहीं-कहीं पर दो महिलाएँ लता को थामे हुए दिखाई गई हैं। दक्षिण की बाहुबली मूर्तियों में प्राय: सांप की वामियाँ अवश्य रहती हैं।

यद्यपि भगवान बाहुबली तीर्थंकर नहीं थे फिर भी उनकी मूर्तियों का निर्माण, उनकी पूजा की परम्परा अतीव प्राचीन है। यह उनके अप्रतिम त्याग और तपश्चरण का ही प्रभाव है जो कि आज उनकी मूर्ति की स्थापना से दिगम्बरत्व के गौरव को सर्वतोमुखी कर रहा है।

टिप्पणी

  1. मतिज्ञानसमुत्कर्षात् कोष्ठबुद्ध्यादयोऽभवन्। श्रुतज्ञानेन विश्वांङ्गपूर्ववित्त्वादिविस्तर:।।१४६।। परमावधिमुल्लंघ्य स सर्वावधिमासदत्। मन:पर्ययबोधे च संप्रापद् विपुलां मतिम्।।१४७।।
  2. तत्त्वार्थराजवार्तिक, अ, १
  3. विक्रियाऽष्टतयी चित्रं प्रादुरासीत्तपोबलात्।.......।।१५२।। प्राप्तौषधद्र्धेरस्यासीत् सन्निधिर्जगते हित:। आमर्श क्ष्वेलजल्लाद्यै: प्राणिनामुपकारिण:।।१५३।। अनाशुषोऽपि तस्यासीद् रसद्र्धि:शक्तिमात्रत:। तपोबल समुद्भूता बलद्र्धिरपि पप्रथे।।१५४।।
  4. विद्याधर्य: कदाचिच्च क्रीड़ाहेतोरुपागत:। वल्लीरूद्वेष्ट्यामासुर्मुने: सर्वाङ्गसंगिनी:।।१८३।।
  5. इत्युपारूढसद्ध्यनबलोद्भूततपोबल:। स लेश्या शुद्धिमास्कंदन् शुक्लध्यानोन्मुखोऽभवत्।।१८४।। वत्सरानशनस्यान्ते भरतेशेन पूजित:। स भेजे परमज्योति: केवलाख्यं यदक्षरम्।।१८५।। संक्लिष्टो भरताधीश: सोऽस्मत्त इति यत्किल। हृद्यस्य हार्दं तेनासीत् तत्पूजाऽपेक्षि केवलम्।।१८६।। केवलार्कोदयात् पाक्च पश्चाच्च विधिवद् व्यधात्। सपर्यां भरताधीशो योगिनोऽस्य प्रसन्नधी:।।१८७।। स्वाग:प्रमार्जनार्थेज्या प्राक्तनी भरतेशिन:। पाश्चात्त्याऽत्यायताऽपीज्या केवलोत्पत्तिमन्वभूत्।।१८८।।
  6. अथ वङ्काायुधाधीशो नप्तृवैâवल्यदर्शनात्। लब्धबोधि: सहस्रायुधाय राज्यं प्रदाय तत्।।१३१।। दीक्षां क्षेमंकराख्यान तीर्थकर्तुरुपान्तग:। प्राप्य सिद्धिगिरौ वर्ष प्रतिमायोगमास्थित:।।१३२।। तस्य पादौ समालम्ब्य वाल्मीवंâ वह्वर्तत। वद्र्धयन्ति महात्मान: पादलग्नानपि द्विष:।।१३३।। व्रतिनं तंं व्रतत्योऽपि मार्दवं वा समीप्सव:। गाढं रूढा: समासे दुराकण्ठमभितस्तनुम्।।१३४।। किञ्चित्कारणमुद्दिश्य वङ्काायुधसुतोऽपि तत्। राज्यं शतबलि न्युच्चैर्निधाय निहतस्पृह:।।१३८।। संयमं सम्यगादाय मुनीन्द्रात् पिहिताश्रवात्। योगावसाने स प्रापद्वङ्काायुधमुनीश्वरम्।।१३९।। तावुभौ सुचिरं कृत्वा प्रव्रज्यां सह दु:स्सहाम्।...........।।१४०।। (उत्तर पुराण पर्व-६३)
  7. संत्यज्य स ततो भोगान् भूत्वा निर्वस्त्रभूषण:। वर्ष प्रतिमया तस्थौ मेरुवन्नि:प्रकम्पक:।।७५।। वल्मीकविवरोद्यातैरत्युग्रै: स महोरगै:। श्यामादीनां च वल्लीभि: वेष्टित: प्राप केवलम्।।७६।। (पद्मपुराण, पर्व ४।)
  8. महापुराण, पर्व २४।