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बुजुर्गों के चरणों में आचरण

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बुजुर्गों के चरणों में आचरण

मुझे कभी—कभी ये देखकर दुख होता है कि जिन बुजुर्गों ने अपने जीवन को समाज और परिवार के लिए समर्पित कर दिया और हमारी पीढ़ी को इस योग्य बना दिया कि हम स्वर्णिम भविष्य की ओर निहारने लगे, वही बुजुर्गों की पीढ़ी आज आशावादी दृष्टि से नई पीढ़ी की ओर निहार रही है। उनकी आशाएं और अपेक्षाएं टूट रही हैं। उन्हें नमस्कार न करते हुए तिरस्कार किया जा रहा है। उनको फूल न देते हुए कांटे दिये जा रहे हैं। उनको सुख न देते हुए दुख की चादर बिछा रहे हैं। हम ये भूल जाते हैं कि हम भी कभी बुजुर्ग होंगे । आज जो बो रहे हैं, वहीं हम काटेंगे । हमें इनके अनुभवों से लाभ लेना चाहिए । बुजुर्ग अपने अनुभव बांटने के लिए तरसते हैं और नई पीढ़ी उनके पास नहीं बैठती। यह होता है दो पीढ़ियों का अंतर । वे बिना अनुभव बांटे ही अपनी जिन्दगी से मन में वंचना लिये चले जाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है और इस पर चिंतन होना चाहिए।

कई बुजुर्ग घर में टीवी देखते हुए अपनी जिन्दगी गुजार रहे हैं और कुछ बुजुर्ग समाज के लिए अपने जीवन के स्वर्णिम क्षण समर्पित कर रहे हैं। हम अपने लिए नहीं समाज के लिए जीना सीखें। यह इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। सभी समर्पित बुजुर्गों में वाणी की ताकत और लिखने की ताकत नहीं होती। घर और परिवार वाले भी नाराज होते हैं कि समाज के लिए क्यों अपना समय बर्बाद करते हो, समाज में दो शब्द भी आपके सम्मान में बोलने वाला नहीं है। फिर क्यों करते हो यह सब। घर में भी शिकायत, साथियों में भी शिकायत, परिवार में भी शिकायत उसके बाद भी समाज के लिए सर्मपण की भावना, क्या यह साधना नहीं, में इसे प्रणाम करता हूं। मैंने बुजुर्गों से सीखा है। मैं अपने दादाजी के पास बैठकर घंटो उनकी बातें सुनता था। इस उम्र में आदमी को अपनी उम्र बांटने की आकांक्षा होती है, और उनका प्यार और आशीर्वाद भी मुझे मिला। आत्मीयता मिलती है दूसरों को दिया था, मुझे याद आया कि मुझे भी समय आने पर आपको ये देना चाहिए। उसी की तैयारी कर रहा हूँ। बच्चे के माता—पिता उसके उत्तर को सुनकर आश्चर्यचकित रह गये। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और वे अपने वृद्ध माता पिता के पास क्षमा मांगने के लिए पहुंचे। उनकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे। उन्हें अपना अंधकारमय भविष्य दिखाई देने लगा था। हम वर्तमान के जोश में होश खो बैठते हैं और बुजुर्गों का अपमान करते हैं। वीर निकलंक विचार मंच ने इस विचार से उन बुजुर्गों का सम्मान करने का निश्चय किया जिन्होंने अपने समर्पण से समाज को सीचा है। जिनके पास वाणी और लेखनी की ताकत नहीं, उन्हें कोई जानता नहीं। जब मैं सम्मान के पहले इन बुजुर्गों का इण्टरव्यू लेने गया तब उनकी आंखों में प्यार के आंसू थे। कुछ ने कहा रमेश जी आप आये तो सही । हमें कोई पूछने वाला नहीं। आपने आकर हमारे उपर उपकार किया। आपके पास सोच तो है। कुछ अच्छा करने की तमन्ना तो है, किन्तु लोग इस मामले में कंजूस है।उन्होंने प्यार से बिठाया और अपने जीवन के कई अनुभव मुझे सुनायें। प्रश्न ये नहीं कि हमने उनका सम्मान किया, किन्तु मुझे उनसे जो आत्मीयता और प्यार मिला उसे मैं अपने जीवन में नहीं भुला सकता। मैं समाज में भी कहता हूँ, मैं नेताओं से, संतों से कहता हूं कि कुछ भी कार्यक्रम करते रहो, किन्तु समाज के उस समर्पित व्यक्ति को जरूर प्यार के दो शब्द कहना जो प्यार के दो शब्द के लिए तरस रहा है और आशा भरी दृष्टि से आप सब लोगों की ओर निहार रहा है। वो समर्पण करता है और हम पीठ भी नहीं थपथपाते। यह दरिद्र मानसिकता उचित नहीं। मुझे प्यार चाहिए मुझे सम्मान चाहिए, सबको मेरी जय जयकार करनी चाहिए। यह अपेक्षा है मेरी । और मैं दूसरों के सम्मान में दो शब्द भी न बोल पाउं। यह कहां तक उचित है। मेरी मान्यता है कि प्यार दो प्यार मिलेगा। दुत्कार दो दुत्कार मिलेगा। सम्मान दो सम्मान मिलेगा नमस्कार करो नमस्कार मिलेगा और तिरस्कार करो तिरस्कार मिलेगा। फूल दो फूल मिलेंगे, कांटे दो कांटे मिलेंगे। जो बोओगे वही काटोगे। जीवन एक प्रतिध्वनि है जो लौट कर आती है। आशा है हम अपने बुजुर्गों के सम्मान में हर स्थान पर कार्यक्रम करेंगे और उनके किये गये कार्यों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करेंगे।


जैन सन्देश २८ जनवरी २०१५