Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


डिप्लोमा इन जैनोलोजी के फॉर्म भरने की अंतिम तारीख ३१ जनवरी २०१८ है |

बेटे ही बेटे क्यों ?

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बेटे ही बेटे क्यों ?

लेखक— श्री सुरेश जैन सरल

जैन दर्शन में निबध्य भक्तामर पाठ में एक श्लोक है—

सोहं तथापि तव भक्ति वशान्मुनीश,कर्तु स्तवं विगत शक्ति रपि प्रवृत:।

प्रीत्यात्म वीर्य, मविचार्य मूगी मृगेन्द्रं, नाभ्येति किं जिनशिशो: परिपालनार्धम् ।।

गुणीजनों ने हिन्दी में इस तरह कहा है— मुनियों में इंद्र की तरह प्रधान आदिनाथ भगवान मैं (मानतुंगाचार्य) सामथ्र्य रहित होने पर भी भक्तिवश आपका स्तवन करने तैयार हुआ हूँ । जिस तरह एक हिरणी घनघोर जंगल में सिंह से अपने शावक को बचाने के लिए अल्पशक्ति वाली होने पर भी शेर का सामना करती है।

यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि हिरणी पशु है फिर भी उसमें अपने शावक की रक्षा हेतु भारी प्रज्ञा है। भारतीय संस्कृति में माताओं के मनों में भी वात्सल्य और ममत्व पाया जाता रहा है। वे संतान की रक्षार्थ अपने प्राणों तक की बाजी लगा देती थीं। किन्तु अभी ४-५ दशकों से बढ़ रही जनसंख्या और जबावदारियों के चलते कुछ माता—पिता सीमित संतान की भावना रखने लगे हैं। कुछ इस निम्न—स्तर पर उतर आये हैं कि संतान का आगमन रोकने के लिए उसे कुक्षि में ही समाप्त करने लगे। चूंकि ८० वर्ष पूर्व घरों में पुत्रों की तुलना में पुत्रियां अधिक संख्या में जन्म ले रही थी और दुर्भाग्य से उस समय दहेज—प्रथा का भी भारी दबाव था अत: अनेक माता—पिता पुत्रियों से छुटकारा पाने उतावले हो उठे। उन्होंने सरकारों द्वारा प्रचारित सुविधाओं, परिवार नियोजन आदि का लाभ लेते हुए पुत्रियों का जन्म रोकना चाहा, फालत: अनेक दम्पतियों ने भू्रण हत्याएं शुरू कर दी। किसी ने एक तो किसी ने तो दो—तीन बार भ्रूण नष्ट कराये और बालिकाओं का आगमन रोका। स्थिति यह हुई कि कुछ ही दशकों में घर—घर पुत्रों की संख्या अधिक दिखले लगी, पुत्रियों की कम।

दम्पत्तियों ने गर्भपात कराने या भ्रूण हत्या कराने का क्रम जारी रखा फलत: धर्म की भारी अवहेलना हुई। हर दम्पति, माता—पिता कम कसाई अधिक प्रतीत होने लगे। परिणाम यह निकला कि आज सैंकड़ो की संख्या में योग्य पुत्र अपनी शादी नहीं कर पा रहे हैं। अनुपात बिगड़ जाने से सम्पूर्ण देश का समाज दुल्हनों का मुंह देखने को तड़प रहा है। बहुत सीधी सी बात है कि जब बेटी नामक लताएं अपने आंगन में नही उगाओगे तो दुल्हन रूपी फसल भी कैसे देख पाओगे।

बेटी और दुल्हन का अभाव तो हुआ ही समाज के अनेक परिवारों के हाथ भी हत्या से सन गये। जिन हाथों से श्री जी का अभिषेक हो रहा था वे हाथ हत्या पर औतारू हो गये घर—घर बहुओं के गर्भपात कराए गये और बेटियों का जन्म रोका गया।

हत्या करने से दम्पत्यिों के विचार और क्रियाकलाप मैले हो गये । कर्म श्रृंखला से बंध कर अपने ही परिवार में उत्तेजना और व्याभिचार युक्त जीवन चर्या जीने लगे। हर घर का एक क्षण भोग—विलास की दुर्गंध से धधकने लगा। मकान को शमशान बना दिया गया। पापों का भारी बोझ सिरों पर लाद लिया गया । पति—पत्नी एक दूसरे को मन ही मन पापी कहने लगे। पाप भी उन्होंने आपसी रजामंदी से ही किये थे। कुछ परिवारों में बहु की गोद में एक—दो बच्चियां देख कर उसकी उपेक्षा की जाने लगी और आगामी गर्भ को सम्पात कर देने बाध्य किया जाने लगा। बेचारी वधु का परिवारिक बहुमत के समक्ष भ्रूण हत्या की ओर झुकना पड़ा। गर्भपात से कितना पाप लगेगा, इस तरफ ध्यान ही न दिया। अनेक परिवार वधशाला बन गये, क्योंकि वहां तीन—तीन, चार—चार बहुएं थी। हरेक को भ्रूण हत्यार्थ बाध्य किया गया।

मगर गत कुछ वर्षों में आम आदमी का सोच परिपक्व हुआ है अत: हर गली मोहल्ले से विचार उठने लगे हैं कि वर्तमान परिवेश में भ्रूण हत्या आवश्यक नहीं है। पुत्र और पुत्री परिवार के लिए एक बराबर है अत: गर्भपात कराकर पाप के भागीदार नहीं बनना चाहिए न ही समाज का संतुलन बिगाड़ना चाहिए।

अत: अधिकांश दम्पति भ्रूण हत्या से बचने का प्रयास करते हैं। फिर भी कुछ ना समझ अज्ञानी और मिथ्या दृष्टि लोग अभी भी चोरी—छिपे ऐसे गलत कार्य में संलग्न हैं। यदि वे लोग आगम का अध्ययन करें तो अवश्य ही उनके विचारों में समय रहते सुधार हो सकता है। जो लोग धार्मिक ग्रंथ पढ़ पाते, उन्हें दिगम्बर मुनियों की प्रवचन सभा में दिशा—दर्शन हो सकते हैं। भ्रूण हत्याओं के विरोध में संतगण बहुत अच्छी शिक्षा दे रहे हैं।

उनके प्रवचन सुनने के बाद हजारों युवक—युवतियों ने भ्रुूण हत्या न करने का संकल्प लिया है। इस लेख के माध्यम से मैं भी देश की समस्त युवा पीढ़ी से निवेदन करता हूँ कि संत का संकेत समझें और घर को बधशाला ना बनने दें। घर में आने वाली हर बेटी का भाग्य अलग—अलग होता है बाद में वे पुरूषार्थ भी अलग — अलग तरीके से करते हैं और अपने लक्ष्य के समीप तक पहुंचती है फिर भ्रूण हत्या करने वाले हम कौन होते हैं ? अतीत की याद करें, सैकड़ों महान महिलाओं का चित्रण हमारे ग्रंथों में उपलब्ध है।

कल व आज को देखे तो सारे देश में महिला रत्न दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रपति, पार्टी अध्यक्ष, मुख्य मंत्री और विरोधी दल के नेता के रूप में कौन है ? देश की ही महिलाएं हैं श्रीमति प्रतिभा पाटिल, श्रीमती सोनिया गांधी, श्रीमती सुषमा स्वराज, कुमारी ममता बैनर्जी, कु.मायावती, श्रीमती जयललिता, श्रीमती मीरा कुमार के नाम न भूलें। ये तो कुछ ही नाम हैं उन जैसी सैंकड़ों महिला रत्न हर नगर में उपस्थित हैं, यह अलग बात है कि उनके नाम प्रकाश में नहीं आ पाये है। यदि ६० — ७० साल पहले की महिलाओं ने भ्रूण हत्या की होती तो उपरोक्त नारी रत्न कहां से उपलब्ध होते। स्वत: विचार करें।

वर्तमान में अनेक नारे एवं स्लोगन चलाये जा रहे हैं जिन्हें यहां रिपीट करना उचित प्रतीत नहीं होता। फिर भी याद रखें—नारी स्वर्ग की क्यारी है या नारी की प्रगति ही देश की प्रगति है और एक पुराना स्लोगन जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवता वास करते हैं।

जैन गजट ४ अगस्त ,२०१४