भगवान ऋषभदेव दीक्षा ,केवलज्ञान भूमि प्रयाग तीर्थक्षेत्र चालीसा

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भगवान ऋषभदेव दीक्षा ,केवलज्ञान भूमि प्रयाग तीर्थक्षेत्र चालीसा


-दोहा-

श्री वृषभेश जिनेश का ,पुण्यमयी शुभ धाम |
तीर्थ प्रयाग कहा जिसे ,अगणित झुके ललाम ||१||
चालीसा उस तीर्थ का, सबको हो सुखकार |
तपोभूमि आदीश की ,वंदन है शत बार ||२||

-चौपाई –

भारत की इस वसुंधरा पर, दो ही तीर्थ कहे हैं शाश्वत ||१||
श्री सम्मेदशिखर व अयोध्या, जन्म व मोक्ष यहीं से होता ||२||
कृतयुग की आदी से माना, तीर्थ प्रयाग भी बड़ा पुराना ||३||
हुए करोड़ों वर्ष जहाँ पर, दीक्षा ली थी प्रभु आदीश्वर ||४||
जहाँ प्रकृष्ट त्याग किया प्रभु ने,नाम प्रसिद्ध प्रयाग है जबसे||५||
जिस वटवृक्ष तले दीक्षा ली, उस तरु नीचे केवलज्ञान भी ||६||
शुभ ‘अक्षय वटवृक्ष’ नाम है, आज वहाँ पर विद्यमान है ||७||
वर्तमान में वह शुभ नगरी, इलाहाबाद स्टेट है यू.पी. ||८||
‘महाकुम्भ नगरी’ प्रसिद्ध है, जैन-अजैनों का वो तीर्थ है ||९||
हाईकोर्ट प्रसिद्ध यहाँ का, संस्कृति का यह स्थल बनता ||१०||
युग की आदी में इस भू पर, केशलोंच प्रारम्भ हुआ जब ||११||
वह उत्कृष्ट महाव्रत अब भी, धारण करते साधु संत ही ||१२||
पुरिमतालपुर का उपवन था, आदिप्रभू को ज्ञान था प्रगटा ||१३||
सुन्दर समवसरण की रचना, प्रथम बनी थी वहाँ अनुपमा ||१४||
ब्राम्ही सुन्दरि ने दीक्षा ली, कुमारिका की कर्म स्थली ||१५||
श्री वृषभेश पुत्र इक सौ इक, उनमें से थे ऋषभसेन नृप ||१६||
दीक्षा ले प्रभु के गणधर बन,प्रथम दिव्यध्वनि खिरी वहाँ पर ||१७||
त्रय नदियों का संगम स्थल, रत्नत्रय का मंगल सूचक ||१८||
गणिनी माता ज्ञानमती की, मिली प्रेरणा भक्तों को थी ||१९||
ऋषभदेव प्रभु तपस्थली तब, हुई साकार प्रयाग में सुन्दर ||२०||
धन्य तृतीय सहस्राब्दी थी, पाकर ऐसी दिव्य मातुश्री ||२१||
पुनि इतिहास उठा हो जीवित, जिनशासन वृद्धिंगत कीरत ||२२||
जम्बूद्वीप संस्था द्वारा, क्रय कर भू निर्माण हुआ था ||२३||
महाकुम्भ नगरी प्रसिद्ध था , आज ऋषभप्रभुमय हो प्रगटा ||२४||
बनी वहाँ कैलाशगिरी थी, जिस पर चढ़ जनता पुलकित थी ||२५||
बनें बहत्तर जिनचैत्यालय , ऊपर शांत ऋषभप्रभु राजें ||२६||
उसके एक ओर अति सुन्दर , दीक्षाकल्याणक जिनमंदिर ||२७||
मुनि मुद्रा में श्री आदीश्वर, हैं ध्यानस्थ उसी के अंदर ||२८||
समवसरण मंदिर अति न्यारा, दूजी ओर बना है प्यारा ||२९||
श्री कैलाशगिरी के नीचे , एक गुफा जहँ प्रभुवर तिष्ठे ||३०||
स्वर्ण वर्णयुत है जिनप्रतिमा , सूर्यकिरण पा बनी अनुपमा ||३१||
इस ही तीर्थक्षेत्र परिसर में, कीर्तिस्तम्भ मूर्ति संग सोहे ||३२||
अतिथीभवन भोजनालय है, उपवन,झूले, कार्यालय है ||३३||
अति रमणीक तीर्थ यह प्यारा, पीछे ट्रेन का भव्य नजारा ||३४||
ऋषभदेव का शांत तपोवन, बच्चों का करवाते मुंडन ||३५||
एक यही भावना हैं भाते, प्रभु जैसे कुछ गुण हम पाते ||३६||
तीरथयात्रा अति सुखकारी ,दुःख संकट सब हरने वाली ||३७||
इस नूतन तीरथ पर आना, श्रद्धायुत हो शीश झुकाना ||३८||
आत्मा तीर्थस्वरूप बनेगी, आध्यात्मिक सुख सहज ही देगी ||३९||
जय हो ज्ञानमती जी माता, जिनसे तीर्थ प्रयाग विख्याता ||४०||

-दोहा-

दीक्षा केवलज्ञान की, भूमि प्रयाग महान |
जिनशासन की यशोभू,को है कोटि प्रणाम ||१||
‘इंदु’ एक बस आश है, चालीसा कह आज |
मम आत्मा तीरथ बने, मिले मुक्ति साम्राज्य ||२||