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भगवान की मूर्ति से हमें शिक्षा लेनी चाहिये

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भगवान की मूर्ति से हमें शिक्षा लेनी चाहिये

भगवान हाथ पे हाथ धर के क्यों बैठे हैं ? पैर पर पैर रख कर क्यों बैठे है ? ऐसा आपने कभी सोचा मूर्ति मूक आवाज में संदेश देती है कि अब मैं चौरासी लाख योनियों में भटक चुका हूँ, अब चलने के लिये कोई जगह बाकी नहीं रही इसलिए ये पैर पर पैर रख कर बैठ गया हूँ और कोई लौकिक काम बाकी नहीं रहा है इसलिए ये इस मुद्रा से मुझे जन्म जरा मृत्यु पर विजय प्राप्त करना है तो आप भी मनन करिये और जन्म जरा मृत्यु के रोग पर विजय प्राप्त कर जीवन को सार्थक बना लो। अब प्रश्न है ?

हम मंदिर क्यों जाते है ? प्रभू दर्शन क्यों करते हैं ? घण्टा क्यों बजाते है ? परिक्रमा क्यों लगाते हैं ? प्रभू चरणों में चावल क्यों चढ़ाते है ? बिना ज्ञान के अंध श्रद्धा मंजिल पर नहीं पहुंचती। श्रद्धा करने के साथ—साथ ज्ञान हमें सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है।

मंदिर जाना दर्शन करना ही महत्वपूर्ण नहीं है। भगवान के शरीर की मूक भाषा से शिक्षा लेनी चाहिए। जिससे हमारा जीवन सुखमय हो जावें। प्रथम पैर धोकर मंदिर जी में प्रवेश करते समय तीन बार नि:शही बोलना चाहिये इसका अर्थ है जो कोई देव प्रभू के दर्शन कर रहा होगा वह आपको दर्शन के लिये उचित स्थान से हट जायेगा। नि:सही बोलने के साथ ही घण्टा बजाना चाहिये घंटे से निकलने वाली ऊँ की ध्वनि हमारे मस्तक से टकरा कर पुराने विचारों को हटा कर शुद्ध विचारों को स्थान देती है। तथा आस—पास में रहने वाले प्रभू भक्तों के लिये अलार्म का काम करती है और वातावरण ओंम्कार मय बन जाता है। चावल चढ़ाने का मतलब है कि चावल जमीन में बोने पर दुबारा नहीं उगता है। हम प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि चावल की तरह हमारा जन्म मरण भी न हो मुझे अक्षय पद की प्राप्ति हो जावे । तीन परिक्रमा करने का मतलब है कि भगवान के आभा मण्डल की पवित्रता हमारे अन्दर आ जावे, जब किसी को प्रसन्न करना होता है तो उसके चक्कर लगाना शुरू कर देते हैं। जिससे वह खुश हो जाता है। हमारे विचारों में कुछ समय के लिये परिवर्तन आ जाने से सम्यक दर्शन, ज्ञान चारित्र की प्राप्ति हो जाती है। यह रोजाना थोड़ी—थोड़ी प्राप्ति एक दिन हमारे अशुभ कर्मों को नष्ट करने में सहायक हो पंचम गति के रास्ते पर पहुंचा देती है। आरती करते समय भक्त को भावना आनी चाहिये कि दीपक की भाँति मेरे जीवन में तथा दूसरों के जीवन में ऐसा अखण्ड धर्म रूपी दीपक का प्रकाश होता है और सम्पूर्ण जगत में ऐसा दिव्य प्रकाश से अन्धेरा लुप्त हो जाये ताकि सम्पूर्ण जगत के प्राणी सुखी हो जावे।

भरत चक्रवर्ती के पास एक साथ तीन समाचार आये प्रथम पुत्र रत्न उत्पन्न का समाचार लाने वाले को अंगूठी पुरस्कार में दी । दूसरा समाचार आयुध शाला में चक्ररत्न उत्पन्न का उसको हाथ का गहना पुरस्कार में दे दिया । तीसरा समाचार आया कि भगवान ऋषभदेव को केवलज्ञान प्राप्त हुआ है सुनकर चक्रवर्ती प्रसन्नता में झूमने लगे तथा सारे शरीर का गहना उतार कर पुरस्कार में देकर तुरन्त ही भगवान के केवलज्ञान की पूजा करने कैलाश पर्वत को रवाना हो गये तो बन्धुओं चक्रवती ने धर्म को ही सर्व उपयुक्त समझा। महापुरूष अपने जीवन में धर्मकार्य ही करते हैं। धर्म ही हमारे साथ हमेशा रहेगा।

माँ—बाप बच्चे को रोजाना उंगली पकड़कर मंदिर ले जाते हैं तो बच्चा माँ—बाप के साथ भगवान के समक्ष झुकता है तो बच्चे में झुकने के संस्कार आ जाते हैं। गुरू चरण स्पर्श कराने की भावना से बच्चा माँ—बाप के चरण स्पर्श करने में संकोच नहीं करता, और बुढ़ापे में माँ—बाप को कन्धे पर बिठा कर तीर्थयात्रा करा कर उनका व अपना जीवन सार्थक कर लेता है और उसमें विनम्रमा आ जाती है, विवेकशील बन जाता है। जो माँ—बाप बच्चे को सिर्फ कॉन्वेंट शिक्षा ही दिलाते है। धर्म से अनविज्ञ रखते है वह समझ लें कि घर में एक आतकंवादी का पालन कर रहे है। धर्म —कर्म की परिभाषा है, कि जो शरीर के लिये किया जाता है वह कर्म है और जो आत्मा के लिये किया गया कार्य धर्म की श्रेणी में आता है। जिससे कभी न कभी भविष्य में जन्म —जरा—मृत्यु रूपी रोग हमेशा को मिट जाता है। जीवन प्राथमिकता धर्म की होनी चाहिये। जिससे जीवन में सुख शांति मिले।

यदि हम धर्म की छत्र—छाया में नहीं रहेंगे तो सारे ग्रह विपरीत प्रभाव हमारे जीवन पर डालते हैं। ज्योतिष शास्त्र का नियम है कि सूर्य ग्रह से पिता, चन्द्र ग्रह से माँ और मंगल ग्रह से भाई— बंधु और बुध ग्रह से बहिन ,बुआ, बेटी—बेटा और गुरू ग्रह से गुरू और शुक्र ग्रह से पत्नी, शनि ग्रह से नौकर, मित्र इत्यादि और राहु—केतु से बाहर जानवर, व्हीकल आदि की स्थिति देखी जाती है। आप पिता की सेवा करते हैं तो आपका सूर्यग्रह अनुकूल रहेगा। माता की सेवा करने पर चन्द्र ग्रह ठीक रहेगा। भाई तथा पड़ौसी आदि के साथ वात्सल्य भाव रखोगे तो मंगल ग्रह सदा आपके जीवन में मंगल ही मंगल करेगा। बहिन, बुआ, बेटी तथा पुत्रवधु को वात्सल्य सहित प्रिय वचन से सम्बोधित करोगे तो बुध ग्रह आपको उच्च कोटि पर पहुँचा देगा। गुरू की सेवा से गुरू आपकी जीवन प्याली को जीवन जीने की कला से भर देंगे। गुरू ग्रह आपके जन्म—जरा मृत्यु के रोग को सदा के लिये मिटाकर सिद्धालय में बिठा देगा। पत्नी के प्रति अच्छा व्यवहार रखेंगे तथा पत्नी को वासना की मशीन नहीं समझेंगे तो आपका शुक्र ग्रह ठीक रहेगा तथा घर में लक्ष्मी का प्रवेश करा देगा। नौकर मित्र आदि से उचित व्यवहार तथा वात्सल्य भाव रखेंगे तो शनिग्रह आप के अनुकूल रहेगा। पहली रोटी गाय को तथा पिछली रोटी कुत्ते को खिलायेंगे तो राहु—केतु आपके जीवन को खुशियों से भर देंगे। यह जैन दर्शन के अनुसार दया—दान में आता है, तथा भावों की शुद्धि भी होती है।

प्राचीन समय में पहली रोटी गाय को तथा पिछली रोटी कुत्ते को खिलाते थे।वर्तमान युग में आदमी बेईमान हो गया है कि गाय और कुत्ते की रोटी स्वयं खा जाता है। इसलिये ग्रह भी हावी हो रहे हैं और अशान्ति की जिन्दगी जी रहे हैं। राहू — केतु शनि ग्रहों की दुश्मन शराब, गुटखा, तम्बाकू बीड़ी सिगरेट, ड्रग्स आदि नशीली वस्तुएं हैं। अपनी जन्मपत्री ज्योतिषी को दिखाने से पहले इन नशीली वस्तुओं का त्याग कर देंगे तो जन्मपत्री दिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। हमारा जीवन सुखमय खुशबूदार गुलशन बन जायेगा और घर तथा समाज स्वर्ग बन जायेगा। सारे ग्रह हमारे अनुकूल हो जायेंगे तो भैया नशीली वस्तुआें के त्याग का संकल्प आज ही ले लो, जिससे शाश्वत सुख की प्राप्ति हो जावे। मनुष्य के अध: पतन का कारण दुर्गुण और व्यसन हैं। मनुष्य जीवन को दु:खी बनाते विलासिता और आशक्ति भाव है।।

१०५ क्षुल्लक नि:शंकित सागर
श्री पल्लीवाल जैन पत्रिका
२५ दिसम्बर २०१४