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भगवान पार्श्वनाथ दशभव की काव्यकथा

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भगवान पार्श्वनाथ दशभव की काव्यकथा

प्रस्तुति-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चन्दनामती

प्रिय पाठकों! जैनधर्म के २३वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के संघर्षशील जीवन से आप सभी को परिचित कराने हेतु यहाँ पर उनके दश भवों का कथानक काव्य में प्रस्तुत किया जा रहा है। मरुभूति की पर्याय से उन्होंने किस प्रकार अपने भाई कमठ के द्वारा किये गये उपसर्गों को सहन कर-करके स्वयं को तीर्थंकर पार्श्वनाथ बनाया, यह बात इस काव्यनाटिका के द्वारा दर्शायी गयी है। पार्श्वनाथ के जन्मकल्याणक, मोक्षकल्याणक आदि अवसरों पर इस नाटिका का मंचन कराने से इसका प्रभाव साक्षात्रूप में सामने आएगा। दश पात्रों के द्वारा एक-एक भवों की मोनो ऐक्टिंग भी प्रस्तुत कराई जा सकती है।

(१)

तर्ज-चाँद मेरे आ जा रे..........

सुनो इक कथा सुनाते हैं-२,
पारस प्रभू के दस-दस भवों की गाथा गाते हैं।।सुनो.।।
मरुभूति-कमठ दो भाई, इक राजा के मंत्री थे।
दिन और रात के सदृश, दोनों ही भिन्न मती थे।।
पुण्य और पाप कमाते हैं,
दोनों ही अपने-अपने करम के फल को पाते हैं।।सुनो.।।१।।
मरुभूति के संग इक दिन, राजा चले रणभूमि में।
तब मंत्री कमठ को सौंपा, था राज्यभार सब नृप ने।।
मौज तब कमठ उड़ाते हैं,
अरविंद राजा के राज्य में अन्याय चलाते हैं।।सुनो.।।२।।
इक दिन जब कमठ ने देखा, मरुभूति की सुन्दर भार्या।
अतिकामुक हो तब उसने, षड्यंत्र से पास बुलाया।।
प्यार से गले लगाते हैं,
अपने दुराचारों से सती को भ्रष्ट बनाते हैं।।सुनो.।।३।।
राजा जब आये वापस, यह बात पड़ी कानों में।
तब कमठ का सिर मुंडवाकर, मुँह काला किया उन्होंने।।
पाप का फल वे पाते हैं,
पापी कमठ को राजा राज्य से बाहर भगाते हैं।।सुनो.।।४।।
हो दुखी कमठ इक तापस, के आश्रम में जा पहुँचा।
‘‘चन्दनामती’’ तब उसको, मरुभूति मनाने पहुँचा।।
क्रोध उस पर दिखलाते हैं,
पत्थर शिला से मरुभूति को वे मार गिराते हैं।।सुनो.।।५।।

एक तपस्वी के द्वारा िंहसा का यह कुकृत्य देखकर वहाँ के तापसियों ने कमठ को आश्रम से निकाल दिया। तब वह जाकर एक जंगल में भीलों के साथ मिलकर चोरी, डवैâती करने लगा फिर तो कमठ का जीवन पूर्णरूप से व्यसन समन्वित हो गया। पुन: अगले भव में दोनों भाई कहाँ-कहाँ जन्म लेते हैं, सो देखें-अर्थात् मरुभूति मरकर हाथी हुआ और कमठ का जीव कुक्कुट सर्प हो गया।

(२)

तर्ज-झुमका गिरा रे.........

हाथी आया रे,
जंगल में हा हाकार मचाता हाथी आया रे।।टेक.।।
सल्लकि वन में एक बार, अरविंद मुनि का संघ आया।
वज्रघोष हाथी ने वहाँ, हिंसा का ताण्डव दिखलाया।।
कुछ मन में आया रे,
वह हाथी फिर आचार्य के सम्मुख शान्ती पाया रे।।१।।
श्री अरविंद सूरि ने अपने, अवधिज्ञान से जान लिया।
मरुभूति मंत्री ही हाथी रूप में है पहचान लिया।।
उसको समझाया रे,
मुनि ने उसको समझाकर अणुव्रत ग्रहण कराया रे।।२।।
नदी में पानी पीते इक दिन, हाथी फस गया कीचड़ में।
हाथी को डस लिया वहाँ, इक कुक्कुट सर्प कमठचर ने।।
स्वर्ग को पाया रे,
तब हाथी मरकर स्वर्ग में देव की योनि पाया रे।।३।।

इस प्रकार शांत और वैराग्यमयी परिणामों से हाथी ने मुनिराज के उपदेश को सुना और उसे अपने पूर्व जन्म का जातिस्मरण हो गया। वह सोचने लगा कि अरे! मैं तो अपने भाई कमठ से क्षमा मांगकर उसे वापस बुलाने गया था और उस भाई ने ही मेरी हत्या कर दी। मैं उसके मोह में मरकर इस पशु योनि में आ गया। ओह! अब मुझे इस पर्याय से छूटना है। मुनि ने उससे कहा-अरे गजराज! पिछले जन्म में तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मंत्री थे, तुम्हारे वियोग में बहुत दिन तक मैं दु:खी रहा, फिर एक दिन मैं महल की छत पर बैठा आकाश की ओर देख रहा था कि उसमें मुझे बादलों से बना एक सुन्दर सा मंदिर दिखा। मैंने उसी तरह का मंदिर बनवाने की भावना से ज्यों ही कागज-कलम उठाया कि इसका चित्र बना लूँ, तुरंत वह मंदिर का दृश्य नष्ट हो गया। ऐसी बादलों की क्षणिक स्थिति देखकर मैंने विचार किया कि इसी प्रकार यह मेरा जीवन भी क्षण भंगुर है, न जाने कब नष्ट हो जावे, अत: मैंने दीक्षा धारण कर ली। यह सुनकर हाथी ने अणुव्रत धारण कर समता भाव से मरण कर बारहवें स्वर्ग में देव पद प्राप्त कर लिया और कुक्कुट सर्प हिंसक परिणामों से मरकर नरक में चला गया। वह देव स्वर्ग में कैसे जीवन व्यतीत करता है पुन: कहाँ जाकर जन्म धारण करता है, यह जानना है-

(३)

तर्ज-कभी तू.............

कभी मंदिर में जाते हैं, कभी पूजा रचाते हैं,
कभी देवों के संग में स्वर्गों में आनन्द मनाते हैं।
जय जय जिनवर स्वामी, जय हो अन्तर्यामी-२।।टेक.।।
मेरु सुदर्शन के सोलह, चैत्यालय का वंदन करते।
नन्दीश्वर में जा बावन, चैत्यालय का अर्चन करते।।चैत्यालय का......
प्रभु पंचकल्याणक में, जा भक्ति भाव करते।
चारण ऋद्धिधारी मुनि का, उपदेश श्रवण करते।।कभी.।।१।।
शशिप्रभ देव स्वर्ग के नन्दन, वन में क्रीड़ा करते हैं।
अपनी सुन्दरियों के संग, वैभव में रमते हैं।।वैभव में रमते हैं......
सब देव वहाँ उसका, आदर भी करते हैं।
उसके सम्यक्त्व तथा तप का, अनुमोदन करते हैं।।कभी.।।२।।
पुण्य-पाप की महिमा देखो, देव यहाँ सुख भोग रहा।
साँप बेचारा पाप के कारण, नरक में जा दुख भोग रहा।।नरक में......
दो भाई का किस्सा, कैसा रोमांचक है।
पारस प्रभु के भव-भव का, यह सत्य कथानक है।।कभी.।।३।।

इस प्रकार स्वर्ग में सोलह सागर की आयु भोगकर वह शशिप्रभ देव अपने पुण्य प्रभाव से जम्बूद्वीप के विदेह क्षेत्र में स्थित विजयार्ध पर्वत पर लोकोत्तम नामक नगर के विद्याधर राजा की रानी के गर्भ में आ गया। वहाँ जन्म लेकर वह अग्निवेग नाम का विद्याधर राजा हुआ। राज्य सम्पदा को भोगते हुए सहसा भरी जवानी में ही एक दिन समाधिगुप्त मुनिराज के पास वह दर्शन करने गया। धर्म का उपदेश सुनकर अग्निवेग विद्याधर क्या करता है यह देखें- इधर कमठचर नारकी नरक से निकलकर हिमगिरि पर्वत की गुफा में अजगर सर्प हो गया फिर आगे क्या होता है? देखें-

(४)

सब छोड़ कुटुम्ब परिवार, राज दरबार, बने मुनिराजा,

जोड़ा शिवपथ से नाता।।
मुनि का उपदेश श्रवण करके।
वैराग्य भाव धारण करके।।
गुरु से मांगी दीक्षा भवजलधि जिहाजा,
जोड़ा शिवपथ से नाता।।१।।
लौकिक विद्या सब छोड़ दिया।
शिवपथ से नाता जोड़ लिया।।
आध्यात्मिक विद्या पाकर हुए महाराजा,
जोड़ा शिवपथ से नाता।।२।।
घोरातिघोर तप करना है।
उपसर्ग परीषह सहना है।।
हिमगिरि पर्वत की गुफा में ध्यान लगा था,
जोड़ा शिवपथ से नाता।।३।।
वहाँ अजगर सर्प ने आकर के।
मुनिवर को निगल लिया उसने।।
फिर भी मुनिराज के तप में हुई न बाधा,
जोड़ा शिवपथ से नाता।।४।।
मुनिवर ने मरण समाधि किया।
स्वर्गों का वैभव प्राप्त किया।।
मन में अजगर प्रति शत्रुभाव नहिं आता,
जोड़ा शिवपथ से नाता।।५।।

समताभाव से सल्लेखनापूर्वक मरण करके मुनिराज तो सोलहवें स्वर्ग में देव हो गये और अजगर कुटिल भावों से मर कर छठे नरक में उत्पन्न हुआ। सुख और दु:ख का यह खेल अनादिकाल से प्रत्येक प्राणी खेल रहा है। देखो! अब मुनिराज स्वर्ग के देवता बनकर वहाँ कैसे जीवन बिताते हैं तथा बेचारा अजगर सर्प का जीव नरक में कैसा दु:ख भोग रहा है। स्वर्ग के सभी देवता उस नये देव को देखकर प्रसन्नतापूर्वक बोलते हैं-

(५)

तर्ज-माई रे माई.............

देखो इक मुनिराज मरणकर, स्वर्ग हमारे आये।
चलो इन्हें हम नये-नये, मंदिर के दर्श करायें।।
जय हो सिद्धप्रभू की जय, जय हो सिद्धप्रभू की जय.।।
पूर्व जन्म में कष्ट इन्होंने, बहुत सहे हैं भाई।
लेकिन इनके धैर्य के आगे, शक्ति न कुछ टिक पाई।।
मरुभूति से लेकर अब तक, इनके भव बतलाएं।
चलो इन्हें हम नये-नये, मन्दिर के दर्श करायें।।
जय हो सिद्धप्रभू की जय, जय हो सिद्धप्रभू की जय.।।१।।
हे पुण्यात्मन् देवराज! तुम, भावी तीर्थंकर हो।
तुम जन्मोगे मध्यलोक में, युग के क्षेमंकर हो।।
आज स्वर्ग में भी तुमसे, कुछ शिक्षा लेने आये।
चलो इन्हें हम नये-नये, मंदिर के दर्श करायें।।
जय हो सिद्धप्रभू की जय, जय हो सिद्धप्रभू की जय.।।२।।

अच्युत स्वर्ग की असीम विभूति में सुखपूर्वक निवास करते हुए बाईस सागर की आयु वैâसे बीत गई उस देव को पता ही नहीं चला, पुन: वहाँ से निकलकर मनुष्य गति में चक्रवर्ती का वैभवपूर्ण पद प्राप्त कर लिया-

(६)

इस मध्यलोक में जम्बूद्वीप के अन्दर क्षेत्र विदेह कहा।

वहाँ वज्रवीर्य राजा की पटरानी विजया का महल बना।।
इक दिन रात्री में पांच सुखद सपनों को रानी ने देखा।
मेरु पर्वत, रवि, शशि के संग नभ में इक देव भवन देखा।।१।।
जल से परिपूर्ण सरोवर लख, रानी की निद्रा भंग हुई।
इन स्वप्नों का फल क्या होगा, इसमें ही वह चिरमग्न हुई।।
फिर सोचा इन सपनों का फल, मैं अपने पति से पूछूँगी।
फल उनका शुभ होवे या अशुभ, आगे उनके प्रति सोचूँगी।।२।।
राजा की राजसभा में जा, अर्धासन पर वह बैठ गई।
अपने सपनों को बतलाकर, उत्तर सुनने को बैठ गई।।
राजा ने अतिशय खुश होकर, बतलाया तुम सुत जन्मोगी।
छह खण्ड धरा पति चक्रवर्ति की माँ, बनकर तुम चमकोगी।।३।।
नव माह प्रतीक्षा के नन्तर इक राजपुत्र का जन्म हुआ।
उसके पुण्योदय के बल पर वह पद्मदेश भी धन्य हुआ।।
शिशु वज्रनाभि स्वर्गों का वैभव छोड़ धरा पर आया है।
मानो वह वैभव ही फिर से उसके चरणों में आया है।।४।।
शैशव से बाल्यावस्था में वह वज्रनाभि जब पहुँच गया।
अपनी आकर्षक क्रीड़ाओं से सबके मन को मोह लिया।।
वह दूज चन्द्रमा के समान वृद्धिंगत हुआ गुणों में भी।
तब चक्ररत्न उत्पन्न हुआ उनकी आयुधशाला में ही।।५।।
नृप वज्रनाभि ने श्री जिनेन्द्र की पूजन कर प्रस्थान किया।
कुछ समय में ही छह खण्ड धरा को जीत पूर्ण सम्मान लिया।।
इस अतुलनीय वैभव में भी नृप चक्रवर्ति नहिं पूâल गया।
नश्वर कंचन अरु कीर्ति कामिनी में भी धर्म न भूल गया।।६।।
सुखपूर्वक राजा वज्रनाभि निज राजसुखों को भोग रहे।
धर्मार्थ काम पुरुषार्थों को क्रमश: जीवन से जोड़ रहे।।
वे देवशास्त्रगुरु की सेवा कर जनता पर शासन करते।
निज कर्तव्यों का पालन कर वसुधा का संचालन करते।।७।।
इक बार राज उपवन में ही, निग्र्रंन्थ मुनी का संघ आया।
परिजन पुरजन के संग राजा, उनके दर्शन को खुद आया।।
राजा के नम्र निवेदन पर, गुरु ने उपदेश सुनाया है।
उपदेश श्रवण कर वज्रनाभि के, मन वैराग्य समाया है।।८।।
वे चिन्तन करते हैं मैंने भोगों का अनुभव बहुत किया।
पर तृप्ति न मन की हुई अत: मैंने इनसे मुख मोड़ लिया।।
अविनश्वर सुख की प्राप्ति हेतु पुरुषार्थ मुझे अब करना है।
नश्वर धन वैभव महल आदि का त्याग मुझे अब करना है।।९।।
यह सोच चक्रवर्ती नृप ने छह खंड राज्य को त्याग दिया।
क्षण भर विराग की संगति से वैरागी पद स्वीकार लिया।।
राजा बन गये दिगम्बर मुनि तो उनकी जय जयकार हुई।
गुरु वज्रनाभि के अन्दर सच्ची तप शक्ती साकार हुई।।१०।।
वे शत्रु-मित्र सुख-दुख, स्तुति-निंदा में समता रखते हैं।
आतम सुख की प्राप्ती हेतु वे घोर तपस्या करते हैं।।
वे यत्र-तत्र कर पदविहार पुनरपि वन में ध्यानस्थ हुए।
आतापन योगों के द्वारा कर्मों के बंधन ध्वस्त किए।।११।।
थे ध्यानलीन इक दिन मुनिवर नहिं बाह्य विकल्प उन्हें कुछ था।
तब वही कमठ का जीव भील बनकर हो गया उपस्थित था।।
मुनि को लखकर उस व्रूर भील ने और व्रूरता दिखलाई।
हो कुपित तीक्ष्ण बाणों से उसने मुनि को पीड़ा पहुँचाई।।१२।।
था असहनीय उपसर्ग किन्तु वे वज्रनाभि मुनि ध्यानमगन।
सह लिया देह से निस्पृह हो बारहभावन का कर चिन्तन।।
उपयोग में स्थिरता लाकर चेतन आत्मा में रमण किया।
फिर धर्मध्यान में एक तान हो नश्वर तन से गमन किया।।१३।।

(७)

मानव के तन से निकल मुनी की आत्मा ग्रैवेयक पहुँची।

अहमिन्द्र बना मध्यम ग्रैवेयक में जन्मा हो गया सुखी।।
सत्ताइस सागर की आयू तक दिव्य सुखों को भोग लिया।
फिर मध्यलोक में आकर राजा बनकर सुख उपभोग किया।।१४।।
देखो! इक ओर सुखामृत है जो मरुभूति को प्राप्त हुआ।
इक ओर दुखों का सागर है जो भ्रात कमठ को प्राप्त हुआ।।
समतापूर्वक दुख सहने से आगे सुख ही सुख मिलता है।
निष्कारण दुख देने वालों को उसका फल दुख मिलता है।।१५।।
वह भीलराज भी रौद्रध्यान से मरकर सप्तम नरक गया।
लाखों बिच्छू के डंक सदृश भारी कष्टों में तड़प गया।।
अत्यन्त दुखी हो हाय-हाय कहकर विलाप वह करता है।
फिर ज्ञान विभंगावधि द्वारा पूरब भव सुमिरन करता है।।१६।।
पश्चात्तापों की अग्नी में वह झुलस रहा अज्ञानी है।
कैसे दु:खों को सहन करूँ रो रो कहता वह प्राणी है।।
उस नरक क्षेत्र में क्षणभर भी नहिं शांति उसे मिलने पाती।
कोटी जिह्वा मिलकर उस दुख का वर्णन भी नहिं कर पाती।।१७।।
पूरबकृत पापकर्म को वह, स्मृत कर दु:ख को पाता है।
इच्छा है जग भर अन्न मिले, लेकिन कण एक न पाता है।।
सागर भर पानी पी जाऊँ, ऐसी लगती है प्यास वहाँ।
लेकिन इक बूँद न जल मिलता, ऐसा नरकों का दु:ख महा।।१८।।
ऐसे भीषण दु:खों को उसने, पूरी आयू सहन किया।
सत्ताइस सागर की आयू, रोते-रोते ही बिता दिया।।
सागर की परिभाषा सुनकर, रोमांच हृदय में होता है।
कैसे बीता होगा यह काल, जो अनन्तकाल सम होता है।।१९।।

इस प्रकार वह पापी कमठ का जीव सप्तम नरक की सत्ताइस सागर प्रमाण मध्यम आयु को भोग रहा है, वहाँ अन्य नारकी जीव पूर्व वैर के कारण उसके शरीर के तिल-तिल खण्ड कर देते हैं परन्तु वहाँ असमय में मृत्यु नहीं होने से वह शरीर पुन: पारे के समान एकमेक हो जाता है। नरकों के ऐसे असह्य दु:खों को जानने के बाद मनुष्य को हमेशा अच्छे-अच्छे कार्य करना चाहिए ताकि उसे नरक जैसी दुर्गति में न जाना पड़े। हाँ! ये तो हुई कमठ के जीव की बात, अब आपको जानना है कि मरुभूति का जीव मध्यम ग्रैवेयक की सत्ताइस सागर प्रमाण आयु को पूर्ण करके कहाँ गया-

(८)

शेरछंद- अब आगे सुनो तुम कथा साकेतपुरी की।

राजा थे वज्रबाहु रानी प्रभाकरी थी।।
मरुभूति का वह जीव इनका पुत्र हो गया।
‘आनन्द’ कुमार नाम से प्रसिद्ध हो गया।।१।।
बीता समय वह पुत्र महाराजा बन गया।
गुणयुक्त महामण्डलीक राजा बन गया।।
इक बार नंदीश्वर परब में आठ दिनों तक।
राजा ने किया पाठ नन्दीश्वर का भक्तियुत।।२।।
अगणित जनों ने पाठ देख कर्मक्षय किया।
मुनिराज विपुलमती ने भी दर्श था किया।।
राजा ने मुनीराज चरण में नमन किया।
उनके मुखारविन्द से प्रवचन श्रवण किया।।३।।
पूछा मुनी से राजा ने जो उनको शंका थी।
प्रतिमाएँ अचेतन हैंकैसे पुण्य फल देतीं?
मुनि बोले-‘इनकी वीतरागता में है शक्ती।
औषधि है अचेतन परन्तु रोग को हरती।।४।।
फिर मुनि ने नृप को सूर्य की महिमा भी बताई।
उसके विमान की कही लम्बाई-चौड़ाई।।
उस सूर्य के विमान में जिनभवन बने हैं।
वे भवन चमर, छत्र, भामण्डल से सजे हैं।।५।।
हैं इक सौ आठ मूर्तियाँ उनमें विराजतीं।
औ यक्ष-यक्षियों की मूर्तियाँ भी राजतीं।।
जो भव्यजीव मूर्तियों की वंदना करें।
वे क्रम से सुख को भोग मुक्तिकन्या वश करें।।६।।
मुनिराज का उपदेश सुन के राजा खुश हुए।
वे सूर्यबिम्ब के प्रती श्रद्धावनत हुए।।
नृप ने सुवर्ण सूर्य का विमान बनवाया।
उसको रतन की मूर्तियों से खूब सजाया।।७।।
श्रद्धा व भक्ति से वे सूर्य बिम्ब पूजते।
जिसके प्रसाद से वे कर्म दूर कर लेते।।
आचार्य कहते हैं जगत में उसी समय से।
सूरज को पूजने की प्रथा शुरू हुई है।।८।।
इक दिन सभा में बैठे थे दर्पण में मुख दिखा।
अपने ही सिर में एक धवल केश लख लिया।।
तत्काल वे भव-भोग से विरक्त हो गए।
संसार की असारता को वे समझ गए।।९।।
निज पुत्र को साम्राज्य सौंप मुनि निकट गए।
जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर वे भी मुनि भए।।
अट्ठाईस मूलगुण को अब वे पालने लगे।
तप-त्याग से वे कर्मों को प्रक्षालने लगे।।१०।।
गुरु के निकट में बैठ के श्रुत अध्ययन किया।
फिर सोलह भावनाओं का भी चिंतवन किया।।
जिनके निमित्त उन्हें मिली तीर्थंकर प्रकृती।
फिर और भी अनेक ऋद्धियाँ उनमें प्रकटीं।।११।।
इक बार वे मुनिराज ध्यानलीन खड़े थे।
प्रतिमा का योग लेके अचल शान्त खड़े थे।।
आया तभी इक सिंह वहाँ गर्जना करता।
पापी कमठ का जीव वह नरकों से आया था।।१२।।
उसने मुनी को देखा क्रोध से भड़क उठा।
टुकड़े किए शरीर के फिर खाने लग गया।।
उपसर्ग समझ वे मुनी सब सहन कर रहे।
तन से न राग शत्रु सिंह से न बैर है।।१३।।
वे धीर-वीर तपोधनी ज्ञानपुञ्ज हैं।
करुणा-क्षमा की मूर्ति को मैं करूँ नमन है।।
है प्रार्थना मुझे भी ऐसी शक्ति प्राप्त हो।
ऐसी क्षमा करूँ कि सब विघ्नों का नाश हो।।१४।।

वास्तव में क्षमाभाव की कितनी महिमा है! यह क्षमा जिसके हृदय में स्थापित हो जाती है उसमें न जाने कितनी सहनशक्ति आ जाती है कि वह अपने ऊपर किए जा रहे अकारणिक उपसर्ग को भी आसानी से सहन कर लेता है। मरुभूति के उस क्षमाशील जीव ने मुनि की पर्याय में कमठ के जीव सिंह द्वारा किए गए घोर उपसर्ग को सहन करते हुए शुभ परिणामों से मरणकर दिव्य वैक्रियिक देह धारण कर लिया अर्थात् आनत नामक तेरहवें स्वर्ग के प्राणत नामक विमान में इन्द्र हो गए। अब आगे की कथा इस प्रकार है-

(९)

तर्ज-आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ.............

आओ भक्तों! तुम्हें सुनाएँ, कथा एक इन्सान की।
क्षमा-धैर्य के द्वारा बनने, वाले प्रभू महान की।।
जय जय जिनवरं-४।।
आनन्द मुनिवर मध्यलोक से, ऊध्र्वलोक में पहुँच गए।
आनत नामक स्वर्ग में जाकर, वे तो बहुत प्रसन्न हुए।।
वहाँ की धरती रत्न और मणियों से ज्योतिर्मान थी।
क्षमा-धैर्य के द्वारा बनने, वाले प्रभू महान की।।
जय जय जिनवरं-४।।१।।
स्वर्गपुरी में उनको सुन्दर, नवयौवन तन प्राप्त हुआ।
दिव्य अवधि चक्षू के द्वारा, सब बातों का ज्ञान हुआ।।
पहँुचे मंदिर सबसे पहले, पूजा की भगवान की।
क्षमा-धैर्य के द्वारा बनने, वाले प्रभू महान की।।
जय जय जिनवरं-४।।२।।
कभी मेरु पर्वत पर जाकर दर्शन-वंदन करते हैं।
द्वीप नन्दीश्वर में जाते अरु समवसरण में जाते हैं।।
दिव्यध्वनी सुन किया उन्होंने, जीवन का उत्थान भी।
क्षमा-धैर्य के द्वारा बनने वाले, प्रभू महान की।।
जय जय जिनवरं-४।।३।।
कभी देव-देवी के संग में, मनोविनोद किया करते।
वैभव अतुल भोगते फिर भी, उसमें रमा नहीं करते।।
भावी तीर्थंकर हैं वे तो, करते समरस पान ही।
क्षमा-धैर्य के द्वारा बनने, वाले प्रभूू महान की।।
जय जय जिनवरं-४।।४।।

ये तो आप समझ ही गए हैं कि उस पुण्यशाली जीव ने स्वर्ग में किस-किस प्रकार के दिव्यसुखों का उपभोग किया, अब आप उनके दशवें भव अर्थात् भगवान पार्श्वनाथ के जीवन के बारे में जानेंगे-

(१०)

वाराणसि नगरी पुण्यभूमि, जहाँ अश्वसेन महाराजा थे।

उनकी रानी वामा देवी, सब गाते उनकी गाथा थे।।
उनके आँगन में धनकुबेर, रत्नों की वर्षा करते थे।
तीर्थंकर जन्मेंगे यहाँ पर, वे ऐसा सूचित करते थे।।१।।
इक रात्री में वामा देवी ने, सुन्दर स्वप्ने देखे थे।
नहिं एक नहीं दो नहीं उन्होंने, सोलह सपने देखे थे।।
प्रात: रानी वामा देवी, अपने पति देव के निकट गर्इं।
पति की आज्ञा पा करके वह, अर्धासन पर थीं बैठ गई।।२।।
स्वप्नों का वर्णन रानी के फिर क्रम-क्रम से बतलाया था।
सुनकर वेâ राजा अश्वसेन का, रोम-रोम हरषाया था।।
‘तुम तीर्थंकर जननी होंगी’, स्वप्नों का यह फल बतलाया।
सुनकर वामा देवी ने सोचा, सफल हुई मेरी काया।।३।।
नव महिने बीत गए सुख से, माता को नहिं संक्लेश हुआ।
आई जब पौष वदी ग्यारस, रवि सदृश पुत्र उत्पन्न हुआ।।
माँ-पिता सहित तीनों लोकों की, जनता अतिशय पुलकित थी।
सौधर्म इन्द्र आए सह परिकर, आई शचि इन्द्राणी भी।।४।।
सौधर्म इन्द्र बालक को लेकर, गए सुमेरु पर्वत पर।
वहाँ पाण्डुकशिला बनी सुन्दर, अभिषेक किया सबने मिलकर।।
जन्माभिषेक के बाद इन्द्र ने, प्रभु का ‘पार्श्व’ नाम रक्खा।
दश अतिशय सहित पार्श्व प्रभु के, चरणों में मस्तक है झुकता।।५।।
पारस कुमार हो गए युवा, उनका शरीर अतिशय सुन्दर।
पितु अश्वसेन बोले-अब जल्दी ब्याह करो हे राजकुवर!
पर पार्श्ववुंâवर ने पितु के इस, प्रस्ताव को नहिं स्वीकार किया।
असिधारा व्रत जो महापूज्य, उसको ही अंगीकार किया।।६।।
इक बार पार्श्वप्रभु मित्रों संग, वनक्रीड़ा करने निकले थे।
वहाँ देखा एक तापसी को, जो पंचाग्नी तप करते थे।।
वे तपसी और नहीं कोई, प्रभु पार्श्वनाथ के नाना थे।
उनको नहिं ज्ञान रंच भी था, वे करते तप मनमाना थे।।७।।
वे पार्श्वप्रभू निज मित्रों संग, तपसी के निकट थे पहुँच गए।
मैं हूँ इसका नाना नहिं इसने, नमस्कार है किया मुझे।।
यह सोच तापसी ने गुस्से में, लकड़ी पर था वार किया।
पारस प्रभु समझाते ही रहे, उसने लकड़ी को फाड़ दिया।।८।।
उस लकड़ी में था नागयुगल, उसके दो टुकड़े हुए तभी।
प्रभु बोले तपसी से तुम अपना, गर्व त्याग कर दो अब ही।।
तपसी बोले मैं नाना हूँ, तूने नहिं मुझको नमन किया।
मैं घोर तपस्या करता हूँ, तूने नहिं मेरी विनय किया।।९।।
प्रभुवर बोले-जिस तप में हिंसा, वह तप नहीं कुतप ही है।
तुम सम्यक् तप धारण कर लो, कल्याण तुम्हारा निश्चित है।।
उपदेश श्रवण कर नागयुगल ने, निज शरीर का त्याग किया।
धरणेन्द्र और पद्मावती बनकर, जीवन का कल्याण किया।।१०।।
वह तपसी जीव कमठ का था, यह याद सभी को रखना है।
किस्सा पढ़कर यह तुम्हें किसी से, बैर कभी नहिं करना है।।
अब आगे सुनो पार्श्वप्रभु निज दरबार में इक दिन बैठे थे।
साकेतपुरी से एक दूत, आया कुछ दिव्य वस्तुएँ ले।।११।।
राजा ने कुछ क्षण बाद दूत से, पूछा हाल अयोध्या का।
उस कुशल दूत ने सुन्दर वर्णन, करना शुरू किया वहाँ का।।
वर्णन सुनते-सुनते पारसप्रभु, के मन में वैराग्य हुआ।
तत्क्षण लौकान्तिक सुर आए, जय-जय का स्वर भी गूँज उठा।।१२।।
पालकि में बैठ पार्श्वप्रभु पहुँचे, अश्वनाम के उपवन में।
थी पौष वदी ग्यारस शुभतिथि, जिस दिन दीक्षा ली प्रभुवर ने।।
थे गुल्मखेटपुर के राजा, था ब्रह्मदत्त जिन नाम भला।
आहार प्रथम प्रभु को देने का, उनको ही सौभाग्य मिला।।१३।।
इक बार पार्श्वप्रभु ने अपनी, आत्मा को ध्यान में लीन किया।
शंबर ज्योतिष के रूप में कमठासुर ने बहु उपसर्ग किया।।
कभी पत्थर बरसाए कभी अग्नी, आँधी कभी चलाई थी।
लेकिन प्रभु मेरु सदृश अविचल, नहिं उनको कुछ कठिनाई थी।।१४।।
उपसर्ग समय सहसा धरणेन्द्र, देव का आसन काँप उठा।
निज भार्या संग प्रभु के मस्तक पर, छत्र उन्होंने तान दिया।।
धरणेन्द्र युगल को देखा ज्यों ही, त्यों ही वह पापी भागा।
प्रभु ने श्रेणी आरोहण कर, वैâवल्य परम पद को पाया।।१५।।
इन्द्राज्ञा से धनपति ने अद्भुत, समवसरण रचना कर दी।
जिस स्थल पर उपसर्ग हुआ, वह ‘अहिच्छत्र’ हो गया तभी।।
शंबर नामक वह ज्योतिषि भी, पा काललब्धि कुछ शांत हुआ।
प्रभु चरणों में कर नमस्कार सम्यग्दर्शन को प्राप्त किया।।१६।।
यह देख सात सौ तपसी भी, सम्यग्दृष्टी बन गए अहो!
तुम भी अपने जीवन में कभी, मिथ्यात्व को ना आश्रय देवो।।
कुछ कम सत्तर वर्षों तक प्रभुवर, समवसरण में राज रहे।
जब एक माह की आयु बची, सम्मेदाचल पर पहुँच गए।।१७।।
वहाँ छत्तिस मुनियों सहित प्रभू ने प्रतिमायोग लगाया था।
फिर श्रावण शुक्ला सप्तमि के दिन, मोक्षधाम को पाया था।।
प्रभु पार्श्व के बाद नहीं कोई, तीर्थंकर मोक्ष गए यहाँ से।
अतएव इसे ‘‘पारसहिल’’ नाम से, जाना जाता है तब से।।१८।।
पारस सम मेरा भी जीवन, बन जावे यही प्रार्थना है।
मैं क्षमा, धैर्य गुण को धारूँ, बस केवल यही कामना है।।
अपकार करे कोई कितना, दुर्भाव नहीं मन में आवे।
जब तक नहिं मोक्ष मिले तब तक, ‘चन्दनामती’ तव गुण गावे।।१९।।

इस प्रकार भगवान पार्श्वनाथ के विस्तृत जीवन चरित्र को संक्षिप्तरूप से इस काव्यकथा के माध्यम से प्रस्तुत किया है आप सभी भक्तगण इसको पढ़कर भगवान पार्श्वनाथ के जीवन से परिचित होवें तथा उनके जीवन से कुछ न कुछ प्रेरणा अवश्य प्राप्त करें, यही मंगल भावना है।