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भगवान पार्श्व के १०८ सिद्धस्थान

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भगवान पार्श्व के १०८ सिद्धस्थान

ग्वालियर, पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार नेमिनाथ भगवान से संबद्ध महाभारत कालीन नगर सुप्रतिष्ठ केवली की निर्वाणभूमि है। भगवान पार्श्र्वनाथ की ४२ फीट पद्मासन विश्व की सर्वाधिक विशाल प्रतिमा एक पत्थर की बावड़ी पर स्थित है।

भगवान पार्श्र्वनाथ के चमत्कारिक वृत्तांतों के रूप में अनेक कथायें प्रचलित हैं। देवभद्रपुरी का पार्श्र्वनाथ चरित प्राकृत भाषा का अनुपम ग्रंथ है। इसमें भगवान पार्श्र्वनाथ के १०८ नाम दिये गये हैं। अपभ्रंश में पद्मर्कीित कृत तथा हिन्दी में भूधरदास कृत पारसनाथ चरित्र उल्लेखनीय है। इनमें भी भगवान पार्श्र्वनाथ के अनेकों नामों जैसे कलिकुण्ड, कुर्वुटेश्वर, स्थंभन, संखपुर, हरिकंशवीनगर, भुद्धदंती कोका वसति, श्रीपुर, अंतरिक्ष, ढिपुंरी, चेल्लण, पार्श्र्वनाथ, अजाग्रह, नवनिधि, कट्हेट का अहिक्षेत्रा, नागह्रद, माहेन्द्रपर्वत, ओंकारेश्वर पर्वत, पुष्पक रावर्तक, महाकाल में पाताल चक्रवर्ती, मथुरा में कल्पद्रुम, चम्पा में अशोक नाम मिलते हैं।

पन्द्रहवीं शती के ग्रंथ अष्टोत्तर शत पार्श्र्वनाथ में श्री जिन भद्रसूरी ने १०८ सिद्ध पार्श्र्वनाथ मंदिरों का उल्लेख किया है उसमें गोपाचल (ग्वालियर) का भी उल्लेख है। इन निम्न सभी स्थानों के अन्वेषण एवं पुरातात्विक अनुसंधान की महती आवश्यकता है। अनुसंधानकर्ताओं के समक्ष यह शोध टिप्पणी इसी आशय से रखी गई है। १०८ पार्श्र्वनाथ के सिद्ध स्थानों की सूची निम्नानुसार है—

(१) वाणारस

(२) राजगृह

(३) पचारइ

(४) धालनयर

(५) सिद्धक्षेत्र

(६) गिरनार

(७) जीरावला

(८) फल वृद्धि

(९) नाग्रदह

(१०) करहेड़द

(११) कलिकुंड

(१२) अणहिलवाड़

(१३) थंभणपुर

(१४) मंगलपुर

(१५) चित्रकूट

(१६) देवगिरि

(१७) श्रीपुर

(१८) पच्चपुर

(१९) नगरकोट

(२०) नागौर

(२१) गिरिपुर

(२२) अजाहर

(२३) राणपुर

(२४) अजयमेरु

(२५) जावालपुर

(२६) जैसलमेर

(२७) हमीरपुर

(२८) पाल्हणपुर

(२९) कुम्भलपुर

(३०) मंडप

(३१) संखेसर

(३२) समेत गिरि

(३३) आरासण

(३४) रावणपार्श्र्व

(३५) पालीनाणा

(३६) घोघा (नवखंडा)

(३७) सोरिसह

(३८) अर्बुदागिरि

(३९) जूनागढ़

(४०) ऊना

(४१) कूकडेश्वर

(४२) अधिक्षेत्रा

(४३) छव्वरणि

(४४) दीवपुर

(४५) सींदृदीव

(४६) देवकापाटण

(४७) वरकाणा

(४८) कइंदवणि

(४९) करवाड़ि

(५०) काकीर

(५१) सुवासणी

(५२) मजावद

(५३) जाऊर

(५४) जवणपुर

(५५) बीजापुर

(५६) उज्जयिनी

(५७) जोगिणपुर

(५८) धवकल

(५९) मेलगपुर

(६०) सामला (अहमदाबाद)

(६१) सलखणपुर

(६२) दहथली

(६३) वेलाउल

(६४) वडली

(६५) आसलकोट

(६६) गोपाचल

(६७) जोझपुर

(६८) महुरत

(६९) मंगसीय

(७०) झम्मणवाहण

(७१) तलाजइ

(७२) झर मदार

(७३) झुवाहड

(७४) बडावद्रह

(७५) थमराडद्रि

(७६) नडुद्रहि

(७७) पहाडपुरी

(७८) हड़ाद्रह

(७९) मोरवाड़ा

(८०) टीमाणह

(८१) मूलधाण

(८२) धंधुयूमइ

(८३) धरमपुर

(८४) बाधणपुर

(८५) पाटऊणइ

(८६) चोरवाड़

(८७) वीसलनगरि

(८८) सीणेरह

(८९) रूण

(९०) चेलणपुर

(९१) साइपुर

(९२) खानपुर

(९३) पराचांसर

(९४) राजपुर

(९५) पंथाहडे

(९६) कंकोलपुर

(९७) आहड

(९८) कंतापुर

(९९) ढिपुरी

(१००) चेलण

१०१) गौडीपुर

१०२) बडनगर

१०३) पारकर

(१०४) वीद्धसी

(१०५) चिंतामणि

(१०६) नवपल्लव

(१०७) नवफण

(१०८) धृत काकोल।

सभी पाठकों, जिज्ञासुओं, अनुसंधानकर्ताओं अध्येताओं की प्रतिक्रियायें सादर साग्रह आमंत्रि हैं, ताकि इस शोध मंथन को स्थायी गति मिल सके।


अभय प्रकाश जैन
एन—१४, चेतकपुरी, ग्वालियर ४७४ ००९
अर्हत् वचन जनवरी १९९३ पेज नं. ५४