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ॐ ह्रीं केवलज्ञान कल्याणक प्राप्ताय श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय नमः |

भजन संग्रह भाग - 09

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माटी से बना जग सारा

बरसा दाता सुख बरसा

मुझे ऐसा वर दे दे प॒भु

लेता मारा प्रभु जी नु नाम

गाऊ रे मैं तो अरिहंत

श्री शंखेश्वर पार्श्वप्रभु

जन जन के तारक तुम

वीर तेरा नाम बडा प्यारा

दादा अपने भक्तों पर

ये तो के सच हे की नवकार

सांप की बांबी पर

जैन धर्म के हीरे मोती

पारस प्रभु के आज गाओ

आओ रे प्रभु एक वार

भगवान तुझे मैं खत लिखता

ओ जिनेश्वर तेरी महिमा

ओ मोक्ष के निवासी

मैं शरण नाथ तेरी

प्रभुजी सांची लागी रे

भक्ति का रंग लगाओ

रूडो अवसर आज आयो

आज आया रे मन भाया रे

करूणा रस का सागर


करो वंदना विधुशी संत महान की

धन्य हुए आहार गुरु के

ये जैन धरम है हमारा

तू कितना अच्छा है

क्योंकि विद्यासागर इनका नाम है

सोलह स्वन्प दिखाये

सुनो गुरु ज्ञान की गागर

दे दे थोड़ा ज्ञान गुरुवर

गुरुवर जैसा त्यागी तपस्वी

हम भक्तहै गुरुदेव के

त्रिशला के प्यारे महावीरा