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ॐ ह्रीं जन्म-तप कल्याणक प्राप्ताय श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय नमः |

भजन संग्रह भाग - 11

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छवि न्यारी जब से प्रभु की

कोई गम ना रहे मन में

कर दया मुझपे

कभी खुशियाँ भी लाये

आत्मरक्षा स्तोत्रं

नवकार जपने से सारे सुख मिलते हैं

इतनी शक्ति हमें देना दाता

उठ भोर भयी

कोई सोना चढाय

झगमगता तारलानुं देरासर

कोयलियां गीत गाये

इस भाव से जो ना मिले

कठासु आयो मोती

मुसीबत में भगवान चाहिए

मीठा मीठा बोल तेरा

आज मारा देरासर मा

छोटासा मंदिर बनायेंगे

इस जग में कोई नही तेरा

पिता हमें सिखलाते

दर्शन से जीवन में

चाहे सोना ना दो

तुने अजब रचा भगवान

रंगाई जाने रंगमा

बनी मिट्टी की जब बाजी

सुमतिनाथ भगवान हमको

झझन झझन झनकारो

चन्दना सन्नारी की

ऐ मेरे प्यारे भगवान

अर्ज तुमको प्रभु आदिश्वर

शांति प्रभुजी मन मोहे

मेरे महावीर के दरबार में

पार्श्व को ध्याते ही ध्याते

मैत्री भावनु पवित्र झरनु

शाम सुबह जप एकही नाम

जैनम जयति शासनम्

है प्रभु पास तेरे

जय जिनेन्द्र बोलिये

समरो मंत्र भालो नवकर

कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं

छोटो छोटो पारणो

भवसागर पार उतार

जिनेश्वर तेरे चरणों

गिरनार के निवासी

तेरे पूजन को भगवान

मैं आया तेरे दरबार

मझदरियां में नाव हमारी

नेम जी की जान बनी

तमे आवा जोरे

है नाथ पाशर्व कृपालु

ले पारस का नाम बन्दे

जो वीर प्रभु गुण गायेगा

मेरे मालिक की दुकान में

स्वार्थ के सब साथी

केशरिया म्हारो कामणगारो