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दिव्यशक्ति ब्राह्मी-सुंदरी स्वरूपा गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास अवध की धरती जन्मभूमि टिकैतनगर में 15-7-19 से प्रारंभ हुआ |

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भजन संग्रह भाग - 12

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जैन चौपाइयाँ महावरी

ओ मुक्ति दूत

दर्शन तेरा सुखकारी

है त्रिशला ना जाया

है तेरे जिनवर

तेरा नाम सबसे ऊँचा

पायो जी मेने

ऐसे मिलता रहे हर जन्म

नहीं चाहिए दिल दुखाना

चपटी भरी चांखा

महावीर कह गये गौतम से

बोल सको तो मीठा बोलो

जब जब जाऊ तेरे द्वारे

मेली चादर ओढ के

माता त्रिशला के लाल

नाथ तेरे मंदिर में

जय जय वीर जय महावीर

श्रध्दा रखो तो बस देते हैं

प्रभु ॠषभदेव सुख दाई रे

झूलो रे झूलो

दूसरे के दुखडे

तेरी मूरत मन में बसाये

प्रभु पार्श्व कहो

एक बार मुखडो बताओ

धरू में आदीश्वर का ध्यान

ऐसे वीर प्रभु की वाणी

तेरी मूरती जिनवर

परिचय

ओ पालन हारे

वो रहने वाली महलों की

छूम छूम छना नना

आओ नी आओ नी भगवन

ये अवसर बारबार न आये

रात गुरु सपने में आये

पलकें ही पलकें बिछायेंगे

जीवन में आती हैं बहार

मेरे महावीर झूले पालना

मोक्ष का द्वार

णमोकार मंत्र ने बडा

करो आरती श्री गुरुवर की

तुम तो विरागी जिनवर

छू लेना आचार्य के पद

जिनवर की वाणी मानो

गुण आगर के करूणा

जिनवर के भजन कर

कुण्डलपुर जायेंगे

युग निर्माणी माता

धन्य धन्य त्रिशला मैया

छोड़ो छल की बातें

सांझ सकारे भक्त

जन जन के मत से धन

क्योंकि आज में द्वार पे खडी

ओम नमो बडे बाबा

गुरुवर जी धीरे चलना

मैं तो आरती उतारूंगी

णमोकार मंत्र

मेरे गुरुवर आने वाले