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भटक गया है जैन ?

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भटक गया है जैन ?

मनुष्य जैसा संकल्प करने लगता है वैसा ही आचरण करता है, धीरे-धीरे वैसी ही इच्छाएँ हो जाती हैं और फिर उसी के अनुसार वार्ता, आचरण, कर्म और कर्मों की गति भी होती है। स्पष्ट है कि अच्छे आचरण के लिए अच्छे विचारों व चरित्र की आवश्यकता होती है, परन्तु आज के इस युग में दिखावा और अन्धविश्वास इतना बढ़ता जा रहा है कि हमें अपने मंत्रो, पाठ व देवशास्त्रगुरु पर शृ्रद्धा व विश्वास धीरे-धीरे घटता नजर आ रहा है।

दोष किसे दें ? स्वयं को, आने वाली पीढ़ी को या फिर बढ़ती हुई नई तकनीकी सुविधाओं को ? या फिर इन सबसे अलग अपने कर्मों को ? कर्म अच्छे व बूरे नहीं होते हैं बल्कि हमारी मानसिकता ही उन्हें अच्छा व बुरा रूप प्रदान करती है। आज हमारी मानसिकता इतनी संकीर्ण व छोटी हो गई है कि जो हमें अच्छे व बुरे की पहचान भी नहीं करा पाती है। अन्धविश्वास का चलन भी इतना बढ़ गया है कि जिसने जो कहा या कोई भी उपाय बताया तो हम तुरन्त उसे करने लगते हैं सोचते भी नहीं है कि हम सही कर रहे हैं कि गलत, क्योंकि हम ‘‘लकीर के फकीर’’ हैं। जरा सी परेशानी हुई कि हम नारियल लेकर चल देते हैं किसी भी देवी-देवता से मन्नत माँगने, किसी मजार पर चादर चढ़ाने या कही माथा टेकने, आखिर क्यों ?

हमारा विश्वास ‘‘णमोकार मंत्र’’और ‘‘भक्तामर’’ पर नहीं टिकता......... क्यों भटक जाते हैं हम ? क्यों हम इन रूढ़िवादी अन्धविश्वास को इतना महत्व देते हैं, क्या कभी किसी अजैन को हमने परेशानी में ‘‘णमोकार मंत्र’’ और ‘‘भक्तामर’’ का जाप करते देखा है ? विधान करते देखा है ? नहीं तो ? फिर क्यूं हम अपनी शृ्रद्धा व विश्वास अपने मंत्र व पाठ पर नहीं रख पाते।

दुनियाँ का हर व्यक्ति केवल सुख ही चाहता है। दुख से सब दूर भागते हैं। सुख पाने की चाहत में ही वो तरह-तरह के आडम्बरों को करता रहता है और इसलिए पाप बंध को बांधता चला जाता है और पाप बंधने के कारण सुखी नहीं रह पाता है।

सुखी और शान्त जीवन व्यतीत करने के लिये हमें धर्म की शरण में जाकर धर्म के मर्म को समझना चाहिये न कि कर्मकांड और आडम्बरों में फंसना चाहिए।

सूरज की किरण अंधकार भगा देती है बंसत की बहार मुरझाए फूल खिला देती है ‘‘णमोकार मंत्र’’ और ‘‘भक्तामर’’ में इतनी शक्ति है कि सोये हुए भाग्य को जगा देती है।

दिखावा, आडम्बरों व अन्धविश्वास के भटकाव को छोड़कर हमें अपनी आत्मा को जगाकर उसपर विश्वास करना चाहिये तभी सुख, समृद्धि व सफलता कदम चूमेगी।

डॉ. रंजना जैन
श्री पल्लीवाल जैन पत्रिका