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भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव — जिम्मेदार कौन ?

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भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव — जिम्मेदार कौन ?

श्रीमती डॉ. रंजना पटेरिया

वेशभूषा के संदर्भ में — पश्चिम सभ्यता आक्रमण की निषेधिका नहीं है अपितु आक्रमण शीला गरीयसी है जिसकी आँखों में विनाश की लीला विभीषिका घूरती रहती हैं सदा। सदोदिता और महामना जिस ओर अभिनिक्रमण कर गए सब कुछ तजकर वन गए उसी ओर उन्हीं की अनुक्रम निर्देशिका, भारतीय संस्कृति है सुख शांति की प्रवेशिका।

किसी भी देश का अपना इतिहास होता है, परम्परा होती है। यदि देश को शरीर माने तो संस्कृति उसकी आत्मा है। किसी भी संस्कृति में आदर्श होते हैं, मूल्य होते हैं। इन मूल्यों की संवाहक संस्कृति होती है। भारतीय संस्कृति में चार मूल्य प्रमुख हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यह बात अलग है कि पाश्चात्य संस्कृति में अर्थ और काम की प्रमुखता है। सादा जीवन उच्च विचार हमारी संस्कृति की परम्परा समझी जाती थी परन्तु आधुनिकता की अंधी दौड़ एवं पाश्चात्य संस्कृति का जीवन में प्रवेश होने से वह परिभाषा कहां चली गई पता ही नहीं । आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज द्वारा रचित मूकमाटी महाकाव्य में वह परिभाषा हमें मिलती हैं—

इस युग के दो मानव अपने को खोना चाहते हैं एक भोग रोग मद्यपान को चुनता है और एक योग त्याग आत्मध्यान को धुनता है। कुछ ही क्षणों में दोनों होते विकल्पों से मुक्त फिर क्या कहना एक शव के समान निरा पड़ा है और एक शिव के समान खरा उतरा है।

सच यही है वे दोनों संस्कृतियां जिनमें से हमें क्या चुनना है यह हमारे ऊपर निर्भर है। वर्तमान में सामाजिक बदलाव को देखकर ऐसा लगने लगा है कि जैसे न ही हमारी संस्कृति रह गई है न ही हमारी सभ्यता। जहाँ तक सवाल है पश्चिमी सभ्यता का तो हम लोगों ने उन बातों को अपनाया जो भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल थीं। जिस भारतीय समाज में हम रहते हैं वहां का वातावरण, सभ्यताएं, मर्यादाएं नैतिक मूल्य कुछ और ही हैं। ऐसे में जब हम पहनावे में उसकी खुली सोच और खुलेपन का अंधानुकरण करते हैं तो हमारे वातावरण में नग्नता दिखाई देती है।

हवा में अजीब सी गंदगी घुल गई है मानव मस्तिष्क पर विपरीत असर कर रही है बात मैं हवा की नहीं कर रही हूँ । मैं हवा के माध्यम से हमारे चारों ओर के सामाजिक परिवेश की चर्चा कर रही हूँ । पाश्चात्य से बटोरा है हमने काम—ग्रसित समाज जिसने हमारी भावनाओं को काम के वशीभूत किया है। लिया है हमने पाश्चात्य से अतिमहत्वाकांक्षी होने का मन्त्र जिसने हमें हमारे सामाजिक परिवेश में अनुशासनहीन जीवन जीने की ओर अग्रसर किया है जाना है हमने पाश्चात्य से न्यूक्लीयर युक्त समाज में जीवन जीने का तंत्र । इस तंत्र ने मानव सभ्यता को इसके अंत पर लाकर खड़ा किया है। पाश्चात्य से हमने सीखा है वर्णशंकर युक्त नई पीढ़ी के साथ जीवन जीने का मार्ग, यह मार्ग बड़ा आसाँ है हमारे भारत धर्म भारतीय की संस्कृति को अधोगति में ले जाने के लिए। चाहिए तो था हम बटोरते कुछ ऐसा पाश्चात्य संस्कृति से जो उसे हमसे कुछ मायनों में आदर्श बनाती है जैसे कि हम उनकी ही तरह ईमानदार होते, राष्ट्र के प्रति समर्पित होते, राष्ट्रप्रेमी होते, अनुशासित होते जो हमें सम्पूर्ण मानव बनने में सहायक होती।हम एक आदर्श भारतीय समाज का निर्माण कर पाते हम आसमां पर चमकते न कि भ्रष्टाचार , बलात्कार, अपराध की सूचि में सबसे ऊपर होते।

कम से कम कपड़े पहन अधिक से अधिक शरीर का प्रदर्शन करना यदि मार्डन है तो आदिवासी ज्यादा मार्डन और सभ्य हुए। संस्कृति का उद्देश्य मानव जीवन को सुंदर बनाना है। परन्तु पाश्चात्य संस्कृति में चमकते कांच झिलमिलाती रोशनी, शराब का प्याला और साथ में खड़ी अर्धनग्न लड़की उद्देश्य होता है। ऐसा लगता है टेलीविजन में दिखाए जाने वाले सिनेमा, सीरियल, विज्ञापन में अर्धनग्न महिलाओं को दिखाए जाने की अनुमति है। आइटम गर्ल और आइटम सांग के बिना कोई फिल्म बाक्स आफिस में हिट नहीं होती। पहनावे में भड़काउपन और खुलेपन की सोच के कारण स्त्री देवी के स्थान पर भोग्या बन गई । जहाँ पहले रिश्तों की अहमियता थी शादियां पूरी जिंदगी चलती थी आजकल रिश्ते चिप्स के पैकेट की तरह हो गए खाकर फैक दिए। अवैद्य संबंधो की बाढ़ आ गई है। इस कारण अपराध की रोज बढ़ोतरी हो रही है। इन विचारों ने लोगों को कितना आजाद किया ये वही जाने पर मैं यह जानती हूँ कि धर्म और देश विध्वंस की ओर जा रहा है। यदि अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो इस छद्म आधुनिकता और वास्तविकता आधुनिकता के बीच अंतर समझना होगा। आधुनिकता के नाम पर हमारी संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है।

आज साड़ी को गरिमामय मानें तो लोगों का कहना है पेट आधा क्यूं खुला है क्या आधुनिक ब्लाउज है आदि आदि। मैं कहती हूँ गंदगी लोगों के दिमाग में होती है। जिसके पास संस्कार है उसे शोभनीय और अशोभनीय का ख्याल रहता है और जिसके पास संस्कार ना हो, लज्जा ना हो, तो उससे क्या उम्मीद रखना। वैसे गंदे लोग अच्छी बातों में भी गंदगी ढूंढने का प्रयास ही करते हैं।

अक्सर लोगों की जुबान पर होता है कि महिलाएं पश्चिम का अंधानुकरण कर रही है क्या पश्चिम का कोई भी दुष्प्रभाव पुरुषों पर नहीं होता ? बात स्त्री और पुरूष को वर्गीकृत करने के लिए नहीं है जो भी मर्यादा के बाहर जाएगा वह दोषी है पुरूषों की बात करें तो उनकी सोच है.....जिन कपड़ों में कोई दीगर लड़की लगती है बड़ी कामुक ......घर पहुंचकर उनकी सोच बदल जाती है तब वे कहते हैं छलकता हैं भोला बचपन, जब पहनती है मेरी सोलह बरस की बच्ची।

वाह क्या बात है भूल जाते हैं वे कि सुविधा की दृष्टि से धोती छोड़कर फुलपेंट अपनाई थी पर महिला उन्हें हमेशा भारतीय परिधान में दिखनी चाहिए।

लज्जा स्त्रियों का आभूषण है तो क्या पुरूषों को निर्लज्ज होना चाहिए। जगह—जगह लौलुप दृष्टि वाले अमर्यादित व्यक्ति दिख जाएंगे जो बलात्कार, छेड़खानी जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं

हमारा दुर्भाग्य है कि हमने पहनावे में नकल कर ली पर अपनी अक्ल विकसित नहीं कर पाए। फैसन के दुष्प्रभाव पुरूष व स्त्री दोनों में समान रूप से है। पहनावें में स्वतन्त्रता जरूरी है पर फूहड़पन नहीं। इसलिए यही संदेश देना चाहूंगी कि भारतीय सांस्कृति के लिए दु:शासन मत बनो। सभ्य कपड़े पहनों वरना आने वाले समय में बेटी को पालना मुश्किल हो जाएगा। जिस समाज में नारी सुरक्षित नहीं है वह समाज नहीं जंगल है और उसमें रहने वाले लोग जानवर। हम बदलाव की आँधी में बहकर इतनी दूर ना निकल जाए कि अपनी ही धरोहर को खो बैठे और अपने ही पास अपने बच्चों को देने के लिए कुछ शेष ना रह जाए।

संस्कार सागर जुलाई, २०१४