मंगलग्रहारिष्टनिवारक श्री वासुपूज्य चालीसा

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मंगलग्रहारिष्टनिवारक श्री वासुपूज्य चालीसा


-दोहा-
बारहवें तीर्थेश श्री,वासुपूज्य जिनराज |
मुक्तिरमा के पति प्रभो,तारणतरण जिहाज ||१||
वीतराग सर्वज्ञ जिन,को निज उर में ध्याय |
चालीसा के पाठ से मनवांछित मिल जाय ||२||
-चौपाई-
जय जय वासुपूज्य जिन स्वामी,हे करुणाकर अंतर्यामी ||१||
सुर नर असुर करें तुम सेवा,तुम हो प्रभु देवों के देवा ||२||
चम्पापुर में जन्म लिया है,उस स्थल को धन्य किया है||३||
पांच कल्याणक से पवित्र है,तीर्थ आज यह परम पूज्य है ||४||
फाल्गुन वदि चौदस की शुभ तिथि,आन पधारेत्रिभुवनपति जी ||५||
स्वर्ग से इंद्र इन्द्राणी आए,जन्मोत्सव कर खुशी मनाएं ||६||
श्री वसुपूज्य हैं पिता तुम्हारे,मात जयावति के हो प्यारे ||७||
बालब्रम्हचारी हे प्रभुवर, वीतराग सर्वज्ञ हितंकर ||८||
एक दिवस वैराग्य समाया,छोड़ा त्रणवत ममता माया ||९||
फाल्गुन कृष्णा चौदस की तिथि,नमः सिद्ध कह दीक्षा ले ली ||१०||
शुक्लध्यान से घात घातिया,केवलज्ञान सूर्य तब प्रगटा ||११||
ऊंकारमय दिव्यध्वनी थी,भवि जीवों ने आन सुनी थी ||१२||
समवशरण था अद्भुत सुन्दर,द्वादश सभा बनी थी सुन्दर ||१३||
गणधर,मुनि,सुर नर,पशु बैठे,अपना शुभ कल्याण करें वे ||१४||
भादों सुदि चौदस शुभ तिथि थी,प्रभु ने शिववल्लभा वरी थी ||१५||
चम्पापुरजी सुपवित्र है,कहलाया निर्वाण तीर्थ है ||१६||
लक्ष बहत्तर वर्ष थी आयू,लाल कमल सम सुन्दर काय ||१७||
महिष चिन्ह से जग पहचाने,भक्त सदा स्तुती बखाने ||१८||
निज पर का कल्याण किया है,सबको हित का मार्ग दिया है ||१९||
स्वामी मेरे कष्ट निवारो,मुझको अब भवदधि से तारो ||२०||
कल अनादी से भरमाया,इस जग में ही गोते खाया ||२१||
चतुर्गती में हरदम घूमा,नहिं पाया जिनधर्म अनुपमा ||२२||
पुण्य उदय से नरतन पाया,फिर भौतिक सुख में भरमाया ||२३||
देव शास्त्र गुरु शरण न पाया,हरदम रमा मोह अरु माया||२४||
पुण्य खिला जिनधर्म को पाया,किन्तु ग्रहों का चक्र सताया ||२५||
जिनभक्ती बस उसे मिटाए,ऐसा जिनआगम बतलाएं ||२६||
नवग्रहजिनशासन में माने,सूर्य,चन्द्र,मंगल,बुध जानें ||२७||
शुक्र,शनी,गुरु,राहु,केतु हैं,वैर मित्रतावश सुख दुःख दें ||२८||
अगर उच्च स्थान पे रहते,ऊंचा पद, यश,धन,सुख देते ||२९||
निम्न अगर हो अपयश पाता, आधि व्याधि का दुःख उठाता ||३०||
इनसे छुटना हो गर प्राणी,जिनप्रभु भजो कहे जिनवाणी ||३१||
यदि मंगलग्रह की पीड़ा हो,वासुपूज्य जिनवर को भज लो ||३२||
दिन चालीस करें चालीसा,मंगलग्रह का कष्ट न होगा ||३३||
वासुपूज्य जिन की जपमाला,वे पाएंगे सौख्य निराला ||३४||
रोग,शोक,संकट हर लेगा,प्राणी को सुख शांती देगा ||३५||
सांसारिक सुख के संग संग में,आत्मिक सुख भी सहज मिलेगा ||३६||
यूं तो वीतराग छवि प्रभु की,किन्तु करें जो मन से भक्ती ||३७||
शब्दवर्गणा सिद्धशिला पर,जाकर करतीं सफल मनोरथ ||३८||
सदा-सदा जिनभक्ति करो तुम,मन की इच्छा पूर्ण करो तुम ||३९||
हे प्रभुवर! तुमको शत वंदन,जय जय जयावती के नंदन ||४०||
-शम्भु छंद –
श्री वासुपूज्य जिन चालीसा,जो चालीस दिन तक पढते हैं |
मंगलग्रह की बाधा नशती,सुख शांती को वे लभते हैं ||
सांसारिक सुख के साथ ‘इंदु’,अनुक्रम से सद्गति को पाते |
क्रम से फिर मुक्तिरमा वर कर,वे सिद्धशिलापति बन जाते ||१||

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