मनवा! तेरी न कोई सीमा

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मनवा! तेरी न


मनवा! तेरी न कोई सीमा।
ढूँढा जग में सभी जगह, पर मुझको मिला कहीं ना।।
मनवा! तेरी न कोई सीमा।। टेक.।।

ऊँचे पर्वत गहरी नदियाँ, लम्बी चौड़ी वसुधा।
सबको युग ने नाप लिया, पर तुझको नाप सका ना।।
मनवा! तेरी न कोई सीमा।।१।।

तू मस्तक में है या दिल में, बोल कहाँ तेरा बीमा।
सबको वश में करता है तू, फिर भी दिखे कहीं ना।।
मनवा! तेरी न कोई सीमा।।२।।

तुझको वश में करने वाले, आज भी हैं दुनिया में।
छोड़ परिग्रह सन्त बने जो, तुझमें रमें कभी ना।।
मनवा! तेरी न कोई सीमा।।३।।

छोड़ दे अपना अहम तू मनवा, मेरे वश में आ जा।
रमण निजातम में हो ‘चंदना’, तब पूरी हो सीमा।।
मनवा! तेरी न कोई सीमा।।४।।