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मन्त्र विद्या

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मन्त्र विद्या

एक विश्लेषण
ब्र० श्री धर्मचन्द्र जैन, शास्त्री(संघस्थ)

भारतवर्ष अनादिकाल से ज्ञान—विज्ञान की गवेषणा, अनुशीलन एवं अनुसन्धान की भूमि रहा है। विद्याओं की विभिन्न शाखाओं में भारतीय मनीषियों ऋषियों एवं अघ्येताओं ने जो कुछ किया, नि:सन्देह वह यहां की विचार—विमर्श एवं चिन्तन प्रधान मनोवृत्ति का द्योतक है। दर्शन, व्याकरण, साहित्य, न्याय, गणित ज्योतिष आदि सभी विद्याओं में भारतीयों का कृतित्व और व्यक्तित्व अपनी कुछ ऐसी विशेषताएं लिये हुए है जो अनेक दृष्टियों से असाधारण है।

इसी गवेषणा के परिणम स्वरूप मंत्र, यंत्र, तंत्र साधनाओं का प्रस्फुटन हुआ। मंत्र शब्द दिवादि और तनादिगणीय तथा सम्मानार्थक ’मन् ’ धातु से ’ष्ट्रन’ (त्र) प्रत्यय लगकर बनता है जिनके व्यत्पत्ति लभ्य अर्थ भिन्न प्रकार से किये जा सकते हैं। मंत्र शब्द के गर्भ में मनन की परिव्याप्ति है। शब्द शब्द के मूल अक्षर और बीजाक्षर से मन्त्रात्मक विद्या का विकास हुआ जो अक्षरों में अन्तर्निहित अपरिसीम शक्ति का द्योतक है।

दि० जैन परम्परा के अनुसार मन्त्र विद्या का सम्बन्ध अत्यन्त प्राचीन है तथा अङ्ग—पूर्व ज्ञान से जुड़ा हुआ है। सर्वज्ञभाषित, गणधरदेव द्वाारा ग्रंथित द्वादशांग में बारहवां अंग दृष्टिवाद है। उसके पांच विभाग हैं। (१) परिकर्म (२) सूत्र (३) पूर्वानुयोग (४) पूर्वगत तथा (५) चूर्णिका। चौथे विभाग पूर्वगत में चौदह पूर्व आते हैं। चौदहपूर्वों मेंं दसवां विद्यानुप्रवाद पूर्व मुख्यत: मंत्रात्मक साधनों, सिद्धियों एवं उनके साधनों से संबद्ध है। वर्तमान में उपलब्ध विद्यानुवाद ग्रन्थ मंत्र यंत्र विद्या का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसके अलावा भैरवपद्मावतीकल्प, ज्वाला—मालनीकल्प, ऋषिमंडलकल्प भक्तामर, कल्याणकल्पद्रुम आदि अनेकों ग्रन्थ मंत्र यंत्रों से भरपूर हैंं।

मन्त्र : जो विशिष्टि प्रभावक शब्दों द्वारा निर्मित किया हुआ वाक्य होता है वह मन्त्र कहा जाता है। बार—बार जाप करने पर शब्दों के पास्परिक संघर्षण के कारण व्याकरण में एक प्रकार की विद्युत तरंगे उत्पन्न होने लगती हैं तथा साधक की इच्छित भावनाओं को बल मिलने लगता हैं। फिर वह जो चाहता है, वही होता है। मंत्रों के लिये उनके हिसाब से जाप की संख्या, शब्द, बीजाक्षर, अक्षर तथा विभिन्न मंत्रों के लिये विभिन्न प्रकार के पदार्थों से बनी मालाएंं विभिन्न प्रकार के फल—फूल, विभिन्न आसन, दिशाएं, क्रियाएं इत्यादि पहले से ही निर्धारित होती हैं।

यन्त्र : जिसमें सिद्ध किए हुए मंत्रों से अभिमंत्रित कागज को अथवा किसी विशिष्ट प्रकार के निर्धारित अंकों, शब्दों व आकृतियों से लिखित पत्र को किसी विशेष धातु के बने ताबीज में रख दिया जाता है अथवा किसी की बाहं में बांध दिया जाता है, गले मे लटका दिया जाता है या किसी धातु विशेष के पत्रों पर लिखकर उचित स्थान पर रख दिया जाता है या चिपका दिया जाता है, वह यंत्र कहा जाता है। इससे कार्य—सिद्धि होती है।

इन यंत्र और मंत्रों के अधिष्ठाता देव—देवियां २४ तीर्थंकरों की सेवा करने वाले २४ यक्ष—यक्षणियां मानी गई हैं। तीर्थंकर तो मुक्त हो जाते हैं, वीतराग होने से वे कुछ देते लेते नहीं। धर्म प्रभावना की दृष्टि से यक्ष—यक्षणियां आदि शासन देवता मंत्र—यंत्र साधकों को लाभान्वित करते हैं। इसमें साधक का पुण्य—पाप कारण बनता है।

तंत्र : यह मंत्र विद्या का एक प्रमुख विशिष्ट अंग है। तन्त्रों का सम्बन्ध विज्ञान से है इसमें कुछ ऐसी रासायनिक वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है, जिनसे एक चमत्कार पूर्ण स्थिति पैदा की जा सके। मानवी शक्ति प्राप्त करने के लिए मंत्र यंत्र—गर्भित विशिष्ट प्रयोगों का वैज्ञानिक संचयन तंत्र है। विद्वानों ने तंत्र शब्द की व्याख्या में दो आशयों को मुख्यत: रखा है। एक दृष्टिकोण इसे उस ज्ञान के मार्ग दर्शक के रूप में व्याख्यात करता है, जिससे लौकिक दृष्टया असाधारण शक्ति, चमत्कार तथा वैशिष्ट्य का लाभ होता है। दूसरा दृष्टिकोण, अलौकिक या मोक्ष परक है, इसलिए तंत्र को चरम सिद्धि उस ज्ञान की बोधिका है, जिससे जन्म—मरण के बन्धन से उन्मुक्त होकर जीव सत् चित आनन्दमय बन जाय, मोक्षगत हो जाय या सिद्धत्व प्राप्त कर ले।

मंत्र और यंत्र से यह विषय विशेषतया संबद्ध है अत: तदनुरूप अभ्यास व साधना से कार्य सिद्धिदायक है। तंत्रों में मंत्र भी प्रयोग में आते हैं और यंत्र भी। तंत्र में मंत्र का प्रयोग कभी कभी आवश्यक भी होता है, क्योंकि उससे तंत्र की शक्ति द्विगुणित हो जाती है। बाह्य दृष्टि से मंत्र तंत्र के द्वारा आकर्षण, माहन, मारण, वशीकरण उच्चाटनादि किया जाता है।

जैन मंत्र शास्त्रों में मंत्रों में अनेक भेद बताये हैं, किन्तु उनका जन्मदाता अनादि मूल मंत्र णमोकार महामंत्र है उसी के सम्बन्ध में यहां विचार किया जाता है—

णमोकार मंत्र में मातृका ध्वनियों का तीनों प्रकार का क्रम सन्निविष्ट है। इसी कारण यह मंत्र आत्मकल्याण के साथ लौकिक अभ्युदयों को देने वाला है। अष्टकर्मों को विनाश करने की भूमिका इसी मंत्र के द्वारा उत्पन्न की जा सकती है। संहारक्रम कर्मविनाश को प्रगट करता है तथा सृष्टिक्रम और स्थितिक्रम आत्मानुभूति के साथ लौकिक अभ्युदयों की प्राप्ति में सहायक है। इस मंत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसमें मातृका ध्वनियों का तीनों प्रकार का क्रम सन्निहित है, इसीलिए इस मंत्र से मारण, मोहन और उच्चाटन तीनों प्रकार के मंत्रों की उत्पत्ति हुई है। बीजाक्षरों की निष्पत्ति के सम्बन्ध में बताया गया है—

‘‘हलो बीजानि चौक्तानि, स्वरा: शक्तय ईरिता:।’’

ककार से लेकर हकार पर्यंत व्यञ्जन बीजसंज्ञक हैं और आकरादि स्वर शक्तिरूप हैं। मंत्र बीजों की निष्पत्ति बीज और शक्ति के संयोग से होती है।

सारस्वत बीज, मायाबीज, शुभनेश्वरी बीज, पृथ्वी बीज, अग्निबीज, प्रणवबीज, मारुतबीज, जलबीज, आकाशबीज आदि की उत्पत्ति उक्त हल् और अंचों (स्वरों) के संयोग से हुई है। यों तो बीजाक्षरों का अर्थ बीज कोश एवं बीज व्याकरण द्वारा ही ज्ञात किया जाता है।

णमोकार मन्त्र का अचिन्त्य और अद्भुत प्रभाव है इस मन्त्र की साधना द्वारा सभी प्रकार की ऋद्धि सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। यह मंत्र आत्मिक शक्ति का विकास करता है। अत: समस्त बीजाक्षरों वाला यह मंत्र जिसमें मूल ध्वनिरूप बीजाक्षरों का संयोजन भी शक्ति के क्रमानुसार किया गया है।

मातृकाओं का महत्त्व : विद्यानुवाद में मातृकाओं का महत्त्व स्वीकार करते हुए बताया है कि मातृकाएं शक्तिपुञ्ज हैं। शक्ति मातृकाओं से भिन्न नहीं है।

जो व्यक्ति मन्त्र—बीजो मेें निबद्धकर इन मातृकाओं का व्यवहार करता है, वह आत्मिक और भौतिक दोनों प्रकार की शक्तियों का विकास कर लेता है। मातृकाएं बीजाक्षरों और पल्लवों के साथ मिलकर आकर्षण विकर्षणों को उत्पन्न करने में समर्थ हो जाती हैं। मातृकाएं बीजों में निबद्ध हो कर चाञ्चल्य का सृजन भी करती हैं, जिससे किसी भी पदार्थ में टूट—फूट की क्रिया उत्पन्न होती है। यह क्रिया ही शक्ति का आधार स्रोत है और इसी से मन्त्र—जाप द्वारा चमत्कारी कार्य उत्पन्न किये जाते हैं।

वर्तमान विज्ञान भी यह बतलाता है कि बीजमंत्रों में निहित शक्ति ब्यूह हमारी इन्द्रियों को उत्तेजित कर देता है और यह उत्तेजना जलतरंग की अनुरणन ध्वनि के तुल्य क्रमश: मन्द, तीव्र, तीव्रतर, मन्द, मन्दतर होती हुई कतिपय क्षणों तक रणन करती रहती है। इसी प्रकार बीजों का घर्षण की शक्ति—व्यूह का संचार करता है। इसी कारण आचार्यों ने कहा है—

न दुष्टवर्णप्रायश्चेन्मनत्र: सिद्धि प्रयच्छति।

इत्युक्तो वर्णयोगोऽत्र परेषां वण्र्यते मतम्।।

अर्थात् दुष्टवर्ण मन्त्र में प्रयुक्त होकर कभी भी सिद्धि प्राप्त नहीं करा सकते हैं। सिद्धि, साधन नक्षत्र, राशि और ग्रह परिशुद्ध बीज हैं, इन्हीं बीजों द्वारा चमत्कारपूर्ण भौतिक शक्तियां प्राप्त की जाती हैं।

मंत्रबीजों के वर्णन में वश्य, आकर्षण और उच्चाटन मेंं ह्रूँ का प्रयोग, मारण मेंं फट् का प्रयोग,स्तम्भन, विद्वेषण और मोहन में नम: का प्रयोग एवं शक्ति और पौष्टिक के लिए ‘वष्ट्’ पल्लव का प्रयोग किया जाता है। मन्त्र के अंत में स्वाहा शब्द रहता है। यह शब्द पापनाशक, मंगलकारक तथा आत्मा की आन्तरिक शक्ति को उद्बुद्ध करने वाला बताया है। मंत्र के बीजाक्षरों को शक्तिशाली बनाने के लिये उसकी समस्त विधियों का निर्वाह करना अत्यावश्यक है। दिशा, आसन, वस्त्र, माला एवं अन्य उपकरणों का विचार कर मन्त्र सिद्धि करनी चाहिये। मातृकाओं द्वारा ही अग्नियन्त्र, जलयन्त्र नाभियन्त्र, अष्टकर्म यन्त्र, जलमण्डल, अग्निमण्डल, माहेन्द्रमण्डल, तीर्थज्र्रमंत्र, विजययंत्र, जययंत्र, हंसयंत्र, सू समयत्र, कुलिक यंत्र, महापद्य यंत्र, रक्षायन्त्र, महारक्षायन्त्र, स्तम्भनयन्त्र, विद्यायन्त्र, परविद्याछेदनयन्त्र, पिशाचदि मोचनयन्त्र, कामचाण्डालीयन्त्र, प्रभृति शताधिक यन्त्र और मण्डलों का निर्माण किया गया है। मातृकाएँ समस्त द्वादशाङ्ग वाणी का मूल हैं, मन्त्र शास्त्र और यन्त्रशास्त्र का पल्लवन इन्हीं के द्वारा होता है। अत: व्याकरण, साहित्य, मंत्र यन्त्र प्रभृति समस्त वाङ् मय का मूलाधार मातृकाएँ हैं। जिन यन्त्रों का ऊपर उल्लेख किया गया है वे सभी शक्ति कूट हैं और उसमें शक्तिव्यूह निहित हैं। यहाँ सामान्य जानकारी के लिये ध्वनियों की शक्ति पर प्रकाश डालना आवश्यक है।

अव्यय, व्यापक, आत्मा के एकत्व का सूचक, शुद्ध ज्ञानरूप, शक्तिद्योतक, प्रणव बीज का जनक। अव्यय, शक्ति और बुद्धि का परिचायक, सारस्वतबीज का जनक, मायाबीज के साथ कीर्ति, धन और आशा का पूरक गत्यर्थक, लक्ष्मी प्राप्ति का साधक, कार्य साधक, कठोर कर्मों का बाधक, वह्निबीज का जनक। अमृतबीज का मूल कार्य साधक, अल्पशक्तिद्योतक, स्तम्भक, मोहक जृम्भक। उच्चाटन बीजों का मूल अद्भुत शक्तिशाली। उच्चाटक और मोहक बीजों का मूल, विशेष शक्ति का परिचायक, कार्यध्वंस के लिये शक्तिदायक। ऋद्धिबीज, सिद्धिदायक शुभ कार्य सम्बन्धी बीजों का मूल कार्यसिद्धि का सूचक। सत्य का संचारक, वाणी का ध्वंसक, लक्ष्मी बीज की उत्पत्ति का कारण। पूर्ण गति सूचक, अरिष्ट निवारण बीजों का जनक पोषक और संवद्र्धक। उच्चस्वर का प्रयोग करने पर वशीकरण बीजों का जनक पोषक और संवद्र्धक, जलबीज की उत्पत्ति का कारक, सिद्धिप्रद कार्यों का उत्पादक बीज, शासन देवताओं का आह्वान कराने में सहायक, क्लिष्ट और कठोर कार्यों के लिए प्रयुक्त बीजों का मूल, ऋण विद्युत का उत्पादक।

ओ—अनुदात्त मेें मायाबीज का उत्पादक, उदात्त में कठोर कार्यों का उत्पादक बीज, कार्य साधक, रमणीय पदार्थों की प्राप्ति के लिये प्रयुक्त होने वाले बीजों में अग्रणी औ—मारण और उच्चाटन सम्बन्धी बीजों में प्रधान अनेक बीजों का मूल। अं—स्वतन्त्र शक्ति रहित कर्माभाव के लिये प्रयुक्त ध्यान मंत्रों में प्रमुख,शून्य या अभाव का सूचक, आकाश बीजों का जनक, अनेक मृदुल शक्तियों का उद्घाटक, लक्ष्मी बीजों का मूल। अ:—शक्ति बीजों में प्रधान, निरपेक्ष अवस्था में कार्य असाधक, सहयोगी का अपेक्षक। क—शक्ति बीज, प्रभावशाली, सुखोत्पादक, सन्तान प्राप्ति की कामना का पूरक काम बीज का जनक ख—आकाश बीज अभाव सिद्धि के लिये कल्पवृक्ष, उच्चाटन बीजों का जनक। ग—पृथक् करने वाले कार्यों का साधक प्रणव और माया बीज के साथ कार्य सहायक। घ—स्तम्भक कार्यों का साधक विघ्न विघातक, मारण और मोहक बीजों का जनक। ङ—शत्रु का विघ्वंसक, स्वर मातृका बीजों के सहयोगनुसार फलोत्पादक। च—अंगहीन खण्ड शक्ति द्योतक उच्चाटन बीज का जनक। छ—छाया सूचक, माया बीज का सहयोगी, बन्धन कारक। ज—नूतन कार्यों का साधक शक्ति का वद्र्धक, आधि व्याधि का शामक, आकर्षक बीजो का जनक। झ— रेफयुक्त होने पर कार्य साधक, आधि व्याधि विनाशक शक्ति का संचारक श्री बीजों का जनक। ञ— स्तम्भक और मोहक बीजों का जनक साधना का अवरोधक। ट— आग्नेय कार्यों का प्रसारक, विध्वंसक कार्यों का साधक। ठ— अशुभ सूचक बीजों का जनक। ड— शासन देवताओं की शक्ति का प्रस्फोटक, निकृष्ट कार्यों की सिद्धि के लिये अमोघ, अचेतन क्रिया साधक। ढ—मायाबीज व मारण बीजों में प्रधान, शक्ति का विरोधी। ण—शक्ति सूचक। त—आकर्षक शक्ति का आविष्कारक। थ—मंगल साधक, लक्ष्मी बीज का सहयोगी स्वर मातृकाओं के साथ मिलने पर मोहक। द—कर्मनाश के लिये प्रधन बीज, आत्मशक्ति का प्रस्फोटक वशीकरण बीजों का जनक। ध—श्रीं और क्लीं बीजों का सहायक सहयोगी के समान फलदाता, माया बीजो का जनक। न—मृदुत्तर कार्यों का साधक हितैषी। प—जन्म तत्त्व के प्राधान्य से युक्त समस्त कार्यों की सिद्धि के लिये। फ—विघ्न विधातक, कठोर कार्य साधक। ब—विघ्नों का निरोधक सिद्धि का सूचक। भ—साधक को मारण और उच्चाटन के लिये उपयोगी। म—लौकिक तथा पारलौकिक सिद्धियों का प्रदाता। य—शक्ति का साधक,मित्र प्राप्ति या अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के लिये उपयोगी,ध्यान का साधक। र—कार्य साधक, समस्त प्रधान बीजों का जनक। ल—लक्ष्मी प्राप्ति में सहायक श्रीं बीज का निकटतम सहयोगी और कल्याण सूचक। ब—सिद्धिदायक, रोगहर्ता, लौकिक कामनाओं की पूर्ति के लिये सहयोगापेक्षी, मंगलसाधक विपत्तियों का रोधक और स्तम्भक। श—निरर्थक सामान्यबीजों का जनक या हेतु उपेक्षा धर्मयुक्त शक्ति का पोषक। ष—आह्वान बीजों का जनक सापेक्षध्वनि ग्राहक सहयोग या संयोग द्वारा विलक्षण कार्य साधक आत्मोन् नति से शून्य रुद्रबीजों का जनक भयंकर और वीभत्स कार्यों के लिये प्रयुक्त होने पर कार्य साधक। स—सभी प्रकार के बीजों में प्रयोग योग्य शक्ति के लिये परम आवश्यक, पौष्टिक कार्यों के लिये परम उपयोगी। ह—शक्ति, पौष्टिक और माङ्गलिक कार्यों का उत्पादक, साधना के लिये उपयोगी, आकाश तत्त्व युक्त कर्मनाशक सभी प्रकार के बीजों का जनक। उपर्युक्त ध्वनियोें के विश्लेषण से स्पष्ट है कि कि मातृका मंत्र ध्वनियों के स्वर और व्यञ्जनों के संयोग से ही समस्त बीजक्षरों की उत्पत्ति हुई है। इन मातृका ध्वनियों की शक्ति ही मंत्र में आती है। णमोकार मंत्र से ही मातकाध्वनियां नि:सृत हैं। अत: समस्त मन्त्रशास्त्र इसी महामंत्र से प्रादुर्भूत हैं। बीजाक्षरों का संक्षिप्त कोष— ऊँ—प्रणव, ध्रव, तैजस बीज है। ऐं—वाग् और तत्त्व बीज है। क्लीं—काम बीज है। हो—शासन बीज है। क्षि—पृथ्वी बीज है। प—अप् बीज है। स्वा—वायु बीज है। हा:—आकाश बीज है। ह्रीं—माया और त्रैलोक्य बीज है। क्रों—अंकुश और निरोध बीज है। आ—फास बीज है। फट्—विसर्जन और चलन बीज है। वषट्—दहन बीज है। वोषट्—आकर्षण और पूजा ग्रहण बीज है। संवौषट्—आकर्षण बीज है। ब्लूँ—द्रावण बीज है। ब्लैं—आकर्षण बीज है। ग्लौं—स्तम्भन बीज है। क्ष्वीं—विषापहार बीज है। द्रां द्रीं क्लीं ब्लूँ स:—ये पांच बाण बीज हैं। हूँ—द्वेष और विद्वेषण बीज है। स्वाहा—हवन और शक्ति बीज है। स्वधा—पौष्टिक बीज है। नम:—शोधन बीज है। श्रीं—लक्ष्मी बीज है। अर्हं—ज्ञान बीज है। क्ष: फट्—शस्त्र बीज है। य:—उच्चाटन और विसर्जन बीज है। जूँ—विद्वेषण बीज है। श्लीं—अमृत बीज है। क्षीं—सोम बीज है। हंव—विष दूर करने वाला बीज है। क्ष्म्ल्व्र्यूं— पिंड बीज है। क्ष—कूटाक्षर बीज है। क्षिप ऊँ स्वाहा—शत्रु बीज है। हा:—निरोध बीज है। ठ:—स्तम्भन बीज है। ब्लौं—विमल पिंड बीज है। ग्लैं—स्तम्भन बीज है। घे घे—वद्य बीज है। द्रां द्रीं—द्रावण संज्ञक है। ह्रीं ह्रूँ ह्रैं ह्रौ ह्र:—शून्य रूप बीज हैं।

मंत्र की सफलता साधक और साध्य के ऊपर निर्भर है ध्यान के अस्थिर होने से भी मंत्र असफल हो जाता है। मन्त्र तभी सफल होता है, जब श्रद्धा भक्ति तथा संकल्प दृढ़ हो। मनोविज्ञान का सिद्धान्त है कि मनुष्य की अवचेतना में बहुत सी आध्यात्मिक शक्तियां भरी रहती हैं। इन्हीं शक्तियों को मंत्र द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। मंत्र की ध्वनियों के संघर्ष द्वारा आध्यात्मिक शक्ति को उत्तेजित किया जाता है। इस कार्य में अकेली विचार शक्ति काम नहीं करती है। इसकी सहायता के लिये उत्कट इच्छा शक्ति के द्वारा ध्वनि—संचालन की भी आवश्यकता है। मंत्र शक्ति के प्रयोग की सफलता के लिये नैष्ठिक आचार की आवश्यकता है। मंत्र शक्ति के प्रयोग की सफलता के लिये नैष्ठिक आचार की आवश्यकता है। मंत्र निर्माण के लिए ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूँ ह्रौं ह्र: ह्रा ह स: क्लीं द्रां द्रीं द्रँ द्र: श्रीं क्षीं क्ष्वीं र्हं क्ष्वीं र्हं अं फट् वषट् संवौषट घे घै य: ख ह् पं वं यं झं तं थं दं आदि बीजाक्षरों की आवश्यकता होती है। साधारण व्यक्ति को ये बीजाक्षर निरर्थक प्रतीत होते हैं, किन्तु हैं ये सार्थक और इनमें ऐसी शक्ति अन्तर्निहित रहती है, जिसमें आत्मशक्ति या देवताओं को उत्तेजित किया जा सकता है। अत: ये बीजाक्षर अन्त:करण और वृत्ति की शुद्ध प्रेरणा के व्यक्त शब्द हैं, जिनसे आत्मिक शक्ति का विकास किया जा सकता है।

इन बीजाक्षरों की उत्पत्ति प्रधानत: णमोकार मंत्र से ही हुई हैं, क्योंकि मातृका ध्वनियां इसी मन्त्र से उद्भूत हैं।

मंत्र साधक बीज मंत्र और उनकी ध्वनियों के घर्षण से अपने भीतर आत्मिक शक्ति का प्रस्फूटन करता है। मंत्र शास्त्र में इसी कारण मंत्रों के अनेक भेद बताये गये हैं। प्रधान—— (१) स्तम्भन

(२) सम्मोहन

(३) उच्चाटन

(४) वश्याकर्षण

(५) विद्वेषण

(६) मारण

(७) शान्तिक और

(८) पौष्टिक।

(१) स्तम्भनजिन ध्वनियों के द्वारा सर्प, व्याघ्र सिंह आदि भयंकर जन्तुओं को भूत, प्रेत, पिशाच आदि दैविक बाधाओं को , शत्रु सेना के आक्रमण तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा किये जाने वाले कष्टों को दूर कर इनको जहाँ के तहाँ निष्क्रिय कर स्तम्भित कर दिया जावे उन ध्वनियों के सन्निवेश को स्तम्भन मंत्र कहते हैं।

(२) सम्मोहनजो किसी प्राणी के मन पर अत्यन्त प्रभाव डाले जो कहें वह करे उसको सम्मोहन कहते हैं।

(३) उच्चाटनजिन मंत्रों के द्वारा किसी का मन अस्थिर उल्लास रहित एवं निरुसाहित होकर पदभ्रष्ट एवं स्थान भ्रष्ट हो जावे, उन ध्वनियों के सन्निवेश को उच्चाटन मंत्र कहते है।

(४) वशीकरणजिस मंत्र के द्वारा इच्छित वस्तु या व्यक्ति, साधक के पास आ जावे, किसी को दास के समान वश में करना, विपरीत मन वाले साधक की अनुवूâलता स्वीकार कर लें उसको वशीकरण कहते हैं।

(५) विद्वेषणजिनके द्वारा कुटुम्ब, जाति, देश, समाज, राष्ट्र आदि में परस्पर कलह और वैमनस्य की क्रान्ति मच जावे उन मंत्रों को विद्वेषण कहते हैं।

(६) मारणसाधक मंत्र बल के द्वारा प्राणदण्ड दे सके उन ध्वनियों के सानवेश को मारण मंत्र कहते हैं।

(७) शान्तिकजिसके द्वारा भयंकर से भयंकर व्याधि, व्यन्तर—भूत पिशाचों की पीड़ा, क्रूूर ग्रहजंगमस्थावर, विषबाधा, अतिवृष्टि, अनावृष्टि दुर्भिक्षादि ईतियों और चोर आदि का भय प्रशांत हो जावे उस मंत्र को शान्ति मंत्र कहते हैं।

(८) पौष्टिकजिस मंत्र के द्वारा सुख सामग्रियों की प्राप्ति हो उन मंत्रों को पौष्टिक मंत्र कहते हैं।

मंत्र, तंत्र, यंत्र की सिद्धि करने के लिये द्रव्यशुद्धि, क्षेत्रशुद्धि, समयशुद्धि, आसनशुद्धि, विनयशुद्धि ,मन:शुद्धि, वचनशुद्धि, कायशुद्धि आदि का ध्यान रखना आवश्यक है।

मंत्र और सिद्धि परस्पर जुड़े हुए शब्द हैं पर इसके लिये कई तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उनका सम्यक् पालन आवश्यक है। विधिवत् पालन न करने से इसमें असफलता मिलती हैं, फलस्वरूप अश्रद्धा उत्पन्न होती है इसीलिए आचार्यों ने कहा है कि—

‘‘एतद् गोप्यं महागोप्यं न देयं यस्य कस्यचित्।।’’
मंत्र साधना में सफलता का मूल आधार चित्त की एकाग्रता है। मन्त्र अपने आप में देवता है, अत: लौकिक एवं पारलौकिक सिद्धियों एवं सफलताओें के लिए इससे बढ़कर अन्य कोई साधन नहीं है।