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महान गुरु के महान शिष्य

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महान गुरु के महान शिष्य

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-जिनशासनरत्न पण्डित श्री सुमेरचन्द्र जैन दिवाकर
(बी.ए.,एल.एल.बी., न्यायतीर्थ, शास्त्री-सिवनी)

मधुर व्यक्तित्व-परमपूज्य १०८ आचार्य श्री वीरसागर महाराज के समीप सन् १९५७ के अप्रैल माह में मुझे रहने का सौभाग्य मिला था, जब वे जयपुर की खजांची की नसिया में संघ सहित विराजमान थे। वृद्ध शरीर होते हुए भी उनके मुख-मंडल पर विशेष तेज और दिव्यता का दर्शन होता था। उनका हृदय निस्पृह और वीतराग भाव से भूषित था। उनकी वाणी में बड़ी मधुरता थी। उनकी आचार्य शांतिसागर महाराज में अगाध भक्ति थी। आचार्य शांतिसागर महाराज ने कुंथलगिरि में अपने सल्लेखना के काल में वीरसागर महाराज को अपना उत्तराधिकारी आचार्य बनाया था। उस समय आचार्य महाराज ने मुझसे कहा था-‘‘हम स्वयं की इच्छा से वीरसागर को अपना आचार्य पद देते हैं। वीरसागर महाराज ने आचार्य पद के गौरव की पूर्णत: रक्षा की।

वे निरन्तर शास्त्र चर्चा, तत्त्व चिंतन अथवा भगवान के नाम स्मरण में अपने समय का उपयोग किया करते थे। तीन बजे रात को वे जगकर णमोकार की विशेष जाप करते थे। प्रतिदिन वे उस महामंत्र की आठ हजार जाप (अस्सी माला) दिया करते था। उनका जीवन प्रारंभ से ही अत्यन्त सरल और धार्मिक था।

'पूर्ण जीवन

गृहस्थ जीवन में इन्हें हीरालाल जी कहते थे। इनका गोत्र गंगवाल था। खुशालचंद जी पहाड़े (जो आचार्य कल्प चन्द्रसागर महाराज के रूप में प्रसिद्ध हुए) इनके बड़े घनिष्ठ मित्र थे। इन्हें लोग गुरु जी कहकर पुकारते थे। कैसी विचित्र बात है, नाम निक्षेप से गुरु जी रूप से प्रसिद्ध व्यक्ति भाव निक्षेप से विशाल जैन संघ के द्वारा वंदनीय ‘‘गुरु जी’’ बन गये। ये बाल ब्रह्मचारी थे। परोपकार करना इनका स्वभाव था। इन्होंने एक पाठशाला खोली थी। ये स्वयं अवैतनिक शिक्षक का कार्य करते थे। जब ये ऐलक पन्नालाल जी के संपर्वâ में आये, तब इन्होंने उनसे ब्रह्मचर्य व्रत रूप सप्तम प्रतिमा ग्रहण की थी।

दिव्य प्रभाव-आचार्य शांतिसागर महाराज दिगम्बर जैन मुनि के रूप में कोन्नूर (जिला-बेलगांव) में विराजमान थे। वहाँ की गुफा में एक बहुत बड़ा सर्पराज महाराज के शरीर से लिपटा था। उनकी तपस्या का तेज अद्भुत था। वीरसागर महाराज ने बताया-‘‘उनका प्रभाव अलौकिक था। मैंने और खुशालचंद जी पहाड़े (चन्द्रसागर जी) ने उनके कोन्नूर में दर्शन किये थे। उन्हें देखते ही हम दोनों के मन पर क्या प्रभाव पड़ा, हम नहीं कह सकते। उन्हें देखकर हमारा मन यही बोला कि ऐसे गुरु को छोड़कर अब नहीं जाना चाहिए। उनके दर्शन से अपने आप परिणाम संयम की ओर वृद्धिंगत हुए। उन्होंने हमें प्रेरणा तक नहीं की, किन्तु उनका आध्यात्मिक प्रभाव अन्त:करण को प्रबल प्रेरणा प्रदान करता था। आचार्य शांतिसागर महाराज की आध्यात्मिक आकर्षण शक्ति अद्भुत थी। आचार्य पायसागर महाराज ने बताया था, ‘‘मेरा जीवन आचार्य महाराज को देखकर बदला। उनकी पवित्र दृष्टि ने मेरे अन्त:करण में परिवर्तन किया। उससे मेरा जीवन संयम की ओर उन्मुख हुआ और मैं महाव्रती बन गया।

दीक्षा

आचार्य वीरसागर जी की मुनि दीक्षा नेमिसागर महाराज के साथ समडोली ग्राम में हुई थी। दक्षिण प्रांत के एक प्रमुख जैन ने बताया था कि नेमिसागर जी की दीक्षा के समय एक और व्यक्ति की मुनि दीक्षा होनी थी, जो कारण विशेष से न हो पाई। उस समय महाराज का वचन खाली न जाये, इसीलिए वीरसागर जी ने मुनि दीक्षा हेतु गुरुदेव से प्रार्थना की। इनकी दीक्षा का संस्कार पहले हुआ, उसके बाद नेमिसागर जी की दीक्षा विधि हुई, इसीलिए आचार्य शांतिसागर महाराज ने कहा था-‘‘वीरसागर हमारा प्रथम निग्र्रन्थ शिष्य है।’’

विश्वासपात्र

वीरसागर महाराज पर आचार्य शांतिसागर महाराज का बड़ा विश्वास था। आचार्य महाराज का इरादा था कि एक बार छोटासा संघ लेकर उत्तर की तीर्थ यात्रा करें और पावापुरी में समाधि लेवें। आचार्य महाराज ने यह भी कहा था, ‘‘इस बार हम तुम्हारी सिवनी होते हुए शिखर जी की तरफ जाये। पहले हमारा तुम से परिचय नहीं था, इसलिए हम जबलपुर तक तो आये, किन्तु सिवनी नहीं आये।’’ जब वीरसागर महाराज को आचार्य शांतिसागर महाराज का भाव सूचित किया गया, तब वीरसागर महाराज ने समाचार दिया था कि आचार्य महाराज की सल्लेखना के लिए उचित स्थान मुक्तागिरि ठीक रहेगा। इस समाचार ने आचार्य महाराज के विचार को बदल दिया। वे कहने लगे-‘‘वीरसागर ने मुक्तागिरि का सुझाव दिया है। उन्होंने यह बात बहुत सोच-समझकर लिखी है।’’ इसलिए वे मुक्तागिरि को ही अपनी सल्लेखना का स्थान बनाना चाहते थे, लेकिन विचित्र परिस्थितियों के कारण कुंथलगिरि में उनकी सल्लेखना हुई।

चर्चा

जयपुर में मेरे साथ में महान् विद्वान् पंडित खूबचंद्र जी शास्त्री भी थे। बड़ी सुन्दर और मार्मिक चर्चा चला करती थी। श्री वीरसागर महाराज अनेक शंकाओं का बड़ा मधुर समाधान दिया करते थे। उस समय वहाँ सोनगढ़ के बाबा आये हुए थे। सम्यग्दर्शन की चर्चा युक्त वातावरण था। उससे ऐसा लगता था कि सम्यग्दर्शन अत्यन्त सरल वस्तु है। मैंने वीरसागर महाराज से कहा-‘‘इस समय सम्यक्त्व का बाजार बड़ा गर्म है। आत्मज्ञान की ध्वनि सर्वत्र सुनाई पड़ रही है, बेचारे सदाचार और संयम की कोई बात भी नहीं करता। वास्तविक सत्य बात क्या है ? उन्होंने कहा-‘‘सम्यक्त्व खेल नहीं है। वह बहुत बड़ी चीज है।’’

महत्त्वपूर्ण उत्तर

मैंने पूछा-आचार्य महाराज ने आपको मुनि बनाकर कष्ट दिया या आनन्द प्रदान किया ? उन्होंने कहा-‘‘हमें कौन-सा कष्ट है। हमें अपूर्व शांति मिली है। तुम परिग्रह के जाल में फंसे हुए हो, तुम्हें क्षण भर भी शांति नहीं है। हम तो तुम्हारी तकलीफ देखते हैं और उससे छुड़ाना चाहते हैं। तुम सोचते हो कि साधु को परिषहों द्वारा कष्ट होता है। किन्तु तुम गृहस्थों को भी कम परिषह सहन नहीं करना पड़ता है। जितना कष्ट गृहस्थ उठाता है तथा जितना वह परिग्रह का ध्यान रखा करता है, उतना कष्ट यदि मुनि सहन करे और निज गुण का ध्यान करे, तो उसे अविनाशी सुख पूर्ण मोक्ष प्राप्ति में देर न लगे। देखो! चिल्हर का धंधा करने वाला बीच बाजारों में बैठता है। हर एक ग्राहक को देता-लेता है, परन्तु अपने धन कमाने के ध्येय को नहीं भूलता है। कितनी सावधानी रखता है वह। दूसरी बात, गर्मी में गृहस्थ ज्येष्ठ माह में दुकान दस बजे पहुँचता है। सूर्य की गर्मी बढ़ती जाती है। ग्राहकों की भीड़ लगी हुई है। उस समय नौकर आकर कहता है-पानी पी लो! तो वह सुनता नहीं बहरा बन जाता है। पुन: कहता है तो वह डांट देता है या उसकी बात पर ध्यान नहीं देता। उसका ध्यान शरीर पर नहीं है, उसका ध्यान है ग्राहक पर। उसकी निगाह पैसे पर रहती है, वह अर्थ लाभ पर ध्यान लगाये हुए शरीर के कष्ट को नहीं देखा करता है। यह दृष्टि का फेर है। आत्मकल्याण में लगने पर साधु आरंभ क्रियाओं को छोड़ देता है और वह आत्महित में बाधा डालने वाली सामग्री पर दृष्टि नहीं देता है। गृहस्थ को आत्महित भार रूप लगता है तथा विषय की आराधना को वह अपनी निधि मानता है। साधु बनने पर मनोवृत्ति बदल जाती है। हमने महाव्रत लिए, हमारे सिर पर घर-गृहस्थी की चिंता तनिक भी नहीं है। इच्छाओं का बोझ कम हो जाने से आत्मा को शांति मिलती है।

पंथ भेद

एक दिन जयपुर के मंदिर जी में भगवान का पंचामृत अभिषेक महाराज ने देखा। उसके अनंतर मुझसे उन्होंने कहा-‘‘इस मंदिर में जितने मुनि हमारे साथ हैं, वे सब तेरह पंथी हैं और जितने व्रती गृहस्थ बैठे हैं, वे सब बीसपंथी हैं।’’ मैंने कहा-‘‘महाराज! आपका अभिप्राय हमारी समझ में नहीं आ पाया। उन्होंने कहा, ‘‘लोग तेरहपंथी, बीसपंथी अपने को कहा करते हैं। उसका रहस्य दूसरा है। पंच महाव्रत, पंच समिति तथा तीन गुप्ति रूप त्रयोदश प्रकार का संयम मुनि पालते हैं, इससे दिगम्बर मुनि सच्चे तेरहपंथी हैं। अष्ट मूलगुण, पंच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, चार शिक्षा व्रत रूप २० व्रतों का पालन करने वाले श्रावक बीसपंथी हैं।’ आचार्य वीरसागर महाराज की बात बड़ी मार्मिक लगी। ऋषिप्रणीत ग्रंथ में तेरह, बीस या साढ़े सोलह पंथ का कथन नहीं है। अत: वीरसागर महाराज के अनुसार पंथों के विवाद से उत्पन्न विषाद तथा अनैक्य का निवारण सहज ही हो जाता है।

आगम पंथ

एक बार मैंने दक्षिण के आचार्य धर्मसागर महाराज से पूछा था, ‘‘हमारे प्रांत में तेरहपंथ, बीसपंथ भेद चलता है। आप किस पंथ के हैं ?’’ उन्होंने कहा ‘‘हम तुम्हारे पंथों को नहीं जानते। शास्त्रों में कोई पंथ का उल्लेख नहीं है। हम तो आगमपंथी हैं। सर्वलोक आगम की आज्ञा के अनुसार आचरण करना हमारा पंथ है।’’ आज स्वच्छन्दता का रास्ता पकड़कर लोग नए-नए पंथों को जन्म दे रहे हैं। सब पंथों के स्थान में आगम पंथी बनना सच्चे धर्मात्मा मुमुक्षु जीव का कर्तव्य है।

मार्मिक बात - वीरसागर महाराज बड़ी मार्मिक बातें कहा करते थे। कहने लगे-जो अपने को गुरु मानता है, वह उन्नति नहीं कर पाता। शिष्य बनोगे, तो हित होगा। शिष्य बनने पर भूल का पता चलता है। गुरु बन जाने पर गलती का पता कैसे चलेगा? मैंने पूछा-

प्रश्न - आचार्य शांतिसागर महाराज में गुरुपना था या शिष्यपना?

उत्तर - ‘‘हमारे लिए तो वे गुरु थे, किन्तु स्वयं को वे गुरु नहीं मानते थे। अपने को गुरु मानने वाले का कल्याण नहीं है।’’

संस्मरण

आचार्य शांतिसागर महाराज के विषय में उन्होंने कहा-उनका आत्मविश्वास अचिन्त्य था। जिनवाणी पर श्रद्धा रखकर आत्मबल के आश्रय से वे अपना मार्ग निर्धारण करते थे। उस समय उनके विरुद्ध यदि सारा संसार हो तो भी उन्हें उसका भय नहीं था। उन्होंने एक घटना सुनाई थी, जिससे ज्ञात होता है कि आचार्य शांतिसागर महाराज कितने उच्च श्रेणी के साधु थे। ‘‘आचार्यश्री का संघ शिखर जी जा रहा था। मार्ग में एक जगह बैलों का झुंड मिला। चार मस्त सांड दौड़ते हुए महाराज की तरफ गये। सबके मन में घबराहट उत्पन्न हुई, कि कहीं ये पशु अनर्थ न कर बैठे। क्षण भर में उनके पास जाकर वे बैल शांत हो गये और उन्होंने महाराज के चरणों के समीप भूतल पर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया। वास्तव में वे अलौकिक महात्मा हो गये।’’

गुरुकुल

वीरसागर महाराज ने कहा-‘‘जैनधर्म का महत्त्व बढ़ाने के लिए हमें गुरुकुल चाहिए, जो हमारे पूर्ण स्वाधीन हो। वहाँ सच्चरित्र विद्वान् तैयार करो, जिनके द्वारा जैनधर्म की सच्ची प्रभावना हो। अपनी संस्थाओं को हम शासन के आधीन करते हैं। सरकारी सहायता प्राप्त करने से सरकार स्वामी बनती है। हमारी स्वाधीनता कहाँ रही ? यही दृष्टि आचार्य शांतिसागर महाराज की थी। वे कहते थे, ‘‘यदि शासन के आधीन धार्मिक विद्यालय रहेंगे, तो ऐसे जिन शासन में ज्ञाता, त्यागी, परोपकारी निस्पृही विद्वान कैसे प्राप्त होंगे, जो अपनी वाणी और जीवनी के द्वारा जगत् को जिनेश्वर की शिक्षा का रहस्य बता सकें।

आवश्यक बात

आचार्य महाराज की यह दृष्टि उन व्यक्तियों के लिए आवश्यक है, जिनके पास सम्पत्ति के साथ विवेक भी है। महाराज ने कई बार कहा था-‘‘सम्यग्दर्शन प्राप्त करने के लिए जिनवाणी का स्वाध्याय आवश्यक है। गरीब आदमी शास्त्र नहीं खरीद पाता। सबके हित के लिए शास्त्रों को बिना मूल्य वितरण करना उदार धनिकों का कत्र्तव्य है। कम से कम लागत मूल्य पर तो ग्रंथ दो। वीरसागर महाराज का स्वास्थ्य खराब रहा करता था। उसके विषय में जब मैंने चिंता व्यक्त की, तब उन्होंने कहा-‘‘भोगी को रोग रोने के लिए होता है, त्यागी को रोग वैराग्य के लिए होता है।’’ गंभीर बात-अनेक महत्वपूर्ण बातें उनके मुख से सुनकर मैंने कहा-‘‘महाराज! आप बड़ी गहरी बात करते हैं ?’’ महाराज बोले-‘‘जैनधर्म में कौन बात गहरी नहीं है ? यदि अनुभव करो तो पता चले। जैनधर्म अनुभव की ही तो वस्तु है। वह वाणी का या बुद्धि का वैभव नहीं है। वह अनुभव के रस से भरा है। लोग आज आगम को बुद्धि के अनुकूल बनाते हैं, बुद्धि को आगम के अनुकूल नहीं बनाते, यही बड़ी भूल है।’’

सार

आचार्य वीरसागर महाराज बड़े गंभीर, शान्त, मृदुभाषी और अत्यन्त कारुणिक साधुराज थे। उनके निकट संपर्व में आने वाले अनेक भव्यात्माओं ने श्रेष्ठ व्रत लेकर आत्महित की साधना की है। वीरसागर महाराज की पावन स्मृति रूप में वीर भगवान के ज्ञान सिंधु के अमृत को भव्यात्माओं को पान कराने का उद्योग हितकारी है। उन संयम मूर्ति गुरुराज को शतश: वंदन।