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मानव जीवन के विकास में वनस्पति की भूमिका

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मानव जीवन के विकास में वनस्पति की भूमिका

वनस्पति मानव समाज के लिये एक ऐसी मूक सेविका है, जो सेवा के बदले में हमसे कुछ नहीं चाहती। मानव जीवन में वनस्पति का इतना महत्वपूर्ण योगदान है कि हम वनस्पति के बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। जीवन की प्रत्येक आवश्यकता वनस्पति से ही पूर्ण होती है। दूसरे शब्दों में यह कहना भी उचित है कि पेड़ पौधे आक्सीजन बनाने के कारखाने है। आज के औद्योगिकरण के कारण प्रदूषण चरम सीमा पर है। जिसके कारण घर—घर में अशांति का वातावरण छाया है। जिससे स्वास्थ्य पर प्रतिवूâल प्रभाव पड़ रहा है।

१. मानव विकास—

वैज्ञानिकों के अनुसार, हर जीवधारी के विकास के लिये १६ तत्वों की आवश्यकता होती है। जिसमें ६ मुख्य तत्व (ण् : प् : ध् : N : झ् : ख्) कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन तो प्राकृतिक रूप से मिलते हैं। नत्रजन, स्पुâर एवं पुटाश अलग से दिये जाते हैं। शेष ९ सूक्ष्म पोषक तत्वों की र्पूित भी अलग से की जाती है। (ण्ल्, श्ह, श्उ, एर्, ैंह, ँद, श्द, ण्ग्, इा) मानव विकास के लिये इन १६ तत्वों की र्पूित हेतु वनस्पति की विशिष्ट भूमिका रहती है। अर्थात् वनस्पति ही सर्वश्रेष्ठ है। वनस्पतियों से आम के आम एवं गुठलियों के दाम वाली कहावत यहाँ चरितार्थ होती है। मानव विकास के लिये १६ तत्वों की र्पूित विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों से की जाती है, वनस्पतियों से प्रदूषण को हटाकर पर्यावरण का संरक्षण होता है। आज देश से, विश्व से प्रदूषण हट जाये तो पर्यावरण का संरक्षण—होता है। जिससे मानव का सर्वांगीण विकास द्रुतगति से होगा। र्आिथक एवं भौतिक पहलुओं पर आत्म निर्भर होगा। पेड़ पौधों, पूâलों का मानव जीवन से आदिकाल से संबंध है। जन्म से मृत्यु तक सभी कार्यों में फूलों का विशिष्ट महत्व है।

२. जैनागम और वनस्पति—

जैनागम में असंख्यात वनस्पतियों का वर्णन मिलता है। मानव जीवन ही नहीं प्राणि मात्र के विकास में, प्रत्येक जीवधारी के विकास में, वनस्पति की भूमिका हैं जैन धर्म विश्व का प्रथम धर्म है। जिससे धर्म का मूलाधार पर्यावरण सुरक्षा को मान्य किया है। आज का मनुष्य वनस्पति जगत को नाना प्रकार के साधनों द्वारा नष्ट करने और हानि पहुँचाने पर तुला है। वनस्पति जगत एक विकलांग की तरह है, यह अंध, वधिर, मूक, पंगु और अवयव हीन है। वनस्पतियों को उसी तरह कष्ट होता है जिस प्रकार शस्त्रों के भेदन छेदन से कष्ट होता है। मनुष्य और प्रकृति के बीच शांतिपूर्ण सम्बन्धों के लिये यह आवश्यक है कि वनस्पति का संरक्षण संवर्धन हो। वनस्पति एवं व्यवहारिक जीवन का अटूट सम्बन्ध है। यों तो वनस्पति की सुरक्षा की बात न्यूनधिक रूप से सभी धर्म करते हैं पर जैन धर्म में तीर्थंकरों के सम्पूर्ण चिन्तन की धुरी वनस्पति संरक्षण है। भरत बाहुबली महाकाव्य में वृक्ष वर्णनों के साथ ही वन संरक्षण का वृहत् वर्णन मिलता है। आदिपुराण में वन संरक्षण एवं सघन वनों का जो वर्णन है, वही अरण्य संस्कृति में भी मिलता है। इस संस्कृति के अनुसार, सम्पूर्ण विश्व एक वृक्ष है, जिसे लोक कहा गया है। लोक के एक भाग पर मानव रहता है। जो जम्बूद्वीप के नाम से जाना जाता है। यों तो, मानव प्रारम्भ से कल्पतरू पर निर्भर रहता आया है। जैन धर्म के अनुसार, पृथ्वी, जल, वनस्पति, वायु और अग्नि में भी जीवन है। आचार्य उमास्वामी ने तत्वार्थ सूत्र के द्वितीय अध्याय के १३ वें सूत्र में कहा है—पृथिव्यप तेजो वायु वनस्पतय: स्थावरा:। यहाँ हम केवल वनस्पति काय का वर्णन करेंगे। पेड़—पौधे आदि वनस्पतिकायिक जीव हैं। निगोद के जीव भी एकेन्द्रिय हैं। इन्हें वनस्पतिकायिक जीव कहते हैं। वनस्पति के दो भेद हैं—१. प्रत्येक, २. साधारण। प्रत्येक वनस्पति वे हैं जिन्हें प्रत्येक जीव का अलग—अलग शरीर होता है। साधारण वनस्पति वे हैं, जिनमें अनन्त जीवराशि का एक ही शरीर होता है। इन वनस्पतिकायिक, साधारण वनस्पति जीवों को निगोदिया जीव भी कहा जाता है। निगोदिया जीव साधारण ही होते हैं, प्रत्येक नहीं। पर्यावरण और अिंहसा का अटूट संबंध है। अत: स्थावर जीवों की रक्षा हो पर्यावरण संरक्षण है। आचार्य उमास्वामी ने तत्त्वार्थ सूत्र के ५ वें अध्याय के २१ वे सूत्र में दूसरा सूत्र लिखा है कि परस्परोपग्रहों जीवानाम् अर्थात् जीवन एक दूसरे के सहयोग पर आधारित है। विकास का मार्ग िंहसा या विनाश नहीं, परस्पर सहकार है। प्रत्येक तीर्थंकर को किसी न किसी वृक्ष के नीचे केवलज्ञान की प्राप्ति हुई, जिसे अशोक वृक्ष की संज्ञा दी गई, जिनको सुनने देव तथा मनुष्य ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण पशु—पक्षी भी आते हैं।

३. तीर्थंकर और वृक्ष—

जैन धर्म के समस्त तीर्थक्षेत्र प्राकृतिक स्थलों पर तथा अनेक स्थान जहाँ तीर्थंकर मुनि भगवंतों का निर्वाण हुआ, वे सभी स्थान प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। अकेले सम्मेदशिखर पर्वत से २० तीर्थंकरों तथा असंख्यात मुनि अपनी साधना से कर्मों की निर्जरा कर मोक्षगामी हुये। एक बार की वंदना से ३३ कोटि २३४ करोड़ ७४ लाख उपवास का फल मिलता है। नरक एवं तिर्यंचगति छूट जाते हैं। स्त्रीिंलग का भी छेदन हो जाता है। जैनशासन में तीर्थंकरों ने पर्यावरण के संरक्षण से अपनी साधना प्रारंभ की। ऋषभदेव ने कृषि एवं वन सम्पदा को सुरक्षित रखने के लिये लोगों को सही ढंग से जीने की कला सिखाई। नेमिनाथ ने पशु—पक्षियों के प्राणों के समक्ष मनुष्य की विलासिता को निरर्थक सिद्ध किया है। पाश्र्वनाथ ने धर्म और साधना के क्षेत्र में हिंसक अनुष्ठानों की अनुमति नहीं दी। सम्मेदशिखर पर नाना प्रकार की वनस्पति है, जो खाद्य पदार्थों के साथ—साथ औषधीय भी है। तीर्थंकरों के चिन्ह भी पर्यावरण से ही संबंधित हैं। पद्म पुराण में भी वृक्षारोपण को प्रतिष्ठा का विषय कहा गया है। प्रतिष्ठतें गमिष्यन्ति वृक्षा: समारोहित:। इस प्रकार जैन धर्म का अनेक स्थलों पर वनस्पति जगत् तथा प्राणी जगत् से सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है।

केवलज्ञान के वृक्ष—

क्र. तीर्थंकर पुराण का नाम पुराण का नाम वनस्पति नाम
तिलोयपण्णत्ति महापुराण
1. ऋषभनाथ न्यग्रोध वट बड़/बरगद (Ficus Bengalensis Linn)
2. अजितनाथ सप्तपर्ण वट सप्तवर्ण (सतौना) (Alstonia Scholaris R.Br.)
3. संभवनाथ शाल शाल्मलि शाल (साल)(Shorea robusta Gaeth f)
4. अभिनंदननाथ सरल असन चीड़ (Pinas lonfigolia roxb)
5. सुमतिनाथ प्रियंगु प्रियंगु प्रियंगु (Colicarpa macrophyila Vahl)
6. पदमप्रभ प्रियंगु प्रियंगु प्रियंगु (Colicaprpa macrophyila Vahl)
7. . सुपाश्र्वनाथ शिरीष शिरीष शिरीष (Albizzia lebbeck benth)
8. चन्द्रप्रभ नागवृक्ष नाग नागकेशर (Mesua ferrea Linn)
9. पुष्पदन्त अक्ष(बहेड़ा) नाग बहेड़ा (Terminais belerica roxb)
10. शीतलनाथ धूलिपलाश बेल ढाक पलाश (Butgea foundosa Koen.ex. roxv)
11. श्रेयांसनाथ तेन्दू तुम्बुर तेन्दु (Diospyros embryoperis pers)
12. वासुपूज्य पाटल कदम्ब कदम्ब (Anthoecphalus cadamva miq)
13. विमलनाथ जम्बू जम्बू जामुन (Eugenia Jamolana lam)
14. अनंतनाथ पीपल पीपल पीपल(Flcus religiosa linn)
15. . धर्मनाथ दधिपर्ण सप्तच्छद कैथ(Feronia elephantum correa)
16. शांतिनाथ नन्दी नन्दी तून (Cadrela toona roxb)
17. कुन्थुनाथ तिलक तिलक तिलक(Wendlendia exerta Dc)
18. . अरनाथ आम्र आम्र आम (Mangifera Indica Linn)
19. मल्लिनाथ कंकेलि अशोक अशोक (Saraca Indica Linn)
20. मुनिसुव्रतनाथ चम्पक चम्पक चम्पा(Michelia champaca Linn)
21. नमिनाथ बकुल बकुल मौलसिरी/मौलश्री (Minusops elengl linn)
22. नेमिनाथ मेषश्रंग बाँस मेषशृंग (Gymema Syvestre R Br.)
23. पाश्र्वनाथ धव देवदारु धव (Anogeissus latifolla woll)
24. महावीर शाल शाल शाल (साल) (Shorea robusta Gaertn f)


उपरोक्त वैवल्य वृक्षों का आरोपण करके एक विशिष्ट उद्यान का निर्माण, जिसे तीर्थंकर उद्यान का नाम दिया गया है, एक अतिरिक्त आकर्षण का केन्द्र बनेगा।

वृक्षों का शास्त्रीय स्वरूप—

वृक्ष—जैनाम्नाय में कल्पवृक्ष व चैत्यवृक्षों का कथन प्राय: आता है। भोग—भूमि में मनुष्यों की सम्पूर्ण आवश्यकताओं को चिन्ता मात्र से पूरी करने वाले कल्पवृक्ष हैं और प्रतिमाओं के आश्रयभूत चैत्यवृक्ष है। यद्यपि वृक्ष कहलाते हैं परन्तु ये सभी पृथ्वीकायिक होते हैं, वनस्पतिकायिक नहीं। कल्पवृक्ष : भोग भूमि के समय वहाँ पर गांव या नागरादिक नहीं होते। केवल वे सब कल्पवृक्ष होते हैं, जो जुगलों को अपने—अपने मन की कल्पित वस्तुओं को दिया करते हैं। (तिलोयपण्णत्ति ४/३४१) भोग भूमि में पानांग, तूर्याग, भूषणांग, वस्त्रांग, भोजनांग, आलयांग, दीपांग, भाजनांग, मालांग और तेजांग आदि कल्पवृक्ष होते हैं। चैत्यवृक्ष—चैत्यवृक्षों के मूल में चारों दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में पद्मासन से स्थित और देवों से पूज्यनीय पाँच—पाँच जिन प्रतिमाएँ विराजमान होती हैं। असुरकुमारादि दस प्रकार के भवनवासी देवों के भवनों में क्रम से अश्वत्थ (पीपल), सप्तवर्ण, शाल्मली, जामुन, वेतस, कदम्बर तथा प्रियंगु, शिरीष पलाश और राजद्रुम ये दस प्रकार के चैत्यवृक्ष होते हैं। किन्नर आदि आठ प्रकार के व्यंतर देवों के भवनों में क्रम से अशोक, चम्पक, नागद्रुग, तम्बुरू, न्यग्रोध, कन्टकवृक्ष, तुलसी और कदम्ब वृक्ष, ये आठ प्रकार के होते हैं। समवसरणों में ये अशोक, सप्तच्छद, चम्पक, व आम्र ऐसे चार प्रकार के होते हैं।

अशोक वृक्ष निर्देश : ऋषभ आदि तीर्थंकरों को जिन वृक्षों के नीचे केवल ज्ञान उत्पन्न हुआ, उन्हें अशोक वृक्ष की संज्ञा दी है। न्यग्रोध, सप्तवर्ण, साल, सरल प्रियंगु, शिरीष नागवृक्ष, अक्ष (बहेड़ा), धूलिपलाश, तेंदू पाटल जम्बू, पीपल, दधिपर्ण, नन्दी, तिलक, आम्र कंकेलि (अशोक), चम्पक बकुल, मेषशृंग, धब और शाल ये २४ तीर्थंकरों के २४ अशोक वृक्ष है। जो लटकती हुई मालाओं से युक्त और घण्टा समूहादि से रमणिक होते हुये पल्लव एवं पुष्पों से झुकी हुई शाखाओं से शोभायमान होते हैं। ऋषभादि तीर्थंकरों के उपयुक्त चौबीस अशोक वृक्ष बारह से गुणित अपने—अपने जिन की (तीर्थंकर) की ऊँचाई से युक्त होते हुये शोभायमान है। (तिलोयपण्णत्ति ४/९१५/९१९) वैदिक सम्प्रदाय अनुसार—गीता में कदम्ब के वृक्ष का सम्बन्ध कामदेव से, पलाश के लालफूल का सम्बन्ध बुद्ध से, कचनार के सफेद फूलों का संबंध वन और सौभाग्य की देवी लक्ष्मी से हैं, नीलकमल भगवान विष्णु से, अमलतास के कनक पुष्प व्यापार में समृद्धिवर्धक कहें जाते हैं।—ऋग्वेद वनस्पति का ह्यस विनाश की ओर—अपने स्वार्थ की र्पूित के लिये जब मनुष्य ने वनस्पति का दोहन शोषण करना शुरू कर दिया तो जीव—जन्तु, पशु—पक्षियों का विनाश वायु प्रदूषण होने लगा। जिससे जल प्रदूषण एवं मृदा प्रदूषण में वृद्धि हुई, आक्सीजन में कमी आई है। बीमारिया (कैंसर, हार्ट अटैक जैसे रोग) फैल रहे हैं। अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक विकृतियाँ आ रही हैं। वनस्पति का नष्ट होना पर्यावरण के लिये अत्यन्त िंचता का विषय है। वर्षा का प्रतिशत दिन—प्रतिदिन कम होता जा रहा है, जिससे सारे विश्व में त्राहि—त्राहि मची रहती है। जमीन उपजाऊ न होकर बंजर होने लगती है। उत्पादन में कमी आ रही है।


सुरेश जैन ‘मारौरा’
संस्कार सागर अक्टूबर २०१३ पेज नं. १८—१९