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पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ ऋषभदेवपुरम्-मांगीतुंगी में विराजमान है ।

प्रतिदिन पारस चैनल के सीधे प्रसारण पर प्रातः 6 से 7 बजे तक प.पू.आ. श्री चंदनामती माताजी द्वारा जैन धर्म का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त करें |

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वर्षायोग स्थापना पर विशेष प्रवचन

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जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



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समाचार

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सर्वाधिक चातुर्मास करने वाली गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी का वर्षायोग ऋषभदेवपुरम् तीर्थ पर-

सर्वोच्च जैन साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने इस वर्ष पावन वर्षायोग करने की घोषणा ऋषभदेवपुरम् तीर्थ (मांगीतुंगी) में की है।

पूज्य माताजी का 66वाँ वर्षायोग स्थापना समारोह आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी, 26 जुलाई 2018, गुरुवार को मध्यान्ह 3 बजे ऋषभदेवपुरम् तीर्थ पर आयोजित किया गया है तथा वर्षायोग की आगमोक्त क्रिया रात्रि 9 बजे सम्पन्न होगी।

पूज्य माताजी वर्तमान समय में सर्वाधिक चातुर्मास करने वाली सर्वप्राचीन दीक्षित आर्यिका माता हैं। इस वर्ष आपका 66वाँ वर्षायोग विशेष भक्तिभाव के साथ भगवान ऋषभदेव  108 फुट विशालकाय दिगम्बर जैन मूर्ति निर्माण कमेटी द्वारा ऋषभदेवपुरम् तीर्थ पर सम्पन्न किया जा रहा है।

अत: 26 जुलाई को मध्यान्ह 3 बजे ऋषभदेवपुरम् तीर्थ पधारकर पूज्य गुरु माँ के प्रति अपनी कर्तव्य निष्ठा समर्पित करें, ऐसा निवेदन है।

निवेदक-108 फुट भगवान ऋषभदेव मूर्ति निर्माण कमेटी के समस्त पदाधिकारीगण।

जन्मजयंती विशेष

महान गुरु के महान शिष्य

आषाढ़ शु.पूर्णिमा-'गुरु पूर्णिमा'आचार्य श्री वीरसागर महाराज के १४३वें जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति

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मधुर व्यक्तित्व-परमपूज्य १०८ आचार्य श्री वीरसागर महाराज के समीप सन् १९५७ के अप्रैल माह में मुझे रहने का सौभाग्य मिला था, जब वे जयपुर की खजांची की नसिया में संघ सहित विराजमान थे। वृद्ध शरीर होते हुए भी उनके मुख-मंडल पर विशेष तेज और दिव्यता का दर्शन होता था। उनका हृदय निस्पृह और वीतराग भाव से भूषित था। उनकी वाणी में बड़ी मधुरता थी। उनकी आचार्य शांतिसागर महाराज में अगाध भक्ति थी। आचार्य शांतिसागर महाराज ने कुंथलगिरि में अपने सल्लेखना के काल में वीरसागर महाराज को अपना उत्तराधिकारी आचार्य बनाया था। उस समय आचार्य महाराज ने मुझसे कहा था-‘‘हम स्वयं की इच्छा से वीरसागर को अपना आचार्य पद देते हैं। वीरसागर महाराज ने आचार्य पद के गौरव की पूर्णत: रक्षा की। वे निरन्तर शास्त्र चर्चा, तत्त्व चिंतन अथवा भगवान के नाम स्मरण में अपने समय का उपयोग किया करते थे। तीन बजे रात को वे जगकर णमोकार की विशेष जाप करते थे। प्रतिदिन वे उस महामंत्र की आठ हजार जाप (अस्सी माला) दिया करते था। उनका जीवन प्रारंभ से ही अत्यन्त सरल और धार्मिक था।

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वर्षायोग स्थापना का समय व विधि

जैन मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक और क्षुल्लिका आदि चतुर्विध संघ वर्षा ऋतु में एक जगह रहने का नियम कर लेते हैं, अन्यत्र विहार नहीं करते हैं इसलिए इसे वर्षायोग कहा है तथा सामान्यतया श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक इन चार महीनेपर्यंत एक जगह रहना होता है अत: इसे चातुर्मास भी कहते हैं।
प्रश्न : इस वर्षायोग को ग्रहण करने की तथा इसे समाप्त करने की तिथियाँ कौन सी हैं?
उत्तर : आषाढ़ सुदी चतुर्दशी की पूर्वरात्रि में सिद्धभक्ति आदि विधिपूर्वक इस वर्षायोग को साधुजन ग्रहण करें और कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की पिछली रात्रि में विधिपूर्वक उस वर्षायोग को समाप्त कर देवें।
विधि :
पूर्व दिशा की तरफ मुख करके वर्षायोग का प्रतिष्ठापन करने के लिए ‘‘यावन्ति जिनचैत्यानि’’ इत्यादि श्लोक का पाठ करना चाहिए पुन: आदिनाथ भगवान और दूसरे अजितनाथ भगवान इन दोनों का ही स्वयंभू स्तोत्र बोलकर अंचलिका सहित चैत्यभक्ति करनी चाहिए। यह पूर्व दिशा की तरफ की चैत्य-चैत्यालय की वंदना है। इसी प्रकार दक्षिण, पश्चिम और उत्तर की तरफ की वंदना भी क्रम से करनी चाहिए।

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समाचार
ऋषभदेवपुरम-माँगीतुँग़ी में हुई पुलिस चौकी की स्थापना

पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के आशीर्वाद से दिनांक 5 जुलाई 2018 को ऋषभदेवपुरम-माँगीतुँग़ी में पुलीस चौकी की स्थापना सम्पन्न हुई। चौकी का उद्घाटन माननीय श्री संजयजी दराडे़, एस.पी.-नाशिक ग्रामीण ने किया। साथ में अन्य पुलिस अधिकारीगण, स्थानिक सरपंच-दसवेल व भिलवाड ग्राम तथा अनेक भक्तजन भी उपस्थित रहे।

इस अवसर पर शिला का अनावरण, फ़ीता खोलना, दीप प्रज्ज्वलन, सम्मान, उद्घाटन सभा आदि कार्यक्रम सम्पन्न हुए। समारोह में पूज्य माताजी के साथ प्रज्ञाश्रमणी श्री चंदनामती माताजी व अध्यक्ष-पीठाधीश श्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी ने भी सान्निध्य प्रदान किया।

सभा में ट्रस्ट की ओर से संजय पापडीवाल (महामंत्री), विजय जैन, डॉ. जीवन प्रकाश जैन, चंद्रशेखर कासलीवाल, मनोज ठोले, प्राचीन मंदिर के ट्रस्टी प्रदीप ठोले, अयोध्या व टिकेतनगर से अमरचंद जैन, शैंकी जैन, अतुल जैन, हस्तीनापुर से सौ. मंगला साहू आदि विशेष उपस्थित रहे।

-डॉक्टर जीवन प्रकाश जैन ऋषभदेवपुरम-माँगीतुँग़ी
ब्रह्मचारी से स्वामी जी तक की प्रेरणादायक यात्रा

ब्रह्मचारी से स्वामी जी तक की प्रेरणादायक यात्रा

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-सुरेश जैन रितुराज, मेरठ
(राष्ट्रीय अध्यक्ष-भारतीय जैन मिलन व अध्यक्ष-दिगम्बर जैन समाज मेरठ)


जम्बूद्वीप को आज कौन नहीं जानता। परमपूज्यनीय आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा से निर्मित जम्बूद्वीप केवल हस्तिनापुर की शान नहीं है, बल्कि पूरे देश में इसे महान् सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहर के रूप में जाना जाता है। हस्तिनापुर जैन धर्मावलम्बियों का सर्वोच्च तीर्थ क्षेत्र है। अजैनों के बीच यह प्रचारित करने में जम्बूद्वीप का उल्लेखनीय योगदान है, यह कहना अतिशयोक्ति न होगी।

जम्बूद्वीप ने जो आयाम स्थापित किये हैं नि:सदेह यह परमपूज्यनीय श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा और आशीर्वाद से प्राप्त किये हैं लेकिन इसकी असाधारण और चमत्कारिक सफलता के पीछे अगर पीठाधीश श्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी का उल्लेख न किया गया, तो शायद यह उचित न होगा ।

मैं माताजी और जम्बूद्वीप से काफी सालों से जुड़ा हुआ हू। मेरठ में श्री प्रेमचंद जैन (तेल वालों) ने कमलानगर (मेरठ) में मंदिर निर्मित किया था और माताजी के पावन सान्निध्य में उसका पंचकल्याणक सम्पन्न हुआ था। मैं पंचकल्याणक का चेयरमैन था। माताजी के सान्निध्य में भगवान ऋषभदेव निर्वाणमहोत्सव समिति का गठन हुआ था, उसका मैं महामंत्री था। इन सभी कार्यों में बाल ब्रह्मचारी श्री रवीन्द्र जी का मुझसे संपर्क रहा था। मैंने तभी उनकी अद्भुत प्रतिभाओं को नजदीक से देखा। रवीन्द्र जी में कार्य करने की क्षमता भी है और जैनधर्म के उत्थान के प्रति ललक भी है। और पढ़ें...

आरती नवग्रह स्वामी...
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तर्ज-चाँद मेरे आ जा रे............

आरती नवग्रह स्वामी की-२
ग्रह शांति हेतू तीर्थंकरों की, सब मिल करो आरतिया।।टेक.।।
आत्मा के संग अनादी, से कर्मबंध माना है।
उस कर्मबंध को तजकर, परमातम पद पाना है।
आरती नवग्रह स्वामी की।।१।।

निज दोष शांत कर जिनवर, तीर्थंकर बन जाते हैं।
तब ही पर ग्रहनाशन में, वे सक्षम कहलाते हैं।
आरती नवग्रह स्वामी की।।२।।

जो नवग्रह शांती पूजन, को भक्ति सहित करते हैं।
उनके आर्थिक-शारीरिक, सब रोग स्वयं टरते हैं।
आरती नवग्रह स्वामी की।।३।।

कंचन का दीप जलाकर, हम आरति करने आए।
‘‘चन्दनामती’’ मुझ मन में, कुछ ज्ञानज्योति जल जाए।।
आरती नवग्रह स्वामी की।।४।।

बाल विकास भाग: २
गणिनी ज्ञानमती बारहमासा
जैनधर्म के प्रारंभिक ज्ञान हेतु शिक्षण

कुशील

पराई स्त्री के साथ या परपुरुष के साथ रमने को कुशील कहते हैं। इस पाप को करने वाले व्यभिचारी, जार, बदमाश कहलाते हैं और लोक में बुरी नजर से देखे जाते हैं।

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रावण ने सीता के रूप पर मुग्ध होकर चोरी से उसका हरण कर लिया और सीता को हर तरह से अपने वश में करने के उपाय किये, किन्तु निष्फल रहा। अन्त में युद्ध में रामचन्द्र के भाई लक्ष्मण के द्वारा मारा गया और नरक में चला गया। देखो! परस्त्री की इच्छा मात्र से रावण नरक चला गया। तब जो परस्त्री का सेवन करते हैं-इनको तो नरकों के दु:ख निश्चित ही भोगने पड़ते हैं। इसलिए कुशील पाप का त्याग कर देना चाहिए। सीता ने अपने शील की रक्षा की, इसलिए उसकी परीक्षा में अग्नि भी जल हो गई थी। आज तक सर्वत्र विश्व में सीता के शील की कीर्ति फैल रही है और रावण के कुशील भाव की अकीर्ति फैल रही है कोई माता अपने बालक का नाम रावण नहीं रखना चाहती है, किन्तु बालक-बालिकाओं का रामचन्द्र और सीता यह नाम बड़े प्यार से रखते हैं।

वीरशासन दिवस
२५७५वीं वीरशासन जयन्ती पर विशेष प्रस्तुति   

वीरशासन दिवस

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भव्यात्माओं! अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर की दिव्यध्वनि श्रावण कृष्णा प्रतिपदा के दिन खिरी थी, उन्हीं के धर्मतीर्थ का प्रवर्तन वर्तमान में चल रहा है। उनके धर्म को धारण करने वाले जीव उन्हीं वीर प्रभु के शासन में रह रहे हैं। इसलिए यह श्रावण वदी एकम का दिवस ‘वीर शासन जयंती’ के नाम से सर्वत्र मनाया जाता है। धवला में श्री वीरसेनाचार्य कहते हैं- ‘पंचशैलपुर (पंचपहाड़ी से शोभित राजगृही के पास) में विपुलाचल पर्वत के ऊपर भगवान महावीर ने भव्य जीवों को अर्थ का उपदेश दिया। इस अवसर्पिणी कल्पकाल के ‘दु:षमा सुषमा’ नाम के चौथे काल के पिछले भाग में कुछ कम चौंतीस वर्ष बाकी रहने पर वर्ष के प्रथम मास, प्रथम पक्ष और प्रथम दिन में अर्थात् श्रावण कृष्णा एकम् के दिन प्रात:काल के समय आकाश में अभिजित नक्षत्र के उदित रहने पर धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति हुई।।५५-५६।। श्रावण कृष्णा प्रतिपदा के दिन रुद्रमुहूर्त में सूर्य का शुभ उदय होने पर और अभिजित् नक्षत्र के प्रथमयोग में जब युग की आदि हुई तभी तीर्थ की उत्पत्ति समझना चाहिए।।५७।। यह श्रावण कृष्णा प्रतिपदा वर्ष का प्रथम मास है और युग की आदि-प्रथम दिवस है। जैसा कि अन्यत्र ग्रंथों में भी कहा है। अत: यह स्पष्ट है कि यह श्रावण कृष्णा एकम दिवस युग का प्रथम दिवस है अर्थात् प्रत्येक सुषमा सुषमा, सुषमा आदि कालों का प्रारंभ इस दिवस से ही होता है। इसलिए यह दिवस अनादिनिधन जैन सिद्धांत के अनुसार वर्ष का प्रथम दिवस माना जाता है। अनादिकाल से युग और वर्ष की समाप्ति आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को होती है। युग तथा वर्ष का प्रारंभ श्रावण कृष्णा एकम से होता है। वर्तमान में इसी दिन वीर प्रभु की दिव्यध्वनि खिरने से धर्मतीर्थ का प्रवर्तन इसी दिन से चला है इसलिए यह दिवस और भी महान होने से महानतम अथवा पूज्यतम हो गया है।

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भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ

भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ

(चैत्र कृ. नवमी-१० मार्च २०१८ से चैत्र कृ. नवमी-२९ मार्च २०१९)
प्रेरणा-भारतगौरव दिव्यशक्ति शारदे माँ गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी
        
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आज हम सभी वर्तमान विश्व में उपस्थित आतंकवाद, हिंसा, विनाश, अशांति, परस्पर शत्रुता, विद्वेष, बदला लेने की भावना आदि विकृतियों से ग्रसित हो रही मानवता को दृष्टिगत कर रहे हैं। ‘अहिंसामयी शाश्वत धर्म’ का शीतल जल ही इन अग्नि ज्वालाओं के उपशमन में सहयोगी हो सकता है, यही तीर्थंकर भगवन्तों की सदाकाल से देशना रही है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से की गई धर्माराधना, मंत्रानुष्ठान, विधि-विधान भी सम्पूर्ण वातावरण को प्रभावित करके क्षेम-सुभिक्ष-शांति-सौहार्द की स्थापना करने में अत्यन्त कार्यकारी होते हैं, यह परम सत्य है।

      इन्हीं विश्वकल्याणकारी भावनाओं से ओतप्रोत होकर भारतगौरव, दिव्यशक्ति, परम उपकारी परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ऋषभगिरि-मांगीतुंगी में विराजमान विश्व के सर्वाधिक उत्तुंग १०८ फुट भगवान ऋषभदेव के श्रीचरणों में स्थित होकर भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती, चैत्र कृ. नवमी, १० मार्च २०१८ के पावन अवसर पर ‘भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष’ मनाने की प्रेरणा प्रदान की है, जो आने वाली ऋषभ जयंती, चैत्र कृ. नवमी, २९ मार्च २०१९ तक हम सबको व्यक्तिगत शांति, सामाजिक शांति, राष्ट्रीय शांति एवं विश्वशांति हेतु जागृत होकर अपना-अपना योगदान प्रदान करने हेतु कटिबद्ध कर रहा है। आइये हम भी विश्वशांति के इस महा आयोजन में किसी न किसी रूप में अपना सहयोग प्रदान कर पुण्यलाभ प्राप्त करें।

विश्वशांति वर्ष मनाने की रूपरेखा-

(१) विश्वशांति हेतु जाप्य (मंत्र-ॐ ह्रीं विश्वशांतिकराय श्री ऋषभदेवाय नम:)
(२) भगवान ऋषभदेव मण्डल विधान
(३) णमोकार महामंत्र अथवा भक्तामर महास्तोत्र का अखण्ड पाठ (अपने समयानुसार)
(४) भगवान ऋषभदेव पर संगोष्ठी

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जीव दया की कहानी

जीव दया की कहानी -

लेखिका-प्रज्ञाश्रमणी चंदनामती माताजी

तर्ज -ये परदा हटा दो ....

सुनो जीवदया की कहानी , इक मछुवारे की जुबानी ,

इक मछली को दे जीवन इसने जीवन पाया था |
the story of compossion , is called indian tradition
one fisherman had given once the life to the fish .

इक मुनि से नियम लिया था , पालन द्रढ़ता से किया था |
he took the vow from munivar , and followed till while life .that vow became very fruitful in fisherman 's life .
अब आगे शुरू होती है कहानी एक मछुवारे की -

जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव |
गुरुवर की सत्संग सभा में , मछुवारा आया प्रवचन सुनने |
गुरुदर्शन का भाव था उसमें , माँगा आशीर्वाद था उसने ||
बोला मै पापी गुरुदेव , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव -२ ||१ ||
गुरु वचनों की महिमा निराली , निकट जो जाता जाता न खाली |
कितनों की गुरु ने विपदा टाली , धीवर की क्या कहूँ कहानी ||
देख रहा वह मुनि का तेज , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव ||२ ||
गुरु ने दिव्यज्ञान से जाना , धीवर की किस्मत पहचाना |
छोटा सा इक नियम दे दिया , उसका बेड़ा पार कर दिया ||
भवदधितारक हैं गुरुदेव , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव ||३ ||
क्या था नियम यह सुन लो भाई , पहली मछली जो जाल में आई |
उसको प्राणदान दे देना , कुछ तो पुण्य अर्जित कर लेना ||
धर्म अहिंसा है सबसे श्रेष्ठ , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव ||४ ||

आगे क्या होता है ?


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बाल विकास प्रतियोगिता
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चौबीस तीर्थंकर वन्दना

चौबीस तीर्थंकर वन्दना

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आवो हम सब करें वंदना, चौबीसों भगवान की।
तीर्थंकर बन तीर्थ चलाया, उन अनंत गुणवान की।।

जय जय जिनवरं-४

आदिनाथ युग आदि तीर्थंकर, अजितनाथ कर्मारि हना।
संभवजिन भव दु:ख के हर्ता, अभिनंदन आनंद घना।।
सुमतिनाथ सद्बुद्धि प्रदाता, पद्मप्रभु शिवलक्ष्मी दें।
श्री सुपाश्र्व यम पाश विनाशा, चन्द्रप्रभू निज रश्मी दें।।
केवलज्ञान सूर्य बन चमके, त्रिभुवन तिलक महान की।। तीर्थं.।।१।।

जय जय जिनवरं-४

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नवग्रह शांति विधान पढ़ें
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आज का दिन - १६ जुलाई २०१८ (भारतीय समयानुसार)
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दिनाँक १६ जुलाई,२०१८
तिथी- आषाढ़ शुक्ल ४
दिन-सोमवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७५

सूर्योदय ०५.३८
सूर्यास्त १९.१६


अथ आषाढ़ मास फल विचार


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फोटो - ऑडियो एवं वीडियो गैलरी

मांगीतुंगी में ऋषभदेव पुरम में भगवान ऋषभदेव पंचकल्याणक प्रतिष्ठा लघु

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