Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


विश्वशांति महावीर मण्डल विधान का आयोजन ऋषभदेवपुरम्-मांगीतुंगी (नासिक) महा. में दशलक्षण पर्व में 14 से 24 सितम्बर 2018

ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शनज्ञान चारित्रेभ्यो नम:

मुख्यपृष्ठ

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
जैन इनसाइक्लोपीडिया
जैन विश्वकोश
जैनधर्म के ज्ञान का महासागर


बेसिक डिप्लोमा इन जैनोलोजी प्रश्न पत्र
रत्नत्रय व्रत - २४-०९-२०१८

लाइव टी वी
प्रमुख विषय

जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



ज्योतिष-वास्तु एवं मंत्र विद्या· जैन भूगोल· जैन इतिहास· श्रावक संस्कार· ग्रन्थ भण्डार

प्रवचन सोलहकारण भावना विशेष
दर्शन विशुध्दि भावना
विनय-सम्पन्नता भावना
शील-व्रत अनतिचार भावना
दशलक्षण व्रत

दशलक्षण व्रत विधि

दशलाक्षणिकव्रते भाद्रपदमासे शुक्ले श्रीपंचमीदिने प्रोषध: कार्य:, सर्वगृहारम्भं परित्यज्य जिनालये गत्वा पूजार्चनादिकञ्च कार्यम्। चतुर्विंशतिकां प्रतिमां समारोप्य जिनास्पदे दशलाक्षणिकं यन्त्रं तदग्रे ध्रियते, ततश्च स्नपनं कुर्यात्, भव्य: मोक्षाभिलाषी अष्टधापूजनद्रव्यै: जिनं पूजयेत्। पंचमीदिनमारभ्य चतुर्दशीपर्यन्तं व्रतं कार्यम्, ब्रह्मचर्यविधिना स्थातव्यम्। इदं व्रतं दशवर्षपर्यन्तं करणीयम्, ततश्चोद्यापनं कुर्यात्। अथवा दशोपवासा: कार्या:। अथवा पंचमीचतुर्दश्योरुपवासद्वयं शेषमेकाशनमिति केषाञ्चिन्मतम्, तत्तु शक्तिहीनतयाङ्गीकृतं न तु परमो मार्ग:।

अर्थ-दशलक्षण व्रत भाद्रपद मास में शुक्लपक्ष की पंचमी से आरंभ किया जाता है। पंचमी तिथि को प्रोषध करना चाहिए तथा समस्त गृहारम्भ का त्यागकर जिनमंदिर में जाकर, पूजन-अर्चन, अभिषेक आदि धार्मिक क्रियाएँ सम्पन्न करनी चाहिए। अभिषेक के लिए चौबीस भगवान की प्रतिमाओं को स्थापन कर उनके आगे दशलक्षण यंत्र स्थापित करना चाहिए। पश्चात् अभिषेक क्रिया सम्पन्न करनी चाहिए। मोक्षाभिलाषी भव्य अष्ट द्रव्यों से भगवान जिनेन्द्र का पूजन करता है। यह व्रत भादों सुदी पंचमी से भादों सुदी चतुर्दशी तक किया जाता है। दसों दिन ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है।
और पढ़ें

मंगल सन्देश
Mangal-sandesh-2018.jpg
रत्नत्रय पूजा

रत्नत्रय पूजा

[रत्नत्रय व्रत में]
-अथ स्थापना (गीता छंद)-
Cloves.jpg
Cloves.jpg

वर रत्नत्रय जिनधर्म हैं, सम्यक्त्वरत्न प्रधान है।

अष्टांगयुत सम्यक्त्व है, सम्पूर्ण गुण की खान है।।

आचार आठ समेत सम्यग्ज्ञान रत्न महान है।

तेरह विधों युत रत्न सम्यक्-चरित पूज्य निधान है।।

-दोहा-

भरतैरावत क्षेत्र में, चौथे पाँचवें काल।

शाश्वत रहे विदेह में, धर्म जगत प्रतिपाल।।२।।

ॐ ह्रीं र्हं श्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मक धर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।

ॐ ह्रीं र्हं श्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मक धर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।

ॐ ह्रीं र्हं श्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मक धर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
पूरा पढ़ें...

दशलक्षण भक्ति:
दशलक्षण भक्ति:

(वसंततिलका छंदः)

योगी क्षमागुणमयो भुवनैकबंधुः।
क्रोधं निहत्य निज शांतरसे निमग्नः।।
स्वात्मैकजन्यपरमामृतसंप्रतृप्तः।
तं योगिनं हृदि दधे परमां क्षमां च।।१।।

भावो मृदोर्भवति मार्दवधर्म एषः।
अष्टौ मदानपि निरस्य विभाति साधौ।।
वश्यं करोति भुवनं विनयैश्चतुर्धा।
तं योगिनं हृदि दधे वरमार्दवं च।।२।।

मायामपास्य सरलं कुरुते त्रियोगं।
एकाग्रध्यानमपि साम्यतया विधत्ते।।
मुक्तिर्भवेत् ऋजुगतेः खलु तस्य साधोः।

तं योगिनं हृदि दधे परमार्जवं च।।३।।

और पढ़े

दशलक्षण धर्म पूजा

तीर्थंकर ऋषभदेव के दश अवतार

दशलक्षण विशेष
PDF Format में डाउनलोड करें
सोलहकारण विधान पढ़ें
दशलक्षण पर्व
आकिंचन्य धर्म का प्रवचन



आकिंचन्य धर्म


उत्तम आकिंचन्य धर्म
आज दशलक्षण पर्व का नवां दिन है। नवग्रह मंदिर में सर्वप्रथम पूज्य ज्ञानमती माताजी के सान्निध्य में पंचामृत अभिषेक होता है। भक्तों की भीड़ ऋषभदेवपुरम् में उमड़ रही है, सभी लोग मांगीतुंगी-ऋषभदेवपुरम् में स्वर्ग जैसी अनुभूति कर रहे हैं। पूज्य चंदनामती माताजी प्रतिदिन हर धर्म के ऊपर बहुत ही सुंदरता के साथ भक्तों को समझाती हैं। आज आकिचन्य धर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मेरा कुछ भी नहीं है, अत: मैं आकिंचन्य हूँ, फिर भी मेरी आत्मा अनन्त गुणों से परिपूर्णा होकर अनन्तकाल से निवास कर रहा हूँ, परिग्रह का त्यागी बनकर गुणों से परिपूर्ण हो जाता है, मैं सदा पर भिन्न से शून्य हूँ।
उत्तम आकिंचन्य धर्म मुनि जनधारण करते हैं, उसका पालन करते हैं। लेकिन अणुव्रत के रूप में श्रावक धारण कर सकता है। अणुव्रत धारण करने वाले श्रावक नियम से देवगति की प्राप्ति करते है। महानुभाव! पाँचों पापों के एक देश त्याग कर ले तो आकिंचन्य धर्म आपके जीवन में साकार हो जायेगा। अणुव्रत हमारे अनंतानंत जन्मों में संचित पाप को नष्ट करने वाले हैं।
जैसे जड़ के बिना वृक्ष नहीं टिक सकता।
नींव के बिना नहीं मकान बन सकता।

और पढ़ें...

व्रत विधि

मेघमाला व्रत

मेघमाला व्रत भादों बदी प्रतिपदा से लेकर आश्विन वदी प्रतिपदा तक ३१ दिन तक किया जाता है। व्रत के प्रारंभ करने के दिन ही जिनालय के आँगन में सिंहासन स्थापित करें अथवा कलश को संस्कृत कर उसके ऊपर थाल रखकर, थाल में जिनबिम्ब स्थापित कर महाभिषेक और पूजन करे। श्वेत वस्त्र पहने, श्वेत ही चन्दोवा बांधे, मेघधारा के समान १००८ कलशों से भगवान का अभिषेक करे। पूजापाठ के पश्चात् ॐ ह्रीं पंचपरमेष्ठिभ्यो नम: इस मंत्र का १०८ बार जाप करना चाहिए।

मेघमाला व्रत में सात उपवास कुल किये जाते हैं और २४ दिन एकाशन करना होता है। तीनों प्रतिपदाओं के तीन उपवास, दोनों अष्टमियों के दो उपवास एवं दोनों चतुर्दशियों के दो उपवास इस प्रकार कुल सात उपवास किये जाते हैं।
और पढ़े

भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ

भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ

(चैत्र कृ. नवमी-१० मार्च २०१८ से चैत्र कृ. नवमी-२९ मार्च २०१९)
प्रेरणा-भारतगौरव दिव्यशक्ति शारदे माँ गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी
        
SAMYAKGYAN-20166 60.jpg
आज हम सभी वर्तमान विश्व में उपस्थित आतंकवाद, हिंसा, विनाश, अशांति, परस्पर शत्रुता, विद्वेष, बदला लेने की भावना आदि विकृतियों से ग्रसित हो रही मानवता को दृष्टिगत कर रहे हैं। ‘अहिंसामयी शाश्वत धर्म’ का शीतल जल ही इन अग्नि ज्वालाओं के उपशमन में सहयोगी हो सकता है, यही तीर्थंकर भगवन्तों की सदाकाल से देशना रही है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से की गई धर्माराधना, मंत्रानुष्ठान, विधि-विधान भी सम्पूर्ण वातावरण को प्रभावित करके क्षेम-सुभिक्ष-शांति-सौहार्द की स्थापना करने में अत्यन्त कार्यकारी होते हैं, यह परम सत्य है।

      इन्हीं विश्वकल्याणकारी भावनाओं से ओतप्रोत होकर भारतगौरव, दिव्यशक्ति, परम उपकारी परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ऋषभगिरि-मांगीतुंगी में विराजमान विश्व के सर्वाधिक उत्तुंग १०८ फुट भगवान ऋषभदेव के श्रीचरणों में स्थित होकर भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती, चैत्र कृ. नवमी, १० मार्च २०१८ के पावन अवसर पर ‘भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष’ मनाने की प्रेरणा प्रदान की है, जो आने वाली ऋषभ जयंती, चैत्र कृ. नवमी, २९ मार्च २०१९ तक हम सबको व्यक्तिगत शांति, सामाजिक शांति, राष्ट्रीय शांति एवं विश्वशांति हेतु जागृत होकर अपना-अपना योगदान प्रदान करने हेतु कटिबद्ध कर रहा है। आइये हम भी विश्वशांति के इस महा आयोजन में किसी न किसी रूप में अपना सहयोग प्रदान कर पुण्यलाभ प्राप्त करें।

विश्वशांति वर्ष मनाने की रूपरेखा-

(१) विश्वशांति हेतु जाप्य (मंत्र-ॐ ह्रीं विश्वशांतिकराय श्री ऋषभदेवाय नम:)
(२) भगवान ऋषभदेव मण्डल विधान
(३) णमोकार महामंत्र अथवा भक्तामर महास्तोत्र का अखण्ड पाठ (अपने समयानुसार)
(४) भगवान ऋषभदेव पर संगोष्ठी

पूरा पढ़ें...

नाटिका
(९) उत्तम आकिंचन्य धर्म (नाटिका)
-ब्र. कु. दीपा जैन (संघस्थ)

(प्रात:काल की मंगल बेला है, १७-१८ साल की एक बालिका भारती स्नानादि से निवृत्त होकर अपनी सहेली ऋद्धि के घर पहुँच जाती है। ऋद्धि भी मंदिर जाने के लिए तैयार हो रही है, साथ में कुछ गुनगुना भी रही है।)

भारती-ऋद्धि! तुम अभी तक तैयार नही हुई ? और तुम तो आज बहुत खुश नजर आ रही हो क्या तुमने कोई नई फिल्म देखी है क्या ?

ऋद्धि-नहीं भारती! इस समय दशलक्षण पर्व चल रहे हैं, मैंने दस दिनों के लिए फिल्म देखने का त्याग कर दिया है। आजआकिंचन धर्म है न! मैं उसी के बारे में सोच रही थी। भारती-अरे हाँ! मैं तो भूल ही गई थी।

ऋद्धि-आकिंचन्य का मतलब क्या होता है, क्या तुम जानती हो ?

भारती-ज्यादा तो नहीं, हाँ! इतना जानती हूँ कि मेरा कुछ नहीं है, ऐसी भावना करनाआकिंचन धर्म है।

दोनों मंदिर के लिए चल पड़ती हैं और रास्ते में बातें भी कर रही हैं।

ऋद्धि-इस बार तो जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर से पंडित जी आए हैं, बहुत अच्छा प्रवचन करते हैं।


भारती-हाँ ऋद्धि! यहाँ के समाज वालों ने रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी से निवेदन किया था, तो पंडित जी आए हैं। इस बार तो मंदिर जी में रात्रि में बड़ा आनंद आता है।


पूरा पढ़ें...

अनन्त चौदश व्रत विधि

अनन्त चौदश व्रत विधि

अनन्तव्रते तु एकादश्यामुपवास: द्वादश्यामेकभक्तं त्रयोदश्यां काञ्जिकं चतुर्दश्यामुपवासस्तदभावे यथा शक्तिस्तथा कार्यम्। दिनहानिवृद्धौ स एव क्रम: स्मर्त्तव्य:।

अर्थ-अनन्त व्रत में भाद्रपद शुक्ला एकादशी को उपवास, द्वादशी को एकाशन, त्रयोदशी को कांजी-छाछ अथवा छाछ में जौ, बाजरा के आटे को मिलाकर महेरी-एक प्रकार की कढ़ी बनाकर लेना और चतुर्दशी को उपवास करना चाहिए। यदि इस विधि के अनुसार व्रत पालन करने की शक्ति न हो तो शक्ति के अनुसार व्रत करना चाहिए। तिथि-हानि या तिथि-वृद्धि होने पर पूर्वोक्त क्रम ही अवगत करना चाहिए अर्थात् तिथि-हानि में एक दिन पहले से और तिथि- वृद्धि में एक दिन अधिक व्रत करना होता है।

विवेचन-अनन्तव्रत भादों सुदी एकादशी से आरंभ किया जाता है। प्रथम एकादशी को उपवास कर द्वादशी को एकाशन करें अर्थात् मौन सहित स्वाद रहित प्रासुक भोजन ग्रहण करे, सात प्रकार के गृहस्थों के अन्तराय का पालन करे। त्रयोदशी को जिनाभिषेक, पूजन-पाठ के पश्चात् छाछ या छाछ में जौ, बाजरा के आटे से बनाई गई महेरी—एक प्रकार की कढ़ी का आहार ले। चतुर्दशी के दिन प्रोषध करें तथा सोना, चाँदी या रेशम-सूत का अनन्त बनाये, जिसमें चौदह गाँठ लगाये।

और पढ़ें

श्री गौतम गणधर वाणी

रत्नत्रय व्रत विधि

रत्नत्रयं तु भाद्रपदचैत्रमाघशुक्लपक्षे च द्वादश्यां धारणं चैकभक्तं च त्रयोदश्यादिपूर्णिमान्तमष्टमं कार्यम्, तदभावे यथाशक्ति काञ्जिकादिकं, दिनवृद्धौ, तदधिकतया कार्यम्, दिनहानौ तु पूर्वदिनमारभ्य तदन्तं कार्यमिति पूर्वक्रमो ज्ञेय:।

अर्थ-रत्नत्रय व्रत भाद्रपद, चैत्र और माघ मास में किया जाता है। इन महीनों के शुक्लपक्ष में द्वादशी तिथि को व्रत धारण करना चाहिए तथा एकाशन करना चाहिए। त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा का उपवास करना, तीन दिन का उपवास करने की शक्ति न हो तो कांजी आदि लेना चाहिए। रत्नत्रय व्रत के दिनों में किसी तिथि की वृद्धि हो तो एक दिन अधिक व्रत करना एवं एक तिथि की हानि होने पर एक दिन पहले से लेकर व्रत समाप्ति पर्यंत उपवास करना चाहिए। यहाँ पर भी तिथि हानि और तिथि वृद्धि में पूर्व क्रम ही समझना चाहिए।

विवेचन-रत्नत्रय व्रत के लिए सर्वप्रथम द्वादशी को शुद्ध भाव से स्नानादि क्रिया करके स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण कर जिनेन्द्र भगवान का पूजन-अभिषेक करे। द्वादशी को इस व्रत की धारणा और प्रतिपदा को पारणा होती है। अत: द्वादशी को एकाशन के पश्चात् चारों प्रकार के आहार का त्याग कर, विकथा और कषायों का त्याग करे। त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को प्रोषध तथा प्रतिपदा को जिनाभिषेकादि के अनन्तर किसी अतिथि या किसी दु:खित-बुभुक्षित को भोजन कराकर एक बार आहार ग्रहण करे। अपने घर में ही अथवा चैत्यालय में जिनबिम्ब के निकट रत्नत्रय यंत्र की भी स्थापना करे।

और पढ़ें

आज का दिन - २४ सितम्बर २०१८ (भारतीय समयानुसार)
Icon.jpg तिथीदर्पण Icon.jpg

दिनाँक २४ सितम्बर,२०१८
तिथी- भाद्रपद शुक्ल १५ पूर्णिमा
दिन-सोमवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७५

सूर्योदय ०६.१४
सूर्यास्त १८.१२


अथ भाद्रपद मास फल विचार

रत्नत्रय-संकटहरण व्रत पूर्ण
Calender.jpg



यदि दिनांक सूचना सही नहीं दिख रही हो तो कॅश मेमोरी समाप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें

Navgrah shanti vidhan.jpg
फोटो - ऑडियो एवं वीडियो गैलरी

मांगीतुंगी में ऋषभदेव पुरम में भगवान ऋषभदेव पंचकल्याणक प्रतिष्ठा लघु

.....अन्य फोटोज देखें . .....ऑडियो श्रंखला के लिए क्लिक करें . .....वीडियो श्रंखला के लिए क्लिक करें


०-९ अं
परिमार्जित क्ष त्र ज्ञ श्र अः


कुल पृष्ठ- २८,२१८   •   देखे गये पृष्ठ- ७८,१६,९९७   •   कुल लेख- ८८१   •   कुल चित्र- 16,171