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वर्षायोग स्थापना विधि भाग-१
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प्रमुख विषय


जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



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चातुर्मास स्थापना वर्षायोग धर्म विकास की आधारशिला हैं


स्मरण करूं जिनदेव का,

गुरू को उर में धार
जिनवाणी को ध्याय के,
नमन करूं शतबार
पानी से पूछा गया कैसा तेरा रंग

जैसी संगति मिल गई, वैसा मेरा रंग।।

संत समुदाय हमारे राष्ट्र की सर्वश्रेष्ठ पूंजी है। सर्वश्रेष्ठ धरोहर है। भारत संतों की जन्मभूमि है। भारतीय इतिहास में जैन श्रमणों का सर्वोपरी स्थान रहा है। वर्षायोग— चातुर्मास का प्राचीन नाम है ‘वर्षायोग’ आत्मसाधना हेतु जिसका स्वस्थ सुयोग। वनस्पति कायिक जीवों का विधात न होवे, अहिंसा धर्म की रक्षा हो, सब रहे निरोग!!!

धन्य है हमारे पूर्वाचार्य जिन्होंने वर्षायोग के विज्ञान को अहिंसामूलक धर्म की चाशनी में लपेटकर सहज ही श्रद्धा से मानव के गले में उतार दिया । शरीर मन और आत्मा तीनों तलों पर विरागी साधु को स्वास्थ्य संरक्षण की आध्यात्मिक औषधि थमा दी।

सांसारिक आपाधापी में फंसे मानव भोग— विलासों, भौतिक साधन सुविधाओं , राजनीति और अर्थतंत्र के कलापूर्ण चातुर्य की वैविध्यताओं से ग्रसित प्रमादों की चादर तानकर सोये अविवेकी जन के लिए ये चलते—फिरते तीर्थ (दिगम्बर जैन संत) कुछ समय के लिए ठहर जाते हैं। जागो, उठो चलो........ चातुर्मास एक धर्म पुरूषार्थ का समय है। ऐसे मौकों को चूकना नहीं चाहिए कारण चातुर्मास साल में सिर्फ एक बार आता है। चातुर्मास समर्पण—सेवा व संकल्प का त्यौहार है। यह ध्यान—साधन—प्रभावना का पर्व है। पूरा पढ़ें...

जम्बूद्वीप


जम्बूद्वीप में क्या-क्या हैं

णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।

अनादिसिद्ध अनंतानंत आकाश के मध्य में चौदह राजू ऊँचा, सर्वत्र सात राजू मोटा, तलभाग में पूर्व पश्चिम सात राजू चौड़ा, घटते हुए मध्य में एक राजू चौड़ा, पुन: बढ़ते हुए ब्रह्म स्वर्ग तक पांच राजू चौड़ा और आगे घटते-घटते सिद्धलोक के पास एक राजू चौड़ा ऐसा पुरुषाकार लोकाकाश है।

इसमें मध्यलोक एक राजू चौड़ा और एक लाख चालीस योजन ऊँचा है।

जम्बूद्वीप का विस्तार-मध्यलोक में असंख्यात द्वीप-समूहों से वेष्टित गोल तथा जंबूवृक्ष से युक्त जंबूद्वीप स्थित है। यह एक लाख योजन विस्तार वाला है|

जंबूद्वीप की परिधि'तीन लाख सोलह हजार दो सौ सत्ताइस योजन, तीन कोश, एक सौ अट्ठाइस धनुष और कुछ अधिक साढ़े तेरह अंगुल है अर्थात् योजन ३,१६,२२७ योजन ३ कोश १२८ धनुष १३-(१/२) अंगुल है। लगभग १२६४९०८००६ मील।

जम्बूद्वीप का क्षेत्रफल-'सात सौ नब्बे करोड़, छप्पन लाख, चौरानवे हजार, एक सौ पचास ७९०,५६,९४,१५० योजन है अर्थात् तीन नील, सोलह खबर, बाईस अरब, सतहत्तर करोड़, छ्यासठ लाख (३,१६,२२,७७,६६,००,०००) मील है।

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सप्तऋषि व्रत (४ जुलाई से १० जुलाई तक)


सप्तर्षि व्रत(मृत्युंजय व्रत)

आज से लगभग ९ लाख वर्ष पूर्व श्री रामचन्द्र के समय मथुरानगरी के उद्यान में सात महर्षि महामुनि पधारे थे। वहाँ वर्षायोग स्थापित किया था, उनके शरीर से स्पर्शित हवा के प्रभाव से वहाँ पर दैवी प्रकोप-महामारी रोग कष्ट दूर हुआ था। तभी से लेकर आज तक इन सप्तर्षि मुनियों की प्रतिमाएँ मंदिरों में विराजमान कराने की परम्परा चली आ रही है और इनका अभिषेक-भक्ति आदि पूजा की जाती है।

इस व्रत की विधि-आषाढ़ शु. चतुर्दशी से श्रावण कृष्णा पंचमी तक सात दिन यह व्रत करना चाहिए। इन व्रतों के दिन सप्तर्षि मुनियों की प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक करके उन्हीं की पूजा करें। मंत्र निम्न प्रकार हैं-

समुच्चय मंत्र-ॐ ह्रीं अर्हं सुरमन्यु-श्रीमन्यु-श्रीनिचय-सर्वसुन्दर-जयवान-विनयलालस-जयमित्रनाम सप्त महर्षिभ्यो नम:।

प्रत्येक दिन के प्रत्येक पृथक्-पृथक् मंत्र-

१. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसुरमन्युमहर्षये नम:।

२. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीश्रीमन्युमहर्षये नम:।

३. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनिचयमहर्षये नम:।

४. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसर्वसुंदरमहर्षये नम:।

५. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीजयवानमहर्षये नम:।

६. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविनयलालसमहर्षये नम:।

७. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीजयमित्रमहर्षये नम:।

क्रमशः सप्तऋषि व्रत पढ़ें

सप्तऋषि पूजा पढ़ें
गुरू पूर्णिमा महोत्सव


गुरू पूर्णिमा महोत्सव

मनुष्य जीवन में माता पिता और गुरु का महत्व विश्व भर में सर्वोपरि माना जाता है । माता पिता का इसलिये कि वे हमें जन्म देते हैं और गुरु इसलिये कि गुरू ही वास्तव में हमे मानव, इन्सान, मनुष्य बनाते है मनुष्यता, मानवीयता या इन्सानियत के संस्कार देते हैं। इस प्रकार गुरु हमे दूसरी बार जन्म देते हैं।

भारत धर्म तथा संस्कृति प्रधान देश है और भारत ही क्या सारे विश्व में गुरू का स्थान ईश्वर के समान और कहीं कहीं तो ईश्वर से भी प्रथम पूज्यनीय बताया गया है। हमारी संस्कृति उन्हें केवल गुरु नहीं ‘‘ गुरू देव’’ कहती है। जैन धर्म में तो ‘‘गुरू की महिमा वरनी न जाय ‘‘ गुरूनाम जपों मन वचन काय‘‘ कहकर गुरू को पंच परमेष्ठि का स्थान दिया है। देव, शास्त्र, और गुरू की त्रिवेणी में करके ही मोक्ष महल में प्रवेश की पात्रता आती है और उसके फलस्वरूप संसार के आवागमन से मुक्ति मिलती है। गुरू हमारे जीवन से अज्ञान का अन्धकार मिटाकर एक नई दृष्टि देते हैं। उन्हीं की दृष्टि —यष्टि के सहारे हम ‘‘भव—वन’’ से सुरक्षित निकल कर इहलोक और परलोक सुधारते हैं—

अज्ञान तिमिरान्धानां ज्ञानांजन शलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै: श्री गुरूवे नम:।।


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भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ


भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ

(चैत्र कृ. नवमी-१० मार्च २०१८ से चैत्र कृ. नवमी-२९ मार्च २०१९)
प्रेरणा-भारतगौरव दिव्यशक्ति शारदे माँ गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी
        
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आज हम सभी वर्तमान विश्व में उपस्थित आतंकवाद, हिंसा, विनाश, अशांति, परस्पर शत्रुता, विद्वेष, बदला लेने की भावना आदि विकृतियों से ग्रसित हो रही मानवता को दृष्टिगत कर रहे हैं। ‘अहिंसामयी शाश्वत धर्म’ का शीतल जल ही इन अग्नि ज्वालाओं के उपशमन में सहयोगी हो सकता है, यही तीर्थंकर भगवन्तों की सदाकाल से देशना रही है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से की गई धर्माराधना, मंत्रानुष्ठान, विधि-विधान भी सम्पूर्ण वातावरण को प्रभावित करके क्षेम-सुभिक्ष-शांति-सौहार्द की स्थापना करने में अत्यन्त कार्यकारी होते हैं, यह परम सत्य है।

      इन्हीं विश्वकल्याणकारी भावनाओं से ओतप्रोत होकर भारतगौरव, दिव्यशक्ति, परम उपकारी परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ऋषभगिरि-मांगीतुंगी में विराजमान विश्व के सर्वाधिक उत्तुंग १०८ फुट भगवान ऋषभदेव के श्रीचरणों में स्थित होकर भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती, चैत्र कृ. नवमी, १० मार्च २०१८ के पावन अवसर पर ‘भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष’ मनाने की प्रेरणा प्रदान की है, जो आने वाली ऋषभ जयंती, चैत्र कृ. नवमी, २९ मार्च २०१९ तक हम सबको व्यक्तिगत शांति, सामाजिक शांति, राष्ट्रीय शांति एवं विश्वशांति हेतु जागृत होकर अपना-अपना योगदान प्रदान करने हेतु कटिबद्ध कर रहा है। आइये हम भी विश्वशांति के इस महा आयोजन में किसी न किसी रूप में अपना सहयोग प्रदान कर पुण्यलाभ प्राप्त करें।

विश्वशांति वर्ष मनाने की रूपरेखा-

(१) विश्वशांति हेतु जाप्य (मंत्र-ॐ ह्रीं विश्वशांतिकराय श्री ऋषभदेवाय नम:)
(२) भगवान ऋषभदेव मण्डल विधान
(३) णमोकार महामंत्र अथवा भक्तामर महास्तोत्र का अखण्ड पाठ (अपने समयानुसार)
(४) भगवान ऋषभदेव पर संगोष्ठी

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णमोकार मंत्र का अर्थ एवं महिमा


णमोकार मंत्र का अर्थ एवं महिमा

णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं

णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।१।।

अर्थ- अर्हंतों को नमस्कार हो, सिद्धों को नमस्कार हो, आचार्यों को नमस्कार हो, उपाध्यायों को नमस्कार हो और लोक में सर्व साधुओं को नमस्कार हो।

(१) ‘णमो अरिहंताणं’

‘अरिहननादरिहंता!’ ‘अरि’ अर्थात् शत्रुओं के ‘हननात्’ अर्थात् नाश करने वाले होने से ‘अरिहंत’ कहलाते हैं। नरक, तिर्यंच, कुमानुष और प्रेत इन पर्यायों में निवास करने से होने वाले जो अशेष दु:ख हैं, उन दु:खों को प्राप्त कराने में निमित्त कारण होने से मोह को ‘अरि’ अर्थात् शत्रु कहा है।

शंका-केवल मोह को ही अरि मान लेने पर शेष कर्मों का व्यापार निष्फल हो जावेगा ?

समाधान-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि बाकी के सभी कर्म मोह के ही आधीन हैं। मोह के बिना शेष कर्म अपने-अपने कार्य की उत्पत्ति में व्यापार करते हुए नहीं पाये जाते हैं। जिससे कि वे अपने कार्य में स्वतंत्र समझे जावें। इसलिए सच्चा अरि मोह ही है और शेष कर्म उसी के आधीन हैं।

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प्रबन्ध सम्पादक की कलम से



विषय - इंद्रध्वज विधान की जानिए महिमा

हस्तिनापुर तीर्थ पर अष्टानिक पर्व में चल रहा इंद्रध्वज महामंडल विधान-

बंधुओं!  हस्तिनापुर की धरा को देखकर शायद ऐसा सोचने पर मजबूर हो जाता कि यह मध्यलोक है या स्वर्ग ? यहां सुबह से लेकर रात्रि तक ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से हर दिन पूजा अभिषेक नए-नए विधानो की रचना पूज्य माताजी ने की है वह विधान भी सभी भक्त लोग करके बहुत ही सुख की अनुभूति करते हैं आचार्य कुंदकुंद देव के अनुसार तो दानम पूजा मुख्य अर्थात श्रावक के लिए दान और पूजन यह दोनों नित्य के आवश्यक कर्तव्य है इसलिए पूजन करना यह श्रावक का आवश्यक कार्य होना ही चाहिए इसके अतिरिक्त अनेकानेक मंडल विधान की पूजा की जाती हैं जिसमें सर्वोत्कृष्ट एवं अचिंत्य फल प्रदायक ऐसा यह इंद्र ध्वज ध्वज नामक विधान है जिसकी रचना पूज्य करने प्रमुख ज्ञानमती माताजी ने सन 1976 में 3 माह के अंत समय में की समय में की जिसे देखकर अवश्य ही आश्चर्य प्रतीत होता है इस विधान में 50 पूजाएं हैं और सभी पूजाओं के पद अलग-अलग शब्दों में लिखना बहुत ही विद्वता एवं भाषाविद की बात है इस इंद्रध्वज विधान में मध्यलोक के सभी कृत्रिम चैत्यालयों की पूजा की जाती है मध्यलोक के बीचो बीच में सुमेरु बीच में  पर्वत है उसमें 16 चैत्यालय हैं| 

यह इंद्र ध्वज विधान जब भक्तजन करते हैं तो विधान करने वाले एवं श्रोताओं को अतिशय रूप से मंत्रमुग्ध करने वाला सिद्ध होता है इसका महत्व अचिंत यह अकथनीय है इस इंद्रध्वज की महिमा सुनिए सन 1976 में जब पूज्य माता जी ने यह यह ने यह यह विधान पूर्ण किया उसके कुछ दिन बाद विधान का पूरा बस्ता जो कि अच्छी तरह से गांठ लगा हुआ था वह बस्ता बंदर उठा ले गया उस समय माताजी खतौली उत्तर प्रदेश में विराजमान थी और सभी श्रावण एकदम घबरा गए संघ की बहने व श्रावक लोग रोटी ले जाकर बंदर को देने लगे बहुत ही परिश्रम करने के पश्चात वह बस्ता बंदर ने ऊपर से गिरा दिया बस्ते की गांठ पूज्य माता जी ने ऐसी लगाई थी कि बस्ता सुरक्षित ऊपर से नीचे सराफा बाजार में गिरा तक सभी लोग बहुत ही प्रसन्न हुए और उसी दिन इंद्रध्वज विधान का चमत्कार जान लिया ऐसा इंद्रध्वज विधान अष्टानिक पर्व में हो रहा है सभी लोग यह विधान पारस चैनल के माध्यम से देख कर पुण्य लाभ अर्जित करें एवं मनोवांछित फल की प्राप्ति भी होगी यही भगवान से प्रार्थना है|

– ब्र० कु० दीपा जैन


जैन तीर्थ


जम्बूद्वीप हस्तिनापुर

तीर्थंकर जन्मभूमियों के इतिहास में यह प्रथम अवसर था, जब भगवान शांतिनाथ-कुंथुनाथ-अरहनाथ जैसे तीन-तीन पद के धारी महान तीर्थंकरों की साक्षात् जन्मभूमि हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर ग्रेनाइट पाषाण की 31-31 फुट उत्तुंग तीन विशाल प्रतिमाएं अत्यन्त मनोरम मुद्राकृति में निर्मित करके राष्ट्रीय स्तर के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के साथ विराजमान की गईं। 11 फरवरी से 21 फरवरी 2010 तक यह आयोजन भव्यतापूर्वक सम्पन्न हुआ, जिसमें देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य अर्जित किया। समापन के तीन दिवसों में तीनों भगवन्तों का ऐतिहासिक महामस्तकाभिषेक महोत्सव भी सम्पन्न हुआ। पूरा पढ़ें ...

आज का दिन - ११ जुलाई २०२० (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक ११ जुलाई २०२०
तिथी- श्रावण कृष्ण ६
दिन- शनिवार
वीर निर्वाण संवत- २५४६
विक्रम संवत- २०७७

सूर्योदय ०५.२८
सूर्यास्त १९.२१


अथ श्रावण मास फल विचार



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