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पंचम कल में पहला स्वर्णिम
चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत
चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत
-गणिनी ज्ञानमती

व्रत विधि-अनादिकाल से सभी संसारी प्राणी चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते आ रहे हैंं। उन चौरासी लाख योनि के भ्रमण से छूटने के लिए यह ‘‘चौरासी लाख योनिभ्रमण निवारण व्रत’’ है। इसके करने से व प्रतिदिन इन योनियों के भ्रमण से छूटने की भावना करते रहने से अवश्य ही हम और आप इन संसार परिभ्रमण के दु:खों से छुटकारा प्राप्त करेंगे।

इन चौरासी लाख योनियों का विवरण इस प्रकार है-१. नित्य निगोद, २. इतरनिगोद, ३. पृथ्वीकायिक, ४. जलकायिक, ५. अग्निकायिक व ६. वायुकायिक इन एकेन्द्रिय जीवों के प्रत्येक की सात-सात लाख योनियां मानी गयी हैं। अत: ६²७·४२ लाख योनियाँ हुई हैं। पुन: वनस्पतिकायिक की दश लाख योनियाँ हैं। पुन: विकलत्रय अर्थात् दो इंन्द्रिय, तीन इन्द्रिय व चार इन्द्रिय जीवों की प्रत्येक की दो-दो लाख योनियाँ हैं। अत: ३²२·६ लाख भेद हुए। पुन: देव, नारकी व पंचेन्द्रिय तिर्यंचों की चार-चार लाख योनियाँ हैं। ये ३²४·१२ लाख हुए। पुन: मनुष्यों की चौदह लाख योनियाँ हैं। इस प्रकार (४२०००००±१००००००±६०००००±१२०००००± १४०००००·८४०००००) योनियों के भेद हैं। इनके संक्षेप मेें १४ प्रकार से विभाजित चौदह मंत्र दिये गये हैं। उत्कृष्ट विधि यह है कि नित्यनिगोद के सात लाख योनियों का एकमंत्र है। इसके सात व्रत करना, ऐसे ही इतर निगोद के सात, पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुकायिक के भी ७-७ व्रत करने से ४२ व्रत हो जाते हैं। ऐसे ही वनस्पतिकायिक के १० व्रत करने से १० हुए। ऐसे ही दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय व चार इन्द्रिय के २-२ व्रत करने से ६ व्रत होते हैं। पुन: देव, नारकी व पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के ४-४ व्रत करने से १२ हुए एवं मनुष्यों की चौदह लाख के १-१ व्रत से १४ व्रत हुए। इस प्रकार ४२±१०±६±१२±१४·८४ व्रत हो जाते हैं। इनमें नित्य निगोद के ७ व्रत, इतर निगोद के ७ व्रत, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु के ७-७ व्रत ऐसे ४२ व्रत होंगे। इनमें सात-सात व्रतों में वहीं मंत्र ७-७ बार लिया जायेगा। ऐसे वनस्पतिकायिक के १० व्रतों में वनस्पतिकायिक का ही मंत्र दश व्रतों में होगा। ऐसे ही सभी में समझना। ऐसे ८४ व्रत हो जाते हैं।

जघन्यविधि में इन चौदह मंत्रों के चौदह व्रत भी कर सकते हैं। अपनी शक्ति के अनुसार व्रत में उत्कृष्ट विधि में उपवास करना है। मध्यम विधि में अल्पाहार, जल, रस, दूध, फल आदि लेकर करना चाहिए तथा जघन्य विधि में दिन में एक बार शुद्ध भोजन करके अर्थात् ‘एकाशन’ करके भी व्रत किया जा सकता है। व्रत के दिनों में अर्हंत भगवान की अथवा चौबीसी तीर्थंकरों की प्रतिमा का या किन्हीं एक भी तीर्थंकर भगवान की प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक करें। पुन: चौबीस तीर्थंकर पूजा या अर्हंत पूजा करके जाप्य करें। मंत्र की १०८ जाप्य में सुगंधित पुष्प या लवंग या पीले पुष्पों से अथवा जपमाला से भी मंत्र जप सकते हैं। व्रत के दिन पूजा व मंत्र जाप्य आवश्यक है। इस व्रत के करने से क्रम-क्रम से संसार के भी उत्तम-उत्तम सुख प्राप्त होंगे पुन: चतुर्गति के दु:खों से छुटकारा प्राप्त कर नियम से २-४ आदि भवों में अपनी आत्मा को परमात्मा बनाकर सिद्धशिला को प्राप्त करना है। समुच्चय मंत्र- ॐ ह्रीं चतुरशीतिलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:। (इन छह मंत्रों में से १-१ मंत्र सात-सात व्रतों में जपना है)

१. ॐ ह्रीं नित्यनिगोदजीवानां सप्तलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:।

२. ॐ ह्रीं इतरनिगोदजीवानां सप्तलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:।


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जय ऋषभदेव बोलो जय-जय आदिनाथ।

जय ऋषभदेव बोलो जय-जय आदिनाथ।

कैसे प्रभु प्रगटे पर्वत पर , सबसे ऊँची प्रतिमा बनकर-|

चमत्कार हुआ भारत भू पर मानो इसे डिवाइन पावर |

दिव्य शक्ति माँ ज्ञानमती माता |

जय हो ऋषभगिरि के भगवान आदिनाथ |


बोलो जय ऋषभदेव ...

तो छोटी सी कहानी ऐसे आप प्रगट हुए पर्वत पर मानो |

दिव्य शक्ति जिनका नाम ज्ञानमती माता |

इनके सुनकर गौरव गाथा जिनके पद में झुके हर माथा |

इनसे मिले ऋषभगिरि के आदिनाथ |

बोलो जय ऋषभदेव ...

ये तो गौरव गाथा है, जिनकी हमने प्रेरणा से भगवान ऋषभदेव हो पाया है | तब इन्होंने प्रेरणा दी | कौन सा दिन था कौन था सन् था

सन् १९९६ में , मांगीतुंगी सिद्ध क्षेत्र में |

चातुर्मास हुआ माता का , शरदपूर्णिमा का दिन पावन था।

ध्यान में आये प्रभु आदिनाथ- बोलो जय ऋषभदेव ...

इक सौ अठ की यह प्रतिमा, पूर्व मुखी हो यह भी बताया |

यह प्रभु होंगे तीरथनाथ-तीरथनाथ, बोलो जय जय ऋषभदेव ..

मेरा बड़ा सौभाग्य रहा क्योंकि मैं ज्ञानमती माताजी के साथ २४ घंटे रहती हूँ। तो इन्हीं के पास में सोती हूँ, इन्होंने सुबह उठकर बताया।

प्रात:काल मुझे बताया ,मेरे मन आश्चर्य समाया |

मोतीसागर पीठाधीश ने एवं ब्रह्मचारी रवीन्द्र जी |

शिष्य त्रिवेणी कहे आदिनाथ- बोलो जय ऋषभदेव ...

हम तीनों ने इस बात को जब सुना ज्ञानमती माताजी ने हमें बताया। माताजी बात तो बहुत अच्छी है, लेकिन बहुत भारी प्रोजेक्ट है। आप तो दिल्ली की ओर जा रही हैं आप कह रही हैं पर्वत पर प्रतिमा बनें, बड़ा दुर्लभ कार्य है। प्रात:काल की मंगल बेला में शायद चक्रेस्वरी माता ने इन्हें प्रेरणा दी होगी या पर्वत के परमाणु इन्हें आकर प्रेरणा दे रहे होंगे|

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सेमिनार

सेमिनार की परिभाषा मेरी दृष्टि में

मुम्बई में २३ से २५ जुलाई २०१७ तक आयोजित

National Seminar On Jain Dharma
में आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने
सेमिनार-SEMINAR
का हिन्दी-अंग्रेजी में विवरण निम्न प्रकार से

बताकर विद्वानों को आनंद विभोर कर दिया-
आर्यिका श्री चंदनामती माताजी
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से - सेवा धर्म समाज की, आगम के अनुकूल।

यही प्रमुख उद्देश्य है, जैनधर्म का मूल।।१।।
मि - मिलकर धर्मप्रभावना, करो सभी विद्वान।
वर्गोदय को तज करें, सर्वोदय उत्थान।।२।।
ना - नाम से नहिं गुण से सहित, णमोकार हैं मंत्र।
इसका खूब प्रचार हो, नमूँ परमपद पंच।।३।।
- रत्न तीन जग में कहे, देव शास्त्र गुरु धाम।

रत्नत्रय इनसे मिलें, इन पद करें प्रणाम।।४।।
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मंदिर दर्शन

भेलूपुर- वाराणसी मंदिर के भगवान पार्श्वनाथ -

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पढ़ें- हस्तिनापुर में जन्मे तीर्थंकरों के परिचय

महानुभावों! आज मैं आपको तीन तीर्थंकरों-सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ, सत्रहवें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ एवं अट्ठारहवें तीर्थंकर भगवान अरनाथ के जीवन से परिचित कराती हूँ जिनके गर्भ-जन्म-तप और ज्ञान ये चार-चार कल्याणक हस्तिनापुर की पावन धरती पर हुए तथा सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये तीनों ही महापुरुष तीर्थंकर होने के साथ ही साथ चक्रवर्ती और कामदेवपद के भी धारी हुए हैं।

सर्वप्रथम आप जाने भगवान शांतिनाथ का जीवन परिचय-

कुरुजांगल देश की हस्तिनापुर राजधानी में कुरुवंशी राजा विश्वसेन राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम ऐरावती था। भगवान शांतिनाथ के गर्भ में आने के छह महीने पहले से ही इन्द्र की आज्ञा से हस्तिनापुर नगर में माता के आंगन में रत्नों की वर्षा होने लगी और श्री, ह्री, धृति आदि देवियाँ माता की सेवा में तत्पर हो गर्इं। भादों वदी सप्तमी के दिन भरणी नक्षत्र में रानी ने गर्भ धारण किया। उस समय स्वर्ग से देवों ने आकर तीर्थंकर महापुरुष का गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया और माता-पिता की पूजा की।

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अष्टसहस्री पढ़ें
  • 🌸🌸📖जैन न्याय के सर्वोच्च ग्रंथ " _अष्टसहस्री_ " के अध्ययन का स्वर्णिम अवसर देखें पारस चैनल प्रतिदिन प्रातः 6 से 7 बजे तक अष्टसहस्री ग्रंथराज का पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के मुखारविंद से अध्यापन एव खोलकर स्वाध्याय करें .
वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत की तिथियाँ, व्रतों के नाम एवं माहात्म्य

तिथि व्रत का नाम फल

पौष कृष्णा ३ पंक्तिमान छह पल्य उपवास

पौष कृष्णा १२ सूर्य सात पल्य उपवास

पौष सुदी ५ पराक्रम नौ पल्य उपवास

पौष सुदी ११ जयपृथु दस पल्य उपवास

माघ कृष्णा २ अजित आठ पल्य उपवास

माघ कृष्णा ५ स्वयंप्रभ ग्यारह पल्य उपवास

माघ कृष्णा १५ रत्नप्रभ बारह पल्य उपवास

माघ सुदी ४ चतुर्मुख तेरह पल्य उपवास

माघ सुदी ७ शील चौदह पल्य उपवास

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चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण स्तुति

चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण स्तुति

चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत करने वाले महानुभाव इस स्तुति को अवश्य पढ़े
-आर्यिका चन्दनामती
तर्ज-सन्त साधु बनके बिचरूँ..........

मनुज तन से मोक्ष जाने की घड़ी कब आएगी
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।टेक.।।

जैसे सागर में रतन का एक कण गिर जावे यदि।
खोजने पर भी है दुर्लभ वह भी मिल जावे यदि।।
किन्तु भव सागर में गिर आत्मा नहीं तिर पाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।१।।

कहते हैं चौरासि लख योनी में काल अनादि से।
जीव भ्रमता रहता है चारों गति पर्याय में।।
एक बस मानुष गति शिव सौख्य को दिलवाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।२।।

एक इन्द्रिय की बयालिस लाख योनी मानी हैं।
नित्य-इतर निगोद-पृथ्वी-अग्नि-जल और वायु हि हैं।।
इनमें जाकर के कभी नहिं देशना मिल पाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।३।।

वनस्पतिकायिक की भी दस लाख योनि कहीं गर्इं।
ये सभी मिथ्यात्व बल से योनियाँ मिलती रहीं।।
इनमें ना जाऊँ यदि सम्यक्त्व बुद्धि आएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।४।।

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फोटोज
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आस्रव के भेद

आस्रव त्रिभंगी

मंगलाचरण


पणमिय सुरेन्द्रपूजियपयकमलं वड्ढमाणममलगुणं।
पच्चयसत्तावण्णं वोच्छ़े हं सुणह भवियजणा।।१।।

प्रणम्य सुरेंद्रपूजितपदकमलं वर्धमानं अमलगुणं।
प्रत्ययसप्तपंचाशत वक्ष्येऽहं शृणुत भव्यजनाः।।

सुरेन्द्र से पूजित हैं चरण कमल जिनके,ऐसे अमल गुणों से सहित श्री वर्धमान जिनेन्द्र को नमस्कार करके आस्रव के कारणभूत सत्तावन भेदों को मैं कहूँगा| हे भव्यजीवों! तुम उन्हें सावधानचित्त होकर सुनो!

आस्रव के भेद


मिच्छत्तं अविरमणं कसाय जोगा य आसवा होंति।
पण बारस पणवीसा पण्णरसा होंति तब्भेया।।२।।

मिथ्यात्वमविरमणं कषाया योगाश्च आस्रवा भवन्ति।
पंच द्वादश पंशविंशति: पंचदश भवन्ति तद्भेदा:।।

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गुणस्थान सम्बन्धी प्रश्नोत्तरी

प्रश्न १. गुणस्थान किसे कहते हैं ?

उत्तर—मोह और योग के निमित्त से होने वाले आत्मा के अन्तरंग परिणामों को गुणस्थान कहते हैं। गुणस्थान आत्मविकास का दिग्दर्शक हैं। यह एक प्रकार का थर्मामीटर है। जैसे ज्वाराक्रान्त रोगी का तापमान थर्मामीटर व्दारा मापा जाता है, उसी प्रकार आत्मा का आध्यात्मिक विकास या पतन गुणस्थान रूपी थर्मामीटर व्दारा मापा जाता है।

प्रश्न २. गुणस्थान कितने होते हैं ?

उत्तर—गुणस्थान चौदह होते हैं जो निम्न हैं—

  1. मिथ्यात्व
  2. सासादन
  3. मिश्र या सम्यग्मिथ्यात्व
  4. अविरत सम्यक्त्व
  5. देशविरत या संयमासंयम
  6. प्रमत्तसंयत
  7. अप्रमत्तसंयत
  8. अपूर्वकरण
  9. अनिवृत्तिकरण
  10. सूक्ष्मसांपराय
  11. उपशांतमोह
  12. क्षीणमोह
  13. सयोगकेवली
  14. अयोगकेवली।

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जीव दया की कहानी

जीव दया की कहानी -

लेखिका-प्रज्ञाश्रमणी चंदनामती माताजी

तर्ज -ये परदा हटा दो ....

सुनो जीवदया की कहानी , इक मछुवारे की जुबानी ,

इक मछली को दे जीवन इसने जीवन पाया था-2 |
सुनो जीवदया की कहानी , इक मछुवारे की जुबानी|
the story of compossion , is called indian tradition
one fisherman had given once the life to the fish .

इक मुनि से नियम लिया था , पालन द्रढ़ता से किया था |
इक मछली को दे जीवन इसने जीवन पाया था-2 |
he took the vow from munivar , and followed till while life .that vow became very fruitful in fisherman 's life .
अब आगे शुरू होती है कहानी एक मछुवारे की -

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आज का दिन - २१ जनवरी २०१८ (भारतीय समयानुसार)
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दिनाँक २१ जनवरी,२०१८
तिथी- माघ शुक्ल ४
दिन-रविवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७४

सूर्योदय ०७.१२
सूर्यास्त १८.०३

भगवान विमलनाथ - जन्म व तप कल्याणक

लब्धि विधान व्रत पूर्ण
दशलक्षण व्रत प्रारम्भ
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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार
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