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मूल जैन संस्कृति : अपरिग्रह

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मूल जैन संस्कृति : अपरिग्रह

कहते हैं सत्य बड़ा कड़वा अमृत है। जो इसे हिम्मत करके एक बार पी लेता है वह अमर हो जात है और जो इसे गिरा देता है वह सदा पछताता है। हम एक ऐसा सत्य कहने जा रहे हैं। जिसे जन—मानस जानता है—मानता नहीं और यदि मानता है तो उस सत्य का अनुगमन नहीं करता। उस दिन एक सज्जन मेरे हस्ताक्षर लेने आ गए। दूर से आए थे, कह रहे थे—आपके सुलझे और र्नििभक विचारों को ‘अनेकान्त’ में पढ़ता रहता हूँ। कारणवश दिल्ली आना हुआ। सोचा आपके दर्शन करता चलूँ। उनके आग्रहवश मैंने हसताक्षर दे दिए। वे पढ़कर बोले—आप तो जैन हैं, आपने अपने को जैन नहीं लिखा—केवल पड्टचन्द शास्त्री लिखा है। मैंने कहा—हाँ, मैं ऐसा ही लिखता हूूँ। इससे आप ऐसा न समझें कि मैं इस समुदाय का नहीं। मैं तो इसी में पैदा हुआ हूँ, बड़ा भी इसी में हुआ हूँ और चाहता हूँ मरूँ भी यहीं। काश ! लोग मुझे जैन होकर मरने दें ! यानी—‘ये तन जावे तो जावे, मुझे जैन धर्म मिल जाने पर मैंने कहा पर अभी मुझे जैन या जिन बनने के लिए क्या कुछ और कितना करना पड़ेगा ? यह मैं नहीं जानता। हां इतना अवश्य है कि यदि मैं मूच्र्छा—परिग्रह को कृश कर सकू तो वह दिन दूर नहीं रहेगा जब मैं अपने को जैन लिख सकू।

‘जिन’ और ‘जैन’ ये दोनों शब्द आपस में घनिष्ट सम्बन्ध रखते हैं। जिन्होंने कर्मों पर विजय पाई हो, वे ‘जिन’ होते हैं और ‘जिन’ का धर्म जैन होता है। मुख्यता धर्म के लक्षण—प्रसंग में ‘वत्थु सहावो धम्मों’ और ‘य: सत्वान् संसार दु:खत: उद्धृत उत्तमे (मोक्षे) सुखे धरति स: धर्म:’ ये दो लक्षण देखने में आते हैं जहा तक प्रथम लक्षण का सम्बन्ध है, वहाँ हमें कुछ नहीं कहना। क्योंकि वहाँ तो ‘जिन’ का अपना स्वभाव ही ‘जैन’ कहलाएगा। जैसे अग्नि का अपना अस्तित्व है वह उसके अपने धर्म उष्णत्व से है। न तो अग्नि उष्णत्व को छोडेगी और न ही उष्णत्व अग्नि को छोड़ेगा। ऐसे ही जिनका यह धर्म जैन है, वे जिन भी इसे न छोड़ेंगे और ना जैन ही ‘जिन’ को छोड़ेंगा। मोह रागादि परिग्रह को छोड़ने से ‘जिन’ हैं और उनका धर्म ‘जैन’ उन्हीं में रहेगा। और जो ‘जिन’ बनता जाएगा। उसका धर्म जैन होता जाएगा। यह बात बड़ी ऊँची और अध्यात्म की है अत: हम इसे यहीं छोड़ते हैं। प्रसंग में तो जैन से हमारा आशय ‘जिन’ द्वारा प्रसारित उस धर्म से है जो जीवों को संसार के दु:खों से छुड़ाकर ‘जिन’ बना सके—मोक्ष सुख दिला सके। क्योंकि इस धर्म का माहात्म्य ही ऐसा है कि जो इसे धारण करता है उसी को ‘जैन’ या ‘जिन’ बना देता है कहा भी है—

‘जो अधीन को आप समान, करै न सौ निन्दित धनवान।’

वर्तमान में अहिंसा, सत्य, अचौर्य और ब्रह्मचर्य की जैसी धुंधली—परिपाटी प्रचलित है, यदि उसमें सुधार आ जाय तो लौकिक—मानव बना जा सकता है। प्राचीन समय की सुधरी परिपाटी ही आज तक समाज और देश को एक सूत्र में बांधे रख सकी है। नि:सन्देह उक्त नियमों के बिना न तो समाज सुरक्षित रह पाता और ना ही देश का उद्धार हुआ होता। लौकिक सुख—शान्ति भी इन्हीं नियमों पर आधारित हैं। इसीलिए भारत के विभिन्न मत—मतांतरों ने इन पर ही विशेष बल दिया। ताकि मानव, मानव बन सके और लौकिक, सुख—शान्ति से ओत—प्रोत रह सके। पर जैन तीर्थंकरों की दृष्टि पारलौकिक सुख तक भी पहुँची। उन्होंने जीवों को शाश्वत—परलोक—मोक्ष का मार्ग भी दर्शाया। उनका बताया मार्ग ऐसा है जिससे दोनों लोक सध सकते हैं। वह मार्ग है—मानव से ‘जैन’ और ‘जिन’ बनने का, पूर्ण परिग्रह के छोड़ने का। अर्थात् अब स्थूलहिंसा, झूठ, चोरी और कुशील का त्याग किया जाता है तब मानव बना जाता है और जब परिग्रह की सीमा बांधी या परिग्रह का त्याग किया जाता है तब जैन बना जाता है। जैनियों में जो दश धर्मों का वर्णन है उनमें भी पूर्ण—अपरिग्रह धर्म ही साध्य है, शेष धर्म उस अपरिग्रह के पूरक ही हैं। कहा भी है— ‘क्षमा मार्दव आर्जव भाव हैं, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग ‘उपाय’ हैं। अकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म दश सार हैं.....।’

जब सत्य, शौच, संयम, तप और त्यागरूपी उपायों से मन को क्षमा, मार्दव, आर्जव, रूप भावों में ढाला जाता है तब आिंकचन्य (पूर्ण अपरिग्रह) धर्म प्राप्त होता है और तभी आत्मा—ब्रह्म (आत्मा) में लीन (तन्मय) होता है। यह आत्मा में लीनता (तद्रूपता) का होना ही ‘जिन’ या ‘जैन’ का रूप है और इसे प्राप्त करने के लिए आस्रव से निवृत्ति पाकर संवर—निर्जरा के उपाय करने पड़ते हैं और वे सभी उपाय प्रवृत्ति रूप न होकर निवृत्ति रूप (जैसा कि ध्यान में होता है) ही होते हैं। किन्हीं अंशों में हम आंशिक निवृत्ति करने वालों को भी ‘जिन’ या जैन कह सकते हैं। कहा भी है—

‘जिणा दुविहा सयलदेजिणभेंएण। खविय धाइकम्मा सयलाजिषा। के ते ? अरहंत सिद्धा अवरे आइरिय उवज्झाय साहू देस—जिणा तिव्व कषायेंदिय—मोहविजयादो।।
—धवला ९, ४, १, १, १०।

जिन दो प्रकार के हैं—सकलजिन और देशजिन। घातियाकर्मों का लय करने वाले अरहंतों और सर्वकर्मरहित सिद्धों को सकलजिन कहा जाता है तथा कषाय मोह और इन्द्रियों की तीव्रता पर विजय पाने वाले आचार्य, उपाध्याय और साधु को देशजिन कहा जाता है। उक्त गुणों की तर—तमता में कथंचित देश—त्यागी—परिग्रह को कृश करने वाले श्रावकों को भी जैन मान सकते हैं, क्योंकि—मोक्षरूप उत्तम सुख मिलना परिग्रह कृश करने पर ही निर्भर है, फिर चाहे वह—परिग्रह अन्तरंग हो या बहिरंग याहिंसादि पापों रूप हो—सभी तो परिग्रह हैं।

ये तो ‘जिन’ की देन है, जो उन्होंने वस्तुतत्व को बिना किसी भेद—भाव के उजागर किया और अपरिग्रह को सिरमौर रखा और अिंहसा आदि सभी में इस अपरिग्रह को हेतु बताया। पिछले दिनों हमें श्री खुशालचन्द्र गोरावाला का पत्र मिला है। पत्र का सारांश यह है कि चारों कषायों और पांचों पापों में कार्य कारण की व्यवस्था उल्टी है। कार्य—निर्देश पहले और कारण—निर्देश अन्त में है। यानी क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार कषायों में अन्त की लोभ कषाय पूर्व की कषायों में कारण है। लोभ (चाहे वह किसी लख्य में हो) के होने पर ही क्रोध, मान या मायाचार की प्रवृत्ति होगी। इसी प्रकारहिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इन पांच पापों में भी अन्त का परिग्रह पाप पूर्व के पापों में मूल कारण है। परिग्रह (चाहे वह किसी प्रकार का हो) के होने पर हीहिंसा, झूठ, चोरी या कुशील की प्रवृत्ति होगी। ये तो हम पहिले भी लिख चुके हैं कि

‘तन्मूलासर्वदोषानुषङ्ग......ममेदमिति, हि सति संकल्पे रक्षणादय संजायन्ते। तत्र चहिंसाऽवश्यं भाविनी तदर्थमनृतं जल्पति, चौर्यं चाचरति, मैथुनं च कर्मणि प्रतिपतते।’
—त. रा. वा. ७/१७/५

सर्व दोष परिग्रह मूलक हैं। यह मेरा है, ऐसे संकल्प में रक्षण आदि होते हैं उनमेंहिंसा अवश्य होती है, उसी के लिए प्राणी झूठ बोलता है, चोरी करता है और मैथुनकर्म में प्रवृत्त होता है, आदि।

आचार्यों ने मूच्र्छा को परिग्रह कहा है और यहां मूच्र्छा से तात्पर्य १४ प्रकार के परिग्रह से है। मूच्र्छा ममत्व भाव को कहते हैं और ममत्व सब परिग्रहों में मूल है। अरति, शोक, भयादि भी इसी से होते हैं। इसीलिए ममत्व का परिहार करना चाहिए। राग की मुख्यता के कारण ही जिन भगवान को भी बीत द्वेष न कहकर वीतरागी कहा गया है। यदि प्राणी का राग बीत जाय—मूच्र्छा भाव बीत जाय तो वह ‘जिन’ हो जाय। जिन—मार्ग में परिग्रह को सर्व पापों का मूल बताया गया है और परिग्रह त्यागी को ही ‘जिन’ और ‘जैन’ का दर्जा दिया गया है।

कुछ लोग रागादि कोहिंसा और रागादि के अभाव को अहिंसा माने बैठे हैं औरहिंसा व परिग्रह में भेद नहीं कर रहे। ऐसे लोगों का कहना है कि अमृतचन्द्राचार्य ने कहा है कि—

‘अप्रादुर्भाव: खलु रागादीनां भवत्यिंहसेति।

तेषामेवोत्पत्तििंहसेति जिनागमस्य संक्षेप:।।

ऐसे लोगों को सूक्ष्म दृष्टि से कार्य—कारण की व्यवस्था को देखना चाहिए। आचार्य ने यहाँ कारणरूप रागादिक में कार्य—रूपहिंसा का उपचार किया है। रागादिक स्वयंहिंसा नहीं हैं अपितुहिंसा में कारण हैं इसीलिए आगे चलकर इन्हीं आचार्य ने कहा है—

‘सूक्ष्मापि न खलुहिंसा परवस्तु निवंधना भवति पुंस:।

‘आरम्यकर्तृ मकृतापि फलातिहिंसानुभावेन।’
‘यस्मात्सकषाय:, सन् इन्त्यात्मा प्रथममात्मनात्मानम्।’
‘यत्खलुकषाययोगात् प्राणानां द्रव्य भावरूपाणाम्।’

—पुरुषा

‘हिसा पर—वस्तु (रागादि) के कारणों से होती हैहिंसा कषाय भावों के अनुसार होती है। कषाय के योग से द्रव्य—भावरूप प्राणों का घात होता है और सकषाय जीव हिंसक (हिंसा से करने वाला) होता है।

पहले हमने जैन बनने में हेतु—भूत ध्यान के प्रसंग से अपरिग्रह—पूर्णनिवृत्ति को दिखाया है। जो लोग किसी बिन्दु पर मन को लगाने की बात करते हैं उसमें भी आस्रव भाव होता है फिर जो दीर्घ संसार हैं, ऐसे लोगों ने तो ध्यान—प्रचार के बहाने आज देश—विदेशों में भी काफी हलचल मचा रखी है, जगह—जगह ध्यानकेन्द्रों की स्थापना की है। वहां शान्ति की इच्छुक जनसाधारण मन:शान्ति हेतु जाते हैं। पर वहां वे, वह कुछ नहीं पा सकते जो उन्हें जिन जैनी या अपरिग्रही होने पर—सब ओर से मन हटाने पर मिल सकता है। यहां आत्मा को आत्म दर्शन मिलेगा और वहां उन्हें परिग्रहरूपी पर—विकारी भाव मिलेंगे। फिर चाहे वे विकारी भाव व्यवहारी दृष्टि से—कर्मशृंखलारूप में ‘शुभ’ नाम से ही प्रसिद्ध क्यों न हों। वास्तव में तो वे बंधरूप होने से अशुभ ही हैं; कहा भी है—

‘कम्ममसुहं कुसीलं सुहकम्मं चावि जाणह कुसीलं।

कह तं होइ सुसीलं जे संसार पवेसेदि।।’’

— समयसार ४/१/१४५

अशुभ कर्म कुशील—बुरा है और शुभ कर्म सुशील—अच्छा है, ऐसा तुम जानते हो; किन्तु जो कर्म जीव को संसार में प्रवेश कराता है, वह किस प्रकार सुशील—अच्छा हो सकता है ? अर्थात् अच्छा नहीं हो सकता।

उक्त प्रसंग से तात्पर्य ऐसा ही है कि यदि जीव परिग्रह—आस्रव जनक क्रिया को त्याग कर संवर निर्जरा में प्रयत्नशील हो—सभी प्रका विकल्पों को छोड़कर स्व में आवे, तो इसे जिन या जैन बनने में देर न लगे। आचार्यों ने स्व में आने के मार्ग रूप संवर निर्जरा के जिन कारणों को निर्देश किया है। वे सभी कारण परिग्रह निवृत्ति रूप हैं, किसी में भीहिंसा, झूठ, चोरी जैसी किसी परिग्रह का संचय नहीं। तथाहि—‘स गुप्ति समिति धर्मानुप्रेक्षा—परीषह चारित्रै:।’ ‘तपसा निर्जरा च।’—गुप्ति समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषहजय और चारित्र से संवर होता है और तप से संवर और निर्जरा दोनों होते हैं। उक्त क्रियाओं में प्रवृत्ति भी निवृत्ति का स्थान रखती है—सभी में पर—परिग्रह का त्याग और स्व में आना है। तथाहि—

गुप्ति—‘यत: संसारकारणदात्मनो गोपनं सा गुप्ति:।’
रा. वा. ९, २, १।

जिसके बल से संसार के कारणों से आत्मा का गोपन (रक्षण) होता है वह गुप्ति है।

मनोगुप्ति—‘जो रागादि णियत्ती मणस्स जाणाहि तं मणोगुत्ती।’

वचोगुप्ति—‘अलियादिणियत्ती वा मौणं वा होई वदिगुत्ती।’

—नि. सा. ६ भ
काय गुप्ति—‘काय किरियाणियत्ती काउस्सगो सरीरगेगुत्ती।
—नि. सा. ६८।
समिति—‘निज परम तत्त्व निरत सहज परम—बोधादि परम धर्माणां संहति समिति।
—नि. सा. ता. वृ. ६१
स्वं स्वरूप सम्यगितो गत: परिणत: समिति।’
—प्र. सा. ता. वृ. २४०
‘अनंत ज्ञानादि स्वभावे निजात्मनि सम सम्यक् समस्तरागदिविभाव—परित्यागेन तल्लीनतिंच्चतन तन्मयत्वेन अयनं गमनं परिणमनं। समिति।’
—प्र. सं टी. ३५
धर्म—‘भाउ विसुद्धणु अप्पणउ धम्मुभणेविणु लेहु।
—प. प्र. मू. २/६८
‘मिथ्यात्व रागादि संसरणरूपेण भावसंसारे—प्राणिनमुद्धृत्य र्नििवकारशुद्ध—चैतन्ये धरतीति धर्म:।’
—प्र. सा. ता. वृ. ७/९१९।
‘सद्दृष्टिज्ञानवृत्तानि धर्मम्।’
रत्न. ३१
‘चारित्तं खलु धम्मो धम्मो जो सो समोत्ति णिद्दिड्टो।

मोहक्खोह विहीणो परिणामो अप्पणो हु समो।।’

—प्र. सा. ७।
अनुप्रेक्षा—‘कम्मणिज्जरणड्टमड्टि—मज्जाणुगयस्स सुदणाणस्स परिमलणमणु—पेक्खणा नाम।’
—ध. ९, ४, १, ५५।।
परीषहजय—‘क्षुधादि वेदनानां तीव्रोदयेऽपि......समतारूप परमसामायिकेन....निजपरमात्मात्मा भावना संजात र्नििवकार नित्यानन्द लक्षणसुखामृत संवित्तेरचलनं स परीषहजय।’
—प्र. सं. टी. ३५।
चारित्र—‘‘स्वरूपे चरणं चारित्रम्। स्वसमय—प्रवृत्तिरित्यर्थ:।’
—प्र. सा. वृ. ७
तप—‘इच्छानिरोधस्तप:।’

मन की रागादिक से निवृत्ति होना मनोगुप्ति है। झूठ आदि से निवृत्ति या मौन वचनगुप्ति है। काय की क्रिया से निवृति—कायोत्सर्ग, कायगुप्ति है। निज परमात्मतत्व में लीन सहज परम ज्ञानादि परमधर्मों का समूह समिति है। स्व—स्वरूप में ठीक प्रकार से गत—प्राप्त समिति कहलाता है। अनंत ज्ञानादि स्वभावी निज आत्मा में, रागादि विभावों के त्यागपूर्वक, लीन होना, तन्मय होना, परिणति होना समिति है। अपना शुद्ध आत्म—भाव धर्म है उसे ग्रहण करो—प्राप्त करो यही धर्म है। जो प्राणी को मिथ्यात्व रागादिरूप संसार से उठाकर र्नििवकार शुद्ध—चैतन्य में धरे वह धर्म है। रत्नत्रय धर्म है। चारित्र निश्चय से धर्म है समता को धर्म कहा है। मोह—क्षोभ से रहित निज आत्मा ही समय है—आत्मा है, समताभाव है, धर्म है। कर्म की निर्जरा के लिए अस्थि—मज्जागत अर्थात् पूर्णरूप से हृदयंगम हुए श्रुतज्ञान के परिशीलन करने का नाम अनुप्रेक्षण है। शरीर भोगादि की अस्थिरता आदि का चिंतन अनुप्रेक्षा है। क्षुधादि वेदनाओं के तीव्रोदय होने पर भी समतारूप परम सामायिक से........निज परम आत्म की भावना से उत्पन्न नित्यानन्दमयसुखामृत से चलायमान न होना परीषह—जय है। स्वरूप में आचरण चारित्र है अर्थात् स्वात्मप्रवृत्ति चारित्र है। इच्छा का निरोध तप है। उक्त सभी उद्धरणों में (जो संवर—निर्जरा के साधनभूत हैं।) परिग्रह की निवृत्ति और स्व—प्रवृत्ति ही मुख्यत: परिलक्षित होती है और उक्त व्यवस्थाओं में प्रयत्नशील किन्हीं व्यक्तियों को भी कदाचित् हम किन्हीं अपेक्षाओं से देश—जिन या जैन कह सकते हैं पर आज तो जैनाचार से सर्वथा अछूता व्यक्ति भी किसी समुदाय विशेष में उत्पन्न होने मात्र से ही अपने को जैन घोषित करने का दम्भ बनाए बैठा है और विडम्बना यह कि इस प्रकार ‘जैन’ को सम्प्रदाय बनाकर भी कुछ लोग इसे बड़े गर्व से धर्म का नाम दे रहे हैं—कह रहे हैं ‘जैन सम्प्रदाय नहीं, अपितु धर्म है। और वे स्वयं भी जैनी है। जब कि इस धर्म के नियमों के पालन से उन्हें कोई सरोकार नहीं। यह तो ऐसा ही स्व—वचन बाधित वचन है जैसे कोई पुरुष बाँझ स्त्री का लक्षण करते हुए कहे कि — ‘जिसके संतान न हो उसे बाँझ कहते हैं जैसे — ‘मेरी माँ । —भला बाँझ है तो माँ कैसे और वह उसका पुत्र कैसे ? इसी प्रकार यदि वह सम्प्रदायी है तो जैन कैसे ?

हमारा कहना तो यही है कि यदि किसी को सच्चा जैन बनना है तो पहले वह भाव और द्रव्य दोनों प्रकार के परिग्रहों में संकोच करे। इनमें संकोच होते ही उसमें अिंहसादि सब व्रतों का संचार होगा—क्योंकि सभी पापों की जननी परिग्रह है और ‘जैन—संस्कृति’ का मूल अपरिग्रह है।


स्व. पं. पड्टचन्द शास्त्री
जैन प्रचारक सितम्बर अक्टूबर नवम्बर २०१४ पेज नं. ६ से ९ तक