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ॐ ह्रीं जन्म-तप कल्याणक प्राप्ताय श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय नमः |

मैं और मेरे पिता

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मैं और मेरे पिता

जब मैं ३ वर्ष का था तब मैं सोचता था कि मेरे पिता दुनिया के सबसे मजबूत और ताकतवर व्यक्ति हैं।

जब मैं ६ वर्ष का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मेरे पिता दुनिया के सबसे ताकतवर ही नहीं सबसे समझदार व्यक्ति भी हैं।

जब मैं ९ वर्ष का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मेरे पिता को दुनिया की हर चीज के बारे में ज्ञान है।

जब मैं १२ वर्ष का हुआ तब मैं महसूस करने लगा कि मेरे मित्रों के पिता मेरे पिता के मुकाबले ज्यादा समझदार हैं।

जब मैं १५ वर्ष का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मेरे पिता को दुनिया के साथ चलने के लिए कुछ और ज्ञान की जरूरत है।

जब मैं २० वर्ष का हुआ तो मुझे महसूस हुआ कि मेरे पिता किसी और ही दुनिया के हैं और वे हमारी सोच के साथ नहीं चल सकते।

जब मैं २५ वर्ष का हुआ तब मैंने महसूस किया कि मुझे किसी भी काम के बार में अपने पिता से सलाह नहीं करनी चाहिए क्योंकि उनमें हर काम में कमी निकालने की आदत सी पड़ गई।

जब मैं ३० वर्ष का हुआ तब मैं महसूस करने लगा कि मेरे पिता को मेरी नकल करने से कुछ समझ आ गई है।

जब मैं ३५ वर्ष का हुआ तब मैं महसूस करने लगा कि उनसे छोटी—मोटी बातों के बारे में सलाह ली जा सकती है।

जब मैं ४० वर्ष का हुआ तब मैंने महसूस किया कि कुछ जरूरी मामलों में पिताजी से सलाह ली जा सकती है।

जब मैं ५० वर्ष का हुआ तब मैंने फैसला किया कि मुझे अपने पिता की सलाह के बिना कुछ नहीं करना चाहिए क्योंकि मुझे यह ज्ञान हो चुका है कि मेरे पिता दुनिया के सबसे समझदार व्यक्ति हैं पर इससे पहले कि मैं अपने इस फैसले पर अमल कर पाता मेरे पिता जी इस संसार को अलविदा कर गए और मैं अपने पिता की हर सलाह और तजुर्बे से वंचित रह गया और तब मेरा बेटा भी २५ वर्ष का हो गया था।


संकलन — सचिन जैन, बड़ौत
जैन जनवाणी दिसम्बर—जनवरी २०१४-१५