मोक्षमार्ग

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मोक्षमार्ग

व्यवहार-निश्चय मोक्षमार्ग-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनों की एकता व्यवहारनय से मोक्ष का कारण है और सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रमयी निज आत्मा निश्चयनय से मोक्ष का कारण है क्योंकि आत्मा को छोड़कर अन्य द्रव्य में रत्नत्रय नहीं रहता है, इस कारण रत्नत्रयमयी आत्मा ही निश्चयनय से मोक्ष का कारण१ है।
व्यवहार रत्नत्रय-जीवादि पदार्थों का श्रद्धान करना सम्यक्त्व है। यह सम्यक्त्व आत्मा का स्वरूप है। इसके होने पर संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय रहित सम्यग्ज्ञान होता है। अनन्तर स्वशुद्धात्मानुभूतिरूप शुद्धोपयोग लक्षण जो वीतराग चारित्र है, उसका परम्परा से साधक सराग चारित्र होता है। तथाहि-
‘‘जो अशुभ कार्य से निवृत्तिरूप और शुभ कार्य में प्रवृत्तिरूप है, वह व्यवहारचारित्र है।’’ श्री जिनेन्द्रदेव ने व्यवहारनय से उस चारित्र को ५ व्रत, ५ समिति और तीन गुप्ति रूप कहा है। इसी चारित्र को अपहृत संयम और सराग चारित्र भी कहते हैं।
इसके अनन्तर निश्चय रत्नत्रय प्रगट होता है, उसी को कहते हैं-‘राग आदि विकल्प रहित, चिच्चमत्कार भावना से उत्पन्न परमशान्त रस के आस्वादरूप सुख का धारक मैं हूँ ’, इस प्रकार से निश्चय रुचि सम्यग्दर्शन है और स्वसंवेदन ज्ञान द्वारा उसी सुख का राग आदि समस्त विभावों से भिन्न जानना सम्यग्ज्ञान है। इसी प्रकार देखे, सुने तथा अनुभव किये हुए भोग आकांक्षा आदि समस्त दुध्र्यान रूप संकल्प-विकल्प के त्याग द्वारा उसी सुख में रत, तृप्त तथा एकाकाररूप परम समता भाव से चित्त का पुन:-पुन: स्थिर होना निश्चय चारित्र है। यह निश्चय रत्नत्रय ही अभेद रत्नत्रय या वीतराग चारित्र कहलाता है क्योंकि इस समय तीनों की एकाग्र परिणति हो जाती है।
संसार के कारणों को नष्ट करने के लिए ज्ञानी जीव के जो बाह्य और अन्तरंग क्रियाओं का निरोध है, जिनेन्द्रदेव का कहा हुआ वह उत्कृष्ट सम्यक् चारित्र है। यही चारित्र वीतराग और निश्चय संज्ञा को प्राप्त होता है।
ध्यान के बल से, मुनि नियम से व्यवहार-निश्चयरूप मोक्षमार्ग को प्राप्त कर लेते हैं इसलिए तुम उस ध्यान का अभ्यास करो। यदि तुम विचित्र ध्यान की सिद्धि के लिए मन स्थिर करना चाहते हो, तो इष्ट-अनिष्ट पदार्थों में मोह मत करो, राग मत करो और द्वेष मत करो।
सहज, शुद्ध, परम चैतन्यशाली तथा परिपूर्ण आनन्द का धारी भगवान निज आत्मा में उपादेय बुद्धि करके ‘मैं अनन्त ज्ञानमयी हूँ, मैं अनन्त सुखरूप हूँ’ इत्यादि रूप से ध्यान करो और बहिरंग में पंचपरमेष्ठी के अवलम्बनरूप, पिण्डस्थ, पदस्थ आदि ध्यान का अभ्यास करो।
सम्यग्दृष्टि जीव निश्चय और व्यवहार दोनों नयों का अवलम्बन लेकर आत्मतत्त्व को ठीक से समझता है।
‘‘जो शुद्धनय तक पहुँचकर श्रद्धावान् हुए तथा पूर्णज्ञान और चारित्रवान् हो गये, उनको तो शुद्धनय का उपदेशक शुद्धनय जानने योग्य है। यहाँ शुद्ध आत्मा का प्रकरण है इसलिए शुद्ध, नित्य, एक, ज्ञायक मात्र आत्मा है, ऐसा जानना और जो जीव अपर भाव अर्थात् श्रद्धा, ज्ञान और चारित्र के पूर्णभाव को नहीं पहुँच सके तथा साधक अवस्था में ही ठहरे हुए हैं, वे व्यवहार द्वारा उपदेश करने योग्य हैं।’’
अपने-अपने समय में दोनों ही नय कार्यकारी हैं क्योंकि तीर्थ२ और तीर्थ के फल की ऐसी ही व्यवस्था है। जिससे तिरा जाये वह तीर्थ है, वह व्यवहार धर्म है और ‘जो पार होना’ वह तीर्थ का फल है अथवा अपने स्वरूप का पाना वह तीर्थ का फल है। कहा भी है-
‘‘यदि तुम जैनधर्म का प्रवर्तन चाहते हो, तो व्यवहार और निश्चय इन दोनों नयों को मत छोड़ो क्योंकि एक-व्यवहारनय के बिना तो तीर्थ (व्यवहार मार्ग) का नाश हो जायेगा और दूसरे-निश्चय के बिना तत्त्व (वस्तु) का नाश हो जायेगा।
आचार्य कहते हैं कि भूतार्थ-निश्चयनय, निर्विकल्प समाधि में रत मुनियों को प्रयोजनभूत है किन्तु निर्विकल्प समाधि रहित जीवों को सोलह ताव के सुवर्ण के अभाव में कुछ-कुछ ताव के सुवर्ण लाभ के समान किन्हीं प्राथमिक शिष्यों को सविकल्प अवस्था में मिथ्यात्व, विषय, कषाय, दुध्र्यान की वंचना के लिए व्यवहारनय भी प्रयोजनीभूत है। सोलह ताव के सुवर्ण लाभ के समान अभेद रत्नत्रय स्वरूप समाधि-ध्यान के समय निश्चयनय ही प्रयोजनवान् है अर्थात् जो ‘अपरम’ भाव-अशुद्ध भाव में स्थित हैं-असंयत सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा से अथवा देशव्रती श्रावक की अपेक्षा से सराग सम्यग्दृष्टि हैं, शुभोपयोगी हैं और जो छठे गुणस्थानवर्ती तथा सप्तम गुणस्थानवर्ती हैं, भेद रत्नत्रय में स्थित हैं, उनके लिए व्यवहारनय प्रयोजनवान् है। यहाँ कहना यह है कि सातवें गुणस्थान तक अपरमभाव है और वहाँ तक व्यवहारनय प्रयोजनीभूत है। इसके आगे ध्यानावस्था विशेष में व्यवहारनय स्वयं छूट जाता है। नयों का अवलम्बन नहीं रहता है।

भेद विज्ञान से बंध का अभाव होता है-

जब यह जीव जान लेता है कि आत्मा और शरीर आदि परद्रव्य भिन्न-भिन्न हैं, तब यह ज्ञानी कहलाता है। आस्रव अशुचि हैं, जड़ हैं, दु:ख के कारण हैं और आत्मा पवित्र है, ज्ञाता है, सुख स्वरूप है, ऐसे दोनों को लक्षण भेद से भिन्न-भिन्न जानकर आत्मा आस्रवों से निवृत्त होती है, उसके कर्म का बंध नहीं होता है।
प्रश्न-यदि ज्ञान मात्र से बंध का निरोध होता है, तब तो सांख्य मत आ जावेगा?
उत्तर-जो आत्मा और आस्रव संंबंधी भेदज्ञान है, वह रागादि आस्रवों से निवृत्त है या नहीं? यदि रागादि आस्रवों से रहित है, तब तो उस भेदविज्ञान में ठंढई के समान अभेदनय से वीतराग चारित्र और वीतराग सम्यक्त्व हैं ही हैं इस दृष्टि से सम्यग्ज्ञान से ही बंध का अभाव कह देना ठीक है। यदि भेदविज्ञान रागादि से निवृत्त नहीं है, तब तो वह सम्यक् भेदविज्ञान ही नहीं है, यह अभिप्राय होता है अर्थात् क्रोधादि कषाय भावों से रहित जीव के ही बंध का अभाव होता है। असंयत सम्यग्दृष्टि के ४१ प्रकृतियों की बंध व्युच्छित्ति हो गई है, उतने मात्र में बंध का अभाव हो गया है, वैसे ही आगे गुणस्थानों में जितनी-जितनी प्रकृतियों का बंध नहीं होता उतनी-उतनी प्रकृतियों की अपेक्षा ही बंध का निरोध सिद्ध है।
सम्यग्दृष्टि जीव कर्ता है या नहीं-यद्यपि जीव शुद्ध निश्चयनय से स्वरूप को भी नहीं छोड़ता है, पररूप परिणत नहीं होता है, फिर भी व्यवहारनय से कर्म के उदय से रागादिरूप उपाधि परिणाम को ग्रहण करता है, इसलिये यह जीव कथंचित् परिणामी है।’’
जब यह जीव बहिरात्मा, अज्ञानी होता है, तब विषयकषाय रूप अशुभोपयोग को कर्ता है। कदाचित् पुन: भोगाकांक्षा निदानरूप शुभोपयोग परिणाम को भी कर्ता है, तब यह द्रव्यभावरूप पुण्य, पाप, आस्रव, बंध पदार्थों का कर्ता बन जाता है।
जब यह सम्यग्दृष्टि अन्तरात्मा होता है, तब मुख्यरूप से निश्चयरत्नत्रयलक्षण शुद्धोपयोग के बल से निश्चयचारित्र का अविनाभावी, वीतराग सम्यग्दृष्टि होता हुआ निर्विकल्प समाधिरूप परिणामों को कर्ता है तब उस परिणाम से द्रव्यभावरूप संवर, निर्जरा और मोक्ष पदार्थों का कर्ता हो जाता है।
कदाचित् पुन: निर्विकल्प समाधिरूप परिणाम के अभाव में विषय कषायों को दूर करने के लिए अथवा शुद्धात्मभावना को सिद्ध करने के लिए बाहर में ख्याति पूजा, लाभ, भोगाकांक्षा रूप निदान बंध से रहित हुआ शुद्धात्मस्वरूप अर्हंत, सिद्ध, शुद्धात्मा के आराधक-आचार्य, उपाध्याय, शुद्धात्मा के साधक-साधु इन पाँचों परमेष्ठियों के गुणस्मरण आदि रूप शुभोपयोग परिणाम को कर्ता है। इस प्रकार से सम्यग्दृष्टि जीव व्यवहार नय की अपेक्षा से संवर, निर्जरा आदि पदार्थों का कर्ता भी माना गया है, यदि सर्वथा अकर्ता ही माना जायेगा, तो मोक्ष व्यवस्था नहीं बनेगी।
रागद्वेषादि विभाव परिणाम जीव के हैं या पुद्गल के हैं?-ये रागादि विकार भाव जीव और पुद्गल के संयोग से उत्पन्न हुए हैं। ये अशुद्ध निश्चयनय की अपेक्षा अशुद्ध उपादान रूप से चेतन हैं क्योंकि जीव से संबंधित हैं। शुद्ध निश्चयनय की अपेक्षा शुद्धोपादान रूप से अचेतन हैं क्योंकि पौद्गलिक हैं। वास्तव में देखा जाये तो एकांत से न ये जीवरूप हैं न पुद्गलरूप हैं। ये व्यवहारनय से दोनों के ही हैं, जैसे कि स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ पुत्र माता और पिता दोनों का ही है और वस्तुभूत सूक्ष्म शुद्धनय से ये मिथ्यात्व रागादि भाव हैं ही नहीं क्योंकि ये तो अज्ञान के संयोग से उत्पन्न हुए हैं।

प्रश्न-सूक्ष्म शुद्ध निश्चयनय से यह किसके हैं?

उत्तर-सूक्ष्म शुद्ध निश्चयनय से इनका अस्तित्व ही नहीं है।
सम्यग्दृष्टि के आस्रव नहीं होता-‘‘राग द्वेष और मोह ये आस्रव सम्यग्दृष्टि के नहीं हैं इसलिए आस्रव भाव के बिना द्रव्यप्रत्यय कर्मबंध का कारण नहीं है। मिथ्यात्व आदि चार प्रकार का हेतु आठ प्रकार के कर्म बंधने का कारण कहा गया है और उन चार प्रकार के हेतुओं को भी जीव के रागादि भाव का कारण कहा है, सो सम्यग्दृष्टि के उन रागादि भावों का अभाव होने से कर्मबंध नहीं है।
टीका का भावार्थ-सम्यग्दृष्टि जीव के राग, द्वेष और मोह भाव नहीं होते हैं क्योंकि इन भावों के होने पर सम्यग्दृष्टिपन बन नहीं सकता। इसे स्पष्ट कर बतला रहे हैं। ‘‘सम्यग्दृष्टि जीव के अनन्तानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ और मिथ्यात्व के उदय से होने वाले रागद्वेष मोह भाव नहीं होते, क्योंकि अन्यथा उसके केवलज्ञानादि अनन्त गुणों वाले परमात्मा में उपादेयता स्वीकार होकर वीतराग और सर्वज्ञ के द्वारा कहे हुए छह द्रव्य, पंचास्तिकाय, सप्ततत्त्व और नव पदार्थों में रुचि होने रूप तीन मूढ़ता आदि पच्चीस दोष रहित तथा संवेग, निर्वेद, निन्दा, गर्हा, उपशम, भक्ति, वात्सल्य और अनुकम्पा इन आठ गुणों वाला चतुर्थ गुणस्थान संंबंधी सम्यक्त्व हो नहीं सकता।’’ अथवा ‘अनन्तानुबंधी और अप्रत्याख्यानावरण संंबंधी रागद्वेष मोह नहीं है, अन्यथा पंचमगुणस्थान के योग्य देशचारित्र के साथ में होने वाला सराग सम्यक्त्व हो नहीं सकता’ अथवा ‘अनन्तानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण कषाय संबंधी रागद्वेष मोह सम्यग्दृष्टि के नहीं होते’ अन्यथा छट्ठे गुणस्थान के योग्य सरागचारित्र के साथ में होने वाला सराग सम्यक्त्व नहीं हो सकता।
अथवा ‘‘अनन्तानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और तीव्र संज्वलनरूप क्रोधादि के उदय से होने वाले प्रमाद के कारण राग, द्वेष, मोह, भाव सम्यग्दृष्टि जीव के नहीं होते क्योंकि फिर तो शुद्ध-बुद्ध एक स्वभाव वाले परमात्मा में उपादेय बुद्धि होकर उसके ही योग्य शुद्धात्मा की समाधि से अनुभूत जो सहजानन्द स्वलक्षण वाले सुख की अनुभूति होना ही है स्वरूप जिसका ऐसे अप्रमत्तादि गुणस्थानवर्ती वीतराग चारित्र के साथ अविनाभाव रखने वाले अर्थात् वीतराग चारित्र के बिना न होने वाले वीतराग सम्यक्त्व की उत्पत्ति नहीं हो सकती है।’’
इस क्रम से सम्यग्दृष्टि के राग, द्वेष, मोह रूप, भाव नहीं होते हैं एवं उनके न होने से सत्ता में होने वाले या उदय में होने वाले मिथ्यात्वादि द्रव्य प्रत्यय कर्मबंध के कारण नहीं होते हैं क्योंकि मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग ये चार कारण ज्ञानावरणादि आठ प्रकार के नवीन बंध के कारण हैं अर्थात् निष्कर्ष यह निकलता है कि वीतरागरूप परम सामायिक भावना में परिणत रहने वाले अभेद रत्नत्रय लक्षणरूप, भेदज्ञान के होने पर यह जीव नवीन कर्मों से नहीं बंधता है।
अन्यत्र इसी भाव को और भी स्पष्ट किया है।
सराग और वीतराग के भेद से सम्यग्दृष्टि के दो भेद होते हैं-उसमें से वीतराग सम्यग्दृष्टि जीव तो नवीन कर्मबंध को सर्वथा नहीं करता, जिसको कि लक्ष्य में लेकर यहाँ कथन किया गया है-सम्यग्दृष्टि को अबंध कहा गया है किन्तु सराग सम्यग्दृष्टि जीव अपने-अपने गुणस्थान के क्रम से बंधव्युच्छित्ति करने वाला होता है। इसको बंध२ त्रिभंगी में बताये हुए बंध-विच्छेद के क्रम से देखें तो चतुर्थ गुणस्थानवर्ती अविरत सम्यग्दृष्टि जीव मिथ्यात्वादि गुणस्थानों में व्युच्छिन्न हुई ४३ प्रकृतियों का बंध करने वाला नहीं होता किन्तु ७७ प्रकृतियों का अल्प स्थिति अनुभाग के रूप में बंधक भी होता है। फिर भी वह संसार की स्थिति का छेदक होता है इसलिए वह अबंधक (ईषत् बंधक) होता है। इस प्रकार अविरत नामक चतुर्थ गुणस्थान के ऊपर के गुणस्थानों में जहाँ तक सराग सम्यग्दर्शन रहता है, वहाँ तक जैसा संभव है, वहाँ तारतम्य से निचले गुणस्थानों की अपेक्षा से अबंधक होता है किन्तु उपरिम गुणस्थानों की अपेक्षा में देखने पर वह बंधक भी है। हाँ! जहाँ सराग सम्यक्त्व के आगे वीतराग सम्यक्त्व होता है, वह साक्षात् स्पष्टरूप से अबंधक होता है ‘‘वयं सम्यग्दृष्टय: सर्वथा बंधो नास्तीति न वक्तव्यं’’ हम सम्यग्दृष्टि हैं और सम्यग्दृष्टि के बंध नहीं होता है इसलिए हमें भी बंध नहीं होता, ऐसा नहीं समझना चाहिए।
समयसार में यत्र-तत्र श्री जयसेनाचार्य ने छठे गुणस्थान तक सराग सम्यक्त्व माना है और आगे के गुणस्थानों में वीतराग सम्यक्त्व माना है। बारहवें गुणस्थान में पूर्णतया वीतराग सम्यक्त्व होता है, उसी गुणस्थान में पूर्णतया बंध का अभाव होता है। उसके पूर्व जितनी-जितनी प्रकृतियों की बंध-व्युच्छित्ति होती है, उतनी-उतनी प्रकृतियों का संवर होने से वह अबंधक कहलाता है।

संसार विच्छित्ति के चार कारण माने हैं-

<poem>‘‘द्वादशांगावगमस्तत्तीव्रभक्तिरनिवृत्तिपरिणाम:।
केवलिसमुद्घातश्चेति संसारस्थितिघातकारणानि भवन्ति।।’’ सिद्धान्त ग्रंथ में कहा है कि-परिपूर्ण द्वादशांग का ज्ञान प्राप्त होना, अरिहन्त आदि की तीव्र भक्ति, अनिवृत्ति परिणाम और केवलिसमुद्घात ये चार संसार स्थिति के घात के कारण माने हैं। द्वादशांग ज्ञान-व्यवहार से द्वादशांग विषयक सम्पूर्ण बाह्यविषयक ज्ञान होना और निश्चय से वीतराग स्वसंवेदन लक्षण ज्ञान का होना। तत्तीव्र भक्ति-भक्ति से यहाँ सम्यक्त्व कहा गया है। वह भक्ति व्यवहार से यहाँ सराग सम्यग्दृष्टि के पंचपरमेष्ठी की आराधना रूप है और निश्चय से वीतराग सम्यग्दृष्टियों के शुद्धात्मतत्त्व की भावना रूप है। अनिवृत्तिपरिणाम-न निवृत्ति को अनिवृत्ति कहते हैं-शुद्धात्मस्वरूप से चलित न होना, एकाग्रपरिणतिरूप अवस्था का होना। इस प्रकार से ‘द्वादशांगावगम’ से निश्चय-व्यवहार ज्ञान हो गया। ‘भक्ति’ से निश्चय-व्यवहार सम्यक्त्व हो गया और ‘अनिवृत्ति परिणाम’ से सराग चारित्र के अनन्तर वीतराग चारित्र हो गया। इस तरह सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र ये तीनों भेद-अभेद रत्नत्रयरूप से संसार की विच्छित्ति-विनाश के कारण होते हैं। किनके होते हैं? छद्मस्थजीवों के होते हैं और केवली भगवान के तो दण्ड, कवाट, प्रतर, लोकपूरणरूप केवलि समुद्घात संसार की विच्छित्ति का कारण होता है, यह भावार्थ हुआ। व्यवहारनय की उपयोगिता-‘ये सब अध्यवसानादि भाव हैं, ऐसा जिनवरदेव ने उपदेश दिया

भाव-यह सब अध्यवसानादि भाव ‘जीव हैं’, ऐसा जो भगवान सर्वज्ञदेव ने कहा है, वह अभूतार्थ-असत्यार्थरूप व्यवहारनय का मत है क्योंकि वह व्यवहारी जीवों के लिए परमार्थ का कहने वाला है। जैसे-म्लेच्छभाषा से म्लेच्छों को समझाया जाता है, उसी प्रकार से अपरमार्थ होने पर भी धर्म-तीर्थ की प्रवृत्ति के लिए व्यवहारनय का वर्णन होना ठीक ही है। यदि उस व्यवहार को न कहें और परमार्थनय जीव को शरीर से भिन्न कहता है उसका ही एकांत कथन करें, तो ‘त्रसस्थावर जीवों का घात नि:शंकरूप से करना ठहरेगा’, जैसे-भस्म के मर्दन करने में हिंसा का अभाव है, उसी प्रकार उनके मारने में भी िंहसा नहीं सिद्ध होगी पुन: हिंसा का अभाव ठहरेगा, तब उनके घात होने से बंध का भी अभाव ठहरेगा। उसी प्रकार ‘‘रागी, द्वेषी, मोही जीव कर्म से बंधता है, वह छुड़ाने योग्य हैं’’ ऐसा कहा गया है। परमार्थ से राग, द्वेष, मोह से जीव को भिन्न दिखलाने पर मोक्ष के उपाय का उपदेश व्यर्थ हो जायेगा, तब मोक्ष का भी अभाव ठहरेगा, इसलिए व्यवहारनय प्रयोजनीभूत है।

‘‘यदि४ पुन: व्यवहार नय नहीं होगा, तब शुद्ध निश्चयनय से त्रसस्थावर जीव नहीं होते हैं, ऐसा मानकर लोग उनका नि:शंक होकर घात करेंगे। उससे पुण्यरूप धर्म का अभाव होना यह एक दूषण आयेगा। उसी प्रकार शुद्ध निश्चयनय से राग, द्वेष, मोह रहित जीव पूर्व में ही मुक्त हैं, ऐसा मानकर मोक्ष के लिए अनुष्ठान कोई भी नहीं करेगा और तब तो मोक्ष का ही अभाव हो जायेगा यह दूसरा दूषण आ जायेगा, इसलिए व्यवहारनय का व्याख्यान उचित ही है।’’ शंका-पर का छेदन-भेदन करने से व्यवहार नय से ही हिंसा होती है न कि निश्चयनय से? समाधान-‘‘आपने ठीक ही कहा है व्यवहार नय से ही हसा होती है और पाप बंध भी व्यवहारनय से ही होता है तथा नारकादि दुख भी व्यवहार से ही होता है। यह बात हमें इष्ट ही है।’’ यदि वे नारकादि दु:ख आपको इष्ट हैं, तब तो हिंसा करो। यदि उन दु:खों से डरते हो तो छोड़ दो इसलिए यह बात निश्चित हो गई कि यह जीव एकान्त से कर्मों का अकर्ता नहीं है। व्यवहारनय से जीव में कर्म बंधे हैं निश्चयनय से नहीं बंधे हैं। ये दोनों ही विकल्पनय पक्ष हैं, जो इन नय पक्ष के विकल्पों से आगे बढ़ जाता है, वही आप निर्विकल्प एक विज्ञान घन स्वभाव होकर साक्षात् समयसार हो जाता है। ‘‘जो महामुनि नय के पक्षपात को छोड़कर अपने स्वरूप में गुप्त होकर निरन्तर स्थिर होते हैं, वे ही पुरुष विकल्पजाल से रहित शान्तचित्त हुए साक्षात् अमृत को पीते हैं। वीतराग निर्विकल्प समाधिरूप ध्यान के द्वारा एक अन्तर्मुहूर्त में ही कर्मजाल नष्ट हो जाते हैं।

यदि३ अर्धनिमिष मात्र काल भी कोई महामुनि परमात्मा में प्रीति को करता है, तो जैसे अग्नि की एक कणिका काष्ठ के पर्वत को भस्मसात् कर देती है, उसी प्रकार से अशेष भी पाप-समूह को समाप्त कर देता है’ अर्थात् जो समस्त विकल्पजालों से-राग-द्वेषादि विभाव भावों से रहित होकर निर्विकल्प ध्यान में स्थित होकर परमात्मा का ध्यान करता है, वह शीघ्र ही कर्म समूह को समाप्त कर देता है।