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मोक्षमार्गता में संस्कार की महत्ता,

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मोक्षमार्गता में संस्कार की महत्ता

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१. निषद्या संस्कार — (५ माह बाद) प्राय: पांचवे माह में बालक को बैठने की क्रिया की जाती है। पिसी हल्दी का चौक पूर कर पाटे पर उसे समय पूर्व मुख कर सुखासन से बैठाऐं तथा नीचे लिखे मंत्र पाठ से मस्तक पर पुष्प डालें—

‘‘दिव्य सिंहासन भावी भव, विजय सिंहासन भागी भव, परम सिंहासन भागी भव।’’

पश्चात् झूला पर मंत्र शुद्धि के जल छींटा डालें। शुद्धि मंत्र — ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद् भवे अमृत वर्षिणि अमृतं श्रावय श्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लूँ ब्लूँ द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं सं झ्वीं क्ष्वीं हं स: स्वाहा।

चारों दिशाओं में रक्षा मंत्र बोलें — ॐ ह्राँ ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसाय नम: सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा। झूला (पालना) पर साँतिया बनाकर बालक को नीचे लिखा मंत्र बोलकर बैठाऐं—

ॐ ह्रीं झ्रौं झ्रौं क्ष्वीं आंदोलने बालकमारोपयामि अस्य सर्वं रक्षा भवतु झौं झौं स्वाहा।’’

बालक का नाक कान भी आज ही छिदवाना चाहिए। तब नाक कान छिदवाते समय यह मंत्र बोला जाए—

मंत्र — ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं बालकस्य ह्र: कर्ण नासावेधनं करोमि असिआ उसा स्वाहा। पश्चात् पलंग पर मुख पूर्व की ओर करके नीचे लिखे मंत्र को पढ़कर बैठाऐं— ॐ ह्रीं अर्हं असिआउसा बालक मुपवेश्यामि स्वाहा’’ पश्चात् मंत्र — दिव्य सिंहासन भागी भव। विजय सिंहासन भागी भव। परम सिंहासन भागी भव। मंत्रों से आशीर्वाद दें। शान्तिपाठ एवं विसर्जन पाठ कर समापन करें।

१०. अन्न प्राशन संस्कार— (७ माह में)

जन्म से ७ या ८ या ९ वें माह में अन्न का आहार बालक को कराना चाहिए। इससे पहले नहीं अन्न देना चाहिए। सर्वप्रथम यंत्र पूजा हवन करें। पश्चात् सर्व प्रथम पिसी हल्दी से चौक लगाऐं उस पर पाटा रख कर बालक को बैठाए शुद्धि मंत्र से शुद्ध करें—

शुद्धि मंत्र — ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृत वर्षिणी अमृत वर्षिणी अमृत श्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं सं झ्वीं क्ष्वीं हं स: स्वाहा। पुन: रक्षा मंत्र से रक्षा की कामना करें—

रक्षा मंत्र — ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआ उ सा नम: सर्व दिशात् आगत विघ्नान निवारय निवारय सर्व रक्ष रक्ष स्वाहा। पश्चात् नीचे लिखे मंत्र को ३ बार पढ़कर बालक के मस्तक पर पुष्प डालें और मृदु उत्तम अन्नाहार कराएं। (घी मिश्री मिली खीर दक्षिण मुखी बालक को खिलाऐं)

मंत्र — ‘‘ दिव्यामृतभागो भव— विजयामृत भागो भव— अक्षीणामृत भागी भव’’ ‘‘ॐ णमो अर्हते भगवते भुक्ति शक्ति प्रदायकाय बालकं भोजयामि पुष्टि तुष्टिश्चारोग्यं भवतु भवतु भ्वीं क्ष्वीं स्वाहा।’’

शान्ति पाठ — विसर्जन कर पश्चात् गृहपति पूरे परिवार को सर्व प्रथम दही भात और उत्तम भोजन कराऐं।

नोट — चौक में माँ पूर्व मुखी होकर बैठे और बालक को गोदी में दक्षिण मुखी करके अन्न प्राशन संस्कार करें।

तत: प्राड़मुख मासित्वा पिता माता यथा सुतं ।

दक्षिणामि मुखं कृत्वा वामोत्संगे निवेशयेत।।
क्षीरान्नं शर्करा युत्तंकं घृतात्तंकं प्राशयोच्छि शुभ।
दध्यन्नं च तत: सर्वान् बान्ध वानपि भोजऐत।।

११. व्युष्टि क्रिया या वर्ष वद्र्धन संस्कार

(एक वर्ष बाद करना चाहिए) सर्वप्रथम गृहस्थाचार्य पिसी हल्दी को चौक पूरण कराकर चौकी पर बालक को नवीन वस्त्र पहनाकर माँ के साथ बैठे। यंत्राभिषेक एवं पूजन हवन करें समस्त कुटम्बी जनों को आमंत्रित करें। बालक को तिलक कर गृहस्थाचार्य मंगलाष्टक का पाठ पढ़ता हुआ बालक के मस्तक पर पुष्प क्षेपण करें। बालक को मिष्ठान खिलाऐ और उपहार प्रदान करे। तथा बालक को उत्तर मुख कर हाथों से पकड़ कर पहले दाहिने पैर को आगे बढ़ाकर पूर्व की ओर चलाऐ। श्री जिन भगवान के दर्शन कराकर लाऐ और समस्त कुटुम्बी जन उसे आर्शीवाद प्रदान करें। तथा गृहस्थाचार्य बालक को चौक में बैठाऐ दीपक आगे प्रज्वलित कर रखे तथा पीले पुष्पों को शिर पर नीचे लिखा मंत्र बोलकर डाले। ‘‘उपनयन जन्म वर्ष वर्धन भागी भव– वैवाहनिष्ठ वर्ष वद्र्धन भागी भव— मुनीन्द्र जन्म वर्ष वद्र्धन भागी भव— सुरेन्द्र जन्म वर्ष वद्र्धन भागी भव— मंदराभिषेक वर्ष वद्र्धन भागी भव—यौव राज्य वर्ष वद्र्धन भागी भव—महाराजा वर्ष वद्र्धन भागी भव— परम राज्य वर्ष वद्र्धन भागी भव— आर्हन्त्य राज्य वर्ष वद्र्धन भागी भव।’’ पश्चाचत् शान्ति पाठ विसर्जन कर पूजा विधि समाप्त करे। रात्रि में भजन संगीत का कार्यक्रम करना चाहिए।

१२. चौल (मुण्डन) संस्कार— (३ वर्ष बाद)

शुभ मुहूर्त में सर्वप्रथम बालक को स्नान कराकर श्री जिन मंदिर में दर्शन— पूजन करें। पश्चात् हल्दी को चौक पूरण कर एक पाटे पर बालक को उत्तर/पूर्व मुख करके बैठाऐ तथा नीचे लिखे मंत्रों को पढ़ता हुआ बालक के मस्तक पर पुष्प डालें एवं इन्हीं मंत्रों से आहुतियां दें।

मंत्र — उपनयन मुंड भागी भव— निग्र्रन्थ मुंड भागी भव— निष्क्रांति मुंड भागी भव— परम निस्तारक केश भागी भव सुरेन्द्र केश भागी भव—परम केश भागी भव—आर्हंत केश भागी भव (माँ की गोद में) बालक को उत्तर या पूर्व मुख करके बैठाऐं तथा पिता मस्तक पर हल्दी—दही मिश्रित जल से सिर धोऐं पश्चात् ॐ श्री पंच परमेष्ठी प्रसादात केशान्वम शिरो रक्ष कुशली कुरु मंत्र पढ़कर नाई से केश निकलवाऐ।

मुंडन हो जाने पर बालक को प्रासुक सुगंधित जल से स्नान कराएँ तथा बालक के चोटी स्थान पर केशर से स्वास्तिक बनाऐ ओर पुन: जिन भगवान या साधू के दर्शन कराकर मिष्ठान वितरण कराऐ तथा श्री जिन मंदिर को दान दें। निकले हुए केशों को गीले आटे में लपेट कर जलाशय में पहुँचा दें।

१३. लिपि संख्यान संस्कार— (३ से ५ वर्ष में)

सर्वप्रथम शुभ मुहूर्त में उत्तरायण सूर्य हो तब श्रीजिन मंदिर में दर्शन करे। पश्चात् घर पर यंत्र पूजन हवन पश्चात् बालक को गृहस्थाचार्य नीचे लिखे मंत्र पाठ से आशीर्वाद दें। ‘‘ शब्द पारगामी भव—अर्थ पारगामी भव—शब्दार्थ संबंध पारगामी भव।’’ पश्चात् बालक को लिपि पुस्तक दी जाऐ। और सर्व प्रथम ॐ तथा ‘ ॐ नम: सिद्धेभ्य:’ का उच्चारण कराऐं और हाथ पकड़कर लिपि पुस्तिका पर लिखाऐं। स्मरण रखें कि निम्नांकित वारों में यह संस्कार कराने पर तदरूप फल मिलता है। रविवार (आयुवृद्धि) सोमवार (जड़ता) मंगलवार (मृत्यु) बुधवार (बुद्धिवृद्धि) गुरुवार (बुद्धि कौशल्य) शुक्रवार (प्रज्ञा वर्धन) शनिवार (शरीर क्षीण) होता है।

अन्नध्याय — प्रदोष काल एवं ४,६,९,१४ यह तिथियां विद्यांरभ में वर्जनीय हैं। शिक्षक पूर्व मुख बालक को पश्चिम मुख बैठा कर पाटी पर केशर से बालक का हाथ पकड़कर लिखाऐ। विद्यागुरू को वस्त्रादि दें तथा सभी बालकों को मिष्ठान वितरित कराऐं।पुन: बालक को आशीर्वाद दें— मंत्र— शब्द पारगामी भव, अर्थ पारगामी भव, शब्दार्थ पारगामी भव।

१४. उपनयन (उपनीति) संस्कार—

शुभ मुहूर्त — (बार) रवि, सोम, बुध, गुरू, शुक्र (नक्षत्र) अश्वति, पुनर्वसु, पुष्प,उत्तरात्रय, रोहणी, अश्लेषा, स्वाति, श्रवण, घनिष्ठा, शतभिषा, मूल रेवती, मृगाशिरा, चित्र। रक्षाबंधन के दिन शुभ है। पंचांग शुद्धि परमावश्यक है।

'आयु' — बालक की आयु १६ या २२ या २४ वर्ष तक अवश्य हो जाना चाहिए। इस संस्कार के बिना बालक के किसी भी धार्मिक कार्य में सम्मलित होने की पात्रता नहीं है। (जिनसेन स्वामी)

संस्कार — यज्ञोपवीत क्रिया पिता को अथवा स्वगोत्रीय पुरूष के द्वारा ही बालक को करें। बालक की माँ रजो धर्म से शुद्ध होना चाहिए।

क्रिया के पूर्व — बालक का मुंडन कराया जाऐ। हल्दी—घी , सिंदूर—दूब का शिर पर लेपन कराया जाऐ। नवीन उज्ज्वल वस्त्र पहने। गृहस्थाचार्य विधिवत यंत्राभिषेक पूजन करे और सामने बालक को बैठाऐ। हवन करे तब बालक को पूर्व मुख बार्इं ओर बैठाऐ। पश्चात् नीचे लिखे मंत्र से आहुतियां दें और इसी मंत्र को पढ़ कर बालक के मस्तक पर पुष्प डालें।

मंत्र — परमनिस्तारक लिंग भागी भव— परमर्षि लिंग भागी भव— परमेन्द्र लिंग भागी भव—परमराज्य लिंग भागी भव— परमार्हन्त्य लिंग भागी भव—परम निर्वाण लिंग भागी भव।

यज्ञोपवीत धारण — यज्ञोपवीत को चंदन— हल्दी में रंग कर बालक नीचे लिखा मंत्र पढ़कर पहने।

मंत्र — ॐ नम: परमशान्ताय शान्तिकराय पवित्री कृतार्हं रत्नत्रय स्वरूपं यज्ञोपवीतं दधामि मम् गात्रं पवित्रं भवतु अर्हं नम: स्वाहा। यज्ञोपवीत पहन चोटी में गांठ लगाऐ। नए सफेद धोती दुपट्टा पहने गले में माला पहने। माथे पर तिलक लगाऐं तथा गृहस्थाचार्य द्वारा नीचे लिखा मंत्र पढ़ा जाऐ बालक अपने हाथ से मस्तक पर पुष्प डाले। माला—वस्त्र छुए।

मंत्र — ॐ णमो अर्हते भगवते तीर्थंकर परमेश्वराय कटि सूत्रं परमेष्ठिने ललाटे शेखरं शिखायां पुष्प मालां च दधामि मां परमेष्ठिन: समुद्धरन्तु, ॐ श्रीं ह्रीं अर्हं नम: स्वाहा।’’ पिता नीचे लिखा श्लोक बोलकर तिलक करें—

मंगलं भगवान वीरो मंगलं गौतमो गणी।

मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो जैन धर्मोस्तु मंगलं।।

तथा नीचे लिखा मंत्र पढ़कर रक्षा सूत्र दाएें हाथ में ३ फैरे में बांधे, ३ गांठ लगाऐं— ॐ णमो अर्हते सर्वं रक्ष—रक्ष ह्रूँ फट् स्वाहा सम्यकदर्शन ज्ञान चारित्र वर्धनाय रक्षासूत्रं धारयामि नम:। पुन: बालक की कमर में मौजी नीचे लिखा मंत्र पढ़कर बांधे— मंत्र— ‘‘ ॐ ह्रीं कटि प्रदेशे मौजी बंधं प्रकल्पयासि स्वाहा।’’ पश्चात् मौली, कटि वस्त्र, कोपीन, पर पुष्प—अक्षत नीचे लिखा मंत्र पढ़कर डालें— मंत्र — ‘‘ ॐ णमो अर्हते भगवते तीर्थंकर परमेश्वराय कटि सूत्रं कौपीन सहितं मौजी बंधनम् करोमि पुण्य बंधो भवतु असिआ उसा नम: स्वाहा। बालक गृहस्थाचार्य से हाथों की अंगुली में गंध अक्षत फल लेकर आत्म कल्याण की इच्छा से हाथ जोड़कर व्रतार्थ याचना करे। गृहस्थाचार्य निम्नांकित मंत्र बोलकर व्रतपालन में दृढ़ता रखे— ‘‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कुमारस्योपनयनं करोमि अयं विप्रोत्तमो भवतु अ सि आ उसा स्वाहा’’ व्रत १. पांच पापों का एक देश त्याग,

२. अष्ट मूलगुणों का धारण करना,

३. बाह्य मिथ्यात्व, अन्याय, अभक्ष एवं सप्त व्यसनों का त्याग।

४. पानी छानकर पीना,

५. विवाह होने तक ब्रह्मचर्य पालने की प्रतिज्ञा लेना। इसके अलावा

१. प्रतिदिन णमोकार मंत्र की माला फैरना।

२. खाट पर शयन न करना।

३. अन्य शरीर स्पर्श—काष्ठदन्त धावन—हरी लकड़ी की दातुन नहीं करना। अंजन—उबटन का त्याग करे।

४. नित्य स्नान करे।

५. जिन भगवान का दर्शन—पूजन करना।

विशेष १. यज्ञोपवीत तालुरंध्र से लटकता हुआ नाभि तक ही होना चाहिए। लघु शंका करते समय जनेऊ दाहिने कान पर और दीर्घ शंका में बाऐं कान पर चढ़ा लेना चाहिए।

२. सूतक पातक के अंत में अथवा मलीन हो जाने पर गले से निकाल कर धो लेना चाहिए और टूट जाने पर बदल कर पुराना नदीं में डाल देना चाहिए। ब्रह्मचारी एक गृहस्थ दो जनेऊ पहने।

१५. व्रत चर्या संस्कार— (१६ वर्ष में)

विद्या अध्ययन करता हुआ ब्रह्मचारी क्रम से निग्र्रन्थ गुरू के समीप अपने संयमित जीवन के संस्कारों को दृढ़ करने गुरू मुख से श्रावकाचार का और फिर आध्यात्म शास्त्रों का ज्ञान कर लेने के लिए तथा व्याकरण, न्याय, अलंकार, छन्द, गणित, ज्योतिष आदि यथा शक्ति पढ़ता है। तथा उपवास कर अध्यन्न की दक्षता प्राप्त करता है।और अपने संयमित जीवन में दृढ़ता लाता है।

१६. व्रतावतरण संस्कार अथवा १७ वैवाहिक संस्कार

यदि संयम मार्ग में आगे बढ़ना है तो अपने माता—पिता से आज्ञा लेकर आचार्य के पादमूल में नवधा भक्ति पूर्वक सप्तम प्रतिमा तक के व्रत अंगीकार कर आध्यात्मिक ज्ञान की वृद्धि में तन्मय रहता है। वह

१. सम्यक्दर्शन की शुद्धि के साथ संसार—शरीर—और भोगों से विरक्त होकर पंचपरमेष्ठी के प्रति समर्पित रहता है । सप्त व्यसनों का त्याग तथा श्रावक के अष्ट मूलगुणों को धारण करता है।

२. श्रावक के समस्त नियमों का पालन करते हुए १२ व्रतों का निरतिचार पालन करता है।

३. तीनों संध्याओं में विधि पूर्वक सामायिक करता है।

४. अष्टमी चतुर्दशी को प्रोषधोपवास करता है।

५. हरी शाक सब्जी फल को अग्नि से संस्कारित करने तथा अस्त्र से छिन्न—भिन्न किए बिना नहीं खाता।

६. दिन में स्त्री के संसर्ग का त्याग करना तथा रात्रि भोजन की अनुमोदना भी नहीं करता। मनवचनकाय से स्त्री मात्र के संसर्ग का त्याग करता है।

७. गृहस्थ के कार्यों के प्रति उदासीन रहता है तथा वैराग्य की ओर उत्साहित रहता है।

८. संसार शरीर भोगों के प्रति विरक्त रहता हुआ माया, मिथ्या, निदान जैसी शल्यों से दूर रहता है।

९. आचार्य के पास रहता हुआ आगे बढ़कर सन्यास आ श्रमी होकर मुfक्त मार्ग को साधन करता है।

अथवा विद्याध्ययन कर लेने पर गुरू साक्षी में देव पूजादि विधि पूर्वक गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के लिए सर्व व्रतों को त्याग कर श्रावक योग्य आठ मूलगुणों को धारण करता है और कदाचित क्षत्रिय धर्म के पालनार्थ कोई शस्त्र धारण करता है।

विद्या अध्ययन समाप्त हो जाने पर गुरू की साक्षी में पुन: आभूषण आदि को गृहण करके गृहस्थ में प्रवेश करना। अष्ट मूलगुणों में मद्य मांसमधु का त्याग, पांच उदम्बर फलों का त्याग, जल छानकर पीना रात्रि भोजन का त्याग, जीवदया एवं परमेष्ठी की आराधना । इन अष्ट मूलगुणों को जीवन भर पालन करना है क्योंकि यह जैन का चिन्ह है।

श्रावण माह में श्रवण नक्षत्र सहित शुभ मुहूर्त में यंत्राभिषेक पूजन हवन आदि करके गृहस्थाचार्य को मौजी खोलकर देवे तथा गृहस्थों के पहिनने योग्य वस्त्रादि को धारण करें तथा गृहस्थों के मूलगुण उत्तरगुणों का पालन करते हुए कुलोचित्त व्यापार आदि करे तथा श्रावक का विवाह आदि संस्कार करें।

नोट १. वैवाहिक संस्कार के लिए पृथक से विवाह संस्कार विधि का आलेखन किया गया है।

२. शेष सभी संस्कार संयम मार्ग पर आते ही सम्पन्न किए जाते हैं । जिससे वह अगली पर्यायों में तत्स्वरूप मोक्ष की पात्रता प्राप्त करें। और उत्तम पर्याय—उत्तम पद— उत्तम सुख के साथ मोक्षाधिकारी बने।

३. विवाह सांकर के समय १८ से २१ तक के संस्कार गृहस्थाश्रम में किए जाते हैं। १६ वां व्रताचरण संस्कार आवश्यक नहीं है। यदि वह गृहस्थावस्था में रहना चाहता है तो विवाह संस्कार किया जाए।

प्रतिष्ठाचार्य पं. विमलकुमार जैन सोंरया'
प्रधान सम्पादक'
वीतराग वाणी—जुलाई —अगस्त,२०१४'