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मोक्षमार्ग में मंदिर का महात्म

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मोक्षमार्ग में मंदिर का महात्म

महात्माओं ने कहा है कि जिनके घर से मन्दिर दूर है उनका घर नरक के पास है। धरती पर आए सभी प्राचीन एवं अर्वाचीन धर्मों में मन्दिर की आवश्यकता को स्वीकृति मिलती आई हैं, चाहे व्यक्ति की मान्यता अनुसार उसका नाम गिरजा, मस्जिद, गुरुद्वारा, स्थानक कुछ भी हो।

दिगम्बर जैन धर्म में र्मूितमान के साथ ही मन्दिर की मान्यता है। बिम्ब या चित्र का दिल दिमाग पर शीघ्र स्थायी प्रभाव पड़ता है यह सर्वजनमान्य है। मन्दिर में मूर्ति नहीं रखने वाले भी उनके सन्त, साधु, महात्मा, मन्दिर आदि के चित्र या प्रतिकृति की कभी भी अवहेलना या अनादर नहीं कर सकते। यही तो आकृति की स्वीकृति है।

सम्यग्दर्शन की प्राप्ति में जिनबिम्ब की महत्वपूर्ण भूमिका है। देवों के विमानों में नन्दीश्वर द्वीप के जिनालयों में ५०० धनुष की अति मनोज्ञ जिनबिम्ब हैं उनके दर्शन से देवों में सम्यग्दर्शन हो सकता है। मनुष्यों को जिनबिम्ब के दर्शन श्रद्धा—भक्तिपूर्वक करने से सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो सकती है। निधत्त—निकाचित कर्म भी मन्द पड़ सकते हैं एवं सम्पूर्ण रूप से समाप्त भी हो सकते हैं।

प्रत्येक जैन का यह प्रधान लक्षण रहा है कि प्रात: नित्य देवदर्शन अति आवश्यक है। दूसरा लक्षण रात्रि भोजन नहीं करना। तीसरा पानी छान कर ही पीना हैं ।मुझे याद है बचपन में भी मन्दिर जाकर दर्शन करके चन्दन की बिन्दी ललाट पर लगा कर आने पर ही प्रात:काल का नास्ता मिलता था। आजकल युवावर्गों में एक फैशन चल पड़ा है कि मन्दिर जाना फालतू काम है। संस्कार एवं संस्कृति मातापिता से ही मिलती है और उनमें ही रुचि का अभाव देखा जाता है।

धर्म के संस्कार के बिना वे ही युवा बड़े होने पर वृद्ध माता पिता की सेवा करने के कार्य को भी बोझ समझने लगते हैं। बचपन से ही धार्मिक संस्कार एवं साधु सन्तों के पास समागम से आचरण सदाचार का बन पाता है।

कुछ व्यक्तियों की धारणा है कि नित्य नये मन्दिर बनते जा रहे हैं यह ठीक नहीं। अन्य धर्मों की तुलना में जैनधर्म की प्राचीनता इन मन्दिर और जिनबिम्बों की बहुलता से ही सर्वजन मान्य है। इतने मन्दिर तब ज्यादा नहीं लगते थे जब जैनियों की संख्या करोड़ों में थी। नगरों की भिन्न—भिन्न कॉलोनियों में मन्दिर भी तो पास पास ही चाहिए। दूर मन्दिर होने पर प्रात:काल की व्यस्तता में माता पिता एवं बच्चे भी मन्दिर नहीं जा पाते। शास्त्रों में तो आवश्यकता पड़ने पर गृह चैत्यालय भी बनाने का उपदेश है।

प्रात:काल जिनको ग्राम—नगर से दूर बाहर किसी काम से जाना हो तो मन्दिर जाकर देवदर्शन करके ही जाना चाहिए। स्कूल जाने वाले बच्चे एवं बालकों को भी दिनभर में एक बार देवदर्शन करके ही जाना चाहिए।

स्कूल जाने वाले बच्चे एवं बालकों को भी दिनभर में एक बार देवदर्शन जरूर करने के लिए भेजना अभिभावकों का एक जरूरी कर्तव्य है। छुट्टियों के दिनों में तीर्थ वन्दना एवं सन्त समागम में सपरिवार जाना चाहिए। नये नये स्थानों के चमत्कारिक अतिशयपूर्ण मन्दिर एवं जिनेन्द्र भगवान के दर्शन से उत्तमोत्तम ऊर्जा प्राप्त होती है। उनके हाथ से, नाम से दान भी देना चाहिए। योग्यता हो तो साधु सन्तों को आहार दान भी दिलाना चाहिए। जीवन में धर्म का प्रवेश सहज एवं सरल हो पाता है।

बात मन्दिर की जरूर ही है तो मन्दिर की समस्या या कोई द्रव्य अपने घर में अपने प्रयोग में भोग—उपभोग में नहीं लाना चाहिए। वह देवद्रव्य निर्माल्य है उसको भोगना तीव्र पापकर्म का बन्ध कराता है। मन्दिर की जमीन जायदाद हड़पना, वहां की जमीन में दुकान—मकान का किराया तत्कालीन मौल—भाव के अनुसार नहीं देना भी चोरी के समान है, जीवन बर्बाद कर देने वाला है। मन्दिर की आमदनी के रुपये प्रतिष्ठाचार्य विधानाचार्य को देना भी नहीं चाहिए। यदि वह निर्माल्य है तो लेना भी नहीं चाहिए।

मन्दिर के पास मकान है तो मन्दिर के कलश शिखर की छाया मकान पर पड़ती है तो बीच में एक दिवाल खड़ी कर देना चाहिए। कभी भी अपने मन—वचन—काय से मन्दिर या देव का अनादर नहीं करना चाहिए।

जिस मन्दिर में जैसी परम्परा, पूजा अर्चना उपासना की चल रही है उसमें तर्क—वितर्क या विवाद विसम्बाद नहीं करना चाहिए। उनकी मान्यता को ठेस पहुंचाये बगैर यदि कोई सुधार या सुझाव देना भी हो तो सामान्य उपदेश देवें, दबाव नहीं डालना चाहिए।

मन्दिर में किसी भी प्रकार के दान की घोषणा या स्वीकृति की रकम यथाशीघ्र देना चाहिए। देर हो गई हो तो बैंक की ब्याजदर से जोड़कर ब्याज के साथ मूलधन भी देना चाहिए। विलम्ब करने से क्या पता पाप के उदय में देने की स्थिति भी रहे या नहीं रहे। बोलियों की रकम भी तकादा करके जल्द ही वसूल कर लेनी चाहिए।

मन्दिर एक धर्मायतन है। इसका दुरूपयोग एवं असादना नहीं करनी चाहिए। अन्य धर्मावलम्बियों के मन्दिर एवं देवी देवताओं के प्रति असम्मानजनक व्यवहार या बोलचाल नहीं करना चाहिए। अपने धर्म की महानता बताने में उनके धर्म का अपमान भी नहीं करना चाहिए। अपने पास आई पत्र—पत्रिकायें, पुस्तके अनावश्यक जो हो उन्हें मन्दिर में कचरे के रूप में रखना भी जिनवाणी का अनादर है जो नहीं करना चाहिए गुरुजनों से पूछकर यथायोग्य कार्य करना चाहिए।

मन्दिर की प्राचीनता में जिनबिम्ब में अतिशय प्रकट होते हैं। श्रद्धा—भक्ति से पूजा पाठ करने से सातिशय पुण्य का उपार्जन एवं पाप का क्षय एक साथ होता है। यह हमारी धरोहर है। इसकी यथोचित सुरक्षा एवं सुव्यवस्था हमारा जन्मसिद्ध अधिकार एवं कर्तव्य है। इस प्रकार वर्तमान विषम पंचमकाल में मन्दिर एवं जिनबिम्ब मोक्षमार्ग का एक समर्थ साधन है।



लेखक—ब्र. शान्ति कुमार जैन (संघस्थ मुनिश्री १०८ प्रमाणसागरजी महाराज)
जैन जनवाणी दिसम्बर—जनवरी २०१४-१५