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रात्रि में बड़े भोज का आयोजन एवं सामूहिक भोज में जमीकंद का प्रयोग उचित नहीं

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रात्रि में बड़े भोज का आयोजन एवं सामूहिक भोज में जमीकंद का प्रयोग उचित नहीं

सामाजिक दृष्टि से चिंतन करें तो भी रात्रिभोज आयोजन को उचित नहीं कहा जा सकता। क्योंकि समाज में हर व्यक्ति समर्थ नहीं होता। प्राय: सौ घरों में से ८० घर आर्थिक दृष्टि से असमर्थ होते हैं। २० व्यक्तियों के द्वारा किए गए आयोजनों का अनुकरण अन्य ८० लोगों को भी प्रतिष्ठा के कारण करना पड़ता है। यदि विवाह आदि का आयोजन दिन में हो तो डेकोरेशन का खर्च बच सकता है। यह खर्च अनावश्यक है। दूसरी बात रात्रि भोजन का बचा हुआ खाना किसी को देने में काम नहीं आता, नाली में बहाया जाता है जो नई हिंसा को जन्म देता है। एक ओर भारत में कई लोगों को पेट भरकर भोजन नहीं मिलता वहीं दूसरी ओर नाली में भोजन को डालना राष्ट्रहित की दृष्टि से भी अनुचित है। दिन में किये गये आयोजन में बचा हुआ भोजन उसकी भूख को मिटाने के साथ पुण्योपार्जन में भी सहायक होता है। अन्न को प्राण कहा गया है—‘‘अन्नं वै प्राणा:।’’ अत: उसके कण—कण का सदुपयोग होना चाहिए।

परम्परा की दृष्टि से विचार करें तो कुछ दशकों पूर्व बड़ा व्यक्ति वह होता था जो समाज को साथ लेकर चलता था। वह चाहे अरबपति हो, पर अपने भाई की, पड़ौसी की और जाति के लोगों की चिंता करता था। पहले लापसी और सीरा दो ही मुख्य मीठे व्यंजन होते थे। वे समाज के अनुसार व्यंजनों की संख्या सीमित रखते थे ताकि हर व्यक्ति का निर्वाह हो सके। उनका चिंतन रहता था कि सामाजिक आयोजन इस प्रकार के हों कि कोई व्यक्ति उलझन में न पड़े। आज खर्चीचे एवं बड़े आयोजनों के कारण आम लोग उलझन में पड़ जाते हैं तथा आयोजन करके कर्ज में दबे रहते हैं। अत: रात्रि भोजन के त्याग के साथ दिन के भोज में व्यंजनों की संख्या भी सीमित होनी चाहिए।

स्वास्थ्य की दृष्टि से विचार करें तो रात्रिभोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सूर्य के प्रकाश में भोजन का पाचन आसान होता है। जबकि रात्रि में किए गए भोजन और शयन में अधिक अंतराल नहीं होने के कारण वह भोजन वायु विकार को उत्पन्न कर पाचन तंत्र को गड़बड़ा देता है। चिकित्सा शास्त्र के अनुसार भोजन और शयन में तीन—चार घंटे का अंतराल आवश्यक है। योगशास्त्र में कहा गया है कि रात्रि में हृदय कमल और नाभि कमल संकुचित हो जाता है। अत: रात्रि में पाचन आसन नहीं होता, रोग का हेतु बन जाता है।

रात्रि भोजन अनेकानेक दोषों का घर है, घोरहिंसा का कारण है और न केवल धार्मिक दृष्टि से वरन् स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सर्वथा हेय है। रात्रि भोजन से त्रस जीवों कीहिंसा होती है साथ ही भोजन के साथ त्रस जीवों के पेट में चले जाने से मांसभक्षण भी हो जाता है। इन र्धािमक दोषों के अतिरिक्त शारीरिक दोष भी राित्र भोजन से होते हैं और स्वास्थ्य में भी विकार उत्पन्न होता है कहा भी है—

मेघां पिपीलिका हन्ति यूका कुर्याज्जलोदरम्।

कुरुते मक्षिका वान्ति, कुष्टरोगञ्च कोलिक:।।
कण्टको दारुखण्डञ्च वितनोति गलव्यथाम्।
व्यञ्जनान्र्तिनपतितस्तालुं विध्यति वृश्चिक:।।
विलग्नश्च गले बाल: स्वरभंगाय जायते।
इत्यादयो दृष्टदोषा: सर्वेषां निशिभोजने।।

अर्थात् भोजन में कीड़ी (चिउंटी) चली जाय तो बुद्धि का नाश होता है, जूं चली जाय तो जलोदर नामक भयंकर रोग हो जाता है, मक्खी चली जाय तो वमन हो जाता है, मकड़ी चली जाय तो कोढ़ हो जाता है, कांटा या फांस मिल जाय तो गले में व्यथा हो जाती है, व्यंजनों में मिलकर बिच्छू पेट में चला जाय तो तालू वेध डालता है, बाल गले में चिपक जाय तो स्वर—भंग हो जाता है इत्यादि अनेक दोष रात्रि भोजन में प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होते हैं।

भक्ष्य—अभक्ष्य की दृष्टि से विचार किया जाये तो रात्रिभोजन तामसिक होता है, विकार बढ़ाता है। अत: इस दृष्टि से भी रात्रि भोजन त्याज्य है। इस प्रकार सभी दृष्टियों से विचार करने पर रात्रि भोजन अनेक दोषों का घर प्रतीत होता है। साधुओं को तो सब प्रकार से रात्रि भोजन का त्याग होता है—

एयं च दोस दट्ठुणं णायपुत्तेण भासियं।

सव्वाहारं ण भुंजंति, णिग्गंथा राइभोयणं।।

ज्ञातसुत भगवान् महावीर द्वारा उपदिष्ट पूर्वोक्त दोषों को देखकर निग्र्रंथ रात्रि में सब प्रकार का आहार नहीं भोगते हैं। श्रावक यदि सब प्रकार का रात्रि भोजन त्याग न करे तो उसे रात्रि में सामूहिक भोजन का त्याग अवश्य करना चाहिए।

उपसंहार—रात्रि भोजन के ऐसे कई दोष हैं जो मिथ्यादृष्टियों के लिए और सम्यग्दृष्टियों के लिए भी समान हैं। यही कारण है कि जैनेतर ग्रंथों में भी रात्रि भोजन का निषेध किया गया है।

रात्रि भोजन को जब मिथ्यादृष्टि भी हेय मानते हैं और प्रत्यक्ष अनेक हानियाँ उससे होती हुई प्रतीत होती हैं तब श्रावकों को तो रात्रि भोजन का त्याग करना ही चाहिए। रात्रि भोजन के त्याग का जो उद्देश्य है उसकी र्पूित करने के लिए न केवल रात्रि में ही भोजन का त्याग करना चाहिए, किन्तु दिन में भी जहाँ आलोक का भलीभाँति प्रकाश न होता हो ऐसे स्थान पर भोजन नहीं करना चाहिए। हेमचन्द्राचार्य ने कहा है कि संध्या के समय, जब सूर्य का प्रकाश मंद पड़ जाता है, भोजन का त्याग कर देना चाहिए। कहा भी है—

दिवसस्याष्टमे भागे, मन्दीभूते दिवाकरे।

नक्तं तु तद्विजानीयान्ननक्तं निशिभोजनम्।।

अर्थात् रात्रि में जीमना ही रात्रि भोजन नहीं है वरन् दिन के आठवें भाग में, सूर्य का प्रकाश मंद हो जाने पर भोजन करना भी रात्रि भोजन की गणना में सम्मिलित है, क्योंकि रात्रि भोजन संबंधी दोष उस समय भी होते है।।

रात्रि भोजन का त्याग नहीं करने पर रात्रि में भोजना बनाया जाता है जिससे घोरहिंसा होती हैं त्रस जीवों कीहिंसा से अंधकार में बचना शक्य नहीं है अतएव रात्रि में भोजन बनाने वाला त्रस—हिंसा के पाप का भागी होता है और उस भोजन का उपभोग करने वाला मांसभक्षण का दोषी ठहर जाता है। ऐसे भीषण पाप से बचने के लिए रात्रि में भोजन बनाना, रात्रि में भोजन जीमना और रात्रि भोजन कराना—सभी का त्याग करना चाहिए। किन्तु हम गृहस्थ हैं—संसारी हैं कदाचित् रात्रि में भोजन बनाने एवं भोजन कराने के प्रत्याख्यान विवशता वश न ले सके तो कम से कम रात्रि में बड़े भोज आयोजित करने के त्याग तो अवश्य करें।


सम्यग्दर्शन मासिक समाचार पत्र
२ फरवरी २०१५